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पिंकी कुमारी

images (1)योजना आयोग ने चंद महीने पहले गरीबी के जो आंकड़े पेश किए उन आंकड़ों ने गरीबी की परिभाशा को ही बदल दिया। अभी तक बहुत से लोगों की समझ में यह नहीं आ पाया है कि गरीबी के मानक को किस आधार पा तय किया गया है। योजना आयोग के नये आंकड़ो के अनुसार शहरों में 33.33 रूप्ये और ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़ाना 27.20 रूप्ये प्रतिदिन खर्च करने वाला व्यक्ति गरीब नहीं है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि बढ़ती महंगाई और भ्रष्टा चार के इस दौर में क्या कोई व्यक्ति सिर्फ 27 से 33 रुपए में अपनी जिंदगी जी सकता है। षायद योजनाकार इस बात को भूल गए हैं कि ज़मीनी हक़ीकत कुछ और ही है। योजना आयोग के ज़रिए पेश किए गए नये आंकड़ो ने बिहार में गरीबी की परिभाषा को ही बदल दिया। नए आंकड़ों के मुताबिक बिहार में दो वित्त वर्षों 2010-11 और 2011-12 के दौरान 20 फीसदी गरीब कम हो गए। इस दौरान गरीबों की संख्या कुल आबादी का घटकर 33.7 फीसदी रह गयी। सवाल यह उठता है कि दो सालों में ऐसा क्या कमाल हो गया जो पिछले पांच सालों में नहीं हो पाया। गौरतलब है कि बिहार में इससे पिछले पांच सालों में 1 फीसदी की दर से गरीबी घटी ।

बिहार ने साल 2005-06 से 2009-10 के दौरान औसतन 12 फीसद विकास की दर हासिल की। इसके बाद के दो सालों में यह विकास दर औसतन 14 फीसदी के आस पास रही। बिहार के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार साल 2004-05 से 2011-12 के दरम्यान बिहार में 11.36 फीसदी की दर से विकास हुआ। इस विकास का फायदा कंस्ट्रक्शभन, होटल और मैन्यूफैक्चरिंग से जुड़े लोगों को ही हुआ। बेसहारा गरीब वर्ग विकास की इस पहुंच से हमेशा की तरह दूर रहा। बिहार की 87 फीसदी आबादी गांव में निवास करती है। इस आबादी को शायद ही कभी विकास का गणित समझ में आता है। इन लोगों की सिर्फ एक ही कोशिश होती है कि किसी तरह दो वक्त की रोटी हाथ आ जाए। बिहार में कृर्शि क्षेत्र र्में पिछले पांच साल में महज़ तीन फीसदी विकास दर ही दर्ज किया गया है। इससे एक बात और साफ होती है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार की ओर से विकास की जो योजनाएं बनायी जा रही हैं उनका फायदा भी अमीर तबके को ही ज़्यादा पहुंच रहा है। गरीब तबका आज भी इन योजनाएं के लाभ से वंचित है। एक गैर सरकारी संगठन बिहार इंस्टीट्यूट आफ इकनॉमिक स्टडीज़ के ज़रिए कराए गए सर्वेक्षण में पाया गया कि 2001-2003 की तुलना में 2006-2008 से देश के अलग अलग हिस्सों में बिहार से जाने वाले मजदूरों के पलायन में 26.53 की गिरावट आयी। राज्य सरकार के लिए थोड़ी राहत देने वाली खबर ज़रूर है। लेकिन चंद महीने पहले योजना आयोग के गरीबी के नये आंकड़ों पर राज्य के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने केंद्र सरकार पर बिहार में गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वालों की संख्या को कम करके आंके जाने का पर आरोप लगाया था। इससे साफ है कि बिहार में गरीबी के वास्तविक आंकड़े अनुमान से कहीं ज़्यादा हैं। सवाल यह भी उठता है कि वास्तव में गरीबी में कमी आ भी रही है या नहीं। बिहार में आज भी ऐसे परिवारों की एक बड़ी तादाद है जो गरीबी की वजह से भूखमरी का शिकार हैं और साथ ही साथ शिक्षा, स्वास्थ्य और बेरोज़गारी जैसी बुनियादी सुविधाओं से भी वंचित हैं।

धरती पर जीतने जीव व प्राकृतिक संपदा है, उसका मालिक मनुश्य है। लेकिन इस संसार में ऐसे मनुश्य भी हैं जिन्हें भरपूर भोजन भी ठीक से नहीं मिलता है। ये सभी लोग कल्याणकारी योजनाओं से वंचित हैं। इनमें से एक ऐसा ही परिवार मुज़फ्फरपुर के पारू प्रखंड के डुमरी परमानंदपुर गांव की शकुंतला देवी का है जो गुमनामी के अंधेरे में अपनी जिंदगी जी रही हैं। पति की मौत के बाद शकुंतला देवी पर ऐसा पहाड़ टूटा कि वह आज तक संभल नहीं पाईं हैं। शकुंतला देवी की छः बेटियां व दो बेटे हैं जिनका पेट वह दूसरे के खेतों में निकौनी कर चलाती हैं। शकुंतला देवी ने चंदा करके तीनों बेटियों की शादी बड़ी मुश्किल से की। लेकिन उन्हें अब भी अपनी तीन बेटियों की शादी की चिंता सताए रहती है। शकुंतला देवी अपने बच्चों के साथ एक टूटी फूटी झोपड़ी में रहती हैं। चांदकेवारी पंचायत के मुखिता विनोद साह समेत तमाम जनप्रतिनिधि इस रास्ते से गुज़रते हैं लेकिन शायद ही कभी किसी की निगाह इस गरीब दुखियारी पर पड़ती हो। ऐसे में अब जिंदगी की डोर पकड़कर इस परिवार के लिए आगे बढ़ना काफी मुश्किल है। बीपीएल में नाम होने के बावजूद भी इस परिवार को इंदिरा आवास योजना का लाभ भी अभी तक नहीं मिला है। आस पास के दूसरे गरीब लोगों ने घूस देकर इंदिरा आवास योजना के तहत अपने घर बनवा लिए हैं। ऐसे में 30-35 रुपए दिहाड़ी की मज़दूरी करने वाली शकुंतला देवी परिवार का भरण पोषण करे या फिर इंदिरा आवास आवंटित होने के लिए घूस दे। यह हाल सिर्फ शकुंतला देवी का नहीं हैं बल्कि गांव के ज़्यादातर लोग गरीबी की वजह से अलग अलग समस्याओं से दो चार हैं। ऐसे में भला दुखियारी शकुंतला देवी औैर गांव के दूसरे आर्थिक तौर पर पिछड़े लोगों का सहारा कौन बनेगा? सवाल यह उठता है कि योजना आयोग के ज़रिए पेश किए आंकड़ों से गरीबी क्या कम हो रही है? केंद्र सरकार के साथ साथ राज्य सरकार भी गरीबों के ज़ख्मों पर सिर्फ आंकड़ों का मरहम ही लगा रही है। ज़मीनी हकीकत इससे कहीं अलग है। ज़रूरत इस बात की है कि सरकार ज़मीनी स्तर पर गरीबों के लिए कुछ कदम उठाए। वरना षाइनिंग इंडिया का सपना देखने वाली केंद्र सरकार का यह सपना सिर्फ शहरों तक ही सीमित रह जाएगा। सरकार को ज़मीनी हक़ीकत की वास्तविकता को समझकर ऐसी योजनाएं बनानी होगीं जिसका फायदा दूरदराज़ के इलाकों में रह रहे लोगों को सीधे तौर पर पहुंचे। (चरखा फीचर्स)

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