लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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election-results1प्रमोद भार्गव

राजनीति का बहुआयामी अपराधीकरण शायद हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी बिडंबना है। हर चुनाव के बाद संसद और विधानसाभाओं में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी हुर्इ दिखार्इ देती है। राजनीतिक दलों के पदों और समितीयों में भी इनकी शकित बढ़ी है और प्रभाव का विस्तार हुआ है। तय है,यह स्थिति लोकतंत्रिक व्यवस्था पर आम आदमी का भरोसा कमजोर करती है। हाल ही में विधायिका में गतिशील कुछ ऐसे घटनाक्रम घटे हैं, जिनसे लोकतंत्र शर्मसार हुआ है और लोग ऐसे जन प्रतिनिघियों से मुक्ति के लिए छटपटा रहे हैं। ऐसी अवस्था एक बार फिर चुनाव सुघार की बहस तेज होती दिख रही है और लोग चुने हुए प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अघिकार मांग रहे हैं। हांलाकि यह बहस पिछले दो दशक से खिंची चली आ रही है,लेकिन नतीजा शुन्य है। जाहिर है,इसी साल अक्टूबर-नबम्बर में हो रहे पांच राज्यों के विघान चुनाव में सभी दलों से दागी उम्मीदवार खड़े होंगे और अप्रैल-मर्इ 2014 में होने वाले आम चुनाव में भी कमोवेश यही स्थिति दोहरार्इ जाएगी। ऐसे में फिलहाल मतदाता उम्मीदवार की चरित्रहीनता से परिचित होने के बावजूद,हाथ मलते रह जाएगा।

हाल में राजस्थान के डेयरी और ग्रामोधोग मंत्री बाबूलाल नगर पर छेड़खानी और बलात्कार के आरोप में प्राथमिकी दर्ज हुर्इ है। इसके पहले यहीं के स्वास्थ्य अभियांत्रिकी मंत्री महिपाल मदेरणा जोधपुर की एक महिला नर्स भंवरी देवी के साथ बलात्कार और हत्या के मामले में आरोपित हैं। ये दोनों नेता पद तो गंवा चुके हैं, लेकिन चुनाव लड़ने का कानूनी हक आज भी रखते हैं। हाल ही में उत्तरप्रदेश के मुजफफरनगर में सांप्रदायिक हिंसा बड़े पैमाने पर हुर्इ है। इस हिंसा को भड़काने में भाजपा, बसपा और सपा के 16 नेताओं पर एफआर्इआर दर्ज हो चुकी है और गिरफतारी वांरट जारी हैं। नेता खबरिया चैनलों को बाइट दे रहे है,लेकिन पुलिस इन्हें हिरासत में नहीं ले पा रही है ? इस घटना की शुरूआत नारी उत्पीड़न से हुर्इ थी,लेकिन एक समुदाय विशेष का पक्ष लेने के कारण सांप्रदायिक हिंसा में बदल गर्इ। यहां के कददवार मंत्री आजम खान पर भी दंगो में दखल के आरोप लगे है। यह हकीकत एक समाचार चैनल द्वारा किए सिटंग आपरेशन से सामने आर्इ है। इसके पहले जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में दंगे हुए। दंगो को भड़काने के आरोप में एक मंत्री को भी पद गंवाना पड़ा। यहां महौल खराब स्वाघीनता दिवस के दिन भारत विरोधी नारे लगाने के कारण हुआ। आजादी के बाद देश में ऐसा पहली बार हो रहा हैं कि दंगा भड़काउ नेता कैमरे में कैद हैं। राजनीतिक हसितयों को पहली बार दिशा-निर्देश देते हुए ऐसे संवाद सिटंग किए गए हैं कि राजनीतिक सत्ताएं प्रजातंत्र को ताक पर रखकर संवैधानिक संस्थाओं को अपने हितों को साधती दिखार्इ दे रही हैं। यदि ऐसे प्रतिनिधि सत्ता में भागीदार बने रहते हैं तो न राजनीति दुरूस्त होने वाली है और न ही व्यवस्था। जाहिर है,ऐसे लोगों को चुनाव प्रणाली से दूर रखने के लिए चुनाव सुधार जरूरी हैं।

राजनीति को अपराधी तत्वों से छुटकारा दिलाने की दृष्टि से न्यायमूर्ति डीके जैन की अगुआर्इ में विधी आयोग ने चुनाव सुधार की दिशा में पहल की थी। आयोग ने विभिन्न राजनीतिक दलों को पत्र लिखकर जानना चहा था कि क्या ऐसे व्यकित को चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है,जिसके खिलाफ संगीन मामले में आरोप-पत्र दायर हो चुका हो? जन प्रतिनिधित्व कानून में चुनाव लड़ने से अयोग्य करार देने का प्रावधान तो है,पर यह उसी सूरत में लागू होता है,जब सजा सुनार्इ जा चुकी हो। मगर हम जानते हैं कि अदालतों में मामले लंबे खिंचते हैं और अपील दर अपील के चलते वे निपटने में नहीं आते। आखिर दोष-सिद्धि तक उन्हें चुनाव लड़ने से रोकना संभव नहीं हो पाता। इसी वजह से आयोग ने यह मामला उठाया था कि अदालती फैसले का इंतजार करने की बजाए, क्यों न आरोप-पत्र दायर होने या अदालत द्वारा आरोप-पत्र तय किए जाने को ही चुनाव लड़ने से वंचित करने का आधार मान लिया जाए। लेकिन दलों में इस मुददे पर सहमति नहीं दी।

इसी मकसद को आगे बढ़ाते हुए देश की सर्वोच्च अदालत ने जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 (4) को विलोपित कर दिया था। दरअसल इसी धारा की प्रतिच्छाया में नामजद और सजायाफताओं को निर्वाचन में भागीदारी के सभी अधिकार मिले हुए हैं। इसी क्रम में सजा सुनाए जाने के 6 साल बाद नेता मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज कराकर चुनाव लड़ सकते हैं। अलबत्ता इसके विपरीत यदि दोषी व्यकित की अपील उपरी अदालत मंजूर कर लेती है और जब तक अपील का निराकरण नहीं हो जाता,तब तक दोषी व्यकित को न तो मतदान से वंचित किया जा सकता है और न ही चुनाव लड़ने से ? जबकि जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 8 को विलोपित करने का आधार न्यायलय ने संविधान के अनुच्छेद 173 और 326 में अंतनिर्हित प्रावधानों को बनाया था। इनमें व्यवस्था है कि न्यायलय द्वारा दोषी करार दिए व्यकितयों के नाम मतदाता सूची में शामिल नहीं किए जा सकते हैं। यहां प्रश्न खड़ा होता है कि जब संविधान के अनुसार कोर्इ अपराधी मतदाता भी नहीं बन सकता है तो वह जनप्रतिनिधि बनने के नजरिए से निर्वाचन प्रकि्रया में भागीदारी कैसे कर सकता है ? संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत यह दोहरा मापदण्ड सामनता के अधिकार का उल्लंघन भी है। लेकिन सभी दलों ने मिलकर न्यायालय के इस चुनाव सुधार की दृष्टि से ऐतिहासिक फैसले की संसद में बलि चढ़ा दी। तय है, दागी वजूद में बने कहेंगे।

अपराधियों से मुक्ति मिलें तो चुनाव सुधार में दूसरी बड़ी पहल मतदाता को निर्वाचित प्रतिनिधी को वापस बुलाने के अधिकार मिलने के कानून से होनी चाहिए। लोकसभा के पूर्व अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी और पूर्व निर्वाचन अयुक्त टीएन शेषन भी मतदाता को नकारात्मक मतदान का अधिकार मिलने की पैरवी कर चुके हैं। यदि वाकर्इ यह अधिकार कानूनी रूप लेता है तो राजनीति में दागी, भ्रष्ट और लापरवाह जनप्रतिनिधियों पर अंकुश लगेगा। जबावदेही से निश्चित रहने वाले और सरकारी सुविधाओं का उपभोग करने वाले प्रतिनिधि दरकिनार होंगे। इस कानून के अमल में आने से राजनीतिक दलों को सबक मिलेगा और वे गैर-जिम्मेबार लोगों को टिकट ही नहीं देगें। यह अधिकार देश में एक नए युग का सूत्रपात करने वाला सिद्ध हो सकता है।

भारतीय लोकतंत्र और वर्तमान राजनीतिक परिदृष्य में जो अनिश्चय,असमंजस और हो-हल्ला का कोहरा छाया हुआ है,वह इतना गहरा, अपारदर्शी और अनैतिक है कि इससे पहले कभी देखने में नहीं आया। षेर-गीदड़ और कुत्ते-बिल्ली एक ही घाट पर पानी पीने में लगे हैं। राष्ट्रीय हित व क्षेत्रीय समस्याओं को हाशिए पर छोड़,जनप्रतिनिधियों ने सत्ता को स्वंय की समृद्धि का साधन और वोट बैंक की राजनीति का खेल जिस बेशर्मी से बनाया हुआ है,वह लोकतंत्र को लजिजत करने वाली स्थिति है। इन स्थितियों में मतदाता को नकारात्मक मतदान और निर्वाचित प्रतिनिधि को बीच में वापस बुलाने का हक मिलता है तो कालांतर में लोकतंत्र का प्रतिनिधि र्इमानदार,नैतिक दृष्टि से मजबूत और जनता व संविधान के प्रति जबाबदेह होगा। वैसे भी डा राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि ‘जिंदा कौंमें पांच साल इतंजार नहीं किया करतीं। लेकिन विधायिका में बैठे जनप्रतिनिधि फिलहाल ऐसा नहीं चाहते,इसलिए जैसे हैं और जैसे आगे आएंगे उन्हें ही जनता को भुगतना होगा।

प्रमोद भार्गव

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