लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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reservation-for-muslimsप्रमोद भार्गव

पिछले लोकसभा चुनाव में सच्चर समिति का राजनीतिक लाभ ले चुकी कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ऐन चुनाव के पहले एक बार फिर मुस्लिम कार्ड खेलने जा रही है। लेकिन इस नाजुक समय में इस कार्ड का खेला जाना देश के सांप्रदायिक सदभाव के लिए ठीक नहीं है। क्योंकि हाल ही में मुस्लिम वोट बैंक को सुरक्षित बनाए रखने के नजरिए से उत्तर प्रदेश की सपा सरकार का खुला पक्षपात सामने आया है। जम्मू – कश्मीर के किश्तवाड़ और बिहार के नबादा में भड़की सांप्रदायिक हिंसा की हकीकतों को वोट बैंक को धुवीकृत किए जाने के कारण नजरअंदाज किया गया। यही वह समय है जब योजना आयोग के सदस्य और प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अभिजित सेन ने केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय की कार्यप्रणाली पर तीखी टिप्पणी देते हुए इस मंत्रालय को संप्रग सरकार का महज दिखने वाला मुखौटा बताया है। जबकि भारत सरकार को जरुरत है कि वह ऐसी नीतियों को अमल में लाए, जिनके मार्फत सभी वर्गों के शोषित, वंचित, पिछड़े और जो निर्धन हैं उनको लाभ मिलें। आज भी मुस्लिमों से कहीं ज्यादा आदिवासी समाज वंचित है, जो आजादी के 67 साल बाद भी विकास के अंतिम पायदान पर लाचारी के हाथ फैलाये खड़ा है।

केंद्र सरकार अल्पसंख्यकबहुल गांवों, कस्बों और विकासखण्डों में बुनियादी जरुरतों और सुविधाओं की पूर्ति के लिए एक नया सर्वे कराने जा रही है। जिन बिंदुओं पर यह सर्वे होना है उसका प्रारुप तैयार करके केंद्र ने राज्य सरकारों को भेज दिया है। मुस्लिम बहुल 90 जिलों में यह सर्वे कराया जा रहा है। सर्वे पूरा कराने की बाध्यकारी सीमा फरवरी 2014 रखी गर्इ है। जिससे इस सर्वे को आधार बनाकर, बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम के तहत मुस्लिमों को राहत की रेवडि़यां आमचुनाव से ठीक पहले बांट दी जाएं। जाहिर है, कांग्रेस मुस्लिमों को महज वोट  बैंक मानकर चल रही है।

इस विभाजनकारी नीति के अंतर्गत पता लगाया जाएगा कि अल्पसंख्यक बहुल गांवों व कस्बों में इंदिरा आवास, आंगनबाड़ी केंद्र, विधालय, स्वास्थ्य केंद्र, पेयजल और सफार्इ व्यवस्था किस हाल में है। साथ ही विकासखण्ड मुख्यालयों में पड़ताल की जाएगी कि इन शहरों में हार्इस्कूल, औधोगिक प्रशिक्षण संस्थान, कौशल विकास केंद्र, छात्रावास व प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र किस अवस्था में हैं। यह भी पता लगाया जाएगा कि अल्पसंख्यक सामान्य व तकनीकि शिक्षा ले रहे हैं अथवा नहीं ? जबकि इस बाबत केंद्र को कुछ ऐसी नीतिगत योजनाएं अमल में  लाने की जरुरत थी, जिनके कि्रयान्वयन से समावेषी विकास लक्षित होता। ऐसा होता तो भाजपा को बहुसंख्यकों के धु्रवीकरण का अवसर नहीं मिलता ? अब भाजपा की ओर से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी इस मुददे को पूरी आक्रामकता से उछालकर बहुसंख्यक समाज को सांप्रदायिकता के आधार पर भुनाने का काम करेंगे। वैसे भी मोदी राष्ट्रीय महत्व के मुददों में नर्इ दृष्टि देख रहे हैं और देश की समग्र सवा अरब आबादी के हित की बात कर अपना जनाधार हरेक समाज में बढ़ा रहे हैं। क्या कांग्रेस को यह समावेषी सोच दिखार्इ नहीं देता ?

हमारे देश में अल्पसंख्यक मामलों से जुड़ा मंत्रालय हो अथवा जनजातियों के विकास से जुड़े राज्य आयोग अथवा विभाग हों, इनकी भूमिका पारदर्षी कभी नहीं रही। ये सफेद हाथी ही साबित हुए हैं। इसीलिए योजना आयोग के सदस्य अभिजित सेन को कहना पड़ा है कि अल्पसंख्यक मंत्रालय संप्रग सरकार का एक ऐसा छलावा है, जिसकी उपलब्धियां बेहद सीमित रही हैं। स्वरोजगार के बहाने यह केवल धन लुटाने का काम कर रहा है। इसका खुद के खर्चों पर कोर्इ नियंत्रण नहीं है। इसी तरह से एक गैर सरकारी संगठन द्वारा ‘सामाजिक विकास में पिछड़ते अल्पसंख्यक-2012 शीर्षक से अध्ययन रिपोर्ट आर्इ है। इस रिपोर्ट में अल्पसंख्यकों के लिए चलार्इ जा रही योजनाओं की असफलताओं का विस्तृत व तार्किक ब्यौरा है। दरअसल संप्रग-1 ने मुसलमानों की सामाजिक, आर्थिक व शैक्षिक हैसियत का आकलन करने की दृष्टि से सच्चर समिति का गठन किया था। इस समिति की रिपोर्ट के आधार पर मुसलमानों को सक्षम बनाने के बहुआयामी उपाय किए गए। ये उपाय अल्पसंख्यक मंत्रालय के तहत ‘बहुक्षेत्रीय विकास कार्यक्रम को अमल में लाकर मुस्लिमबहुल आबादी वाले उन 90 जिलों में किए गए, जहां मुस्लिमों की आबादी 25 प्रतिषत या इससे अधिक थी। लेकिन रिपोर्ट के मुताबिक यह लाभ केवल 30 फीसदी आबादी को मिला। वह भी ऐसी आबादी को जब पहले से ही आर्थिक एवं शैक्षिक रुप से सक्षम थी। ऐसा ही हश्र पिछड़े वर्ग के हितार्थ चलार्इ जा रही कल्याणकारी योजनाओं का हो रहा है।

हालांकि वोट बैंक समझते हुए मुस्लिमों की जो तसबीर पेश की जा रही है, वह वास्तव में है नहीं। स्वास्थ्य संबंधी मानकों की दृष्टि से मुस्लिम महिलाएं, आम धारणा के विपरीत हिंदू महिलाओं से आगे हैं। धार्मिक एवं भाषायी अल्पसंख्यकों की स्थिति पर रंगनाथ मिश्र आयोग की रिपोर्ट से ये तथ्य सामने आए हैं। न्यायमूर्ति मिश्र की इस रिपोर्ट का मकसद धार्मिक अल्पसंख्यकों के पिछड़ेपन को सामने लाते हुए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में उनके लिए आरक्षण के उपाय सुझाना था। किंतु आयोग की रिपोर्ट में धार्मिक अल्पसंख्यकों और उनकी स्थिति के बारे में जो तुलनात्मक जानकारियां दी गर्इं, वे चौंकाने वाली हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, हिंदुओं में शिशु मृत्युदर सबसे अधिक 77.1 प्रतिशत है, जबकि मुस्लिम, र्इसार्इ, सिख, जैन और बोद्धों में यह दर कहीं कम है। मुसलमानों में 58.8, र्इसार्इयों में 49.9 और सिखों में 53.3 है। औसत वजन व कद की दृष्टि से भी मुस्लिम महिलाएं, हिंदू महिलाओं से आगे हैं। हिंदू स्त्री का औसत कद 151.1, मुस्लिम 151.5, जैन 153.6, र्इसार्इ 152.1 और सिख सित्रयों का कद 155.0 सेंटीमीटर है। रंगनाथ आयोग की रिपोर्ट से यह भी तय हुआ कि 1991 और 2001 की जनगणनाओं के मुताबिक हिंदुओं की आबादी कम हुर्इ है, जबकि मुस्लिम अल्पसंख्यकों की बढ़ी है। दूसरे अल्पसंख्यक वर्गों र्इसार्इ, सिख, जैन और बौद्धों की आबादी स्थिर रही है। इस रिपोर्ट की तथ्यात्मक जानकारी के बावजूद मुस्लिमों की आबादी नियंत्रित करने के कोर्इ उपाय नहीं किए जा रहे। इस वजह से जम्मू-कश्मीर और असम में जनसंख्यात्मक घनत्व बिगड़ा है। कश्मीर से पंडितों के विस्थापन और असम में हुए सांप्रदायिक दंगों की यह एक बड़ी वजह है, जिसे हमारे कथित पंथनिरपेक्षतावादी नेता नजरअंदाज करते चले आ रहे हैं। यह स्थिति और वोट के लिए अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण संबंधी नीतियां देश के भविष्य के लिए घातक हैं।

अल्पसंख्यक मंत्रालय ने धन लुटाकर जिस तरह से कश्मीर को अतिवाद की सांप्रदायिकता में झोंकने का काम किया है, यदि यही नीतियां अल्पसंख्यक बहुल  विभिन्न जिलों में अपनार्इ जाती हैं तो इसी अतिवाद का अनुसरण होना तय है। आज कश्मीर में ज्यादातर लोगों को बेरोजगार बताया जाता है, बावजूद वहां के लोगों का प्रतिव्यकित औसत खर्च 9,661 रुपए है, जो राष्ट्रीय औसत 3,969 रुपए से तीन गुना अधिक है। बिना काम-धंधे के यह धन कहां से आता है, यह एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल है, जिसे नजरअंदाज किया जा रहा है ? जाहिर है, अल्पसंख्यक मंत्रालय देश के लिए बोझ साबित हो रहा है। दरअसल हमें ऐसी नीतियां अमल में लाने की जरुरत है, जो सामाजिक प्रतिबद्धता और समावेषी विकास से जुड़ी हों ? विघटनकारी नीतियों से अब तौबा करने का समय आ गया है, केंद्र सरकार इसका अहसास करे तो अच्छा है।

 

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1 Comment on "केंद्र सरकार का नया मुस्लिम कार्ड"

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mahendra gupta
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मज़बूरी है,फिर सत्ता का क्या होगा,लक्ष्मी व रज्स्श्त्त कब मुहं फेर निकल जाये और न लौटे तो क्या होगा?अब तो रहे सहे सभी तरीके अपनाने ही होंगे.सत्ता से बहार बैठे आप जैसे लोगों के लिए कमेंट करना आसान है पर इसका सुख प्राप्त कर बहार बैठना बहुत ही मुश्किल.

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