लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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विजय कुमार

1985 में दूरदर्शन पर अनेक कलाकारों को मिलाकर बना कार्यक्रम‘देश-राग’ बहुत लोकप्रिय हुआ था। सुरेश माथुर द्वारा लिखित गीत के बोल थे,‘‘मिले सुर मेरा तुम्हारा, तो सुर बने हमारा।’’ उगते सूर्य की लालिमा, सागर के अनंत विस्तार और झरनों के कलकल निनाद के बीच जो धीर-गंभीर स्वर और चेहरा दूरदर्शन पर प्रकट होता था, वह था पंडित भीमसेन जोशी का। इस गीत की मूल धुन भी उन्होंने ही बनाई थी। राग भैरवी में निबद्ध इस गीत ने शास्त्रीय संगीत एवं भीमसेन जी को पूरे भारत में लोकप्रिय कर दिया।

भीमसेन जी का जन्म कर्नाटक के धारवाड़ जिले में स्थित एक छोटे नगर गडग में चार फरवरी, 1922 को एक अध्यापक श्री गुरुराज जोशी के घर में हुआ था। अपनी माता जी के भजन और दादाजी के कीर्तन सुनकर इनकी रुचि भी गीत और संगीत की ओर हो गयी। एक बार गांव का एक दुकानदार ‘किराना घराने’ के संस्थापक अब्दुल करीम खां के कुछ रिकार्ड लाया। उन्हें सुनकर भीमसेन ने निश्चय कर लिया कि उन्हें ऐसा ही गायक बनना है।

1932 में गडग में अब्दुल करीम खां के शिष्य प्रसिद्ध गायक रामभाऊ कुंदगोलकर (सवाई गंधर्व) के कार्यक्रम से प्रभावित होकर बालक भीमसेन ने घर छोड़ दिया। कई महीने तक खाली जेब, बिना टिकट घूमते हुए उन्होंने जालंधर, लखनऊ, रामपुर, कोलकाता, बीजापुर, ग्वालियर आदि में संगीत सीखा। इसके बाद वे भाग्यवश सवाई गंधर्व के पास ही पहुंच गये। सवाई गंधर्व ने इन्हें शिष्य बनाकर पूरे मनोयोग से गायन सिखाया।

धीरे-धीरे गीत और संगीत भीमसेन जी के जीवन की साधना बन गयी। 1946 में अपने गुरु सवाई गंधर्व के 60वें जन्मदिन पर पुणे में हुए कार्यक्रम से ये प्रसिद्ध हुए। फिर तो देश भर में इन्हें बुलाया जाने लगा। अब लोग इन्हें अब्दुल करीम खां और सवाई गंधर्व से भी बड़ा गायक मानने लगे; पर भीमसेन जी सदा विनम्र बने रहे। किराना घराना भावना प्रधान माना जाता है; पर भीमसेन जी ने उसमें शक्ति का संचार कर नया रूप दे दिया।

बहुभाषी भीमसेन जी मुख्यतः खयाल और भजन गाते थे। अभंग गाते समय वे मराठी, जोगिया राग गाते समय पंजाबी, वचन गाते समय कन्नड़भाषी और मीरा या सूर के पद गाते समय हिन्दीभाषी लगते थे। उन्होंने श्री हरिप्रसाद चौरसिया, पंडित रविशंकर तथा डा0 बाल मुरलीकृष्ण जैसे श्रेष्ठ संगीतकारों के साथ जुगलबंदी की। शुद्ध कल्याण उनका सबसे प्रिय राग था। उन्होंने कई राग मिलाकर कलाश्री और ललित भटियार जैसे कुछ नये राग भी बनाये। उन्होंने कुछ फिल्मों में भी अपने गायन और संगीत विधा का प्रदर्शन किया।

पुणे में अपने गुरु की स्मृति में प्रतिवर्ष सवाई गंधर्व महोत्सव करते थे। इसमें विख्यात और नये दोनों ही तरह के कलाकारों को बुलाया जाता था। विश्व पटल पर स्थापित ऐसे कई कलाकार हैं, जो इस समारोह से ही प्रसिद्ध हुए। इसमें पूरे महाराष्ट्र से श्रोता आते हैं। कई बार तो गायक के साथ संगत करने वाले को हल्का पड़ते देख भीमसेन जी स्वयं तानपूरा लेकर बैठ जाते थे।

शास्त्रीय गायन के पर्याय पंडित भीमसेन जी को सैकड़ों पुरस्कार मिले। उन्हें पदम्श्री, संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, पद्मभूषण, तानसेन सम्मान और 2008 ई0 में ‘भारत रत्न’ से विभूषित किया गया। एक बार प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें राज्यसभा में भेजना चाहा, तो उन्होंने अपने दोनों तानपूरों की ओर संकेत कर कहा कि मेरे लिए ये दोनों ही लोकसभा और राज्यसभा हैं।

देश-राग का यह सर्वोत्तम स्वर 24 जनवरी, 2011 को सदा के लिए मौन हो गया; पर अपने गायन द्वारा वे सदा अमर रहेंगे।

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2 Comments on "देश राग के सर्वोत्तम स्वर: पंडित भीमसेन जोशी"

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बिना झा
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(कश्मीरी) चॉन्य् तरज़ तय म्यॉन्य् तरज़ इक-वट बनि यि सॉन्य् तरज़ (पंजाबी) तेरा सुर मिले मेरे सुर दे नाल मिलके बणे एक नवा सुर ताल (सिन्धी) मुहिंजो सुर तुहिंजे साँ प्यारा मिले जडेंह गीत असाँजो मधुर तरानो बणे तडेंह (उर्दू) सुर का दरिया बह के सागर में मिले (पंजाबी) बदलाँ दा रूप लैके बरसन हौले हौले (तमिल) इसैन्दाल नम इरुवरिन सुरमुम नमदक्कुम तिसै वॆरु आनालुम आऴि सेर मुगिलाय मऴैयय पोऴिवदु पोल इसै नम इसै… (कन्नड) नन्न ध्वनिगॆ निन्न ध्वनिय, सेरिदन्तॆ नम्म ध्वनिय (तेलुगु) ना स्वरमु नी स्वरमु संगम्ममै, मन स्वरंगा अवतरिंचे . (मलयालम) निंडॆ स्वरमुम् नींगळुडॆ स्वरमुम् धट्टुचॆयुम् नमुडॆय स्वरम… Read more »
Himwant
Guest
1947 मे लगता था की भारत की राज्य व्यवस्था एकात्मक होनी चाहिए. लेकिन भारत संघ उसके बाद के वर्षो मे एक राष्ट्र के रुप मे विकसित हुआ है तथा तकरीबन हरेक प्रदेश के लोग भारतीय राष्ट्रियता मे अटुट विश्वास रखते है, उसे देख कर लगता है की यह संघियता का अभ्यास सफल रहा है. यह गीत भारतीय संघियता की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति. अब जो टुट गए है वो भी मिल जाए और अखण्ड भारत बन सके तो हम अपने गौरवशाली अतीत को फिर से जी सकेगें :- मिले सुर मेरा तुम्हारा तो सुर बने हमारा सुर की नदियाँ हर दिशा से… Read more »
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