लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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-सिद्धार्थ शंकर गौतम-
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कांग्रेस के पूर्व कद्दावर नेता, पूर्व राजनयिक और पूर्व केंद्रीय मंत्री के. नटवर सिंह अपनी किताब वन लाइफ इज नॉट एनफ को लेकर सुर्ख़ियों में हैं और जिस तरह उनकी किताब विमोचन से पूर्व चर्चा में आई है, उससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ७ अगस्त को जब पूर्व अटॉर्नी जनरल सोली सोराबजी के हाथों इसका विमोचन होगा, तब यह क्या गुल खिलाएगी? २०१४ के लोकसभा चुनाव में जीती सीटों का अर्धशतक चूकी कांग्रेस असम, महाराष्ट्र, हरियाणा समेत अन्य राज्यों में नेतृत्व के संकट से त्रस्त है, उपाध्यक्ष राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठाए जा रहे हैं, ऐसे में नटवर सिंह की पुस्तक से छन-छन कर बातें आ रही हैं, वे कांग्रेस समेत इसके शीर्ष नेतृत्व को संकट में डाल सकती हैं| हाल ही में नटवर सिंह के नई दिल्ली के जोरबाग स्थित घर पर सोनिया गांधी अपनी पुत्री प्रियंका के साथ उनसे मिलने पहुंची थीं| तकरीबन ५० मिनट तक चली इस इस बैठक को नटवर सिंह भले ही शिष्टाचार भेंट का तमगा दें किन्तु राजनीतिक जानकार कहते हैं कि इस मुलाक़ात के पीछे पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर संकट के जो भावी बादल मंडरा रहे हैं, उन्हें छांटने की कवायद शुरू हो चुकी है| हालांकि किताब के आधिकारिक रूप से विमोचन के बाद ही इस सत्य से पर्दा उठेगा कि आखिर वे कौन से ऐसे खुलासे हैं जिनसे पार्टी में तनाव बढ़ रहा है| चूंकि नटवर सिंह गांधी परिवार के पुराने विश्वस्त रहे हैं और हाल में उनसे अधिक गांधी परिवार को जानने वाला कोई नेता नहीं है, लिहाजा नटवर सिंह की किताब कांग्रेस की राजनीतिक तासीर को बिगाड़ने का माद्दा रखती है| खुद नटवर सिंह के हवाले से किताब के जो अंश मीडिया द्वारा सार्वजनिक हुए हैं, उनके अनुसार गांधी परिवार सवालों के घेरे में है| नटवर आपातकाल के लिए इंदिरा गांधी को गलत मानते हैं और राजीव गांधी को राजनीतिक कुप्रबंधन का दोषी पाते हैं| यहां तक कि खुद को नेहरूवादी बताने वाले नटवर सिंह अपनी किताब में चीन और कश्मीर नीति को लेकर नेहरू की भी बखिया उधेड़ने में उन्हें संकोच नहीं हुआ है| कांग्रेस की मौजूदा अध्यक्ष सोनिया गांधी को लेकर नटवर सिंह की कलम ने खूब आग उगली है| नटवर सिंह ने अपनी किताब में सीताराम केसरी को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से हटाए जाने, उनकी जगह सोनिया के आने, सत्ता की राजनीति का सामने करते हुए सोनिया के तजुर्बे, शरद पवार समेत कुछ नेताओं की बगावत और एनडीए सरकार से निपटने के बारे में ब्योरा दिया गया है| खुद नटवर ने माना है कि उन्होंने अपनी किताब में सोनिया गांधी के बारे में विस्तार से लिखा है| किताब के जरिए नटवर सिंह ने संप्रग सरकार की कार्यप्रणाली को भी कठघरे में खड़ा किया है| उनके मुताबिक संप्रग के शासन के दौरान सोनिया गांधी की पहुंच सरकारी फाइलों तक थी| ऐसा ही आरोप पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के पहले कार्यकाल में मीडिया सलाहकार रहे संजय बारू ने भी अपनी किताब द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर में लगाया था| हालांकि सोनिया को कांग्रेस पार्टी पर पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से भी ज्यादा पकड़ रखने वाला बताते हुए नटवर सिंह ने लिखा है कि सोनिया ने कभी बुद्धिजीवी होने का दावा नहीं किया, लेकिन उनके शब्द ही पार्टी का कानून थे| नटवर के मुताबिक कांग्रेस पर सोनिया का नियंत्रण इंदिरा गांधी से भी ज्यादा था और वह इंदिरा से भी ज्यादा ताकतवर नजर आती थीं| यह अलग बात है कि राजीव गांधी सरकार में पहली बार मंत्री बनने वाले नटवर सिंह ने सोनिया को राजीव गांधी से बेहतर नेता बताया है| नटवर सिंह के मुताबिक डॉ. मनमोहन सिंह नहीं बल्कि नरसिंह राव की वजह से देश में आर्थिक सुधार का युग शुरू हुआ था| इसके अलावा वे एटमी डील का भी क्रेडिट मनमोहन को नहीं देते हैं|
नटवर सिंह ने जहां राजीव गांधी को बोफोर्स घोटाले में क्लीन चिट दी है वहीं श्रीलंका में तमिल मुद्दे पर विपक्ष के दुष्प्रचार का सामना करने में उनके राजनीतिक प्रबंधन पर सवालिया निशान लगाए हैं| नटवर सिंह का सबसे अहम खुलासा सोनिआ गांधी के महिमामंडित  त्याग को लेकर है जिसने अब तक उनकी ‘त्याग की देवी’ वाली कहानी पर सवालिया निशान लगा दिया है| नटवर सिंह के मुताबिक २००४ में सोनिया के पीएम नहीं बनने की सबसे बड़ी वजह राहुल थे| राहुल को डर था कि यदि उनकी मां सोनिया प्रधानमंत्री बनीं तो दादी इंदिरा गांधी और पिता राजीव गांधी की तरह उनकी भी हत्या हो जाएगी| किताब के मुताबिक सोनिया को प्रधानमंत्री बनने से रोकने के लिए राहुल ने अपना सबकुछ दांव पर लगा दिया था| राहुल ने अपना निर्णय बताते हुए सोनिया को २४ घंटे का समय दिया था| राहुल की राय थी कि उन्हें यह पद नहीं लेना चाहिए| बेटे की जिद के आगे सोनिया को झुकना पड़ा| हालांकि नटवर सिंह के इस खुलासे के इतर भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने उस वक्त कुछ और ही दावे किए थे किन्तु ‘अंतरात्मा की आवाज’ की कहानी अब संदिग्ध हो गई है और इस पर विवाद होना तय है| नटवर सिंह ने यह भी खुलासा किया है कि प्रियंका गांधी ने उनसे राहुल गांधी के सोनिया को प्रधानमंत्री पद न स्वीकारने वाली बात को किताब से हटाने का अनुरोध करने के लिए मुलाकात की थी| यही नहीं राहुल और सोनिया ने भी उनसे ऐसा ही अनुरोध किया था| नटवर सिंह के सनसनीखेज खुलासों ने राजनीति और गरमा दिया है और इसी गर्माहट में जब सोनिया गांधी से उनकी राय पूछी गई तो उनका कहना था कि वे भी किताब लिखेंगी ताकि दुनिया के सामने सच लाया जा सके| हालांकि जिस तरह सोनिया ने अपनी प्रतिक्रिया में अपनी सास और पति की मृत्यु पर भावुकता दिखाई है, उससे लग रहा है कि कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व एक बार पुनः भावुकता के हथियार को भुनाने के पक्ष में हैं| कई कांग्रेसी नटवर सिंह की किताब को सस्ती लोकप्रियता पाने का हथकंडा बता रहे हैं किन्तु उनके दावों को यूं झुठलाया भी नहीं जा सकता| उनके अधिकांश दावे सत्यता के करीब हैं जिनसे आम जनता बखूबी बाक़िफ़ है| नटवर सिंह ने गांधी परिवार की तीन पीढ़ियों के साथ सरकार और पार्टी में काम किया है| वे इंदिरा के जमाने में प्रधानमंत्री कार्यालय में तैनात अधिकारी के रूप में काम कर चुके हैं| राजीव गांधी की सरकार में वे केंद्र में मंत्री, मनमोहन सिंह की अगुआई में यूपीए की सरकार में मंत्री रह चुके हैं| इसके अलावा नटवर के बारे में कहा जाता है कि सितंबर २००५ तक वे सोनिया गांधी के भरोसेमंद करीबी सलाहकारों में से एक रहे हैं| उनका कहना है कि वे कांग्रेस सरकार के तमाम फैसलों को अधिकारी और बाद में मंत्री या नेता के तौर पर काफी करीब से देख चुके हैं| उनका कहना है कि कई फैसलों को लेने वाली कैबिनेट के वे सदस्य रहे हैं| यही कारण है कि नटवर के दावे गंभीर हो जाते हैं| हालांकि नटवर सिंह को दिसंबर २००५ में ऑयल फॉर फूड कार्यक्रम में नाजायज फायदा उठाने का आरोप लगने पर विदेश मंत्री का पद छोड़ना पड़ा था| अक्टूबर २००५ में पॉल वॉकर की अगुआई में सामने आई रिपोर्ट में नटवर सिंह और उनके बेटे जगत सिंह को इराक में ऑयल फॉर फूड कार्यक्रम में नाजायज फायदा उठाने का दोषी बताया था| इन दोनों के अलावा जगत के बचपन के दोस्त अंदलीब सहगल पर भी एक ऐसी कंपनी के साथ जुड़े होने का आरोप लगा था जो एक स्विस फर्म को गैरकानूनी तरीके से पेट्रोलियम पदार्थ बेचने में बिचौलिए का काम करती थी| आरोप लगा था कि स्विस फर्म इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन, नटवर सिंह और कांग्रेस पार्टी को घूस देती थी| नटवर सिंह पर यह भी आरोप लगा था कि वह इसके बदले इराक को लेकर अमेरिकी नीति की खिलाफत करते थे| २००६ में जस्टिस आरएस पाठक जांच आयोग ने नटवर और उनके बेटे जगत को ऑयल कॉन्ट्रैक्ट को अपने पद के चलते प्रभावित करने का दोषी पाया था, लेकिन यह भी कहा था कि पूरे खेल में दोनों ने कोई वित्तीय या निजी फायदा नहीं लिया था| नटवर सिंह ने पाठक जांच आयोग की रिपोर्ट पर सवाल उठाते हुए कहा था कि पूरे मामले में कांग्रेस को क्लीन चिट कैसे दे दी गई, जबकि उस पर भी घूस लेने का आरोप था? आरोपों से परेशान नटवर सिंह ने २००८ में कांग्रेस पार्टी भी छोड़ दी थी। प्रवर्तन निदेशालय में नटवर सिंह के खिलाफ अब भी मामला चल रहा है| इसी पृष्ठभूमि के चलते यदि नटवर सिंह की किताब में कांग्रेस या उसके शीर्ष नेतृत्व के खिलाफ कोई विवादित या सनसनीखेज जानकारी सामने आती है तो ज़ाहिर है कांग्रेस एकजुट होकर उसका विरोध करेगी और नटवर सिंह को कटघरे में खड़ा किया जाएगा किन्तु नटवर सिंह की किताब का सच कांग्रेस को चैन तो नहीं लेने देगा|

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1 Comment on "कांग्रेस को कितना नुकसान पहुंचाएगा नटवर का किताबी बम"

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mahendra gupta
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किताब का विमोचन होने व पढ़ लेने के बाद ही इस पर बहस शुरू होगी,बाकी कुछ हलचल तो होगी यह भी तय है। गांधी परिवार के निष्ठां वान कांग्रेसी तो कुछ दिन सारा जोर नटवर सिंह को कोसने में लगाएंगे ही , बाकी कुछ भविष्य में लाभ उठाने की उम्मीद रखने वाले भी उछाल कूद मचाएंगे लेकिन अंत में सब सामान्य हो जायेगा

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