लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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    nhrc  दिनांक २६-११-२०१३, मंगलवार को वाराणसी में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की फुल बेंच की बैठक हुई। वाराणसी के कमिश्नर के सभागार में आयोजित खुली सुनवाई का उद्घाटन भारत के सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और वर्तमान अध्यक्ष, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग, न्यायमूर्ति श्री बाककृष्णन ने किया। इस खुली सुनवाई (Open Hearing) में उत्तर प्रदेश पावर कार्पोरेशन लि. से संबन्धित कई मामले थे। इसे बिजली विभाग ने काफी गंभीरता से लिया था। अतः खुली बहस में हमलोग पूरी तैयारी से गए थे। लखनऊ से पावर कार्पोरेशन का प्रतिनिधित्व श्री राधे मोहन, निदेशक (पी एन्ड ए) तथा वाराणसी से पूर्वान्चल विद्युत वितरण निगम लि. का प्रतिनिधित्व मैं स्वयं, मुख्य अभियन्ता (प्रशासन) के रूप में कर रहा था। दो दिवसीय सुनवाई के लिये वाराणसी, गाज़ीपुर, जौनपुर और चन्दौली जिले के १२३ मामले सूचीबद्ध थे। सुनवाई के लिये दो न्यायालय गठित किए गए थे – एक कमिश्नर के सभागार में दूसरा वही प्रेक्षागृह में। एक तरफ शिकायतकर्त्ता बैठे थे और दूसरी तरफ जिला प्रशासन और संबन्धित विभागों के सरकारी अधिकारी। जज के अतिरिक्त सभी एक ही तरह की कुर्सियों पर बैठे थे। बैठने की व्यवस्था में कोई भेदभाव नहीं था।

      सुनवाई की शुरुआत चन्दौली जिले की शिकायतों से हुई। दिन के १.३० बजे तक चन्दौली की सभी १४ शिकायतों का निस्तारण हो गया। माननीय न्यायाधीश ने सभी शिकायतों पर अपना निर्णय सार्वजनिक रूप से न सिर्फ सुना दिया बल्कि रिकार्ड भी करा दिया। दोपहर के बाद चार बजे गाज़ीपुर जिले की सभी १२ शिकायतों का निस्तारण इसी कोर्ट ने किया। अपनी दो दिवसीय खुली सुनवाई के दौरान सभी १२३ मामले निस्तारित किये गए। मानवाधिका आयोग का जनता के बीच जाकर खुली सुनवाई के द्वारा मामलों के निस्तारण का यह अभिनव प्रयोग था। इसके लिये न्यायमूर्ति श्री बालकृष्णन बधाई के पात्र हैं।

हाई स्कूल के हिन्दी के पाठ्यक्रम में महान कथाकार मुन्शी प्रेमचन्द की एक कहानी पढ़ी थी – पंच परमेश्वर। अंग्रेजी न्यायप्रणाली के आगमन के पूर्व भारत में गांव की पंचायत ही गांव के सभी दीवानी-फ़ौज़दारी मामलों की सुनवाई करती थी और अमूमन एक ही बैठक में फ़ैसला भी सुनाती थी। तब शायद सबको न्याय मिलता था। प्रेमचन्द ने इसी न्याप्रणाली का अत्यन्त सशक्त और प्रभावशाली वर्णन एक रोचक कहानी के माध्यम से ‘पंच परमेश्वर’ में किया था। प्रेमचन्द ही नहीं राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की भी गहरी आस्था हिन्दुस्तान की पारंपरिक न्याय-व्यवस्था में थी। उन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ में स्पष्ट रूप से ग्राम पंचायत की वकालत की है। लेकिन आज़ादी के बाद हमने अंग्रेजों द्वारा लागू की गई न्याय-प्रणाली को ज्यों-का-त्यों स्वीकार लिया और पूरे भारत के न्याय को काले कोट वालों को सुपुर्द कर दिया। गांधीजी ने लिखा है कि ये काले कोट वाले (न्याय के दलाल) वेश्या से भी गये गुजरे हैं। वेश्या कम से कम पैसे लेकर देनेवाले को उपकृत तो करती है, लेकिन ये काले कोट वाले जिससे पैसा पाते हैं, उसीका अहित करते हैं। जबतक मुवक्किल का घर-द्वार बिक नहीं जाता, वह दौड़ता ही रहता है, उसका शोषण होता ही रहता है। ऐसी न्याय-व्यवस्था में उसी व्यवस्था के अवकाशप्राप्त न्यायाधीशों द्वारा खुली सुनवाई के दौरान मामलों का त्वरित और उचित निस्तारण मेरे लिये घोर आश्चर्य का विषय था। बिल्कुल पंच परमेश्वर की शैली में न्याय किया जा रहा था। न कोई वकील, न पैरोकार, न दलाल और ना ही कोई बिचौलिया। केस नंबर और शिकायतकर्त्ता के नाम की उद्घोषणा सर्वप्रथम की जाती थी। शिकायतकर्त्ता ध्वनि उद्घोषक के माध्यम से अपनी पूरी बात जज के सामने रखता था। संबन्धित सरकारी अधिकारी शिकायत का उत्तर देता था। जज और शिकायतकर्त्ता क्रास एक्जामिनेशन के लिये स्वतंत्र थे। अनुभवी जज कुछ ही मिनटों में सही स्थिति को भांप लेते थे। वादी-प्रतिवादी से जज की कुछ ही मिनटों के उत्तर-प्रत्युत्तर में दूध का दूध और पानी का पानी हो जाता था। फैसला सुनकर मैं आंखें फाड़कर जज को देखने के सिवा कुछ नहीं कर सकता था क्योंकि वहां ताली बजाने की मनाही थी। न्याय पाने में अपने घर से वाराणसी आने में हुए खर्चे के अलावे वादी का एक पैसा भी खर्च हुआ होगा, मुझे ऐसा नहीं लगा। सभी मामले दलित उत्पीड़न के थे। सुनवाई के पूर्व जिन दलितों की आंखों में निराशा और अविश्वास के भाव थे, सुनवाई के बाद उनकी आंखों में एक चमक थी। उन्हें न सिर्फ न्याय मिल रहा था बल्कि न्याय दीख भी रहा था।

मानवाधिकार आयोग ने एक अभिनव प्रयोग किया है। इसकी जितनी प्रशंसा की जाय, कम पड़ेगी। यह प्रयोग वर्तमान न्याय-प्रणाली को एक संदेश दे रहा है। क्या हमारा हाई कोर्ट, जिला कोर्ट और लोवर कोर्ट गांव, कस्बों में अपनी खुली अदालतें नहीं लगवा सकते हैं, जिसमें वादी हों, प्रतिवादी हों, गवाह हों लेकिन कोई काला कोट वाला न हो।

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