लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-
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पिछले दो अंकों मे मैंने घर का नाम जिसे पैट नेम या निक नेम कहते हैं, उसकी चर्चा नहीं की थी तो आज यहीं से आरंभ करते हैं। बच्चे के पैदा होते ही अगर पहले से नाम न सोचा हो तो लोग उसे मुन्ना-मुन्नी, गुड्डु-गुड़िया या बंटी-बबली जैसे नामो से पुकारने लगते हैं, बाद में उनका नाम कुछ भी रख दिया जाये ये नाम जीवनभर के उनके साथ चिपक जाते हैं, बचपन के इन्ही नामो से वो पहचाने जाते हैं। ऐसा ही एक बड़ा प्यारा सा नाम है पप्पू… बहुत सारे पप्पू होंगे जिन्हें अब अपना ये नाम बिल्कुल भी पसन्द नहीं होगा और इससे छुटकारा पाना चाहते होंगे और राह नज़र न आती होगी…! आजकल तो माता-पिता प्यार से अपने बेटे का नाम पप्पू कभी नहीं रखेंगे, क्योंकि अब पप्पू तीन वजह से जाना जाता है- सबसे पहली वजह कि पप्पू डांस नहीं कर सकता, दूसरी वजह कि पप्पू पास हो गया और तीसरी वजह कि एक बहुत (ना) कामयाब राजनैतिक पार्टी के वारिस को भी इस नाम से जाना जाता है, अब कोई ये नाम रख दे तो बच्चों को बिलकुल अच्छा नहीं लगेगा!

घर के नाम कभी कभी वास्तविक नाम को छोटा करने के लिये भी रख दिये जाते हैं- जैसे नीलिमा को नीलू, नीरजा को नीरू, राजकुमार को राजू, रामकुमार को रामू, तनुजा को तनु, राघवेन्द्र को रघु या मीनाक्षी को मीनू अक्सर कहा जाता है। कभी-कभी घर का नाम रख लिया जाता है पर असली नाम बहुत बाद में रखा जाता है। ऐसे में दोनों में कोई संबध ही नहीं होता। जैसे शैलेन्द्र को रूबी या विक्रम को बौबी कहा जाये।
कभी-कभी अच्छा ख़ासा नाम होते हुए जब बच्चा स्कूल जाता है तो उसका नाम कुछ और ही लिखा दिया जाता है, जैसे नेहा का जब स्कूल में दाख़िला हुआ तो उसका नाम नम्रता लिखवा दिया गया तो परिवार और पारिवारिक मित्रों के लियें वो नेहा और बाहर के लोगों के लिये नम्रता बन गई, अब व्यर्थ ही दो नामों का बोझ उठा रही है। कभी-कभी पति पत्नी या ददिहाल (दादा के) और ननिहाल(नाना के) वाले अपने अपने प्रिय नामों पर अड़ जाते हैं, तब या तो दोहरा नाम रखना पड़ता है या एक घर में पुकारने का और एक वास्तविक नाम। नानी के घर व्यक्ति एक नाम से जाना जाता है और दादी के घर दूसरे नाम से।

आज कल तो एक दो बच्चे होते हैं। पहले जब 7-8 या और ज़्यादा होते थे। नाम याद रख पाना कितना मुश्किल होता होगा, वो भी जब सबके दो दो नाम हों।बाहर वाले क्या माता पिता भी भूल जाते होंगे कि चुन्नू का नाम राकेश है या मुन्नू का! आपमें से कुछ को शायद याद भी न हो एक अभिनेता थे… अरे थे नहीं, हैं.. कुमार गौरव, वही अपने राजेन्द्र कुमार साहब के पुत्र, तब मन मे विचार आया था कि ये कुमार गौरव क्यों हैं इन्हें तो गौरव कुमार होना चाहिये था।

आजकल कुमार विश्वास भी चर्चा में है। इसी तरह कुमार राज भी कुछ उल्टा सा लगता है होना तो राजकुमार चाहिये। सुना है राजस्थान मे अविवहित लड़कियां अपने नाम के आगे कुमारी लगाती हैं। जैसे कुमारी मीना या कुमारी टीना। अगर कुमार या कुमारी नाम से पहले लगाने से वैवाहिक स्थिति का पता चलता है तो विवाह के बाद पुरुष भी क्या नाम के आगे से कुमार हटा लेंगे ?

भारत में नाम के अर्थ को बहुत महत्व दिया जाता है। अब अंग्रेज़ों की तरह हमारे यहां टौम, डिक, हैरी जैसे निरर्थक शब्द को तो नाम के रूप में रखने का रिवाज तो नहीं है। नाम के अर्थ मे सकारात्मकता और सद्गुण होने चाहिये इसलिये ‘गर्व’ नाम रख सकते हैं ‘घमंडी’ नहीं, इसी तरह ‘सुरीली’ नाम हो सकता है ‘बेसुरी’ नहीं परन्तु हिन्दी का कम ज्ञान होने के कारण माता-पिता कभी कभी नकारात्मक नाम रख देते हैं। ऐसे अपवाद मिल जाते हैं कभी-कभी। एक बार मेरा बेटा किसी सी से फोन पर बात कर रहा था तो अचानक चौंक कर बोला आशंका! फिर ठीक है ठीक है… बात समाप्त होने के बाद मैने अपने बेटे पूछा ‘काहे की आशंका है?’ तो उसने कहा ‘मां वो क्लायन्ट थी, उसका नाम आशंका है।‘ मैंने कहा ‘सुनने में ग़लती हुई होगी वो आकांक्षा होगी,’ तो उसने कहा ’नहीं मां उसका नाम आशंका ही है। उसने मेल आईडी भी भेजी है।’

नामों से कभी-कभी व्यक्ति की आयु का अनुमान लगाया जा कता है, उत्तर भारत में जैसे किसी का नाम यदि रामेश्वर प्रसाद हो तो उसकी आयु सत्तर के पास होगी, इस आयुवर्ग में ऊषा, सरोज, विजय उमा, उमाशंकर जैसे नाम मिलेंगे। 60 के आसपास अशोक, माया, विक्रम मिलेंगे। 50 के पास अजय, विशाल, रश्मि, रेखा आदि का बोलबाला होगा। 30-40 की आयु वर्गों मे मर्दों में राहुल, करण और अभिषेक बेशुमार होंगे। महिलाओं मे पूनम, ज्योति और ज्योत्सना और सुमन की बहार होगी।20 से अधिक मे नेहायें और पूजायें लाइन लगा कर खड़ी होंगी।इसके बाद के दशकों मे ईशान, ईशा, अंकित, अंकिता और अनुश्री की दावेदारी है। पिछले 10- 20 साल के अंदर सारे अजीबो ग़रीब नाम विवान, वियान, कियान, समायरा, नाइसा, हिरल, विरल या ऐसे ही नाम आते हैं, जिनका या तो अर्थ कुछ नहीं है, या हमारे जैसों को नहीं मालूम।

अब तुम्हारा नाम है ?-3 सफलता मिलती है या नहीं मुझे नहीं पता, क्योंकि बौक्स औफ़िस का गणित कोई नहीं जानता पर यकीन मानिये, यह इस विषय पर तीसरी और आख़िरी किस्त है। अगर मैंने चौथी किस्त लिखकर प्रवक्ता को भेजी तो संजीव सिन्हा मेरी रचनायें प्रकाशित करना बंद कर देंगे। हां संजीव से याद आया, संजीव की उम्र भी 30-40 के बीच ही होनी चाहिये… क्यों ठीक लगाया न अनुमान…।

(इस व्यंग की पिछली दो कड़ियां http://www.pravakta.com/what-is-your-name
http://www.pravakta.com/one-more-sequel links पर उपलब्ध हैं।)

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