लेखक परिचय

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

सिद्धार्थ मिश्र “स्वतंत्र”

विगत २ वर्षो से पत्रकारिता में सक्रिय,वाराणसी के मूल निवासी तथा महात्मा गाँधी कशी विद्यापीठ से एमजे एमसी तक शिक्षा प्राप्त की है.विभिन्न समसामयिक विषयों पे लेखन के आलावा कविता लेखन में रूचि.

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NETAसिद्धार्थ मिश्र ”स्‍वतंत्र आजकल इ ससुरी विचारधारा के नाम पर बड़ी मारामारी है । उ विचारधारा मजदूरों की उ अमीरों फलानी विचारधारा भगवा है और ढमाकी पाकिस्‍तानी । का है इ विचारधारा जिसके नाम पर सारे गुरू घंटाल दिन रतियै हल्‍ला मचाते रहते हैं ?  हमको तो समझ नहीं आता……कहां का विचार अउर कउन सी धारा…..राजनीति में तो एके धारा चलती है उ है अवसर की धारा ………..जहां से सुविधा बरकरार रहे उस विषय पर विचार करीये और बह जाइये धारा में । जैसे इ देश विकास की धारा में रोजे बह रहा है । टीवी नहीं देखते का……टीवी पर मौनी बाबा रोजाना ही भारत निर्माण दिखाते हैं । अबही इहै कुल सोचे रहे थे कि छेदी गुरू अचानक प्रकट हो गये । मुंह में पान और लकलक कुर्ता । मेरी ओर देखे और बोले- छेदी गुरू – का हो स्‍वतंत्र जी,का हाल  हैं ? मैं-  कुछो नहीं गुरू इ सब लोग विचारधारा विचारधारा चिल्‍ला रहे थे । उहे सोच रहे थे । छेदी गुरू-  अरे त इमे गलत का है गुरूदेव,आपो लोग छोटी छोटी बतिया पर घंटों बर्बाद कर देते हैं ।  गुरू विचारधारा है उ पैंतरा जो विरोधी को चारों खाने चित्‍त कर आपको मुख्‍यधारा में ला देती है । नहीं तो आपे बताइये इ सियासत करने वालों कउनो एक नाम जो अपने विचार के साथ ठहरा हो । सब साले रंगे सियार हैं । मैं – काहे गुरू अइसा काहे कह रहे हैं ? बहुत से लोग हैं……… छेदी गुरू-  अरे महराज कउनो एक नाम गिना दीजीये । मैं- मुखर्जी जी उपाध्‍याय जी अउर भी कई नाम हैं । छेदी गुरू- धत बुरबक इ सब तो पुरनिये हैं,कउनो नयकन में बताओ तो जानें । सही कह रहे स्‍वतंत्र जी अगर इ लोग जिंदा होते तो आज अपने चेलवन का चाल चलन देखकर कपार पीट लेते । बनवाने को घंटा नहीं अउर करा दिये महाभारत अब कहते हैं विकास करेंगे । अउर सच बोल दो झंटुआ जाएंगे । मैं- गुरू जी आपकी बात से निराशा झलक रही है । विकास में का बुराई है ? छेदी गुरू – अबे कउन कहा कि विकास में बुराई है । खूब कराओ विकास दिन कराओ रात कराओ पर इ बीच में विचारधारा काहे पेल रहे हो । इ है चूतीयापा गलत है । एक बात जान लो विचारधारा पुरनियों के साथ परलोकवासी हो गयी है । अरे किसी साले का नीयत इतना साफ है तो दोअर्थी संवाद काहे को बोलता है । खुल के कहो तुम्‍हारा एजेंडा का है । जिसको पसंद आएगा उ साथ रहेगा जिसको नहीं आएगा उ दूर चला जाएगी । बाकी बुरबक बनाने वाला धंधा हमे पसंद नहीं है । मैं- गुरू आप तो झूठो गरमा रहे हैं ? गुरू-  कहां गरमा रहे हैं बचवा…….इहे तो कह रहे हैं कि विचारधारा की नौटंकी और विरोधी की शिकायत करने वाले अपने समाधान या विकास का नजरिया जनता के सामने रख दें । अउर पांच साल बाद देख लिया जाएगा कि उ अपनी बात पर कितना कायम हैं । अउर नहीं त इ रणरोवन बंद होना चाहीये कि हम उस विचारधारा के हैं । इ सब साले सुविधाभोगी कौम के लोग हैं । मैं – गुरूदेव मैं भी विचारधारा का समर्थक हूं । अउर इसमें बुराई क्‍या है ? गुरू -अबे इसी लिये तो तुम सब कार्यकर्ता ही है । कार्यकर्ता और नेता की विचारधारा में जमीन आसमान का अंतर होता है । कार्यकर्ता विचारधारा विचारधारा पगुराता है अउर नेता मुक्‍तधारा का प्राणी होता है । या अउर साफ शब्‍दों में कार्यकर्ता को बैल बनाकर उससे सियासत का हल चलाने वाला चतुर किसान नेता होता है । कार्यकर्ता को त्‍यागी होना आवश्‍यक है नेता का विलासी होना धर्म है । कार्यकर्ता से कौड़ी का हिसाब लिया जाता है, नेता की एक सभा में अरबों चले जाते हैं । या यूं समझो विचारधारा कार्यकर्ताओं को काबू में करने का एक झुनझुना है । जिसे बजा बजा कर कार्यकर्ता आत्‍ममुग्‍धता की अवस्‍था से विक्षिप्‍तावस्‍था तक का सफर तय करता है । समझे तुम…. अब हम का कहें कड़वा ही सही पर गुरू कह तो सहीये रहे थे । आगे आप जानो…….

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