लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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      laluआदरणीय लालू भाई,

जै राम जी की।

हम इहां राजी-खुशी से हैं। उम्मीद करते हैं कि आप भी रांची जेल में ठीकेठाक होंगें। ई सी.बी.आई का जजवा बउरा गया था क्या? ई बात उसका दिमाग में काहे नहीं घुसा कि आदमी जानवर का चारा कैसे खा सकता है? जानवर आदमी का चारा हज़म कर सकता है। गऊ माता को रोटी खिलाओ, वह खा लेगी, दाल पिलाओ – दूध बढ़ा देगी, लेकिन आदमी कैसे भूसा और पुआल खा सकता है? जब हमारे जैसा आर्डिनरी आदमी भी यह बात जानता है, तो जज के समझ में ई बतिया काहे नहीं आई? आप सोनिया भौजी को रंग-अबीर लगाते रह गए, वह मौका पाते ही ऐसा दाव मारी की आप परुआ बैल की तरह चारो खाने चित्त हो गए। देखिए जिसको बचाना था, उसको साफ बचा लिया। तनिको रेप नहीं आया। मायावती बहिन और मुलायम चाचा ने का कम पैसा कमाया था? इधर सीबीआई का जज आपको फंसा रहा था आ उधर वही सीबीआई बहिनजी और चाचा को क्लीन चिट दे रहा था। ई सब काम नीतिश भाई का है। वह आजकल दिल्ली दरबार का बहुत चक्कर लगा रहा है। उसका भी वही होगा जो आपका हुआ। काम निकल जाने के बाद ई जमाना में कवन किसको पूछता है!

एक बात आपको बताना हम उचित समझते हैं। आप भी कहीं कहने मत लगिएगा कि जान न पहचान, एतना लंबा चिठ्ठी कौन लिख दिया? सो, परिचय बताना जरुरी है। हमारा आपका जन्म एके जिला में हुआ है। हम दोनों गंजी हैं – आप गो्पालगंजी हैं हम महराजगंजी हैं। जब आप पटना यूनिवरसिटी की राजनीति कर रहे थे, तो हम बीएचयू की छात्र राजनीति में सक्रिय थे। उस समय हिन्दुस्तान के लगभग सभी विश्वविद्यालयों में आरएसएस वाले अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद और समाजवादी युवजन सभा में छात्र संघ को कब्जा करने के लिये गलाकाट मुकाबला हुआ करता था। बीएचयू में तो दोनों युवा संगठनों के नेता और कार्यकर्त्ता एक दूसरे के खिलाफ़ साल भर बाहें चढ़ाए रहते थे। आपस में समझौते की कभी गुंजायश ही नहीं रहती थी। लेकिन आपने गज़ब का काम किया। पटना यूनि्वर्सिटी का अध्यक्ष बनने के लिए आपने एसवाईएस का आरएसएस से समझौता करा दिया। विद्यार्थी परिषद वाले तैयारे नहीं हो रहे थे। आपने नानाजी देशमुख और गोविन्दाचार्य से उन्हें खूब डांट खिलवाई। अन्त में समझौता हुआ। आप अध्यक्ष पद के संयुक्त उम्मीदवार बने, सुशील मोदी महासचिव और रवि शंकर प्रसाद सह-सचिव के उम्मीदवार बने। कांग्रेस और कम्युनिस्ट गठबंधन के खिलाफ़ आप लोगों ने शानदार जीत हासिल की थी। जेपी आन्दोलन में भी आप तीनों कंधे से कंधा मिलाकर लड़ते रहे।  तब आप मेरे भी हीरो थे। लेकिन बुरा हो इस वोटतंत्र का! अल्पसंख्यक वोट के लिए आपने क्या नहीं किया! टोपी पहने, नमाज़ पढ़े, ज़कात दिये, रोज़ा इफ़्तार किये और आडवानी बाबा को गिरफ़्तार भी किए। लेकिन सोनिया भौजी की तरह यह कौम भी आपके साथ बेवफ़ाई कर गई। नीतिशवा का ज़ालीदार टोपी पहनना ढेर कारगर रहा। वह आपसे तेज निकला। आपका सब वोट-बैंक हड़प गया। पिछड़ों में अति पिछड़ा बनाया, दलितों में अति दलित तो मुसलमानों में पश्मान्दा मुसलमान बना डाला। दो  चुनावों में तो आपको चित्त कर ही दिया। अगर आपको भी  लोक सभा की २५ सीट मिली होती, तो किस सीबीआई की मजाल थी कि आपसे पूछताछ भी कर सके।

ये पत्रकार भी बेपेंदी के लोटे होते हैं। हमेशा उगते सूरज  को ही प्रनामापाती करते हैं। कभी ये सब आपको मैनेजमेन्ट गुरु कहते थे, किंग मेकर कहते थे, धरती का बेटा कहते थे। आप थे भी। अनपढ़ रबड़ी को मुख्यमंत्री बना दिया, देवगोड़ा को प्रधानमंत्री बना दिया, गुजराल तो गुज़रे ज़माने की बात बन चुके थे। मनमोहन की तरह उन्होंने कभी सपने में भी सोचा था क्या कि वे पीएम बन जायेंगे? आप ने बना दिया। लेकिन आजकल के पत्रकार और कार्टूनिस्ट बहुत मज़ा ले रहे हैं। आपका फोटो मुंह में चारा दबाये और चक्की पीसते हुए छाप रहे हैं। मुकेशजी ठीके गा गये हैं – है मतलब की दुनिया सारी, यहां कोई किसी का यार नहीं, किसी को सच्चा प्यार नहीं।

तेजस्वी को  आपने काजू-किशमिश-बादाम-अखरोट खाने वाली गायों का दूध पिला-पिलाकर बड़ा तो कर दिया है, लेकिन वह पार्टी संभाल पायेगा, कहना मुश्किल है। मीसा यह काम कर सकती है लेकिन रबड़ी उससे डरती हैं। वह आयेगी तो तेजस्वी का तेज डाउन हो जायेगा। सोनिया भौजी की तरह उसको भी पुत्र-मोह है। आरे बाडी लैंगवेज भी कवनो चीज होता है कि नहीं। प्रियंका में इन्दिरा जी का लूक है लेकिन भौजी को पप्पू ही पसंद है – भले ही वह कागज़ फाड़े या संविधान फाड़े। इधर सुनने में आया कि साधु यादव फिर से आपके घर का चक्कर लगा रहा है। आंख में तो वह तभी खटक गया था जब वह आपके बच्चों और भाइयों के साथ मिलकर आपकी इच्छा के विरुद्ध अपनी बहन को बिहार का मुख्यमंत्री बनवा दिया था। आप तो कान्ति सिंह को डमी सीएम बनाना चाहते थे। सुन्दरी कान्ति कान्तिहीन रह गई। रबड़ी को सीएम बनाना आपकी मज़बूरी बन गई। नहीं बनाते तो सधुइया उसको लेकर राष्ट्रीय महिला आयोग तक जाता, आसाराम बापू के माफ़िक मुकदमा दर्ज़ कराता और जेल की चक्की जरुर पिसवा देता। आपने उसे बाहर का रास्ता दिखाया तो कांग्रेस में चला गया, फिर  नमो से मिलने अहमदाबाद गया। अब फिर बहिना-बहिना कहके रबड़ी के आगे-पीछे घूम रहा है। अब का बतायें – युगों-युगों से हर मेहरारू का अपने भाई और नैहर से प्रेम अपने शौहर से ज्यादा रहा है। कहावत भी है कि मैके का कुत्ता भी प्यारा होता है। द्वापर के युग में शकुनि गांधार से आकर हस्तिनापुर में बैठ गया। धृतराष्ट्र तो जन्मजात अंधे थे, गांधारी की आंख पर भी पट्टी बंधवा दिया। युधिष्ठिर को जुआ खिलाया, द्रौपदी का चीरहरण करवाया, महाभारत का युद्ध कराया; अपने तो मरा ही, सौ भांजों को भी ले डूबा। गांधारी को तब भी चेत नहीं आया। उनकी नज़र में श्रीकृष्ण ही अपराधी थे। उन्हीं को शाप दे डाला। यह परंपरा तब से चली आ रही है। भाई के लिए हिन्दुस्तान की हर औरत गांधारी बन जाती है।

ढेर बतकही है लिखने के लिए, लेकिन केतना लिखें? कुछ बात अगली चिठियो में भी रहना चाहिये। इहां सब मज़े है। आप तो हरफनमौला हैं। जेलवो में समय बढ़िया से काट लेते होंगे। हां, सुना है कि वहां कैदियों को आप राजनीति पढ़ा रहे हैं। भगवान के वास्ते और बिहार के वास्ते ऐसा काम मत कीजिएगा। जब ये सारे कैदी आपसे राजनीति की शिक्षा पाकर सज़ा पूरी करने के बाद बाहर निकलेंगे, तो बिहार में क्या बचेगा? आपके राज में तो किडनैपिंग के डर से हम गांव आना भी छोड़ दिये थे। नीतिश भाई के आने के बाद बड़ी मुश्किल से गांव से संबन्ध बना पाए हैं – वह भी खटाई में पड़ जायेगा। हम तो मरद आदमी हैं, कोई ठिकाना ढूंढ़ ही लेंगे, लेकिन गाय गोरू का क्या होगा। बिहार में हरी घास का एक तिनका भी बच पाएगा क्या? गाय-गोरू या तो यूपी-बंगाल की राह पकड़ेंगे या फिर बांग्ला देश के कसाईखानों की। अब सीताराम-सीताराम जपने का समय आ गया है। आप वहां यही जपें, अगले जनम में तो कम से कम कल्याण हो ही जाएगा।  भैया, अब चिट्ठी बंद कर रहे हैं। थोड़ा लिखना, ज्यादा समझना।

आपका ही

विनोद बिहारी

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1 Comment on "एक पाती – लालू भाई के नाम"

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वीपी
Guest

का कही ?ई पाती तो बहुत बढ़िया लिखी गई है ।
विपिन किशोर भैय्या भगवान से मन्नत माँगत हैं हम कि आप ऐसन ही पाती और लिखते जाएँ ।
मन में बहुत गुदगुदी भई!
दसहरा की बुत बहुत सुभकामना आपको और आपके पूरे बिरादरी व कुन्बे को !
राम राम भैया जी !

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