लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आंदोलन राख में दबी आग साबित हो रहा है। जिसे केंद्र सरकार के अदूरदर्शितापूर्ण दोहरे कानूनी मापदण्ड और विपक्ष में छार्इ राजनीतिक शून्यता हवा देने का काम कर रहे हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के संसद में दिए बयान से यह तय हो गया है कि ज्वलंत राजनीतिक मसलों पर उनकी गंभीर राजनीतिक समझ और पकड़ नहीं है। लिहाजा वे ऐसे मसलों को भी पुलिस को आधार बनाकर सुलझाने की कोशिश में लगे हैं। जबकि उन्हें जनता की मंशा का ख्याल रखने की जरूरत थी। अन्ना हजारे के निवास स्थल मयूर विहार से उनकी गिरफ्तारी से तिहाड़ जेल से हुर्इ रिहार्इ के बीच घटे घटनाक्रम ने जाहिर कर दिया है कि समस्त राजनीतिक समाज हाशिए पर है और नागरिक समाज मुख्यधारा का चमकता सूरज बनकर उभर रहा है। जिसमें अन्ना देश की 60 फीसदी युवा आबादी की आशाओं का प्रतिबिंव बनके उभरे हैं। लोकपाल विधेयक को लेकर संसदीय कार्रवाही में अन्ना समूह द्वारा अड़ंगा डालने का जो बहाना अब तक केंद्र सरकार बना रही थी उसकी धाजिजयां जिस तरह से लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने उड़ार्इं, उससे तय हुआ कि संससदीय प्रक्रिया का मजाक बनाने की शुरूआत खुद सप्रंग सरकार के आला मंत्रियों ने की। अपने ही जाल में फंसी सरकार सुलझने के जितने भी उपाय कर रही है, वह उतनी ही वह न केवल उलझती जा रही है, बलिक शर्मशार भी हो रही है। लगता है इस चक्रव्यूह से निकलने का अब उसके पास अपनी लाज बचाने का कोर्इ मंत्र शेष नहीं रह गया है।

अन्ना की गिरफ्तारी को जायज और सरकार को सारे घटनाक्रम से पाकसाफ ठहराने के नजरिए से मंगलवार को तीन-तीन दिग्गज मंत्रियों ने पत्रकारों

से चर्चा की थी। फिर दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने कानून के पालन और शांति भंग की आशंकाओं के चलते अन्ना की गिरफ्तारी को उचित ठहराया। कमोबेश इन्हीं बिन्दुओं को लोकसभा और राज्यसभा में बयान देते वक्त देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के प्रशासनिक अधिकारी रहे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने दोहराया। वे कुछ भी ऐसा नया नहीं बोले, जिन्हें प्रधानमंत्री के मौलिक सोच या राजनैतिक चुनौती का सामना करने वाली आवाज कहा जा सके। उन्होंने अन्ना हजारे को देश का सर्वोच्च आदर्श तो माना लेकिन सरकार अन्ना के साथ आगे क्या करने जा रही है इसका कोर्इ संकेत नहीं दिया। लिहाजा उनसे जो राजनीतिक मार्गदर्शन की उम्मीद थी, उसे कोर्इ दिशा नहीं मिली। कागज में लिखे बयान को पढ़ने का उनका जो लहजा था, उससे साफ हो रहा था कि यह बयान किसी अधिकारी ने लिखा है और प्रधानमंत्री ने उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती की तर्ज पर उसे पढ़ा भर है। प्रधानमंत्री ने न तो समस्या की जड़ को खंगालने की कोशिश की और न ही समस्या के हल को कोर्इ मार्ग सुझाया। उनके बयान से ऐसी कोर्इ इच्छाशकित भी नहीं झलकी, जिसे माना जाए कि भ्रष्टाचार पर सरकार कोर्इ ठोस कदम उठाने जा रही हो। तय है कि अब से दिन प्रतिदिन सरकार पर अवाम का भरोसा कम होता चला जाएगा।

प्रधानमंत्री ने अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों पर लोकपाल विधेयक थोपने के साथ संसदीय प्रक्रिया में दखलंदाजी करने का ठींकरा भी फोड़ा। प्रधानमंत्री ने कहा कोर्इ नागरिक समाज संसद की सर्वोच्चता को चुनौती देकर संवैधानिक अधिकारों का हनन नहीं कर सकता। इस सिलसिले में गौरतलब है कि जब अन्ना सख्त लोकपाल विधेयक की मांग को लेकर जंतर-मंतर पर आमरन अनशन करने बैठे थे, तब इसी मनमोहन सरकार ने अन्ना-दल से समझौता करते हुए न केवल यूपीए के मंत्रियों और नागरिक समाज के लोगों को लेकर ‘लोकपाल प्रारूप साजा समिति बनार्इ, बलिक अन्ना ने जब विपक्षी दलों को सदस्य बनाए जाने का प्रस्ताव रखा तो उसे नकार दिया गया। जबकि संसद की गरिमा और संविधान की मर्यादा रखने के लिए यह जरूरी था कि विपक्षी दलों के सदस्यों को इस समिति में नामांकित किया जाता। किंतु मसले के मसौदे को लेकर जब बात बिगड़ गर्इ तो कहा गया कि संसदीय प्रक्रिया बाधिक की जा रही है, जिसे प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा। जबकि विपक्षी दलों के सदस्यों को न लेकर संसद की गरिमा को भंग करने का काम सप्रंग सरकार ने ही किया था। सुषमा स्वराज ने जब संसद में इन मुददों पर सरकार से जवाब तलब किया तो सरकार कोर्इ दुरूस्त और माकूल जवाब नहीं दे पार्इ।

अन्ना के प्रभाव और जनता के भ्रष्टाचार के प्रति आक्रोश की भवना को सरकार तो भांप ही नहीं पार्इ देश की गुप्तचर एजेंसियां भी अन्ना की गिरफ्तारी के बाद होने वाले असर का कोर्इ आंकलन करने में नाकाम रहीं। इसलिए गिरफ्तारी के तत्काल बाद से हर तबके पर तो अन्ना का असर दिखा ही, शिक्षा, अदालत और तमाम सरकारी गैर सरकारी संस्थाओं में व्यवस्था बनाए रखने वाले लोग भी देखते-देखते अन्ना आंदोलन से देश भर में जुड़ते चले गए। अन्ना की सुलगार्इ यह आग देशभर में जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति की तरह गांव-गांव तो फैलेगी ही सप्रंग के कांग्रेस समेत कर्इ सहयोगी दल भी इस आग की आंच से झुलसे बिना रह नहीं पाएंगे। इसी आशंका के चलते यूपीए को बाहर से समर्थन दे रहे लालू, मुलायम और मायावती तो चुप हैं ही तृणमूल नेता ममता बनर्जी भी खामोश है। यदि अन्ना आंदोलन नियंत्रित नहीं होता अथवा सरकार से कोर्इ समझौते की स्थिति नहीं बनती तो तय माने सप्रंग के सहयोगी दल अपने वजूद कायमी के लिए कांग्रेस से दूरी बनाना शुरू कर देंगे। इधर दक्षिणपंथी और वामपंथी दलों में भी एक मंच पर आने के लिए वार्तालाप का सिलसिला शुरू कर दिया है। राजनीतिक दलों के समीकरणों में यह बदलाव केंद्र सरकार के लिए सदन में अविश्वास प्रस्ताव का संकट भी पैदा कर सकता है। यदि विपक्ष एकजुट हो जाता है तो समझिए सरकार के दिन लद गए।

घमंड में चूर सरकार लोकपाल को लेकर अभी भी जो हठ दिखा रही है, वह उचित नहीं है। जब मंगलवार को पत्रकारों से रूबरू होते हुए अंबिका सोनी ने यह स्वीकार लिया है कि मैं भारत सरकार में मैं मंत्री हूं, इसके बावजूद मुझ पर भी गैर कानूनी काम गलत तरीके से करने के लिए दबाव डाला जाता है। भ्रष्टाचार का समर्थन कोर्इ नहीं करता। हम तीनों मंत्री (अंबिका सोनी, पी. चिदंबरम और कपिल सिब्बल) भ्रष्टाचार के खिलाफ है। जब आप भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं तो भ्रष्टाचार को निर्मूल करने के ठोस लोकपाल से क्यों परहेज कर रहे हैं ? यह स्थिति आशंकाओं को जन्म देने वाली है। हर स्तर पर दोहरे मापदण्ड अपनाने की वकालात क्यों हो रही है ? कथनी और करनी में फर्क क्यों है ? क्यों भ्रष्टाचार विरोधी एक आंदोलन को समय सीमा और नागरिकों की निशिचत संख्या में बांधने की कोशिश की गर्इ ? मजबूत जनलोकपाल विधेयक की जिस मांग को अन्ना ने बुलंद करके देश ही नहीं विश्वव्यापी बना दिया है, लोकतंत्र की इस आवाज को क्यों सरकार तानाशाही का मुखौटा लगाकर देखने की जरूरत महसूस कर हरी है। जबकि यह आवाज अब जनता जर्नादन की आवाज बनकर व्यवस्था में समग्र परिवर्तन के संघर्ष में तब्दील होती दिखार्इ देने लगी है। सरकार और उसके सहयोगी दलों को समझ लेना चाहिए कि जनता में पैठ बना चुके मुददों को सत्ताधारियों ने जब-जब ठुकराया है, जनता की अदालत ने वक्त आने पर उन्हें भी ठुकरा दिया है। लिहाजा कांग्रेस अपने इतिहास में झांके और 1977 तथा 1989 में आए चुनाव परिणामों से सबक ले। केंद्र सरकार के मंत्री अन्ना और उनके समूह को चुनाव जीतकर संसद में आकर लोकपाल विधेयक लाने की चुनौती देते रहे हैं। इन मंत्री और कथित नेताओं को जानना चाहिए कि लोकतंत्र और संवैधानिक अधिकारों से आशय केवल चुनाव जीतकर संसद में आने से नहीं होता। असहमति और विरोध जताना भी लोकतंत्र और संविधान का हिस्सा है और इन्हें सम्मानजनक मान्यता हासिल है। लोकतंत्र में व्यापक बदलाव असहमति और विरोध से ही आता है, नेताओं को यह अहसास होना चाहिए। क्योंकि इन्हीं सिथतियों से रूबरू होते हुए नेता प्रतिष्ठा हासिल करके विधायिका में जगह बनाता है। बहरहाल टकराव की नियति से दूर रहकर सरकार को मजबूत जनलोकपाल लाने की प्रतिबद्धता जतानी चाहिए।

 

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3 Comments on "भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना की आग"

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shakt dhyani
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गूंगा, बहरा राजा बैठा,
भ्रष्ट व्यवस्था छत्र बनी
लोकतंत्र का भांड खेल है,
सांप-लाठियां मित्र बनीं
दण्ड-न्याय बन बैठे सेवक,
स्वांग-संसदें भंग करो
गण-गरिमा अपमानित होती,
विधान-प्रहसन बंद करो
अरे विदूषक! गद्दी छोड़ो,
जन-गण-मन उठ गाता है
अन्ना, अन्ना, अन्ना अन्ना,
भारत भाग्य विधाता है….

शाक्त ध्यानी

RTyagi
Guest
Rahulji, Sonyaji evam unke tathakathit saafsuthre, doodh ke dhule mantri kya gandhi parivar ka jo videshon mein jama 2 hazar karod ke baare mein koi safai denge?? Vaise जनता के पैसे की बर्बादी, कातिल मंत्रियों को बचाने, बिजली, पानी, सड़क शिक्षा जैसी मूल आवश्यकताओं की पूर्ती में विफल राज्य सरकारों के विरोध में भी एक आन्दोलन की आवश्यकता आज महसूस हो रही है… इन राज्यों में.. उत्तर प्रदेश और इसकी मुख्या मंत्री मायावती सबसे ऊपर हैं जो बने बनाये वक्तव्य पढ़ती हैं और घर जा कर गोलमाल कर बनाये हुए पैसों को गिनने में लग जाती हैं….यह अपने पिछले चार… Read more »
RTyagi
Guest
हमारे प्रधानमंत्री मनमोहन जी की अदूरदर्शिता, एवं विवेकहीनता की ये पराकाष्ठा है. वे सिर्फ एक रोबोट प्राइम मिनिस्टर बने हुए हैं.. जिस रोबोट का रिमोट कपिल सिब्बल, दिग्गी, प्रणव जैसे धूर्त एवं मौकापरस्त लोगों के हाथ में दिया गया है. और ये रिमोट सोनियाजी द्वारा अल्प समय के लिए दिया गया है. अब जनता को समझ जाना चाहिए क्यों हमारा विदेश कूटनीतिक पक्ष अपनी बात नहीं रख पाता. जो प्रधान मंत्री यह समझ नहीं रखता की अपने देश जनता की भावनाओं और उससे जुडी समस्याओं पर क्या वक्तव्य देना चाहिए, वे हमारे विदेश निति में बार बार क्यों विफल होते… Read more »
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