लेखक परिचय

विकास कुमार गुप्ता

विकास कुमार गुप्ता

हिन्दी भाषा के सम्मान में गृह मंत्रालय से कार्रवाई करवाकर संस्कृति मंत्रालय के अनेको नौकरशाहों से लिखित खेद पत्र जारी करवाने वाले विकास कुमार गुप्ता जुझारू आरटीआई कार्यकर्ता के रूप में पहचाने जाते है। इलहाबाद विश्वविद्यालय से PGDJMC, MJMC। वर्ष 2004 से स्वतंत्र पत्रकारिता के क्षेत्र में हैं। सम्प्रति pnews.in का सम्पादन।

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विकास कुमार गुप्ता

narendra-modiप्रजातंत्र में जब सबकुछ जनता को ही तय करना है तब आखिर देशभर के नेता, बुद्धिजीवी, विचारक, समाजसेवी एवं अनेकों प्रकार के लोग आखिर मोदी विरोधी बयान क्यों दे रहे हैं? और यह बयानबाजी जब सात समुन्दर पार अंतर्राष्ट्रीय मीडियाओं द्वारा आने लगे वह भी एक प्रजातांत्रिक देश के लिए तो स्थिति का आंकलन स्वतः किया जा सकता है। न्यूयार्क टाईम्स ने अपने 18 अक्टूबर 2013 के सम्पादकीय में मोदी की व्याख्या जिस तरीके से की वह अप्रत्यक्ष रूप से मोदी विरोध था।

17 सितम्बर 1950 को वर्तमान गुजरात में जन्मे नरेन्द्र मोदी राजनीति शास़्त्र में परास्नातक हैं। अक्टूबर 2001 में केशुभाई पटेल के इस्तीफे के बाद से मोदी वर्तमान तक गुजरात के मुख्यमंत्री हैं। विचारणीय है कुछ सालों पहले नरेन्द्र मोदी राष्ट्रीय स्तर के नेता नहीं माने जाते थे एवं उनके बयानों को कोई खास तवज्ज़ों भी नहीं दी जाती थी। नरेन्द्र मोदी का दायरा लगभग गुजरात तक ही सीमित था। इनके नमो बनने का सिलसिला तब शुरु हुआ जब भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी के बैठक में उपस्थित पाये गयें। उस समय भाजपा किले में पीएम प्रत्याशी की घोषणा को लेकर वीरों का अस्त्र प्रयोग, पोस्टर प्रयोग, अनुपस्थिति, उपस्थिति की गूढ़ विद्या, आवश्यक अनावश्यक बयानबाजियों का दौर चल रहा था तब अनेकों धुरंधर महाभारत के द्रोणाचार्य, अर्जुन और चिडि़या की आंख के मनन में थे। हां यह दीगर था कि कुछ पर्दे के पीछे से निशाना बेध रहे थे तो कुछ खुलेआम मंच पर आसीन होकर। उस समय राजनीति के दिग्गज माने जाने वाले लोग एक सिरे से मोदी को पीएम पद के लिए खारिज कर रहे थे लेकिन अंततः मोदी भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार घोषित कर ही दिये गये फर्क इतना रहा की पहले मोदी विरोधी बयानबाजियाँ राजनीति के गलियारों से आती थी लेकिन अब यह लगभग हर उस जगह से आ रही हैं जहां से जनता को विश्वास में लिया जा सके कि मोदी प्रधानमंत्री बने तो देश में माहौल खराब हो जायेगा और मोदी के योग्यता पर भी सवाल उठाये जा रहे हैं। शोभन सरकार से भी आगे बढ़ते हुए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात कन्नड़ लेखक डा. यू आर अनंतमूर्ति ने कहा था ”नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर वह देश में नहीं रहेंगे।“ अन्ना हजारे भी मोदी को प्रधानमंत्री के लायक नहीं मानते। चिंतक माने जाने वाले केएन गोविंदाचार्य ने फरवरी में कहा था कि गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लायक नहीं हैं। उससे पहले नीतिश कुमार, शरद यादव, दिग्विजय सिंह सरीखे अनेकों नेता मोदी के पीएम पद को लेकर अपने विरोधाभाषी बयान जारी कर चुके हैं। देश के लगभग जाने माने लोग मोदी को लेकर अपनी छिंटाकसी कर चुके हैं।

महात्मा गांधी ने अपने लिखित वक्तव्य में कहा था ”याद रखना, आजादी करीब हैं। सरकारे बहुत जोर से यह जरूर कहंेगी कि हमने यह कर दिया, हमने वह कर दिया। मै अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन व्यावहारिकता किसी भी अर्थशास्त्री से कम नहीं हैं, आजादी के बाद भी जब सरकार आएगी, तो उस सरकार के कहने पर मत जाना, इस देश के किसी हिस्से में एक किलोमीटर चल लेना, हिन्दुस्तान का सबसे लाचार, बेबस बनिहार मिल जायेगा, अगर उसकी जिन्दगी में कोई फर्क नहीं आया तो उसी दिन, उसी क्षण के बाद चाहे वह किसी की सरकार हो उसका कोई मतलब नहीं। गांधीजी के विचार तो विचार ही रह गये। नेहरू की पहली सरकार आयी और आज हम यूरोप से 65 गुणा पीछे हो चुके हैं। हमारी कीमत जोकी रुपये की कीमत है वह कम हो चुकी हैं। हमने लोन ले लेकर अपनी औकात कम कर चुके हैं। महात्मा गांधी तो संविधान लागू होने से पहले ही विदा हो गये। अगर वर्तमान में गांधीजी भी होते और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार होते तो शायद उनका, मोदी से ज्यादा विरोध होता। क्योकि गांधीजी होते तो वल्र्ड बैंक, डब्ल्यूएमएफ की नीतियों का विरोध करने वाले पहले भारतीय होते। अमेरिका, ब्रिटेन की भाषा पर इस देश को कतई नहीं लुढ़काते। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन आदि वैश्विक देशों की वैसी वस्तुओं को यहां कतई नहीं बेचने देते जो जीरों तकनीकी की हैं लेकिन वर्तमान व्यवस्था में हमारे खुदरा दुकान ब्रिटेन के यूनीलीवर और अमेरिकी प्रोडक्टों से पटे पड़े हैं। बस फिर वैश्विक कंपनीयां और ये सभी देश गांधी विरोध में जुट जातें। गांधीजी होते तो आज नमक पर टैक्स नहीं होता। गांधीजी होते तो समूचा तंत्र वैसा नहीं होता जैसा आज हैं। परिवर्तन की आंधी चलती और यूरोप की नीतियां और विचार तेज हवां के झोंकों के साथ वापस यूरोप भाग जाते। एक बार लाल बहादुर शास्त्री जी ने कुछ ऐसा ही करने की कोशिश की थी और नतीजा सब जानते हंै कि उनका पोस्टमार्टम तक नहीं हुआ था। उनको ताशकंद में में भी मृत पाया गया।

वर्तमान में भारत की स्थिति समझने के लिए बस इतना उल्लेख काफी है कि हमारे देश के स्लम एरिया में पालतु कुत्तों से भी बद्तर जिन्दगी बसर कर रहे लोगों की संख्या विश्व के अनेक देशों की जनसंख्या से भी ज्यादा हैं और आने वाले समय में यह और भी भयावह रूप में हमारे सामने आने वाला हैं। यूरोप का पूंजीवादी चेहरा भारत को ढंकने लगा हैं और इस चादर पर जाने अनजाने भारत के रसूखदार लोग सवार हैं। इन रसूखदार लोगों में अधिकतर अनजान हैं कि यह पूंजीवादी चेहरा भारत को उस चादर तले ढंक लेगा जहां सिर्फ स्लम एरिया और अमेरिका सरीखे संपन्न लोग बचेंगे। जो जानते हैं वे जानबूझकर अनजान बने हुये हैं क्योंकि उन्हें पता है उनका क्या हश्र हो सकता है और जो बेचारे अजनान हैं उनकी बात ही करनी बेमानी हैं। जाति, पाति, पंथ, विचार आदि अनेकों फैक्टर के पहियों पर यह देश चलायमान हैं और इससे यूरोप को कोई कष्ट नहीं और अगर भारतीय प्रजातंत्र के संविधान के अनुसार जनता मोदी को प्रधानमंत्री बनाती है तो इसमें यूरोप और कथित भारतीय विशेषज्ञों, नेताओं, समाजसेवियों आदि को दिक्कत हैं? अपने मन से अथवा दूसरों के बयानों को तोता सरीखे रटने वाले बुद्धीजीवियों को अपने बयान से पहले सोचना चाहिये कि अगर भाजपा मोदी को पीएम प्रत्याशी बना रही है तो मोदी कोई पीएम नहीं बन जाने वाले। चुनाव होगा जनता जिनकों चुनेगी वे और उनकी पार्टियां मिलजुलकर तय करेंगी की मोदी पीएम बनेंगें या नहीं। मोदी विरोध के चादर पर वैश्विक कंपनीयों, यूरोप और तथाकथित आजादी पश्चात् यूरोपीय विचारधारा और रंग को सबसे चमकदार बताने वाले कुछ लोग हो सकते हैं। आजादी पश्चात से अबतक लगभग वही लोग देश के नीतिकर्ता रहे हैं जिन्होनंे बीएमडब्ल्यू और मर्सीडीज से बैलगाड़ी को खींचने की कोशिश की हैं और जो यूरोपीयन गुणगान के समर्थक रहे हैं। समाजवादी पार्टी के महासचिव नरेश अग्रवाल जिस प्रकार कहा कि ” एक चाय बेचने वाले का नजरिया कभी राष्ट्रीय स्तर का नहीं हो सकता।” वह प्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शित कर रहा है कि जमीनी आदमी का पीएम पद पर पहुंचना न सिर्फ देश के रसूखदार लोगों के लिए विरोधाभाषी हैं बल्कि गांधीजी के बनिहार वाली कथन के लिए विरोधाभाषी हैं। दरअसल ब्रिटिश इंडिया से चली आ रही परंपरा के अनुसार देश का कोई भी जमीनी व्यक्ति अगर पीएम बनता है तो अंग्रेजी रंग में रंगे लोगों के लिए दिक्कत की बात तो होगी ही। बाकी आप सभी समझदार हैं और समझदारों के लिए इशारा ही काफी हैं। मोदी विरोध सिर्फ इसीलिए हो रहा है कि ताकी ब्रिटिश इंडिया के समय से चली आ रही शासन में आमूल चूल परिवर्तन न हो सकें। और यह यूरोपीयन देश से लेकर इनके पूंजीवादी रंग में रंग जाने वाले अनजाने भारतीय रसूखदार भी चाह रहे हैं इसीलिए सिर्फ मोदी विरोध हो रहा हैं।

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22 Comments on "नमो का विरोध आखिर क्यों?"

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आर. सिंह
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आज दो साल हो गए इस आलेख को प्रवक्ता.कॉम पर आये हुए.तब से बहुत कुछ बदल चूका है.नमो के शासन के भी अठारह महीने हो चुके हैं.इसी बीच राज्यों में भी बहुत जगह शासन परिवर्तन हो चूका है. एक तरह से दो हजार चौदह नमो के जयजयकार का वर्ष रहा,पर दो हजार पंद्रह में नजारा कुछ बदला हुआ है. नमो के अनवरत आगे बढ़ते रथ को भी दो जगह रोक लिया गया है.स्वच्छ भारत अभियान भी पूरी तरह से जोर नहीं पकड़ सका है.शौचालय तो बहुत बने हैं,पर कुछ लोगों की आदतें और कुछ रख रखाव की कमी उनका उपयोग… Read more »
शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह
बहुत शानदार लेख…… जीवंत चित्रण….अंतिम चंद लाइनें ही ख़त का मजमून बयां कर देती हैं, “दरअसल ब्रिटिश इंडिया से चली आ रही परंपरा के अनुसार देश का कोई भी जमीनी व्यक्ति अगर पीएम बनता है तो अंग्रेजी रंग में रंगे लोगों के लिए दिक्कत की बात तो होगी ही। बाकी आप सभी समझदार हैं और समझदारों के लिए इशारा ही काफी हैं। मोदी विरोध सिर्फ इसीलिए हो रहा है कि ताकी ब्रिटिश इंडिया के समय से चली आ रही शासन में आमूल चूल परिवर्तन न हो सकें। और यह यूरोपीयन देश से लेकर इनके पूंजीवादी रंग में रंग जाने वाले… Read more »
विकास कुमार गुप्ता
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विकास कुमार गुप्ता

shukriya

rtyagi
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bahut बहुत उचित कहा आपने शिवेंद्रजी। बधाई।

इंसान
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विकास कुमार गुप्ता जी के आलेख को पढ़ मन में कई भाव उठे हैं| विकास को उनके आलेख पर साधुवाद देते भावुक मन मैं केवल अच्छी भाव भंगिमा में मोदी जी के लिए भारत के प्रधान मंत्री बनने की प्रार्थना करूँगा ताकि उनके नेतृत्व में सभी भारतीय हर प्रकार के भेद भाव अथवा नित्य नए दिन धूर्त मीडिया में व्यर्थ वाद विवाद (मीडिया को राष्ट्र-हित अनुशासन में लाना होगा) से ऊपर उठ कर भारत पुनर्निर्माण में योगदान दें| यहाँ प्रवतका.कॉम पर “परिचर्चा : राष्ट्र क्या है?” पर पुन: लौट मैं दो शब्दों में उत्तर दे सकूंगा, “हिन्दू राष्ट्र!” यह देश… Read more »
Manoj Sharma
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मुज़फ्फरनगर दंगे के आरोपियों को मोदी जी का सम्मानित करना ,,[वो अलग बात है आखरी समय पर हमारे जैसी सोच रखने वालों कि वजह से कार्यक्रम में थोडा सा बदलाव किया पार्टी ने ] क्या कहना है आपका। अपना तो मन टूट गया। अब लगता है PM बनके क्या कर लेंगे मोदी जी। चलना तो उन्हें पार्टी के हिसाब से ही पड़ेगा ,,,,,एकता तो एक गॉव/शहर से शुरू होकर ही पूरा देश बनेगा ,,,,, जिंदगी मौत न बन जाये यारों …खो रहा …सब कुछ , हालात देखते हुए … आँख करो बंद और ” AAP ” का दबाओ बटन ,… Read more »
vikas kumar gupta
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यूरोप में पुनर्जागरण के बाद पूंजीवादियों के मध्य लोकतंत्र ने अपने सितारे बुलंद किये और उसके बाद पुनर्जागरण से हुये विज्ञान प्रगति के ताकत के बल से यूरोप ने तीसरी दुनियां के देशों को गुलाम बनाम आजाद कर जो लोकतंत्र के पिंजड़े में कैद किया वह पिंजड़ा अब भी राज्यतंत्र के रस्सी से जकड़ा हुआ हैं। राज्यतंत्र के चादर पर लोकतंत्र का रंग चढ़ा दिया गया है। फर्क सिर्फ इतना है कि राज्यतंत्र में सिर्फ परिवारवाद था लेकिन अब इसमें पैसा, पावर, जातिवाद आदि भी हैं।

इंसान
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ऐसे सुबोध विचार बार बार सुनने को आतुर मैं चाहूंगा कि भारतीय युवा १८८५ में जन्मी उस “राज्यतंत्र की रस्सी” इंडियन नेशनल कांग्रेस को आगामी चुनावों में पूर्णतय समाप्त कर मोदी जी के नेतृत्व में राष्ट्रवादी लोकतंत्र स्थापित करने में उत्कृष्ट योगदान दें| मुझे चिंता है कि भारतीय युवा में राजनीतिक जागरूकता के भय से वर्त्तमान “लोकतंत्र के पिंजड़े” में कार्यरत देशद्रोही तत्व व उनकी सेवा में लगे उनके भारतीय मूल के समर्थक फिर से फिरंगी राज की परिस्थिति उत्पन्न न कर दें|

डॉ. मधुसूदन
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मोदी यदि प्रधान मन्त्री बने, तो मुझे लॅप-टॉप मिलेगा क्या? मेरी जाति को आरक्षण मिलेगा क्या? मैं शौचालयों का विरोधी हूँ। उनकी कोई आवश्यकता नहीं मानता। क्यों देश का धन व्यर्थ खर्च कर रहे हो? सडकें भी बनाने की क्या आवश्यकता? बिजली? भाई बिना बिजली हम गाँव में रह सकते हैं। उसके लिए अनवश्यक राष्ट्रीय सम्पत्ति का व्यर्थ व्यय क्यों किया जाये? और भ्रष्टाचार से भला कौन बचा पाया है? रिश्वत लेकर और देकर ही तो काम शीघ्रता से होता है। वैसे आपने हनुमान चालिसा में भी तो पढा होगा। कहा है……. राम दुवारे तुम रखवारे, होत न आज्ञा बिनु… Read more »
Rtyagi
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कुछ ऐसी ही व्यथा है आज कि… जो को लोग कबूतर कि तरह आँखे बंद कर बिल्ली के आने का इंतज़ार कर रहे हैं… अरे एक मौका रास्ट्रवादी और परिवारवाद से दूर कि राजनीती करने वाले सामान्य से व्यक्ति को मौका मिलना चाहिए…

अपनी उवा अवस्था में भले ही आपने चाय बेचीं पर… आपने अपने को प्रमाणित किया है गुजरात में …अब आज आप देश चलाने में समर्थ है और आपको मौका मिलना चाहिए…

जय मोदी जी

विकास कुमार गुप्ता
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विकास कुमार गुप्ता

shukriya

vikas kumar gupta
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ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद

आर. सिंह
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आपने बहुत बड़ी बात कही है.”क्योकि गांधीजी होते तो वल्र्ड बैंक, डब्ल्यूएमएफ की नीतियों का विरोध करने वाले पहले भारतीय होते। अमेरिका, ब्रिटेन की भाषा पर इस देश को कतई नहीं लुढ़काते। अमेरिका, ब्रिटेन और चीन आदि वैश्विक देशों की वैसी वस्तुओं को यहां कतई नहीं बेचने देते जो जीरों तकनीकी की हैं लेकिन वर्तमान व्यवस्था में हमारे खुदरा दुकान ब्रिटेन के यूनीलीवर और अमेरिकी प्रोडक्टों से पटे पड़े हैं।” क्या नमो इस पर खरे उतरते हैं? क्या वे उस युग का प्रारम्भ करेंगे जिसका सपना महात्मा गांधी या पंडित दीन दयाल उपाध्याय ने देखा था? अभी तक तो उनका… Read more »
विकास कुमार गुप्ता
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विकास कुमार गुप्ता

नमो खरे उतरेंगें की नहीं यह तो समय बतायेगा सिंह जी, लेकिन यह भी सोचिये की कांग्रेस का विकल्प आखिर है कौन इस देश में? एक मोदी ऐसे व्यक्ति हैं जिनपर देश विश्वास कर रहा है। भाजपा अपना विश्वास खो चुकी थी और विश्वास करिये मोदी नहीं होते तो कांग्रेस पूर्ण बहुमत के साथ फिर सत्ता में आती। क्योंकि यह देश जातिवाद पर चलता है लेकिन अगर नितीश, मोदी, केजरीवाली टाइप के लोग आते है तो जनता सबकुछ भुलाकर इनको वोट देती है। आज देश भाजपा को नहीं वरन मोदी को वोट कर रहा हैं।

आर. सिंह
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आपने लिखा है” अगर नितीश, मोदी, केजरीवाली टाइप के लोग आते है तो जनता सबकुछ भुलाकर इनको वोट देती है। ” तो आज मैं यह कहना चाहता हूँ कि आने वाले समय में कांग्रेस का विकल्प बीजेपी नहीं ,बल्कि बीजेपी का विकल्प आम आदमी पार्टी होगा. एक विज्ञापन आता है कि बस नाम ही काफी है.वही अब आम आदमी पार्टी के साथ होने जा रहा है. अब देखा जाए कि ये अनुभवहीन ,किन्तु कटिबद्ध नव युवकों का समूह इसको किस ऊंचाई पर ले जाता है.

Manoj Sharma
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मुज़फ्फरनगर दंगे के आरोपियों को मोदी जी का सम्मानित करना ,,[वो अलग बात है आखरी समय पर हमारे जैसी सोच रखने वालों कि वजह से कार्यक्रम में थोडा सा बदलाव किया पार्टी ने ] क्या कहना है आपका। अपना तो मन टूट गया। अब लगता है PM बनके क्या कर लेंगे मोदी जी। चलना तो उन्हें पार्टी के हिसाब से ही पड़ेगा ,,,,,एकता तो एक गॉव/शहर से शुरू होकर ही पूरा देश बनेगा ,,,,, जिंदगी मौत न बन जाये यारों …खो रहा …सब कुछ , हालात देखते हुए … आँख करो बंद और ” AAP ” का दबाओ बटन ,… Read more »
शिवेंद्र मोहन सिंह
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शिवेंद्र मोहन सिंह

वाह वाह….. सिंह साहब ….. क्या दूर कि कौड़ी लाए हैं….. जो केंद्र सरकार के अधिकार की वस्तुएं हैं वो भी एक मुख्यमंत्री के मत्थे (रिलायन्स मूल्य वृद्धि प्रकरण)? ये प्रश्न आपको शिवराज चौहान, रमन सिंह, गहलौत, शीला दीक्षित, केजरीवाल से भी पूछने चाहिए थे? तो ये सब नमो से क्यों? वो अभी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार हैं…. प्रधानमंत्री नहीं. (ये बात आपको पता होनी चाहिए). और लोकायुक्त के बारे में पहले भी बताया जा चुका है. पर शायद आप गायबोल्स को भी पीछे छोड़ना चाहते हैं. बारबार आपके ढोलक की थाप लोकायुक्त पर रुक जाती है.

आर. सिंह
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गुजरात के मुख्यमंत्री से यह प्रश्न नहीं है.यह प्रश्न प्रधान मंत्री पद के उम्मीदवार से है. दूसरी बात यह है कि लोकायुक्त को मुख्य मंत्री के अधीन करकर उन्होंने उसका अस्तित्व ही मिटा दिया है. ऐसे मेरी जो मान्यता है, वह महात्मा गांधी और पंडित दीन दयाल उपाध्याय के विचारों पर आधारित है,अतः उसमे व्यक्ति गौण हो जाता है.

इंसान
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आप कूड़े के ढ़ेर पर बैठे बिना कोई साधन जुटाए कैसे सफाई करने का सोचते हैं? खाते पीते और हगते देश के गाँव, कस्बों और शहरों में चारों ओर गंदगी और गरीबी से अनभिज्ञ लोगों में सोचने की शक्ति लोप हो चुकी है| व्यर्थ के वाद विवाद से हट कर मैं आपसे अनुरोध करूँगा कि आप १८८५ में जन्मी इंडियन नेशनल कांग्रेस के नेतृत्व के अंतर्गत पिछले पैंसठ वर्षों में उनकी व उससे पहले फिरंगी की राजनीति और उसका सामान्य नागरिक के जीवन पर अविरल दुष्प्रभाव समझें और बताएं कि क्या आप वर्त्तमान स्थिति से संतुष्ट हैं? भविष्य में राष्ट्रवादी… Read more »
आर. सिंह
Guest

उसके बारे में मैं अभीकोई बहस उचित नहीं समझता.मैं डाक्टर मधुसूदन के एक टिपण्णी के उत्तर में इसका जबाब दे चूका हूँ दिल्ली का चुनाव संपन्न होने के बाद मैं मेरे दृष्टिकोण से भविष्य का भारत कैसा होगा और कैसे होगा उस पर एक विस्तृत आलेख लिखने का प्रयत्न करूंगा,क्योंकि दिल्ली की झुग्गियों के अंदर जाकर देखने पर बहुत कुछ ऐसा अनुभव हुआ है,जिसको सबके सामने लाना आवश्यक है.

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