लेखक परिचय

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

डॉ. मनोज चतुर्वेदी

'स्‍वतंत्रता संग्राम और संघ' विषय पर डी.लिट्. कर रहे लेखक पत्रकार, फिल्म समीक्षक, समाजसेवी तथा हिन्दुस्थान समाचार में कार्यकारी फीचर संपादक हैं।

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– डॉ. मनोज चतुर्वेदी

भारतीय संस्कृति का नाम लेते ही हमारे मन में एक ऐसे राष्ट्र का चित्र सामने आता है जो विश्व का सबसे प्राचीनतम राष्ट्र है। जिसके संबंध में महाकवि जयशंकर प्रसाद ने कहा – ”अरूण यह मधुमय देश हमारा। जहां पहुंच अनजान क्षितिज को मिलता एक सहारा।” ‘अर्थात् मानव जाति ने जब अपनी ऑंखें खोली तो उसने भारत नामक सुसंस्कृत, सबल, सशक्त तथा वसुधैव कुटुंबकम्’ से युक्त स्वाभिमानी राष्ट्र को देखा। भारत की इस भूमिका के कारण मैक्समूलर, रोम्या रोला तथा मार्कट्वेन को लिखना पड़ा,”भारत उपासना पंथों की भूमि, मानव जाति का पालना, भाषा की जन्मभूमि, इतिहास की माता, पुराणों की दोदी तथा परंपरा की परदादी है। मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान एवं सृजनशील सामग्री है उसका भंडार अकेले भारत में है।”1

भारतीय संस्कृति का अर्थ है सहानुभूति, प्रेम, अहिंसा, समभाव, आदर, अतिथि सेवा, त्याग, तप, संयम, वैराग्य, आदि समस्त बातें आ जाती है। भारतीय संस्कृति का अर्थ है अज्ञान से ज्ञान की तरफ जाना, घृणा से प्रेम की ओर जाना, कीचड़ से कमल की ओर जाना।

डॉ. राममनोहर लोहिया भारतीय संस्कृ ति के व्याख्याता, भारतीय राजनीति के विराट् व्यक्तित्व, भारतीय समाजवाद के प्रचारक तथा एक महान देशभक्त थे। वे राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों के लिए आतंक थे, तो दलितों के मसीहा, शोषितों के उध्दारक तथा भारतीय राजनीति के स्वप्नद्रष्टा थे। आपका जन्म 23 मार्च, 1910 में अकबरपुर (अब अंबेडकर नगर) के वैश्य परिवार में हुआ था। वैश्य परिवार में पैदा हुए लोहिया को लोहिया उपनाम इसलिए मिला कि आपके पूर्वज लोहे का व्यवसाय किया करते थे। आपने जर्मनी में ”नमक और सत्याग्रह” विषय पर अर्थशास्त्र में पी. एच. डी. की उपाधि प्राप्त की। डॉ. लोहिया के विचारों पर प्राच्य एवं पाश्चात्य दोनों विचारों का प्रभाव दिखाई पड़ता है। लोहिया ने कहा है, ” गांधी तथा मार्क्स से सीखने के लिए अमूल्य खजाने पड़े हैं।”2 अपने अध्ययन के दौरान समाजवादी पार्टी से उनकी सबसे बड़ी बौद्धिक एकरूपता रही”3 और इसी कारण से उनको स्वदेश लौटते वक्त आर्थिक कष्टों से जुझना पड़ा।

हम विचारकों को दो भागों में बांट सकते हैं -पहले, वह जो स्वयं चिंतन करते हैं, दूसरे वे जो भिन्न-भिन्न विचारकों से प्रभावित होकर चिंतन करते हैं। पहले प्रकार के विचारक कम मात्रा में और दूसरे अनगिनत हैं।” डॉ लोहिया को दूसरे स्थान पर रखा जा सकता है। उनके उपर मार्क्स तथा गांधी का समान प्रभाव पड़ा।

अर्थात डॉ. लोहिया इन सभी चिजों के अतिरिक्त अर्थशास्त्री, स्वतंत्रता सेनानी, पत्रकार, दार्शनिक तथा मानवतावादी विचारक थे। उनके लिए भारत की मुक्ति का अर्थ विश्व की मुक्ति से था। वे बेजुबानों के वाणी थे। शक्तिहीनों की शक्ति थे। मूलतः यही विराट व्यक्तित्व लोहिया को भारतीय संस्कृति से जोड़ता है। उनको कबीर की तरह एक फकीर कहा जा सकता हैजो भारतीय समाज में फैली अशिक्षा, बेकारी, गरीबी तथा स्वाभिमान शून्य भारत को स्वाभिमान से युक्त होने के लिए संत कबीर की तरह-कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुटआ हाथ। जो घर जारै आपना चले हमारे साथ”। कबीर के इस वाणी को आत्मसात् कर भारतमाता धरतीमाता की सेवा के लिए (1928 से 12 अक्टुबर, 1976 तक) सचेष्ट रहें।

डॉ. लोहिया धार्मिक या आध्यात्मिक थे, इस पर विचार करने से पूर्व यह जानना जरूरी होगा कि वे कोरे कर्मकांडी नही थे। वे तो ज्ञानकांडी थे। टीका, चंदन, माला पहनना तथा दाढ़ी रखने से कोई धार्मिक नहीं हो जाता है। वे नास्तिक भी नहीं थे। भले हीं अपने आप को वे अध्यात्मिक, नास्तिक कु छ भी कहें लेकिन निम्नांकित उदाहरण से यह समझा जा सकता है, कि डॉ. लोहिया के जीवन में कहां तक धर्म का स्थान था कैलाश पर्वत केवल भूगोल, इतिहास, संस्कृति, रहन-सहन के आधार पर हिन्दुस्तान के नजदीक है। लेकिन यह साक्षात् शिव-पार्वती का स्थल है। तिब्बत तो पूरा स्वतंत्र होना चाहिए। यदि नहीं होता तो कैलाश मानसरोवर का हिस्सा भारत में आना चाहिए। द्वारका, रामेश्वर, गया, काशी और एक चीज पर ध्यान रखना, इन्हीं के साथ-साथ मैं अजमेर को भी जोड़ता हूं। मुझे इससे कुछ मतलब नहीं है कि वे किस धर्म-संप्रदाय के होते हैं। मुझे इस बात से मतलब है कि वहां प्रति वर्ष लाखों-करोड़ों की तादाद में लोग इक्ठ्ठा होते हैं। उन तीर्थ स्थानों को साफ-सुथरा बनाया जाये। जिससे कि ये लाखों आदमी हर साल देखें कि सफाई की जिंदगी चला सकते हैं। यह बात भी मुझ जैसे अधार्मिक आदमी के मुंह से निकली। धार्मिकों ने नहीं कहा हमारे तीर्थस्थानों को सुंदर, साफ और पवित्र बनाओ।”5

डॉ. राममनोहर लोहिया भारत, भारत माता तथा भारतीय संस्कृति के उपासक थे। यदि इस बात को लेकर किसी को संदेह हो, तो वह करें। यह तो मानव प्रवृत्ति है। किसी भी समाज एवं संगठन में किसी भी व्यक्ति के विचारों के शत-प्रतिशत समर्थक नही होते है। हमारी सांस्कृतिक विचारधारा के जितने भी ग्रंथ है। उसमें से यदि राम, कृष्ण, शिव, सीता, द्रौपदी तथा सावित्री को निकाल दिया जाय, तो संपूर्ण साहित्य निरस ही लगेगा। यदि हम डॉ. लोहिया की पुस्तक ‘जाति-प्रथा’, ‘राम, कृष्ण और शिव’, ‘सगुण और निर्गुण’, तथा ‘इतिहास चक्र’ का अध्ययन करें, तो हमें भारतीय संस्कृति से संबंधित विचारों का गुच्छा मिलेगा। डॉ. साहब किस प्रकार राम, कृष्ण और शिव से प्रभावित होकर अपना विचार देते है। इसे पढ़ने की जरूरत हैः- ” हे भारत माता! हमें शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का हृदय दो तथा राम का कर्म और वचन दो। हमें असीम मस्तिष्क और उन्मुक्त हृदय के साथ-साथ जीवन की मर्यादा से रचो।”6

इससे बढ़कर भारतीय संस्कृति से भला और क्या लगाव हो सकता है जो विचारक शिव का मस्तिष्क, कृष्ण का विशाल हृदय मांग रहा हो। वह विशाल हृदय किसके लिए। अपने स्वार्थ के लिए नहीं। दुख से दुखित भारत माता के सपूतों के सेवा के लिए। हाँ, लेकिन यह सेवा तभी हो सकता है। जब उनके पास राम की मर्यादा हो। डॉ. साहब सचमुच भारतीय संस्कृति के व्याख्याता थे। वे राम, कृष्ण तथा शिव के विचारों में डुबकी लगा रहे थे तथा उन विचारों से प्रभावित होकर भारत को समाजवाद रूपी अमृत दिया।

डॉ राममनोहर लोहिया एक ऐसे महान विचारक थे जिन्होंने अपने चिंतन में भारतीय संस्कृति को आत्मसात् किया। भारत गौरवशाली संस्कृति वाला देश है। यहां की मर्यादा का गुणगान समस्त विश्व में होता हैतथा इस देश की पावन भूमि पर देवता भी जन्म लेने के लिए तरसते हैं – विष्णु पुराण का श्लोक देखने योग्य है – ” गायन्ति देवा किलगीतकानि, धन्यास्तुते ते भारतभूमि भागे। स्वर्गा पवर्गा स्पद मार्ग भूते, भविन्त भूयः पुरुषः सुरत्वात्॥”7

यही कारण है कि डॉ. लोहिया ने राम, कृष्ण तथा शिव के पूर्णता से युक्त जीवन को आत्मसात् कर स्वयं को भी पूर्णता से युक्त कर दिया। उन्होंने कहाः- ” राम कृष्ण और शिव भारत में पूर्णता के तीन महान स्वप्न हैं। सबका रास्ता अलग-अलग है। राम की पूर्णता मर्यादित व्यक्तित्व में है, कृष्ण की उन्मुक्त या संपूर्ण व्यक्तित्व में ओर शिव की असीमित व्यक्तित्व में, लेकिन हरेक पूर्ण है। एक का एक या दूसरे से पूर्ण-अपूर्ण हाने का कोई सवाल हीं नही उठता। पूर्णता में विभेद कैसे हो सकता है? पूर्णता में केवल गुण एवं किस्म का विभेद होता है। हर आदमी अपनी पसंद कर सकता है या अपने जीवन के किसी विशेष छंड़ से संबंधित गुण या पूर्णता चुन सकता है। मूलतः पूर्ण के ये रूप मर्यादित, उन्मुक्त तथा असीमित व्यक्तित्व साथ-साथ रह सकते हैं। ऐसे पूर्ण पुरूषों की भारत में कमी नही है।”8 भारतीय राजनीति में पंडित जवाहर लाल नेहरू के कट्टर विरोधी तथा स्वयं कुजात गांधीवादी कहने वाले डॉ. राम मनोहर लोहिया ने धर्माधारित राजनीति का समर्थन किया जिसकी जड़ें प्राचीन भारतीय संस्कृति मे विद्यमान है। उन्होंने स्वयं को कुजात गांधीवादी, नेहरू को सरकारी गांधीवादी तथा विनोबा भावे को मठी गांधीवादी कहा।”9

सर्वधर्म समभाव में भारत का विश्व में महत्वपूर्ण स्थान हैजिसको भारत में धर्म निरपेक्ष भारत कहने का अधिक प्रचलन है। यहां धर्मनिरपेक्षता का अर्थ एक विशेष मत एवं पंथ को तुष्ट करने से है। जबकि समस्त मत-पंथों की स्वतंत्रता से होना चाहिए। महात्मा गांधी के अनुयायी डॉ. लोहिया ने नौआखली में गांधी के आदेश पर सांप्रदायिक सद्भाव के लिए कार्य किया। यह इसलिए कि भारतीय संस्कृति में किसी के मत-मंथन तथा उपासना पद्धति में भेदभाव का स्थान नहीं है। जब एक मुस्लिम बच्चे पर कुछ धर्मांध आक्रमण करने जा रहे थे। डॉ. लोहिया ने उसका बचाव किया। मूल रूप से लोहिया ने यहाँ श्रीराम चन्द्र के मर्यादा का पालन किया।”10

मूलतः डॉ. लोहिया की कृष्ण के प्रति विचारों को पढ़कर ऐसा लगता है कि वे कटु आलोचक है पर यह उनकी मानवतावादी दृष्टि है। वे कृष्ण के अनन्य भक्त है। कृष्ण को पढ़ते-पढ़ते तथा लिखते-लिखते वे इस्कॉन वालों की तरह कृष्णय हो जाते है। बार-बार भगवान श्रीकृष्ण के प्रति गोपियों के अनन्य प्रेम एवं विरह की व्याख्या करते हुए दिखायी पड़ते है। वे बार-बार के प्रेम में गोपियों के विरह पर विचार व्यक्त करते हैं।

”जब वे जिंदा थे, वृंदावन की गोपियाँ इतनी दुखी थीं कि आजतक गीत गाए जाते हैं- निसि दिन बरसत नैन हमारे। कंचुकि पट सुरवत नहिं कबहूं उर बिच बहत पनारे॥”11

श्रीमद् भगवद्गीता भारतीय सांस्कृतिक विचारधारा का सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ है। अभी कुछ समय पूर्व इसे स्वामी अड़गड़ानंद ने राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करने की मांग की थी। गीता को कोई राष्ट्रीय ग्रंथ घोषित करे या न करे यह संपूर्ण भारतीयों की आत्मा में विराज मान है। डॉ लोहिया ने इसमें व्यक्त विचारों को ही आत्मसात् किया तथा लाहौर के कष्टपूर्ण यातना को सहते हुए स्वयं को स्थितिप्रज्ञ बनाया। उन्होंने श्रीमद्भगवद्गीता के संबंध में कहा ः ” कृष्ण ने आत्मा के गीत गाए। उन्होंने आत्मा को अजर-अमर व अविनाशी बताया। उन्होंने कर्म के गीत गाए और मनुष्य को, फल की अपेक्षा किए बिना, और उसका माध्य मव कारण बने बिना। निर्लिप्त भाव से डटे रहने के लिए कहा। उन्होंने समत्व भाव, सर्दी-गर्मी, जीत-हार, हानि-लाभ इत्यादि जीवन में आने वाले उद्वेलनों में समान भाव से रहने को कहा।”12 यह ठीक है कि महात्मा गांधी ने राम तथा कृष्ण को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर (मिथकिय) काल्पनिक व्यक्ति माना है, पर महात्मा गांधी के कट्टर अनुयायी डॉ. राममनोहर लोहिया ने राम तथा कृष्ण के संबंध कहा वह तो गजब ही है। उनके कथन में भारतीयता, भारतीय संस्कृति तथा भारतीय जीवन-मूल्यों का संगम दिखायी पड़ता है। इस संगम में डुबकी लगाकर आज के तथाकथित समाजवादी मुक्ति प्राप्त कर सकते है, तो गांधीवादी गांधी के राम का साक्षात्कार कर सकते हैं। ” गांधी राम के वंशज थे।आखिरी क्षण में उनके जुबान पर राम का नाम था। उन्होंने मर्यादा पुरूषोत्तम के ढांचे में अपने जीवन को ढाला और देशवासियों का आह्वान किया। द्वारिका पुत यमुना के किनारे मारा व जलाया गया था। गांधी अपने जीवन को अयोध्या के ढांचे में बहुलांश ढालने में सफल हुए। फिर वे दोनों के विचित्र और बेजोड़ मिश्रण थे।”13

शिव की कहानी से, राम की कहानी से तथा कृष्ण की कहानी से संपूर्ण भारत परिचित है। यह इसलिए कि शिव के जीवन में निष्काम भाव है। कामशून्यता है। क्रोध का प्रचंड वेग है तो अक्रोश का विशाल कैलाश पर्वत है। जहां शिव तांडव नृत्य किया करते हैं। वे कभी काम से युक्त दिखाई पड़ते है। भला भारतीय संस्कृ ति के इस परमात्मा पर लोहिया कुछ न कहें। यह कैसे संभव है। लोहिया ने शिव के संबंध में कहा, ”राम और कृष्ण ने मानवीय जीवन बिताया। लेकिन शिव बिना जन्म और बिना अंत के है। इस मामले में उनका कोई मुकाबला नही कर सकता है। उन्होंने काम के देवता को नष्ट कर डाला, धर्म और राजनीति, ईश्वर और राष्ट्र हर जमाने में हर देश में मिल सकते हैं। शिव की यह कहानी हिन्दुस्तान की अटुट एवं विलक्षण एकता की कहानी है।”14 मूलतः विकृतियां मानव प्रवृति का पाशविक रूप है। मनुष्य जब अपने आराध्य की सच्ची उपासना से भटकता है, तो उसमें आसुरी प्रवृतियां आ ही जाती है। वह कामी, लोभी, मिथ्यावादी, हिंसक, अशौच, अधैर्य तथा समस्त दुर्गुणों के तरफ बढ़ने लगता है। परमात्मा के नाम मात्र स्मरण करते-करते कितने ही सहज को प्राप्त कर गए। इसीलिए गोस्वामी तुलसीदास ने कहा – ” कलियुग केवल नाम अधारा। सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा॥”15 अर्थात कलियुग में मात्र नाम स्मरण के द्वारा मुक्ति संभाव्य है। डॉ. साहब ने कहा, ”राम के भक्त समय-समय पर पत्नी निर्वासिक, कृष्ण के भक्त दूसरों की बीवियां चुराने वाले, और शिव के भक्त अघोरपंथी हुए हैं। गिरावट और क्षत की प्रक्रिया में मर्यादा पुरूष संकीर्ण हो जाता है, उन्मुक्त पुरूष दुराचारी हो जाता है।, असीमित पुरूष प्रासांगिक और स्वरूपहीन हो जाता है। राम का गिरा हुआ रूप संकीर्ण व्यक्तित्व, कृष्ण का गिरा हुआ रूप दुराचारी व्यक्तित्व तथा शिव का गिरा हुआ रूप स्वरूपहीन व्यक्तिव बन जाता है। राम के दो रूप, मर्यादित और संकीर्ण, कृष्ण के उन्मुक्त एवं क्षुद्र प्रेमी तथा शिव के असीमित और प्रासांगिक।”16

मृत्यु जीवन का सत्य है। जो आता है उसे जाना ही होता है। लेकिन मरणोपरांत उन्हे जो परिस्थितियां मिली, इससे हमें उनके विराट व्यक्तित्व उनथक, अविरल तथा सांस्कृतिक जीवन का स्मरण देखा जा सकता है।

भारतीय इतिहास का एक पक्ष है कि मानसिंह की पूजा हम उसके जीवन काल में करते हैं, परंतु प्रताप जैसे नर केसरी के तरफ हमारा ध्यान उनके मरणोपरांत जाता है। मधु लिमए के अनुसार, वे एक मौलिक विचारक, असाधारण नेता, विरोधी थे। आधुनिक भारत के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी। वह एक ऐसे कर्मयोगी थे जो एकांत में नहीं रहते थे जिससे लोग उन तक पहुंच न पाएँ। ”मूलरूप से डॉ. राममनोहर लोहिया भारतमाता की एकनिष्ठ भाव से सेवा के लिए पैदा ही हुए थे तो भला वे एकांत तथा समाज से कटकर अलग क्यों रहते। वे तो भारत माता के सच्चे पुत्र थे। मुझे याद है। जब मैं ओकार शरद द्वारा लिखित ‘डॉ. राममनोहर लोहिया’ के जीवनी को पढ़ रहा थातो लोहिया पर लाहौर जेल में होने वाले अत्याचार को पढ़ता जाता था तथा रोता जाता था। आज जब डॉ. लोहिया जैसे महान व्यक्तित्वों का भारतीय राजनीति में आभाव हो गया है। ऐसे समय में जबकि लोहिया जन्म शताब्दी वर्ष मनाया जा रहा है। लोहिया के व्यक्तित्व और कृतित्व का प्रचार-प्रसार मात्र शहरों तथा वातानुकूलित कक्षों तक केंद्रित करने से काम नही चलेगा। जब तक लोहिया के विचारों को कथा सम्राट प्रेमचंद के धनिया और होरी के पास ले जाने का प्रयास होता है। तब तक लोहिया जन्म शताब्दी का क्या अर्थ होगा? हाँ, इसके साथ ही समाजवादियों को लोहिया के विचारों को आत्मसात् करना होगा, बिना आत्मसात् किए समाज में कुछ भी परिवर्तन नहीं हो सकता है। जरूरत है लोहिया जैसे प्रचारक की तरह पैर में चक्कर, मुंह में शक्कर तथा दिल में आग के साथ वंचितों, दलितों तथा शोषितों के लिए तन, मन, और धन से लगना होगा। तभी डॉ. राममनोहर लोहिया के स्वप्न को साकार किया जा सकता है।

डॉ. लोहिया सत्य के सच्चे अराधक थे। इसीलिए उनकी स्पष्टता के कारण कुछ लोगों का मानना था कि वे विद्रोही थे तथा उनका किसी संगठन से जुड़ाव ठीक प्रकार से नही था। एक सत्य का आराधक भला सत्य के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर देता है। यह तो भारतीय संस्कृति की अमर परंपरा रही है। डॉ. राममनोहर लोहिया सचमुच उसी धारा के प्रतिनिधी थे। तभी तो उन्होंने न मार्क्स-विरोधी न मार्क्स-समर्थक तथा गांधी के प्रति दिया। वे चापलुसगिर नहीं थे। उन्होंने कहा, ”मुझे अपनी भावनाओं को छिपाना नहीं चाहिए और हिम्मत के साथ कहना चाहिए कि मै न मार्क्स-विरोधी हूं या मार्क्स-समर्थक। इसके अलावा मैं न तो मार्क्स-विरोधी हूं और न मार्क्स का समर्थक और यहीं दृष्टिकोण मेरा महात्मा गांधी के प्रति भी है।”17 डॉ. साहब ने समता का अर्थ के संबंध में कहा कि ”आधुनिक मानव ने समानता का अर्थ, जो सबसे अधिक आंतरिक अर्थ है, भुला दिया है। आदमी को आंतरिक समानता लाने की कोशिश करनी चाहिए। यह आंतरिक समानता हर्ष-विषाद, सर्दी-गर्मी, जीत-हार की विपरित स्थितियां बनी रहनी चाहिए। ऐसा लगता है कि हमारे प्राचीन मनीषियों ने आंतरिक स्थितिप्रज्ञता और बाहरी समानता को एक ही सिक्के के दो पहलूओं के रूप में जान लिया था क्योंकि केवल भारतीय भाषाओं में दोनों अर्थों के लिए एक शब्द समता या समत्व का प्रयोग हुआ है। कहा यह जाता है कि विपरीत स्थितियों में इस तरह की स्थितियों को प्राप्त करना असंभव है। यह कहना पूरा सच नहीं होगा क्योंकि ऐसी उन्हीं लोगों को प्राप्त हुई है। जिन्होंने इसके लिए प्रयत्न किया।”18

” डॉ. लोहिया ने कहा, ”दुनिया में हरेक उसूल के दो रूप होते हैं, एक सगुण और दूसरा निगुर्ण, एक साधारण तथा व्यापक और दूसरा ठोस। ऐसा कोई उसूल नहीं है जिसके ये दो रूप नहीं हो। सिर्फ धर्म एवं दर्शन में ही सगुण एवं निगुर्ण नही हुआ करते वहां तो ब्रह्म को सगुण व निर्गुण कहा गया है। दोनों भक्तों को अलग-अलग बताने की कोशिश की गयी है। लेकिन दुनिया की राजनीति,समाजी जिंदगी, हरेक में जो एकता आप ढुंढ़ें। उसमें से दो चिजें होती है। एक आम व्यापक शक्ल तथा दूसरा ठोस तथा जिंदा शक्ल। हिन्दुस्थान की जिंदगी के जो पांच शक्ल हैं, उनको अपनी समझ के मुताबिक मैं गिनाऊं गा। एक बराबरी, दूसरा जनतंत्र, तीसरा विकेंद्रीकरण, चौथा अहिंसा, पांचवा समाजवाद।”19

जब अपने यहां यह कहा गया किः ”जाति पाँति पूछै नहिं कोई। हरि को भजै सो हरि का होई” अर्थात् परमात्मा के शरणागति के लिए सभी समान अधिकारी हैं।

जातिविहीन समाज की परिकल्पना भारतीय चिंतन का मुख्य विषय रहा है। परमात्मा के लिए हरिजन-ब्राह्मण में भेदभाव का कहीं भी स्थान नहीं है। आखिर से किस प्रकार समाप्त किया जाये तो फिर मंदिरों में ऐसा जातिय आधार पर भेदभाव मिटाने के लिए कहा, ”बनारस और दूसरी जगह के मंदिरों में हरिजन सवर्ण भेद खत्म हो।”20

जब जाति और योनि में भेद हो तथा किसी व्यक्ति को श्रेष्ठ तथा किसी को निम्न माना जाये तो पूर्णरूपेण मानवाधिकारों का हनन है। आज जहां भारतीय समाज में जातियों में भी जातियां-उपजातियां बन गयी है। एक जाति दूसरे को निम्न तथा स्वयं को श्रेष्ठ मान रही है। आपस में संघर्ष एवं मतभेद का बाजार गर्म है। भारत माता इस जातिभेद को लेकर व्यथित है। वो अपने पुत्रों से कह रही है। मेरे पुत्रो उठो! तुम सभी मानव जाति हो। तुम्हारे अंदर राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, चंद्रगुप्त मौर्य, नानक, कबीर, रविदास, स्वामी विवेकानंद, स्वामी दयानंद तथा ज्ञात-अज्ञात महापुरूषों का रक्त प्रवाहित हो रहा है। तुम सभी मेरे पुत्र हो। तुम ये नही समझते माँ तो माँ होती है। उसके लिए भेदभाव का स्थान नही है। वस्तुतः भारत माता के आर्तनाद को डॉ लोहिया ने पहचाना। भारतीय संस्कृति से प्रभावित डॉ. लोहिया ने कहा, ”भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रपति ने पुण्य नगरी काशी में सार्वजनिक रूप से दो सौ ब्राह्मणों के पैर धोए। सार्वजनिक रूप से किसी का पैर धोना अश्लीलता है। इस अश्लील काम को ब्राह्मण जाति तक सीमित करना दंडनीय अपराध माना जाना चाहिए। इस विशेषाधिकार प्राप्त जाति में अधिकांशतः ऐसो को सम्मिलित करना जिनमें न योग्यता हो न चरित्र, विवेक बुद्धि का पूरा त्याग है जो जाति-प्रथा और पागलपन अवश्यंभावी अंग है।”21

शिक्षा का उद्देश्य मानव का सर्वांगीण विकास करना होता है। जब बच्चे-बच्चियाँ शिक्षित हो जाए तथा वे चाहे तो शादी कर सकते है। भारतीय चिंतन ने इसका तो प्रतिरोध किया ही नहीं। यदि ऐसा होता तो सीता, द्रौपदी तथा सावित्री ने स्वयंवर क्यों रचाया। आज पुरातनपंथियों तथा धर्मांध लोगों का मानना है कि स्त्री स्वयंवर को चुनती है तो यह साक्षात् कलियुग है, अर्थात् कलियुग आ गया है। डॉ. साहब ने कहा ”बलात्कार और वादाफरामोशी को छोड़कर औरत-मर्द के बीच सारे रिश्ते जायज है। लड़की की शादी करना मां-बाप की जिम्मेवारी नहीं, अच्छा स्वास्थ्य और अच्छी शिक्षा दे देने पर उनकी जिम्मेवारी खतम हो जाती है।”22

भारतीय नारी ऐसी थी वैसी थी। आज की स्त्रियां बेहया हो गयीं है। उनमें थोड़ी-सी मलीनता नही है। वे पतिता तथा पश्चात्य संस्कृति से प्रभावित हो गयी है। इस तरह की बातें हमें प्रायः सुनने को मिल ही जाती है। क्या शालीनता, सहनशीलता, त्याग, समर्पण तथा पतिव्रत धर्म का पालन करना मात्र स्त्री का ही धर्म है। कि वो पुरूषवादी मानसिकता को सहती रहे। पुरूष उसे संपत्ति माने। उसे जब चाहें रौदे। चाहे जो मन में आए वो करें। यह इसलिए कि वो उस पुरूष की व्याहिता है। उसकी पत्नी है। उसकी संपत्ति है। पर पुरूष के उपर ये नियम नही लागु होते क्या? अन्याय, अत्याचार तथा शोषण का प्रतिकार उसे करनी ही होगी। डॉ. लोहिया ने स्त्रियाें को कहा कि, ” नारी द्रौपदी हो जिसने कभी भी किसी पुरूष से, दिमागी हार नहीं खायी। नारी को गठरी के समान नहीं बनाना है परंतु नारी इतनी शक्तिशाली होनी चाहिए कि वक्त पर पुरूष को गठरी बना कर अपने साथ ले चले।”23

डॉ. लोहिया सामाजिक समता के लिए इतना अधीर हो गये थेकि उन्होंने विशेष अवसर का प्रतिपादन किया। मुझे ऐसा लगता है कि डॉ. साहब के मन में यह भाव था कि जो भारतीय समाज में प्रभु जातियां हैं वे सामाजिक समता की स्थापना में सबसे बड़ी बाधा है। अतः विशेष अवसर के द्वारा ही इस समस्या का समाधान निक ाला जा सकता है। उन्होंने कहा, ” अवसर मिलने से योग्यता आती है। देश में सभी 60 प्रतिशत अवसर हिंदुस्तान की 90 प्रतिशत आबादी यानि शुद्र, हरिजन, धार्मिक अल्पसंख्यकों की पिछड़ी जातियां, औरत और आदिवासियों को मिलनी चाहिए। इस सिध्दांत को ऊंची-से-ऊंची प्रतियोगिता में लागू करना चाहिए।” 24

जिंदा कौमें 5 साल इंतजार करती है क्या? दुनिया के देशों में तथा भारत में आर्थिक संपत्ति एवं साधनों पर अंग्रेजीयत से युक्त मैकालेवादी, अमीार, जातिवादी तथा विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों का कब्जा है। वो यद्धपि संख्या में कम है पर पुरी तरह से अपराधी की तरह संगठित गिरोह है। यह संगठित गिरोह धर्मसत्ता, राज्यसत्ता, अर्थसत्ता तथा समाज सत्ता पर गेडुली मारकर बैठा हुआ है। यदि देश की जनता ऐसा नहीं करती तो वो नष्ट हो जाएगी। क्या इन सत्ताओं पर एक विशेष वर्ग, जाति, धर्म तथा व्यवसाय का ही कब्जा रहेगा ऐसा क्यों? डॉ. लोहिया ने इसके विरोध में पाञ्चजन्य का तीव्र घोष किया। उन्होंने कहा, ”पुरानी विरासत की ग्वालियर की महारानी कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ रही हैं जिनके खिलाफ झाड़ू देने वाली सुक्खोरानी को वोट देकर विजयी बनाते है, तो देश के इतिहास में यह एक दैदिप्यमान घटना होगी।”25

डॉ. राममनोहर लोहिया कट्टर राष्ट्रभक्त थे। वे एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें व्यक्ति-व्यक्ति में राष्ट्रीय चेतना का भाव निहित हो। उसके मन में से जातिवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद के साथ-साथ, नर-नारी भेदभाव समाप्त हो जायें तथा संपूर्ण भारत एकता के सूत्र में आबद्ध हो जाय। इन्ही बातों को ध्यान में रखते हुए डॉ. साहब ने राम, हिन्दी, तथा गांधी विरोधी द्रविड़ कषगम के वृद्ध नेता श्री रामास्वामी नाइकर से भेंट की तथा उनसे कहा, ” जाति-प्रथा की समाप्ति की लड़ाई में मैं आपकी मदद करने और साथ जेल जाने को तैयार हूँ। यदि जातिगत नामपट्ट हटाने के आंदोलन चलाये जाए, तो मैं उसका भी स्वागत करूंगा। लेकिन यह तभी संभव है जब आप अपनी ये मांगे छोड़ दें।” 1) उत्तर भारत का विरोध (जिसमें द्रविड़ स्थान की मांग)। 2) हिंदी विरोधी आंदोलन। 3) गांधी जी की तस्वीरें जलाना और 4) ब्राह्मणों के प्रति हिंसा को रोकना।

मूलतः डॉ. साहब के उपर एक वैश्विक भारतीय संस्कृति का ही प्रभाव था कि वे नाईकर जैसे जाति-विरोधी संकीर्ण नेता से मिले। उनके मन में भारत का भूत, वर्तमान तथा भविष्य दिखाई दे रहा था। डॉ. लोहिया ने देखा-पढ़ा था कि किस प्रकार जातिवाद तथा सामाजिक विषमता ने भारतीय राष्ट्र के एकात्म भाव को नष्ट किया है। अतः वे राष्ट्रीय एकता एवं समाजिक समरसता के लिए एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें जोशी, पांडेय, मिश्रा, उपाध्याय, त्यागी, प्रधान, सिंह, राठौर, रेड्डी, नंबुदरी, डोंगरा, मुखर्जी, यादव, हरिजन नामक जाति सूचक शब्दों का स्थान न होता तथा राज्यसत्ता पर ब्राह्मण तथा वनिया वर्चस्व समाप्त हो। इसलिए उन्होंने जातिवाद के सत्यानाश का बीड़ा उठाया। यह ठीक है कि वे इसमें उतना सफल नही हुए। पर भारत माता का यह पुत्र करोड़ों युवाओं के लिए प्रेरणा स्रोत था, रहा है और रहेगा। यह ठीक है कि डॉ. राममनोहर लोहिया 12 अक्टुबर, 1967 को इस संसार से चले गए पर उनका व्यक्तित्व तथा कृतित्व हमारे लिए सदैव प्रेरणास्रोत रहेगा।

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3 Comments on "भारतीय संस्कृति और डॉ. राम मनोहर लोहिया"

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Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
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Dr. Purushottam Meena 'Nirankush'
बहुयामी लेख लिखने के लिए डॉ. चतुर्वेदी जी को धन्यवाद! प्रस्तुत लेख के विद्वान लेखक डॉ. मनोज चतुर्वेदी जी का कहना है कि- “डॉ. राममनोहर लोहिया भारतीय संस्कृति के व्याख्याता, भारतीय राजनीति के विराट् व्यक्तित्व, भारतीय समाजवाद के प्रचारक तथा एक महान देशभक्त थे। वे राजनीतिज्ञों तथा नौकरशाहों के लिए आतंक थे, तो दलितों के मसीहा, शोषितों के उध्दारक तथा भारतीय राजनीति के स्वप्नद्रष्टा थे।” आगे आपने लिखा है कि- “यह ठीक है कि महात्मा गांधी ने राम तथा कृष्ण को ऐतिहासिक व्यक्ति न मानकर (मिथकिय) काल्पनिक व्यक्ति माना है,……” लेखक ने डॉ. लोहिया के विचारों के बारे में ये… Read more »
श्रीराम तिवारी
Guest

इन सभी तथ्यों के अलावा लोहिया जी का और भी विशेष अवदान रहा है .वे मार्क्सवाद -लेनिनवाद ;.सर्वहारा अंतर्राष्ट्रीयतावाद तथा द्वान्दादात्म्क भौतिकवाद के .
पोषक थे .उनके और तत्कालीन साम्यवादियों के प्रभाव से ही तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित नेहरु और वाद में इंदिराजी ने राजाओं के प्रीवी पर्स बंद किये थे .देश में राष्ट्र्यीकरण एवं मिश्रित अर्थ व्यवस्था पर लोहिया जी का प्रभाव रहा है .
आज़ादी के पवन पर्व पर देश के हितार्थ लोहिया का पुन्य स्मरण कराने के लिए -chaturvedi जी ko dhanywad .

Anil Sehgal
Guest

Author Dr Manoj Churvedi has mentioned that Dr Ram Manohar Lohia visualized
*Indian society without caste; and
*60% reservations right up to the highest level of competitions for 90% of our population consisting of:
– Shudras
– Harijans
– Backward castes amongst religious minorities
– Women &
– Tribes
Let present-day Socialists compare their present day demands for reservations with the above dream of Dr Lohia.

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