लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

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 डॉ. दीपक आचार्य

दुनिया में ऐसा कोई व्यक्ति नहीं होगा जिसके कोई मित्र या शत्रु न हों। व्यक्ति के जन्म के साथ ही राग-द्वेष के बीज अंकुरित होना शुरू हो जाते हैं जो कालान्तर में उम्र के बढ़ने के साथ ही अपना असर दिखाना शुरू कर देते हैं और उम्र ढलने तक पीछा नहीं छोड़ते।

जीवनयात्रा के विभिन्न पड़ावों और मार्गों पर विभिन्न कर्म क्षेत्रों में कार्य संपादन करते-करते हम संसार के बीच रमण करते रहते हैं। इस पूरी यात्रा में चाहे-अनचाहे कई लोग हमारे करीब आते हैं जिनमें कई मित्र और कई शत्रु तथा कई उदासीन स्वरूप में हमारे इर्द-गिर्द छाए रहते हैं।

इन्हीं लोगों का हमारे जीवन पर काफी प्रभाव पड़ता है। कभी हमें सकारात्मक और कभी नकारात्मक माहौल मिलता है और उसी के अनुरूप हम हमारे आचरण को ढालते और अभिव्यक्त करने लगते हैं। स्वार्थों और क्षुद्र ऐषणाओं से भरे-पूरे संसार में अधिकांश लोग ऐसे होते हैं जो कभी दो या दस दस नंबरी के रूप में सामने आते हैं। ऐसे लोग ताजिन्दगी कभी निन्यानवे और कभी चार सौ बीस के फेर में रमे रहते हैं।

हमारे घर-परिवार और जीवन से लेकर परिवेश और कर्म स्थलों तक में हम रोजाना कई लोगों के सम्पर्क में आते हैं। इनमें अच्छे-बुरे और सभी प्रकार के लोग हुआ करते हैं। प्रकृति का नियम है कि पूर्वजन्म के शत्रु और मित्र साथ-साथ पैदा होते हैं और जीवन तथा मरण का चक्र लेन-देन से सीधा बँधा होता है।

संसार में चार तरह के लोग पैदा होते हैं। पूर्व जन्म का ऋण चुकाने आने वाले, ऋण लेने आने वाले, उदासीन और संसार के लिए कुछ करने ईश्वर द्वारा भेजे हुए। पूरी जीवन यात्रा में हम अपने सारे परिजनों और परिचितों को इन चार श्रेणियों में विभाजित कर देखें तो साफ पता चल जाएगा।

इन्हीं के आधार पर हमें लाभालाभ की प्राप्ति होती है और सहयोग-असहयोग के साथ ही मित्रता और शत्रुता का व्यवहार सामने आता है। मित्रों और शत्रुओं दोनों में दो प्रकार के लोग होते हैं। कई लोग बेवजह मित्रता रखते हैं कई विभिन्न कारणों से।

इसी प्रकार कई कारणों से लोग हमारे शत्रु हो जाते हैं और कई सारे ऐसे लोग होते हैं जो बेवजह हमारे शत्रु बन जाते हैं। इन दोनों ही तरह के शत्रुओं और मित्रों के व्यवहार का विश्लेषण करने पर हम अच्छी तरह समझ पाएंगे कि कौन क्यों मित्र या शत्रु है।

यह बात हमें साफ तौर पर समझ लेनी चाहिए कि जो लोग बिना किसी कारण से हमारे शत्रु हो जाते हैं वे हमारे पूर्व जन्म के शत्रु होते हैं जो हमसे कुछ पाने के लिए ही अवतरित हुए हैं या पूर्वजन्म का कोई बदला चुकाने के लिए ही हमारे समय में पैदा हुए हैं।

अन्यथा कोई कारण ऐसा नहीं है कि वे लोग हमसे शत्रुता रखें। ऐसी शत्रुता रखने वाले लोग हमारे घर-परिवार, कुटुम्ब से लेकर दफ्तरों, स्कूलों और सभी सरकारी या गैर सरकारी या अर्द्ध सरकारी गलियारों, समाजों, समुदायों, पंथ-सम्प्रदायों और सभी जगह पाए जाते हैं जिनसे हमें हमेशा किसी न किसी प्रकार का नुकसान उठाना पड़ता है।

इनकी शत्रुता के कारण तलाशने पर कोई ठोस वजह कभी सामने नहीं आती बल्कि जो हमसे शत्रुता करते हैं उन्हें भी नहीं पता कि आखिर उनकी पावन देह में यह मलीनता क्यों, कैसे और कब आ गई है।

यह तय मानियें कि जो लोग आपसे बिना किसी कारण से शत्रुता का बर्ताव रखते हैं वे आपके पूर्वजन्म के शत्रु ही हैं जो बदला लेने या चुकाने फिर पैदा हो गए हैं। ऐसे पूर्व जन्म के शत्रुओं की गतिविधियों का कोई प्रतिकार नहीं करते हुए अपने हाल में मस्त रहें तो उनके भीतर जमा पूर्वजन्मी शत्रुता के बीज और प्रहार व्योम में अपने आप नष्ट हो जाएंगे।

इन लोगों को मौका दें कि वे अपनी भरपूर शत्रुता आप पर निकालते रहें ताकि कभी न कभी वो समय भी आ जाए जब उनके भीतर का सारा वैर बाहर निकल आए और इस विरेचन के बाद वे पूरी तरह खाली हो जाएं।

उनमें यह स्थिति आने की प्रतीक्षा हमें करनी चाहिए। इसी प्रकार पूर्व जन्म का बदला चुक जाने पर उनकी सारी शत्रुता स्वतः ही समाप्त हो जाती है और हमें उनकी वजह से कोई भी नुकसान नहीं होता।

इस अवस्था में हम भी यदि शत्रुता का प्रतिकार करें और शत्रुता का भाव रखते हुए उनका विरोध करना या उन्हें प्रताड़ित करना शुरू कर दें तो इससे उनकी शत्रुता समाप्त नहीं होगी बल्कि शत्रुता की नई श्रृंखला जन्म ले लेगी और हम अपने मूल उद्देश्यों से भटक जाएंगे तथा जन्म-मरण के चक्करों में कई जन्म गँवा देंगे। कुछ लोग ऐसे भी हुआ करते हैं जो दो-चार लोगों से नहीं बल्कि कई सारे लोगों से शत्रुता पाल लेते हैं।

निरूद्देश्य शत्रुता रखने वाले लोगों पर दया करनी चाहिए। ऐसे लोगों पर यह मानकर तरस खाएँ कि इन बेचारों का कोई दोष नहीं है बल्कि इनमें संस्कारों की कमी, मलीनता और पशुता के जो बीज पड़े हुए हैं उन्हीं का तो पल्लवन और पुष्पन होगा।

ऐसे उन्मादी लोगों की पूरी जिन्दगी शत्रुता के हथकण्डों में ही गुजर जाती है। इसलिए इन लोगों को पूरा मौका दें कि वे जिन-जिन से शत्रुता निकालना चाहते हैं पूरे मन से निकालें, अन्यथा ऐसे लोगों की गति-मुक्ति नहीं हो पाएगी और कहीं न कहीं इसका दोष हमें भी लग सकता है।

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