लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

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इधर कर्ण को युद्ध के लिए अपने सम्मुख पाकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ। रंगभूमि में उसने मुझे द्वंद्व युद्ध की चुनौती दी थी। समयाभाव और कृपाचार्य की व्यवस्था के कारण हम लोगों में युद्ध नहीं हो सका था। आज विधाता ने बिना मांगे ही यह अवसर प्रदान कर दिया। उसके बड़बोलेपन का उत्तर मुझे अपने बाणों से देना था। मारक परिधि में आते ही उसने काई तीक्ष्ण बाण मुझे लक्ष्य कर चलाए। उसके बाण लक्ष्य तक पहुंचते, इसके पूर्व ही मैंने उन्हें निष्प्रभावी कर दिया। जबतक वह अगले आक्रमण के विषय में सोचता, मैंने प्रत्यंचा को कान तक खींचकर अत्यन्त घातक पच्चीस बाण उसके मर्मस्थलों पर मारे। वह अचेत हो भूमि पर गिर पड़ा। । पिता की सहायता के लिए उसका किशोर पुत्र सुदामन बाण-वर्षा करता हुआ मुझपर टूट पड़ा। मेरे एक साधारण प्रहार में ही वह वीरगति को प्राप्त हो गया। मैं विवाह की शुभ-बेला में किसी का वध करना नहीं चाह रहा था लेकिन सुदामन की मृत्यु शायद मेरे ही हाथों निश्चित थी। अति उत्साह उसके प्राणों का शत्रु बन गया। मूर्च्छित कर्ण पर मैंने कोई बाण नहीं चलाया। उसकी चेतना शीघ्र लौट आई। आंख खोलते ही उसे सुदामन का शव दिखाई पड़ा। क्रोध के वशीभूत वह द्विगुणित पराक्रम से पुनः युद्ध में रत हो गया। मैंने इस बार उसकी प्रत्यंचा को लक्ष्य कर, तीक्ष्ण बाण छोड़े। डोरी कट चुकी थी। उसने एक नहीं, दो नहीं, लगातार पांच धनुष उठाए। प्रत्येक बार मैंने उसकी प्रत्यंचा काटी। वह आश्चर्यचकित था। बड़ी शालीनता से उसने प्रश्न किया –

“विप्रशिरोमणे! आप मूर्तिमान धनुर्वेद हैं या साक्षात्‌ परशुराम? अथवा स्वयं इन्द्र या अपनी महिमा से कभी च्युत न होनेवाले भगवान विष्णु? मैं समझता हूं, आप इन्हीं में से कोई हैं और अपने स्वरूप को छिपाने के लिए ब्राह्मणवेश धारण कर मेरे साथ युद्ध कर रहे हैं। इस पृथ्वी पर कुपित हो, युद्ध करने पर साक्षात्‌ शचीपति इन्द्र, भगवान शंकर या किरीटधारी पाण्डुनन्दन अर्जुन के अतिरिक्त कोई दूसरा मेरा सामना नहीं कर सकता। कृपया अपना परिचय देने का कष्ट करें।”

“कर्ण! न तो मैं धनुर्वेद हूं और न ही प्रतापी परशुराम। वीरों का परिचय उनकी वीरता ही होती है। मेरा परिचय मेरे बाण हैं जिनके आघात से तुम अभी-अभी मूर्च्छित हुए थे। समय व्यर्थ न करते हुए, या तो मुझसे युद्ध करो या पराजय स्वीकार करो। मैं तुम्हें विजित करने के लिए खड़ा हूं।”

कर्ण ने एक प्रयास और किया – सारा कौशल, समस्त पराक्रम युद्ध में झोंक दिया। पुत्र-शोक के कारण उसके बाण ही नहीं, उसकी आंखें भी अग्नि-वर्षा कर रही थीं। मैंने किसी दिव्यास्त्र का प्रयोग किए बिना ही उसके आक्रमण को विफल किया और सधे हुए बाण मारकर पुनः उसकी प्रत्यंचा काट डाली। पराजय स्वीकार करने के लिए वह विवश था। युद्ध रुक गया। उसे छोड़ सभी राजा भीम से पराजित हो पहले ही युद्धभूमि से पलायन कर चुके थे।

कर्ण से द्वंद्व युद्ध का यह मेरा पहला अवसर था। मैं अत्यन्त प्रसन्न था। वर्षों पूर्व हस्तिनापुर की रंगभूमि में जो कार्य अधूरा रह गया था, आज पूरा हुआ। मैं चाहता तो उसका वध कर सकता था लेकिन ऐसा नहीं किया। मैं विवाह के शुभ अवसर पर अनावश्यक रक्तपात के पक्ष में कही से भी नहीं था। यह युद्ध मुझपर बरबस थोपा गया था। मुझे आत्मरक्षा हेतु अस्त्र उठाना पड़ा। रक्षात्मक युद्ध करने के उपरान्त भी सुदामन का वध हो गया। मुझे इसकी ग्लानि हो रही थी।

महाराज द्रुपद ने गन्तव्य तक जाने के लिए रथ और सारथि की व्यवस्था की लेकिन मैंने स्वीकार नहीं किया। हम पांचों भ्राता द्रौपदी को लेकर पद-यात्रा करते हुए माता के पास पहुंचे। अग्रज युधिष्ठिर ने द्वार खटखटाते हुए माँ को उल्लसित स्वर में सूचना दी –

“माँ, कपाट खोलो। आज हम एक दुर्लभ वस्तु लाए हैं।”

“वत्स! जो भी लाए हो, पांचों भ्राता सम भाग में बाँट लो।”

अंदर से माँ का दृढ़ व्यस्त स्वर सुनाई पड़ा। हम सभी स्तब्ध रह गए। सभी एक-दूसरे का मुंह देख रहे थे – किंकर्त्तव्यविमूढ़। अचानक कुटीर का द्वार खुला। सामने माता थीं। उन्होंने विस्मित और मुग्ध दृष्टि से द्रौपदी को देखा। चरण-स्पर्श के लिए झुकी पांचाल-कन्या को अपने कोमल हाथों से यत्नपूर्वक उठा लिया और दुखी होते हुए क्षीण स्वरों में पश्चाताप करते हुए कहा –

“मैंने यह क्या कह दिया? मैंने समझा था, मेरे पुत्र भिक्षा का अन्न संग्रह करके लौटे हैं। लेकिन यह तो परम सुंदरी राजकन्या है।”

“हां माते, यह राजकन्या ही है – महाराज द्रुपद कि सर्वगुण संपन्न दुहिता – याज्ञसेनी कृष्णा। तुम्हारे पुत्र सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ने असंभव सा लक्ष्यभेद कर इसे प्राप्त किया है। यह विवाह पूर्व तुम्हारा आशीर्वाद प्राप्त करने के निमित्त यहां उपस्थित हुई है।” अग्रज ने माँ को समझाया।

माता की द्विधा समाप्त नहीं हो रही थी। उसने अनजाने ही द्रौपदी को पांच भागों में विभक्त कर दिया था। मुझे मुनिवर व्यास जी के वचनों का स्मरण हो आया। हमलोग ऐसे समाधान की तलाश में थे कि माता का वचन भी मिथ्या न हो और द्रौपदी के साथ अन्याय भी न हो। अग्रज युधिष्ठिर ने महर्षि व्यास और माता के वचनों का सम्मान करते हुए हम पांचों के, द्रौपदी के साथ विवाह का प्रस्ताव रखा। अन्तिम निर्णय का अधिकार फिर भी द्रौपदी को ही दिया गया। वह भी अनिर्णय की स्थिति में दिखी। मैं उसके मनोभावों को समझ सकता था – पांच पुरुषों की पत्नी बनना, कौन स्वाभिमानी स्त्री स्वीकार कर सकती है? कृष्णा के स्वर हिले, लेकिन भाषा को स्वर नहीं मिला। पैर के अंगूठे से धरती को कुरेदती, वह खड़ी रही – चुपचाप, शान्त, भावशून्य।

हम सभी मानसिक द्वंद्व से जूझ रहे थे कि सहसा श्रीकृष्ण और बलराम की उपस्थिति ने सबको चौंका दिया। दोनों ने अपनी बुआ और हमारी माँ कुन्ती के चरण-स्पर्श किए। माँ ने उन्हें वक्ष से लगाया। उचित आसन देने के बाद माँ ने हमलोगों की समस्या से उन्हें अवगत कराया। कृष्णा ने भी समस्या के समाधान का दायित्व कृष्ण पर ही डाल दिया। वे मन्द-मन्द मुस्कुरा रहे थे। किसी भी तरह के असमंजस के भाव उनके मुखमण्डल पर नहीं थे। द्रौपदी को मधुर ओजस्वी वाणी में उन्होंने संबोधित किया –

“देवी याज्ञसेनी! पृथ्वी के दुराचारियों का विनाश करने एवं धर्म की पुनर्स्थापना करने हेतु विशेष रीति से तुम्हारा आविर्भाव हुआ है। हम सभी की उत्पत्ति माता के गर्भ से हुई है लेकिन तुम्हारी उत्पत्ति यज्ञवेदी से हुई है। तुम सामान्य नारी नहीं हो, इसलिए नारी जाति के लिए संसार के सामान्य नियम तुम पर लागू नही होते। तुम्हें अपना यह शरीर, उसके भीतर स्थित कामना, वासना, मन, हृदय और बौद्धिक विचारों को धर्म की स्थापना के लिए उत्सर्ग करना होगा। महत्तर स्वार्थ के लिए क्षुद्र स्वार्थ की बलि दी जा सकती है। पांचों पाण्डवों की भार्या बनकर तुम जगत का कल्याण कर सकती हो। इस समय यह निर्णय अटपटा अवश्य लग सकता है लेकिन आगत, जिसकी कथा इतिहास लिखेगा, यह सिद्ध करेगा कि यह साहसिक और अद्भुत निर्णय समय की आवश्यकता ही नहीं, अनिवार्यता थी। पृथ्वी के कल्याण के लिए अपनी बलि देना कितने लोगों के भाग्य में जुटता है? तुम्हें यह अवसर प्राप्त हुआ है, इसका उपयोग करो।”

द्रौपदी ने अपना मस्तक श्रीकृष्ण के श्रीचरणों में रखा, अश्रुधारा से उन्हें प्रच्छालित किया और दृढ़ स्वरों में अपना निर्णय सुनाया –

“हे कृष्ण! आज से यह देह, इससे संबंधित कर्म और इससे उत्पन्न समस्त प्रतिफल तुम्हारे प्रतिनिधि पांचों पाण्डवों को समर्पित है। मैं कुछ नहीं जानती; महत्तर स्वार्थ के लिए, जो तुम्हारा आदेश है, मुझे स्वीकार्य है। काम, क्रोध, लोभ, मोह जीतने की मुझे शक्ति दो। मैं तुम्हारी शरणागता हूं।”

श्रीकृष्ण ने द्रौपदी के सिर को अपने स्नेहिल कर युग्मों का स्पर्श दिया, उसे ऊपर उठाया और कहा –

“देवी! आज से तुम सुभद्रा की भांति मेरी भगिनी हुई। इसके अतिरिक्त तुम्हें अपनी एकमात्र सखी के दिव्यासन पर प्रतिष्ठित करता हूं। तुम्हारी सूक्ष्मातिसूक्ष्म देहातिरिक्त सत्ता के साथ मेरा अदृश्य सम्पर्क शाश्वत रहेगा। सुख-दुख, विस्मय-संशय, किसी भी स्थिति में, जब भी तुम मेरा स्मरण करोगी, मैं तुम्हारे सम्मुख उपस्थित होऊंगा। तुम आर्यावर्त्त का नव इतिहास गढ़ने जा रही हो। प्रसन्न मन से पाण्डवों को स्वीकार करो और दुर्गम मार्ग को सरल बनाते हुए कर्त्तव्य-पथ पर अग्रसर होओ।”

द्विधा और अनिर्णय की बदली छंट चुकी थी। सबकुछ कितना सहज कर दिया श्रीकृष्ण ने। वाणी में अद्भुत ओज, माधुर्य, दृढ़ता और स्पष्टता। व्यक्तित्व में मादक आकर्षण, हिमालय की ऊंचाई। ज्ञान का आगार – सागर की गहराई। ऐसे व्यक्तित्व से जीवन में पहली बार साक्षात्कार हो रहा था। चमत्कृत, अभिभूत प्रतिमा की भांति मैं स्तब्ध खड़ा था। दृष्टि उस आत्मन्‌ के स्मित बिखेरते आभासित मुखमण्डल पर टिकी थी।

अचानक उन्होंने मेरे कंधे को झकझोरा। मेरी चेतना वापस आई। उन्होंने मुझे और मेरे समस्त भ्राताओं को द्रौपदी को पत्नी-रूप में प्राप्त करने पर बधाई दी।

धृष्टद्युम्न गुप्तचर की भांति हमलोगों के पीछे लगा था। पूरी बात उसने छिपकर सुनी। हमारा वास्तविक परिचय ज्ञात कर पिता द्रुपद को इसकी सूचना दी। हम सभी राजमहल में आमंत्रित किए गए। हमने द्रौपदी के विवाह के सम्बंध में अपने निर्णय से महाराज को अवगत कराया। वे हमलोगों से सहमत नहीं थे। उन्हें समझाने के लिए महर्षि वेद व्यास स्वयं उपस्थित हुए, द्रौपदी के पिछले जन्म की कथा सुनाई और कृष्णा के यज्ञवेदी से अवतरित होने के विशेष प्रयोजन का सविस्तार वर्णन किया। अन्त में महाराज यज्ञसेन ने महर्षि वेद व्यास को अपनी सहमति प्रदान की –

“भगवन्‌! मैंने आपके श्रीमुख से जबतक अपनी कन्या के पूर्वजन्म की घटना नहीं सुनी थी, तभी तक युधिष्ठिर की बात का विरोध कर रहा था। परन्तु विधना का जब ऐसा ही विधान है, तब उसे कौन टाल सकता है? आपकी जैसी आज्ञा है, वैसा ही किया जाएगा। भगवान्‌ शंकर ने जैसा वर दिया है, चाहे वह धर्म हो या अधर्म, वैसा ही होना चाहिए। अब इसमें मेरा कोई अपराध नहीं समझा जाएगा। अतः पांचों पाण्डव प्रसन्नता के साथ द्रौपदी का पाणिग्रहण करें, क्योंकि यह पांचों भ्राताओं की पत्नी के रूप में प्रकट हुई है।”

महर्षि वेद व्यास द्वारा निर्धारित शुभ मुहूर्त्त में श्रीकृष्ण तथा अन्य सम्मानित गुरुजनों की उपस्थिति में हमारा विवाह संपन्न हुआ।

स्वयंवर में आमन्त्रित राजाओं के मन में हमलोगों का वास्तविक परिचय ज्ञात करने की जिज्ञासा उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही थी। महाराज द्रुपद के राजपरिवार की गतिविधियों का व्योरा प्राप्त करने के लिए उन्होंने अपने गुप्तचर लगा रखे थे और पांचाल के राजकीय गुप्तचर उनपर दृष्टि रखे हुए थे। अधिकांश राजाओं ने अपने प्रवास बढ़ा दिए। दोनों ओर से सूचनाओं का आदान-प्रदान हो रहा था। हमलोगों के विवाह के पश्चात कुछ भी गुप्त नहीं रहा। सभी नरेशों को महाराज द्रुपद के दूत द्वारा अधिकृत सूचना दी गई –

“जिस पुरुषश्रेष्ठ ने विशेष धनुष से स्वयंवर में लक्ष्यभेद किया था, वे विजयी, वीरों में श्रेष्ठ, महान धनुर्धर अर्जुन हैं।

जिस अपार शक्तिसंपन्न वीर ने मद्रराज शल्य को दोनों भुजाओं में उठाकर, पृथ्वी पर दे मारा था, हाथों में वृक्ष ले रणभूमि में समस्त योद्धाओं को अपने स्पर्श मात्र से भयभीत कर दिया था, वे महाबली, महातेजस्वी, शूरवीर भीमसेन हैं।

ब्राह्मण का वेश धारण कर प्रशान्त भाव से बैठे हुए वे पंचवीर पुरुष कुन्तीपुत्र पाण्डव हैं।”

अधिकांश नरेशों ने आश्चर्यमिश्रित हर्ष के साथ इस समाचार को सुना। दुर्योधन, कर्ण, शकुनि और धृतराष्ट्र की सलाह पर पुरोचन के द्वारा किए हुए अत्यन्त क्रूरतापूर्ण कर्म का समरण हो आने से सभी नरेश धृतराष्ट्र तथा भीष्म को धिक्कार रहे थे। दुर्योधन ने अपनी आंखों से सब देखा, अपने कानों से सब सुना। कर्ण और शकुनि के साथ वह ईर्ष्या की ज्वाला में दग्ध हो रहा था। कांपिल्यनगर से प्रस्थान के पूर्व सभी नरेश हमलोगों से मिलने आए, पांचाली से विवाह पर बधाइयां दीं और सुखमय दांपत्य जीवन की शुभकामनाएं भी अर्पित कीं। कौरव पक्ष ने इस सामान्य शिष्टाचार की भी आवश्यकता नहीं समझी। उन्होंने सीधे हस्तिनापुर की राह पकड़ी।

क्रमशः

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