लेखक परिचय

पियूष द्विवेदी 'भारत'

पीयूष द्विवेदी 'भारत'

लेखक मूलतः उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले के निवासी हैं। वर्तमान में स्नातक के छात्र होने के साथ अख़बारों, पत्रिकाओं और वेबसाइट्स आदि के लिए स्वतंत्र लेखन कार्य भी करते हैं। इनका मानना है कि मंच महत्वपूर्ण नहीं होता, महत्वपूर्ण होते हैं विचार और वो विचार ही मंच को महत्वपूर्ण बनाते हैं।

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पीयूष द्विवेदी    

नक्सल समस्या से बुरी तरह से प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में आख़िरकार पहले चरण का मतदान काफी सही ढंग से संपन्न हो गया ! पहले चरण में chछत्तीसगढ़ के बस्तर और राजनांदगाँव की १८ सीटों पर मतदान हुआ ! इस दौरान तकरीबन सवा लाख के आसपास जवान पूरी मुस्तैदी के साथ मतदान संपन्न कराने में लगे रहे ! नक्सलियों द्वारा कुछेक जगहों पर हिंसक घटनाएँ अंजाम देने की कोशिश जरूर की गई, पर हमारे जवानों के हौसले और मतदाताओं की हिम्मत के आगे नक्सलियों की एक न चली और मतदान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ ! अब चूंकि इस चरण में छत्तीसगढ़ के जिन क्षेत्रों में मतदान हुआ, उनमे प्रदेश के मुख्यमंत्री रमन सिंह समेत उनके मंत्रिमंडल के और तीन मंत्रियों केदार कश्यप, लता उन्सादी और विक्रम उन्सादी के चुनाव क्षेत्र भी शामिल थे ! इसके अतिरिक्त ये क्षेत्र खासा नक्सल प्रभावित इलाकों में भी आते हैं ! अतः इन बातों के मद्देनज़र भी सुरक्षा इंतजामों की चाक-चौबंदी अपने चरम पर थी ! हालाकि ये सही नही कहा जा सकता कि चुनाव बंदूकों के साये में हो ! क्योंकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अगर चुनाव हथियारों के साये में होता है, तो इसे लोकतंत्र के लिए बेहतर संकेत नही कह सकते ! सच्चा लोकतंत्र तो ये है कि मतदान खुले माहौल में हो, पर यह भी एक सत्य है कि छत्तीसगढ़ में सुरक्षा के जो जमीनी हालात हैं उन्हें देखते हुए ये सुरक्षा इंतजाम अनिवार्य ही थे ! इन सुरक्षा इंतजामों के कारण ही शायद ये संभव हो पाया कि नक्सलियों द्वारा खुले तौर पर चुनाव का बहिष्कार करने के एलान के बावजूद भी प्रदेश में ६८ फिसदी मतदान हुआ ! गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ के कई नक्सली गुटों द्वारा चुनाव से ठीक पहले लोगों से मतदान न करने की अपील की गई थी ! पर अगर एकाध मतदान केन्द्रों को अपवाद मान लें तो नक्सलियों की इस अपील को दरकिनार करते हुए लोगों द्वारा बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लिया गया ! हालाकि चुनाव में खलल डालने और मतदाताओं में भय कायम करने के लिए नक्सलियों द्वारा सर्वाधिक नक्सल प्रभावित दंतेवाड़ा के कुछ इलाकों में हिंसा फैलाने की कोशिश की गई, पर इन सबके बावजूद जिस तरह से चुनाव के इस चरण में ६८ फिसदी मतदान हुआ उससे ये साफ़ होता है कि छत्तीसगढ़ की जनता प्रतिरोध के लिए हिंसात्मक तरीको की बजाय लोकतांत्रिक व्यवस्था और उसके तरीकों को अपनाना चाहती है ! साथ ही छत्तीसगढ़ के सर्वाधिक  नक्सल प्रभावित इलाकों में हुए इस ६८ फिसदी मतदान के द्वारा लोगों ने नक्सलियों को भी ये बताने की कोशिश की कि जनता उनके नही लोकतंत्र और संविधान के साथ है ! सही मायने में छत्तीसगढ़ में हुआ ये ६८ फीसद मतदान नक्सलियों और लोकतंत्र के बीच जारी द्वंद्व में लोकतंत्र की विजय का ही प्रतीक है !

  अब जरा बात मोड़ते हुए अगर एक नज़र नक्सलवाद पर डालें तो सत्तर के दशक में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी गाँव से जन्मा ये सशस्त्र आंदोलन अब अपने प्रारंभिक आदर्शों और उद्देश्यों से पूरी तरह से भटक चुका है ! गौर करना होगा कि बीसवी सदी के सातवे दशक में जिन उद्देश्यों व विचारों के साथ इस नक्सल आंदोलन का जन्म हुआ था, वो काफी हद तक सही और शोषित वर्ग के हितैषी थे ! पर समय के साथ जिस तरह से इस सशस्त्र आंदोलन से वो विचार और उद्देश्य लुप्त होते गए, उसने इस आंदोलन की रूपरेखा ही बदल दी ! उन विचारों व उद्देश्यों से हीन आज इस नक्सल आंदोलन की हालत ये है कि ये आंदोलन अपने प्रारंभिक ध्येय से अलग एक हानिकारक और अनिश्चित संघर्ष का रूप ले चुका है ! सही मायने में तो  इसे आंदोलन कह भी नही सकते ! क्योंकि आंदोलन उसे कहते हैं जिसकी कोई सोच व विचारधारा हो, पर फ़िलहाल ये तथाकथित नक्सल आंदोलन विचारों व आदर्शों से शून्य मात्र आतंक और हिंसा फ़ैलाने वाले संगठन की तरह रह गया है ! दरअसल नक्सलियों के तरफ से हमेशा से यही कहा जाता रहा है कि वो शोषितों, आदिवासियों के मसीहा और उनके हितों के रक्षक हैं ! उनका ये कहना उस समय के लिए सही भी था जब उनका ये सशस्त्र विद्रोह अपने प्रारंभिक दौर में था ! पर अब जिस तरह की वारदातें उनके द्वारा अंजाम दी जा रही हैं, उन्हें देखते हुए उनकी इन जनहितैषिता वाली इन बातों को सफ़ेद झूठ ही कहा जा सकता है ! सोचने वाली बात है कि आज जिस तरह से नक्सलियों द्वारा अपनी बात मनवाने के लिए आए दिन बेगुनाहों का खून बहाया जा रहा है, क्या वो किसी आंदोलन का स्वरुप है ? प्रश्न ये भी उठता है कि सरकार द्वारा बार-बार बातचीत के जरिए उन्हें विकास की मुख्यधारा से जोड़ने की कवायद होने के बावजूद भी आखिर उनपर कोई विशेष प्रभाव क्यों नही पड़ता और वो हिंसा का रास्ता छोड़ने को तैयार क्यों नही होते ? इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि नक्सलियों को विकास मुख्यधारा की बजाय आतंक का यही रास्ता पसंद है ! पर छत्तीसगढ़ चुनाव के इस पहले चरण के मतदान को देखते हुए ये प्रतीत होता है कि अब वहाँ की जनता समझ चुकी है कि न तो नक्सली किसी के हितैषी हैं और न ही उनके द्वारा अख्तियार हिंसात्मक प्रतिरोध की राह पर चलकर ही कुछ हासिल होने वाला है ! यही कारण है कि नक्सलियों की अनेक अपीलों के बावजूद भी लोगों द्वारा पूरे उत्साह के साथ मतदान करते हुए नक्सलियों को उनकी असलीयत का आइना दिखाया गया है !

 

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