लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

Posted On by &filed under महत्वपूर्ण लेख, राजनीति.


शंकर शरण 

अन्ना आंदोलन की बाढ़ में पश्चिम बंगाल से आती एक बड़ी खबर डूब-सी गई। बंगला मीडिया में वह खबरें ‘कंकालकांड’ के नाम से आई है। पूर्वी और पश्चिमी मिदनापुर जिलों में जमीन के नीचे थोक भाव से नरकंकाल मिले हैं। प्रारंभिक जाँच में ही दिखा कि यह मार्क्सवादी पार्टी द्वारा राजनीतिक विरोधियों की सामूहिक हत्याएं थीं। खबरें विगत जून से ही उभरनी शुरू हुईं, जब मलिकडंगा गाँव में लोगों को एक ढँके गड्ढे में 7 नरकंकाल मिले। इधर पश्चिमी मिदनापुर में 31 नरकंकाल इकट्ठे मिले। फिर पूर्वी मिदनापुर में भी कई नरकंकाल गड़े मिले हैं। एक प्राथमिक पाठशाला के सेप्टिक टैंक में भी लोगों को मार कर दबा दिया गया था।

कंकालकांड के खुलने पर बुद्धदेव भट्टाचार्य के दो प्रमुख सहयोगी सुशांत घोष और लक्ष्मण सेठ उन हत्याओं के सीधे आरोपी पाए गए हैं। घोष बुद्धदेव के कैबिनेट मंत्री थे और सेठ हाल्दिया के दबंग सांसद। नरकंकालों का एक थोक घोष के घर के पिछवाड़े ही निकला है, जिनकी डीएनए जाँच के बाद उसमें तृणमूल कांग्रेस के एक समर्थक का कंकाल भी पाया गया। तब सुशांत घोष गिरफ्तार होकर जेल पहुँच गए।

यह केवल वे उदाहरण हैं जिनके प्रमाण किसी तरह सामने आ गए। ममता बनर्जी के अनुसार पश्चिमी मिदनापुर में ही कम से कम 55 और नरकंकाल कहीं न कहीं दबे पड़े होंगे। यह नहीं कि ममता कोई अभियान चलाकर ऐसे मामले खोज रही हैं। यह तो अनायास निकले कंकाल हैं, जिनमें कुछ की शिनाख्त सामान्य पुलिस जाँच में हो गई। इसलिए जहाँ हत्या के सूत्र सीधे मार्क्सवादी नेताओं से जुड़े, वहाँ कार्रवाई हुई।

इसीलिए मार्क्सवादी भी इन हत्याओं से इंकार नही कर रहे। उनकी प्रतिक्रिया ध्यान देने लायक है। वे कह रहे हैं कि यह सब पुराने मामले हैं। वहाँ मार्क्सवादी नेताओं, उनके गुडों-कार्यकर्ताओं की करतूतों के प्रमाण इतने प्रत्यक्ष हैं कि अभी कहने को भी वे आरोपों को झूठा बताने की स्थिति में नहीं। स्वयं बुद्धदेव भट्टाचार्य ने विगत 13 अगस्त को एक सार्वजनिक सभा मे कहा, नरकंकालों की “यह खुदाइयाँ योजनाबद्ध तरीके से की जा रही हैं। यह एक फासिस्ट संगठन द्वारा की जा रही बदले की राजनीति है।”

यह सब दिखाता है कि पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी सत्ता का 34 वर्षीय राज वोट-बल पर उतना नहीं, जितना क्रूर हिंसा से चलता रहा। ज्योति बसु के काल में दमन अधिक हुआ, किन्तु बुद्धदेव दौर में भी क्रूरता वैसी ही रही। स्वयं बुद्धदेव ने घोष, सेठ, माजिद मास्टर, निरूपम सेन जैसे लोगों को पूरी शह दी। उन्हें बखूबी मालूम था कि यह लोग क्या करते रहे हैं। सेनबारी नरसंहार में सेन की कुख्याति के बावजूद बुद्धदेव ने उसे अपना उद्योग मंत्री बनाया था। इसलिए, राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय कानूनों की दृष्टि से बुद्धदेव भट्टाचार्य उन सामूहिक राजनीतिक हत्याओं के सीधे सह-आरोपी बनते हैं।

मगर राष्ट्रीय मीडिया में बुद्धदेव के विरुद्ध कोई निंदा-अभियान नहीं दिखता। संभवतः सेक्यूलर-वामपंथी मीडिया प. बंगाल के कंकालकांड को दबाना चाहता है। अन्यथा, गुजरात के पूर्व मंत्री अमित शाह या कांची शंकराचार्य की गिरफ्तारी से प. बंगाल की तुलना कीजिए। कांग्रेस नेता मानस भूनिया ने गृह मंत्रालय के आकंड़ों से 1997 से लेकर 2004 के बीच पश्चिम बंगाल में 20,000 राजनीतिक हत्याएं होने की बात कही है। जबकि पार्टी ऑबजर्वर की हैसियत से कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद ने वहाँ 9,000 हत्याएं हुई बताई थी। किन्तु क्या कभी राष्ट्रीय मीडिया या राजनीति में इस भीषण स्थिति पर कोई आक्रोश-अभियान चला? इस के विपरीत संदेह या आरोप मात्र से अमित शाह और शंकराचार्य पर कोलतार पोता जाता रहा है! तब मार्क्सवादी मंत्रियों और सासंदों पर सामूहिक हत्याओं के आरोप और स्वयं बुद्धदेव द्वारा अपरोक्ष स्वीकारोक्ति के बाद भी राष्ट्रीय मीडिया मौन कैसे है?

इस प्रवृत्ति का एक कारण यह भी है कि दुनिया को कम्युनिस्ट अपराधों की वैसी व्यवस्थित जानकारी नहीं रही है, जैसी फासिस्टों के बारे में है। सोवियत संघ और पूर्व यूरोप में साम्यवाद के अंत के बाद मानवता के अपराधियों को सजा देने के लिए न्यूरेनबर्ग मुकदमे जैसी कोई चीज नहीं हुई, जैसी फासीवाद के नाश के बाद हुई थी। एकाध अपवाद को छोड़कर किसी पूर्व-साम्यवादी देश में साम्यवादी अत्याचारों के म्यूजियम नहीं बनाए गए जो आने वाली पीढ़ियों को सदैव चेतावनी देते रह सकें। साम्यवाद के शिकार लोगों की निशानियाँ, गुलाग (सोवियत यातना शिविर) जैसे भयानक लेबर कैंपों की स्मृतियाँ उस तरह नहीं रखी गईं, जैसी फासीवाद की रखी हुई हैं। ऐसे कई कारणों से साम्यवादी इतिहास के मूल्यांकन के प्रति दुनिया भर के इतिहासकारों में उदासीनता दिखाई पड़ती है।

भारत के साम्यवादियों को इस से बहुत लाभ हुआ है। उन के पुराने पापों पर पर्दा पड़ा रहा, और इसीलिए उन्हें पुनः-पुनः नई-नई मनमानियाँ और अपराध करने में भी संकोच नहीं होता। उन के विचारों, सिद्धातों, क्रिया-कलापों और ऐतिहासिक रिकॉर्ड की सभी बातें शिक्षित जनता को भी मालूम नहीं हैं। नई पीढी तो उससे लगभग अनजान ही है। इससे शैक्षिक-राजनीतिक क्षेत्रों में हमें बड़ी हानि हुई है। क्योंकि दुनिया भर के साम्यवादी प्रयोगों से यह मूल्यवान शिक्षा मिलती है कि समाज को बदलने का प्रयत्न किस तरह से न किया जाए। उससे अवगत रहना आवश्यक है, ताकि किसी साम्यवादी प्रपंच में लोग न फँसें। परंतु दुर्भाग्य से भारत में कम्युनिस्ट दबदबा कम नहीं हुआ, बल्कि कई मामलों मे बढ़ गया है। इसका मुख्य कारण साम्यवाद के वैश्विक अनुभवों का अज्ञान ही है।

पूर्व-साम्यवादी देशों के अभिलेखागार शोधकर्ताओं के खुल जाने के बाद साम्यवाद के सच के बारे में ढेरों नई सामग्री उपलब्ध हुई। पूरी सावधानी और परिश्रम से हिसाब करके विद्वानों ने साम्यवाद के शिकार इंसानों की यह नवीनतम संख्या बताई है। सोवियत संघः 2 करोड़ मौत, चीनः 6.5 करोड़ मौत, वियतनामः दस लाख मौत, उत्तरी कोरियाः बीस लाख मौत, कम्बोडियाः बीस लाख मौत, पूर्वी यूरोपः दस लाख मौत, लैटिन अमेरिकाः डेढ़ लाख, अफ्रीकाः सत्रह लाख मौत, अफगानिस्तानः पंद्रह लाख मौत, सत्ताविहीन कम्युनिस्ट आंदोलनों और पार्टियों के हाथः दस हजार मौतें। इस तरह साम्यवादी प्रयोगों के कारण सत्तर-पचहत्तर सालों में कुल मिलाकर दुनिया में लगभग 10 करोड़ लोग मारे गए। जिन्हें अविश्वास हो, वे बस भारत में माओवादियों द्वारा आज भी की जा रही हत्याओं की गिनती रखें। कुछ ही समय में दिखेगा कि उपर्युक्त सूची में आखिरी श्रेणी, अर्थात् सत्ता से बाहर ‘आंदोलनरत’ कम्युनिस्ट पार्टियों द्वारा मारे गए लोगों की गिनती यथार्थ से कम आंकी गई है।

कुछ बुद्धिजीवी साम्यवाद और फासीवाद की तुलना करने में भ्रमित हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि साम्यवाद फासीवाद से कम बुरा था। किंतु हिटलर के ‘नस्ली जन-संहार’ और स्तालिन के ‘वर्गीय जन-संहार’ में एक समानता थी। किसी को दूसरे से छोटा न मानना ही उचित है। दोनों सत्ताएं मानवता की अपराधी रहीं, और विराट पैमाने पर। वास्तव में कम्युनिस्टों ने इस भ्रामक धारणा से बड़ा लाभ उठाया है कि नाजी जन-संहार एक अद्वितीय किस्म का अपराध था। सन् 1941 के बाद स्तालिन ने नाजीवाद-विरोधी की छवि अपना कर सोवियत सत्ता के अपराधों को काफी हद तक छिपा लिया था। इसके बाद दूसरे कम्युनिस्ट भी अपनी ओर से लोकतांत्रिक देशों के लोगों का संदेह हटाने में काफी सफल रहे। इसीलिए, उन्होंने इस प्रचार को खूब बढ़ावा दिया कि वामपंथी अत्याचारों के मुकाबले दक्षिणपंथी फासिस्ट अधिक घृणित हैं। भारत में भी यही वैचारिकता हावी है। इसीलिए पश्चिम बंगाल और केरल माकपा द्वारा की गई हजारों राजनीतिक हत्याओं के बाद भी उनसे बुद्धिजीवी वर्ग को प्रायः कोई घृणा नहीं रही है। बल्कि कुछ उलटा ही।

ऐसा इसलिए क्योंकि क्योंकि बुद्धिजीवी यह जानते ही नहीं कि हिटलरी नाजीवाद ने जितने भयानक कुकर्म किए वह लगभग सबके सब सोवियत कम्युनिज्म के तौर-तरीकों की नकल थे। लेनिन और स्तालिन ने जिन क्रूरताओं का आविष्कार व प्रयोग किए, वह हिटलरी जुल्मों से बढ़ कर और व्यापक थे। महान रूसी लेखक और इतिहासकार सोल्झेनित्सिन ने अपने अपूर्व ग्रंथ गुलाग आर्किपेलाग में प्रमाणिक रूप से यह दिखाया है। केवल संख्या को ही लें, तो नाजियों के ढाई करोड़ की तुलना में कम्युनिस्टों ने दस करोड़ इंसानों को मारा। दमन, क्रूरता और यातना के स्थूल और सूक्ष्म रूपों का अध्ययन करें तो जर्मनी या इटली के फासिस्ट रूसी या चीनी कम्युनिस्टों से निस्संदेह बहुत पीछे थे। यह सब हम नहीं जानते। इसीलिए वीर सावरकर से लेकर विष्णुकांत शास्त्री तक किसी भी हिंदू को फासिस्ट कह दिया जाता है और हमारे लेखक-पत्रकार चूँ नहीं बोलते!

फासीवाद की सबसे वीभत्स अभिव्यक्ति आश्वित्ज में हुई थी। वहाँ बड़ी संख्या में लोगों को मारा गया था। बाद में किसी ने दर्द से लिखा, ‘आश्वित्ज के बाद कविता नहीं हो सकती!’ यह पंक्ति हमारे कुछ पढ़े-लिखे मार्क्सवादी दुहराते भी हैं। किंतु क्या हमें मालूम है कि आश्वित्ज सोवियत कारनामों की ही नकल था? आश्वित्ज कैंप के कमांडेंट रुडॉल्फ हेस ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, “राइख सुरक्षा मुख्यालय ने सभी कैंप कमांडेंटों को रूसी यातना कैंपों से संबंधित पूरी रिपोर्ट भेजी थी। उनमें विस्तार से उन कैंपों के संगठन और कामों का विवरण था। उनमें इस बात पर विशेष बल दिया गया था कि कैसे रूसी कैंपों में कैदियों से जानलेवा जबरिया श्रम करा कर पूरी-पूरी आबादियों को खत्म कर डाला गया।” इस प्रकार, किसी जाति, समुदाय और राष्ट्रीयता को संपूर्णतः मार डालने का प्रयास बीसवीं शती में पहले सोवियत कम्युनिस्टों ने किया था।

जो नाजियों ने यहूदियों के साथ किया, वह उनसे काफी पहले सोवियत कम्युनिस्टों ने कुलकों (धनी किसान) के साथ किया था। लेनिन के शासन काल में पूरे रूस में कुलकों को ‘परजीवी’ और ‘कीड़े’ कहकर बाल-बच्चों, परिवार समेत निर्ममता पूर्वक मार डाला गया था। यह भयंकर कारनामा तभी हो चुका था, जब दुनिया ने हिटलर का नाम भी नहीं सुना था! प्रसिद्ध रूसी लेखक वसीली ग्रोसमान ने कुलकों के बच्चों के बारे में लिखते हुए नोट किया है, “ठीक इसी तरह (बाद में) नाजियों ने यहूदी बच्चों को गैस-चैंबरों में डाला था।” अतः यह कहने और करने में कम्युनिस्ट ही आगे थे कि किसी विशेष वर्ग या समुदाय में जन्म लेने मात्र के कारण मानवता के कुछ हिस्सों को जीने का कोई अधिकार नहीं! चाहे वह निरपराध ही क्यों न हों। जो बात कुलकों, व्यापारियों जैसे समूहों या चेचेन जैसे समुदायों के लिए क्रमशः लेनिन और स्तालिन ने घोषित की थी, उसी को हिटलर ने यहूदियों के लिए दुहराया। वही लेनिन और स्तालिन आज भी हमारे मार्क्सवादियों के आदर्श हैं। इसके भयावह निहितार्थ समझना चाहिए।

रूस और पूर्व यूरोप में अनेक ऐसे लोग हुए जिन्होंने नाजी गेस्टापो और सोवियत एम.जी.बी. (सीक्रेट पुलिस) दोनों के हाथों यातना सही थी। उनके तुलनात्मक अनुभव बताते हैं कि नाजियों का रुख अपेक्षाकृत नरम था। एक रूसी पादरी वाई. आई. दिवीनिच के अनुसार गेस्टापो जानना चाहता था कि वह कम्युनिस्ट तो नहीं है। जब आरोप साबित नहीं हुआ तो उसे छोड़ दिया गया। जबकि एम.जी.बी. की रुचि किसी सच्चाई में थी ही नहीं। उसका एक ही सूत्र था कि जिसे पकड़ लिया, उसे छोड़ा नहीं जा सकता। गुलाग आर्किपेलाग में अनेक पीड़ितों की गवाही लिपिबद्ध है। ‘नीली टोपी वाले’ (सीक्रेट पुलिस) मामले गढ़ते थे, और अपने शिकार को यातनाएं देते थे। कई बार तो यह हर क्षेत्र में केवल कोटा पूरा करने की बात थी कि हमने ‘इतने जनता के दुश्मनों को मारा या सजा दी’। इस संख्या का बड़ा होना पुरस्कार और पदोन्नति से जुड़ा था! यातना देने के तरीकों में भी एम.जी.बी. नाजियों से कहीं ज्यादा क्रूर और स्वेच्छाचारी थी।

सर्वविदित है कि हिटलर के पतन के बाद जर्मनी में नाजियों पर मुकदमे चले और सजाएं हुई। किंतु कितने लोगों ने ध्यान दिया है कि यह केवल पश्चिम जर्मनी में हुआ, पूर्वी जर्मनी में नहीं? पश्चिम जर्मनी में 86,000 नाजी अपराधियों को सजाएं हुईं। किंतु कम्युनिस्ट शासन वाले पूर्वी जर्मनी में ऐसा कुछ न हुआ! क्योंकि अधिकांश नाजी तत्व कम्युनिस्ट शासन की सेवा में ले लिए गए। वे दमन के अनुभवी थे और सरलता से नई वर्दी में आ गए। ठीक वैसे ही, जैसे रूस में 1917 ई. में कम्युनिस्टों की सत्ता बन जाने पर पहले के अनेक अपराधी और दुष्ट अफसर तुरत कम्युनिस्ट बन गए। उन से नए कम्युनिस्ट शासन को बड़ा भारी सहारा मिला, क्योंकि वही लोग बिना नैतिक असुविधा के हर तरह के अत्याचार करके जनता पर नियंत्रण कर सकते थे। यह मोटा सा तथ्य हमारे देश के इतिहास प्रोफेसर तक नहीं जानते, सामान्य पत्रकारों, बुद्धिजीवियों की कौन कहे!

माकपा का ‘कंकालकांड’ एक बार पुनः दिखाता है कि पश्चिम बंगाल की सत्ता बनाए रखने के लिए उन्होंने कितनी हिसा की, कितना विध्वंस किया। वस्तुतः उन्होंने सत्ता लेने के लिए भी वही तरीके इस्तेमाल किए थे। जब सन् 1967-68 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी पश्चिम बंगाल में तरह-तरह से उत्पात मचा रही थी। तब वहाँ तात्कालीन राज्यपाल धर्मवीर ने एक बार ज्योति बसु से अनौपचारिक बात-चीत में पूछा कि वे लोग क्यों यह सब कर रहे हैं। बसु ने बेधड़क उत्तर दिया कि मार्क्सवादियों का तो लक्ष्य ही है भारतीय संवैधानिक व्यवस्था और समाज को तहस-नहस कर देना। ताकि उसके बाद वे अपनी इच्छा का कम्युनिस्ट राज्यतंत्र बना सकें। यही दुनिया भर के कम्युनिस्टों की मानसिकता रही है। उनका राजनीतिक आचरण और रणनीति इस की पुष्टि करती है। सोवियत विघटन और साम्यवादी विचारधारा की पराजय के बाद भी इस मनोवृत्ति में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं आया है। भारतीय कम्युनिस्टों की विखंडनवादी राजनीति इस का शिक्षाप्रद उदाहरण है, जो यहाँ अस्सी वर्ष से भी अधिक समय से चल रही है।

पश्चिम बंगाल में राजनीतिक विरोधियों की हत्याएं माकपा की राजनीतिक तकनीक का अटूट अंग रही हैं। इसे “हत्या और आतंकवाद की जुड़वाँ नीति” की संज्ञा स्वयं वहाँ के दूसरे वामपंथियों ने ही दी थी, जिन्हें भी माकपा का उत्पीड़न झेलना पड़ा था। यह बात सन् 1970 में ही कही गई थी। जरा इन शब्दों पर ध्यान दें। “(माकपा) अपने राजनीतिक विरोधियों का शारीरिक सफाया और जनता को आतंकित इसलिए कर रही है ताकि कोई उस का विरोध करने का साहस नहीं कर सके। … 15 सितंबर 1970 को समाप्त होने वाली तिमाही में करीब सौ हत्याएं की गईं, जिनमें 73 हत्याएं केवल माकपा द्वारा की गई थीं।” यह शब्द पश्चिम बंगाल के कम्युनिस्ट नेता प्रभात दासगुप्त ने लिखे थे (‘पश्चिम बंगाल में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का आतंक’, 1970, भाकपा प्रकाशन)।

सितंबर 1970 में माकपा ने प. बंगाल में एक शिक्षक हड़ताल आयोजित की। उस का विवरण देते हुए प्रभात दासगुप्त ने लिखा था, “एक स्कूल में – जो हड़ताल के पहले दिन खुला था – एक अर्ध-नग्न आदमी प्रधानाध्यापिका के दफ्तर में घुस गया और मेज पर इत्मीनान से बैठ कर प्रधानाध्यापिका से पूछा कि क्या उस ने अपने अंतिम संस्कार के बारे में कभी कुछ सोचा है। भौंचक प्रधानाध्यापिका कुछ समझ नहीं पाई। तब उस ने खुलासा करते हुए कहा कि यदि वह अविलंब अपने स्कूल को बंद नहीं करेगी तो उसे उसके अंतिम संस्कार के लिए प्रबंध करना पड़ेगा।” प्रभात दासगुप्त आगे कहते हैं, “मेरे पास 21 ऐसे कुख्यात अपराधकर्मियों की सूची मौजूद है, जिन्होंने चौबीस परगना के बड़ा नगर पानी हाटी बेलघोरिया इलाके के समस्त माकपा हमलों का नेतृत्व किया। … (जो) ज्योति बसु के गृह मंत्री बन जाने के बाद माकपा में शामिल हो गए। उनमें से एक अब माकपा का सचिव है। उनमें से कई के नाम अपराधकर्मी के रूप में पुलिस सूची में दर्ज हैं।”

‘ह्त्याओं के पूरक के रूप में’ माकपा द्वारा लोगों को ‘संत्रस्त करने के अभियान’ की तकनीक का वर्णन करते हुए प्रभात दासगुप्त लिखते हैं, “अकस्मात बमों, लाठियों, बंदूकों और अन्य सांघातिक हथियारों से लैस और लाल स्कार्फ बाँधे हुए स्वयं सेवकों का कोई समूह एक इलाके में प्रकट होगा, सड़कों पर एक छोर से दूसरे छोर तक परेड करेगा और अपने राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ जान से मार डालने संबंधी नारे लगाएगा। कभी-कभी अपने अंतर्ध्यान होने से पहले वह अपने मार्च को जीवंत बनाने के लिए कुछ बमों के विस्फोट भी कर देगा। इन सशस्त्र मार्चों का अर्थ बहुत सरल है। माकपा इलाके की जनता से कहती हैः बेहतर हो कि आप हमारा समर्थन करें वरना आप हमारे बमों के विस्फोट तो सुन ही चुके और हमारी बंदूकों को देख ही चुके!” इस पृष्ठभूमि में माकपा के कंकालकांड का समुचित पैमाना और मानसिकता को ठीक से समझा जा सकता है। जिस तरह पिछले तीन दशक में पश्चिम बंगाल में चुनाव प्रक्रिया को पूरी तरह माकपा का बंधक बना लिया गया था, उसे इस संपूर्ण पृष्ठभूमि में ही देखना चाहिए।

वस्तुतः पश्चिम बंगाल में माकपा की अक्षुण्ण सत्ता का रहस्य संसदीय प्रणाली के निरंतर बलात्कार की कहानी है। वहाँ के अखबार पीछे पलटते चलें तो आरंभ से ही माकपा नेताओं द्वारा ‘जान लेने’ और विरोधियों का सशरीर ‘सफाया’ करने के खुले आह्वान और खूनी कांड बार-बार दिखाई पड़ेंगे। 1970 में ही प्रसिद्ध वामपंथी सासंद भूपेश गुप्त ने स्पष्ट रूप से कहा था कि माकपा ने अपराधियों और समाज-विरोधी तत्वों को अपने साथ करके वहाँ अपना कब्जा बनाया है। उन के शब्दों में, “प. बंगाल में तब तक सामान्य स्थिति होने की आशा नहीं है, जब तक कि मार्क्सवादी अपने बमों को हुगली नदी में फेंक नहीं देते और अपनी बंदूकें और छुरे चलाना छोड़ नहीं देते। यह भी न भुलाया जाए कि माकपा का आतंकवाद खत्म हुए बिना प. बंगाल में सामान्य स्थिति की वापसी असंभव सी है।” यह टिप्पणी आज भी स्मरणीय है, जब पश्चिम बंगाल में पिछले वर्षों में माकपा के शिकारों के नरकंकाल जगह-जगह मिल रहे हैं।

समस्या यह है कि दुनिया भर में कम्युनिस्ट अपराधों के प्रति उदासीनता बरती गई है। इसीलिए हिटलर का नाम जैसा कुख्यात हुआ, वैसा स्तालिन का न हो सका। यही स्थिति उनके अधीन प्रमुख सहयोगियों की भी रही। हिमलेर और आइखमान को दुनिया भर के लोग बर्बरता का पर्याय मानते हैं। किंतु उन नाजियों से कहीं अधिक, लंबे समय और व्यापक पैमाने पर की गई क्रूरताओं के लिए जर्जिंस्की, येगोदा और येजोव के बारे में कम ही लोग जानते हैं। केवल सोल्झेनित्सिन की एक पुस्तक गुलाग आर्किपेलाग (जिसे बीसवीं शती का पूरे विश्व में सबसे महान कथा-इतर लेखन, नॉन-फिक्शन माना गया है) से भी कम्युनिज्म के पूर्ण रूप को पहचाना जा सकता है। जबकि वह केवल 1918-56 के बीच का ही विवरण है। वह भी केवल एक कम्युनिस्ट देश का, आंशिक विवरण मात्र। उस के अतिरिक्त माओ के चीन, पोल पोट के कम्बोदिया, चौसेस्क्यू के रुमानिया, कादार के हंगरी, होनेकर के पूर्वी जर्मनी आदि के विवरणों को बारे में जानकर इसमें कोई संदेह नहीं रहेगा कि सारी दुनिया में कम्युनिस्ट शासक फासिस्टों के बड़े भाई रहे हैं। न केवल अकथनीय अत्याचार करने, बल्कि झूठ बोलने और भयंकर दुष्प्रचार करने में भी।

कम्युनिज्म की काली किताब में भारत के मार्क्सवादियों ने भी यथासंभव योगदान दिया है। इसमें संदेह न रहे कि यहाँ के कम्युनिस्ट भी वैचारिक-राजनीतिक रूप में रूसियों, चीनियों से भिन्न नहीं रहे हैं। ईश्वर की कृपा से उन्हें भारतवर्ष की संपूर्ण सत्ता नहीं मिली। लेकिन जब, जहाँ और जितनी मिली, उसमें उनका चरित्र वही दिखा है। असहिष्णुता, हिंसा, जबर्दस्ती, मिथ्या व उग्र प्रचार और दोहरापन। केरल, पश्चिम बंगाल के माकपाई हों, या बिहार, आंध्र, छत्तीसगढ़, आदि में माओवादी, सबने समय-समय पर वही चरित्र दिखाया है जिसकी पूर्ण अभिव्यक्ति स्तालिन और माओ के निरंकुश शासनों की विशेषता थी। दुर्भाग्यपूर्ण है कि मार्क्सवादी-नेहरूवादी इतिहासकारों द्वारा इतिहास के पूर्ण मिथ्याकरण के कारण हमारे शिक्षित वर्ग में बहुतेरी भ्रांतियाँ बनी हुई है। मार्क्सवादियों को गरीबों का हमदर्द समझा जाता रहा, जबकि उनकी नीतियाँ केवल विघटन, विध्वंस का लक्ष्य रखती थीं। जिससे सबसे अधिक पीड़ित गरीब ही होते हैं।

Leave a Reply

10 Comments on "कम्युनिज्म की काली किताब"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
राजन
Guest

बढ़िया।
प्रवक्ता पर मेरे द्वारा पढ़ा सबसे अच्छा लेख।
धन्यवाद ।

डॉ. राजेश कपूर
Guest

लेख अत्यंत उच्च कोटि का और अत्यंत उपयोगी है. सुझाव है की इसे नाम दिया जाय ”काली करतूतों की लाल किताब”

Satyarthi
Guest

शंकर शरण जी के सभी लेख संग्रहणीय लगते हैं.पता नहीं किस कारणवश हमारा सूचना तंत्र तथा शासन तंत्र मार्क्स वादिओं के प्रति इतना सौहार्द पूर्ण है. डाक्टर बिनायक सेन को इतना समर्थन मिलने और शासन द्वारा सम्मानित किये जाने का क्या रहस्य है. आशा है की यह लेख देश भर के पाठकों द्वारा पढ़ा जायेगा और मार्क्स वादिओं का वास्तविक स्वरूप लोग पहचान सकेंगे

B K Sinha
Guest

कोम्मुनिस्तों की काली किताब की आपने चर्चा पूरे उत्साह के साथ की .अस्तु, अब आप राष्ट्र वादिओं की किताब को कुन रंग देना पसंद करेंगे? कोई भी रंग नहीं वह तो जैसा देश वैसा भेष बना लेता है बहुरुपिया है वह जरा उनके महँ कार्यों पर भी प्रकाश डालिए तो अच्छा हो.जर्मन रास्ट्रवाद को तो आप भूले नहीं होंगे और नस्ल वाद उससे भी आप आंख नहीं चुरा सकते यह सब बातें किस रंग की किताब में लिखेंगे
जरा बतायिगा मै उत्सुक हूँ जानने के लिएधर्म के नाम पर रास्ट्र के नाम पर कब तक जनता का शोषण करते रहिएगा .बिपिन

anil gupta
Guest

श्री शंकर शरण जी की इस लेख के लिए जितनी प्रशंशा की जाये कम है. अफ़सोस केवल ये है की हमारे तथाकथित बुद्धिजीवियों की आँखें, दिमाग व लेखनी तथा जुबान इस मामले में पूरी तरह से बंद है. इसका सतांश भी अगर किसी भाजपा शाशित राज्य में होता तो बुद्धिजीवियों ने पिंड से ब्रह्माण्ड तक सर पर उठा लिया होता. तथा सर्वोच्च न्यायालय तक सक्रिय हो उठते. श्री शंकर शरण जी न्जैसे जागरूक लोगों के होते भारत में लोकतंत्र के प्रति आश्वस्ति का भाव मजबूत होता है.

wpDiscuz