लेखक परिचय

मिलन सिन्हा

मिलन सिन्हा

स्वतंत्र लेखन अब तक धर्मयुग, दिनमान, कादम्बिनी, नवनीत, कहानीकार, समग्रता, जीवन साहित्य, अवकाश, हिंदी एक्सप्रेस, राष्ट्रधर्म, सरिता, मुक्त, स्वतंत्र भारत सुमन, अक्षर पर्व, योजना, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, प्रभात खबर, जागरण, आज, प्रदीप, राष्ट्रदूत, नंदन सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में अनेक रचनाएँ प्रकाशित ।

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london olympics 2012मिलन सिन्हा 

 

अबतक खींच-तान, आरोप-प्रत्यारोप  जारी है। ओलम्पिक खेल  में भारत की वापसी के रास्ते कठिन बने हुए हैं। राजनीति अपना रंग दिखा रही है। क्यों और कैसे अंतर राष्ट्रीय ओलम्पिक समिति ने अगले ओलम्पिक खेल से भारत को निलंबित करने का वह अप्रत्याशित निर्णय लिया जिससे देश की 125 करोड़ जनता का सिर शर्म से झुक गया, उस पर चर्चा कर हम आपका मूड और खराब नहीं करना चाहेंगे, बल्कि ओलम्पिक खेलों में भारत की दशा और दिशा पर एक अन्य सन्दर्भ में सार्थक चर्चा करेंगे।

 

अब भी हमारे स्मृति में कुछेक माह पूर्व संपन्न हुए लन्दन ओलम्पिक 2012 की यादें ताजा हैं, जब भारत ने ओलम्पिक खेल प्रतिस्पर्धाओं में अपने पिछले प्रदर्शन में सुधार  करते हुए कुल 6 पदक – दो रजत और चार कांस्य, हासिल किये। 17 दिनों  तक चले इस भव्य खेल आयोजन में विश्व के 204  देशों ने भाग लिया परन्तु सिर्फ 85 देशों को ही पदक तालिका में स्थान पाने का गौरव प्राप्त हुआ। ज्ञातव्य है कि अमेरिका ने 104  पदक जीत कर पहला तो चीन ने 85 पदक के साथ दूसरा और मेजबान  ब्रिटेन ने 65 पदक के साथ तीसरा स्थान हासिल किया। भारत 55 वें स्थान पर रहा।

 

परंपरा के अनुसार ओलम्पिक खेल की समाप्ति पर अधिकारियों और खेल विश्लेषकों का प्रत्याशा के अनुरूप बयान व विश्लेषण आया। भारत में ओलम्पिक खेलों से सम्बद्ध अधिकारियों, नेताओं एवं तथाकथित समर्थकों ने कम से कम निम्नलिखित तीन कारणों से भारत की उपलब्धियों को अत्यन्त उत्साहवर्धक बतलाया।  ये कारण हैं :

  • इस प्रतियोगिता में हमारे  पदकों की संख्या दोगुनी हुई  – बीजिंग ओलम्पिक, 2008 में  तीन पदक मिले थे जब कि लन्दन ओलम्पिक 2012 में हमने छह पदक हासिल किये
  • 1996 अटलांटा  ओलम्पिक  में भारत को मिले एक पदक की तुलना में यह छह गुना ज्यादा है
  • पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, नेपाल जैसे हमारे निकटतम पड़ोसी देशों को लन्दन ओलम्पिक में एक भी पदक नहीं मिले

सही है।  खुद को खुश करने और रखने को यह ख्याल अच्छा है। लेकिन, अगर नीचे प्रस्तुत तालिका पर, जिसमें लन्दन ओलम्पिक 2012 के पदक सूची में पन्द्रह शीर्ष पदक पानेवाले देशों  को उनकी आबादी को सन्दर्भ में रखते हुए, एक गहरी  नजर डालें तो दुनिया के दूसरे सबसे आबादीवाले देश के खेलनीति निर्धारकों, खेल संघों, मंत्रिओं -नेताओं  को ‘रियो ओलम्पिक 2016’ के लिए एक सशक्त व प्रभावी कार्य योजना बनाने में संभवतः कुछ सहायता मिलेगी।

 

 

क्रमांक 

देश का नाम 

स्वर्ण पदक सं

कुल पदक सं.

देश की आबादी (करोड़ में )

1

अमेरिका

46

104

31. 2

2

चीन 

38

87

135. 0

3

ब्रिटेन 

29

65

6. 2

4

रूस 

24

82

14. 2

5

. कोरिया 

13

28

5. 0

6

जर्मनी 

11

44

8. 2

7

फ़्रांस 

11

34

6. 5

8

इटली 

8

28

6. 1

9

हंगरी 

8

17

1. 0

10

ऑस्ट्रेलिया 

7

35

2. 2

11

जापान 

7

38

12. 8

12

कज़ाकिस्तान 

7

13

1. 7

13

नीदरलैंड 

6

20

1. 7

14

उक्रेन 

6

20

4. 6

15

क्यूबा 

5

14

1. 1

विश्वास है कि उपर्युक्त तालिका को देखकर सभी देशभक्तों का यह सोचना और सत्ता प्रतिष्ठान से प्रश्न करना उपयुक्त होगा कि हमारे देश के दस बड़े और अपेक्षाकृत संपन्न ( प्राकृतिक संसाधन, मानव संसाधन सहित ) प्रदेश जैसे, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, तमिलनाडू, राजस्थान,कर्नाटक  एवं गुजरात ( उत्तर प्रदेश की आबादी है 20 करोड़ जबकि गुजरात की 6 करोड़ ) अपने अपने बलवूते  पर  ओलम्पिक पदक तालिका में शामिल शीर्ष दस देशों जितना पदक क्यों नहीं जीत सकते ?

 

भारत गणतंत्र के इन  दस प्रदेशों के अलावे  कई अन्य प्रदेशों में भी यह इतनी क्षमता है कि अगर वे यह ठान लें कि अगले तीन वर्षों तक   ‘रियो ओलम्पिक 2016’ को ध्यान में रखकर  उत्साही, उर्जावान, समर्पित युवा खिलाडियों की एक ऐसी टीम तैयार करने में दृढ़ संकल्प एवं प्रभावी कार्य योजना के साथ कार्य  को पूरी ईमानदारी से सम्पादित करेंगे तो कोई कारण नहीं कि भारत आगामी ओलम्पिक खेलों में पदक प्राप्त करनेवाले पांच शीर्ष देशों में शुमार नहीं होगा। हाँ, लेकिन, इसके लिए खेल को राजनीति के दुष्प्रभावों से पूर्णतः बचाना होगा जिसके लिए सभी देशभक्तों को आगे आ कर काम करना पड़ेगा।

 

 

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