लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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victoryराजस्थान, मध्य प्रदश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली प्रदशों की विधानसभाओं क
संपन्न हुए  चुनावों न जो परिणाम दिय हैं, उनस स्पष्ट हो गया है कि दश की
जनता परिवर्तन की पक्षधर है। लोकतंत्र मं हम भूल जात हैं कि जीत किसी
पार्टी की नही हुआ करती है, अपितु जनापक्षाओं की हुआ करती है। हां,
जनापक्षाओं को कोई विचारधारा प्रभावित किया करती है, और विचारधारा किसी
पार्टी की प्रतीक बन जाया करती है। हर राजनीतिज्ञ जीत क पश्चात पहली भूल
य करता है कि वो अपनी उस विचार धारा को भूल जाता है जिसन जनता को
प्रभावित किया था और उस प्रभावित होन स जनापक्षाएं मत क माध्यम स उसक साथ
आकर जुड़ी थीं। दूसरी भूल उसस य होती है कि वो जनापक्षाओं की उपक्षा करक
अपनी पार्टी को 'लोकप्रिय' बनान पर ध्यान दन लगता है। इसक लिए वह सरकारी
खजान का दुरूपयोग करता है और अपन वोट बैंक को मजबूत करन क लिए उचित
अनुचित ढंग स उन्हं लाभ पहुंचान लगता है। फलस्वरूप जो जनापक्षाएं उसक साथ
सहयोगी बनकर जुड़ीं थीं, वो ही उसस कुंठित होन लगती हैं। तब जनता विकल्प
की खोज करन लगती है। नता मस्त हो जाता है दीवारों को अपन चुनाव चिन्ह स
पुतवाकर और अपनी उपलब्धियों को शहरों कस्बों क चौराहों पर लिखवाकर कि
सम्भवत: जनता का मूर्ख बना दिया गया है, पर जनता है कि वो सब जानती है,
और अपना निर्णय लिय चुप बैठी रहती है। समय आन पर सभी को धो डालती है।
पिछल 67 वर्षों मं हमन राजनीति और लोकतंत्र क इस सच को कई बार घटित होत
दखा है।
राजस्थान, मध्य प्रदश, छत्तीसगढ़ और दिल्ली (संभवत:) मं अब भाजपा की
सरकारं बन रही हैं। इनमं स छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदश मं पूर्व स ही भाजपा
सरकारं रही हैं। चारों प्रांतों मं जीत भाजपा की या मोदी की नही हुई है,
जीत पुन: जनापक्षाओं की हुई है। हां, जनापक्षाएं मोदी क माध्यम स भाजपा
को जीत दिलाकर सत्ता सिंहासन तक पहुंची है। इस प्रकार 'आप' भी कजरीवाल क
माध्यम स पूर्णत: सम्मानजनक स्थिति मं आ गयी है। जनापक्षाओं की जीत पर
जश्न मनाना लोकतंत्र मं वर्जित है, क्योंकि जनता न आपको अपना मत स्वयं
जश्न मनाकर तुम्हार द्वारा जश्न मनान क लिए नही दिया है, अपितु उसन
गंभीरता का परिचय दिया है और चुपचाप अपना जनादश द दिया है। यह मौन
क्रांति है, जिस जनता कई बार इस  दश मं कर चुकी है, परंतु हमार नता उस
जश्न मनान मं खो दत हैं। जश्नों को इतन उत्साह स मनाया जाता है कि मानो
हमन किसी शत्रु दश पर ही विजय प्राप्त कर ली हो। जब तक पराजित पक्ष मार
लज्जा क छुप ना जाए, तब तक हमं 'शांति' नही मिलती।
शत्रु को पहल दिन स ही चिढ़ाकर अपन लिए असहयोगी बना लना लोकतंत्र की
भावना क प्रतिकूल है।  लोकतंत्र की भावना तो य है कि आप अपन
प्रतिद्वंद्वी को राष्ट्रहित मं अपन लिए पहल दिन स अपना सहयोगी बनान की
पहल करं, उस विपरीत पक्ष (विपक्ष) ना बनाकर विशष पक्ष बनायं। जो आपक
कार्यों मं अपना रचनात्मक सहयोग प्रदान कर, इसक लिए आवश्यक है कि जीत क
जश्न मं ना डूबकर पहल दिन ही विपक्ष क नता क पास जाकर या पदमुक्त हो रह
मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री क पास जाकर उसस रचनात्मक सहयोग करन का निवदन
किया जाए। इसस जनता क जनादश की गरिमा बढ़गी और हमं जनता क आदश का ध्यान
रहगा कि उसन य क्यों दिया था? गंभीर दायित्व जब मिल रहा हो तो उस समय राम
जैसी (सिंहासनारूढ़ होत और वनगमन करत राम, दोनों अवस्थाओं मं सम थ )
गंभीरता का प्रदर्शन करना ही उचित होता है। कांग्रस क दिग्विजय सिंह का य
कहना कुछ अर्थ रखता है कि मोदी अब अटल की राह पर चल रह हैं। सचमुच इस दश
की जनता सिद्घांतों पर कड़ा लकिन उदार नतृत्व ही चाहती है। दश क
मुसलमानों को कांग्रस, सपा और दूसरी धर्मनिरपक्ष पार्टियां वोट बैंक क
रूप मं प्रयोग करती रही हैं, उनका मूर्ख बनाया गया है, उनक लिए काम नही
किया गया। जो व्यक्ति समान नागरिक संहिता की बात करता है, या धारा 370 को
हटान की मांग करता है, उस इनक बीच मं एक 'हौवा' बनाकर पश किया जाता है कि
यदि य आ गया तो 'प्रलय' आ जाएगी, अन्यथा राष्ट्रीय मुसलमान भी नही चाहत
कि दश मं कहीं भी दोरंगी नीतियां हों। वह वर्तमान क सच को समझत हैं और
चौदहवीं शताब्दी की हिंसा को दश की उन्नति क लिए अनुचित मानत हैं। वह यह
भी जानत हैं कि दश मं साम्प्रदायिक दंग किस पार्टी न अधिक कराय हैं, या
किस पार्टी क सत्ता मं आत ही साम्प्रदायिकता भड़कती है? मुसलमान इस दश की
सच्चाई है और जो लोग य सोचत हैं कि उन्हं समाप्त करक ही दश की उन्नति
संभव है वो उन्माद फलाकर दश को महाविनाश की ओर तो ल जा सकत हैं, पर विकास
क रास्त पर नही डाल सकत। आवश्यकता राजनीतिक सूझबूझ क माध्यम स सख्ती क
साथ राष्ट्रवादी नीतियों को और सिद्घांतों को लागू करन की है, और उनमं जो
व्यक्ति अडंगा डाल उसस बिना साम्प्रदायिक भदभाव क शक्ति स निपटा जाए।
किसी भी व्यक्ति या समुदाय को मूल अधिकारों स वंचित नही किया जा सकता।
सबको विकास और आत्मोन्नति क समान अवसर दिय जाएं।
दश की जनता जब जब भी जनादश दती है, तब तब ही उस जनादश का यही अर्थ होता
है। भाजपा को चार प्रदशों की जनता न अपना जनादश भी इसी भावना स दिया है।
इसलिए किसी भी पार्टी पर या किसी भी विचार-धारा पर कटाक्ष करन की
आवश्यकता नही होनी चाहिए। पूर्ण गंभीरता क साथ जनादश क पीछ छिपी जनापक्षा
को समझना होगा। मोदी न  एक परिवार क जादू मं बंधी कांग्रस को लोगों क
सामन नंगा करन मं सफलता प्राप्त की है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी अभी
तक अच्छी बातों का श्रय अपन लिए लूटत रह हैं जबकि गलतियों को बड़ी
सावधानी स डा. मनमोहन सिंह क सिर मढ़त रह हैं। परंतु मोदी की चुनावी
रणनीति ऐसी रही है कि इस बार सोनिया-राहुल ऐसा नही कर पाएंग। मोदी न धीर
स डा. मनमोहन सिंह को नपथ्य मं धकल दिया और ऐसी चाल चली कि सदा नपथ्य मं
रहकर तीर चलान वाली सोनिया और उनक पुत्र राहुल गांधी को मोदी को घरन क
लिए स्वयं हथियार उठान पड़ गय। मोदी यही चाहत थ। सोनिया-राहुल क नपथ्य स
उठकर हथियार संभालत ही व मुख्य भूमिका मं आग आ गय। अत: उनकी योग्यता को
परखन का मौका मोदी न दश को दिया। दिल्ली की जनता न राहुल क सात मिनट क
भाषण को भी नही सुना, जबकि सोनिया अपन भाषण को 12-13 मिनट तक ल आयीं,
परंतु जनता न मुंह फर लिया। मोदी सफल हो गय। मोदी की इस सफल चुनावी
रणनीति का सर्वाधिक लाभ डा. मनमोहन सिंह को मिला है, वह निश्ंिचत है और
उन्होंन इन प्रदशों क चुनाव परिणाम आन स पूर्व ही कह दिया था कि मोदी
कांग्रस क लिए एक गंभीर चुनौती हैं। उन्होंन कांग्रस शब्द का प्रयोग चाह
भल ही किया हो, पर उनका अभिप्राय कांग्रस क स्थान पर सोनिया-राहुल स ही
है। अब मोदी क लिए 2014 क चुनाव मं कांग्रस की ओर स एक अपरिपक्व नता
राहुल गांधी ही मोर्चा संभालंग। यह दश क लिए दुर्भाग्यपूर्ण होगा,
क्योंकि जितन बड़ स्तर का महारथी  लड़ रहा हो, उसस उसी स्तर का महारथी
भिड़ तो अच्छा रहता है। इसस बड़ महारथी क अभिमान मं वृद्घि होन का खतरा
रहता है, जिसका दुष्परिणाम दश को भुगतना पड़ता है। जैसा कि इंदिरा गांधी
या उनस पहल नहरूजी क समय मं दश न दखा भी है। सक्षम पक्ष क लिए सक्षम
विपक्ष लोकतंत्र की अनिवार्यता है।
अरविंद कजरीवाल सचमुच बधाई क पात्र हैं। उन्होंन कई बाधाओं को पार कर
इतिहास लिखा है। वर्ष 2013 उनक जीवन क लिए मील का पत्थर सिद्घ हो गया है।
इतिहास न उन्हं रूककर दखा है और यह अवसर किसी व्यक्ति क जीवन मं बड़
सौभाग्य स ही आता है कि जब उस इतिहास रूककर दखं। डा. मनमोहन सिंह क लिए
इतिहास अपनी स्याही दवात को समट रहा है, राहुल और उनकी मां सोनिया की
गलतियों को समट रहा है, और मोदी क लिए कुछ लिखना चाह रहा है, तभी कजरीवाल
न इतिहास को अनायास ही अपनीओर दखन क लिए बाध्य कर दिया, वह उनकी बड़ी
सफलता है। उन्होंन दिल्ली की जनता को अच्छा विकल्प दिया और दिल्ली मं 70
प्रतिशत तक मतदान होन का एक कारण कजरीवाल की आम आदमी पार्टी का अच्छा
विकल्प मिलना भी रहा। जब गंदगी क ढर मं स अच्छी पिन्नियां बीनन क लिए
जनता को चुनाव क दिन मतदान करन क लिए कवल इसलिए भजा जाता है कि जाओ और
हमन जो घटिया लोग तुम्हार सामन उतार दिय हैं, उन्हीं मं स बढिय़ा का चुनाव
करक लाकर दो, तो जनता मतदान का बहिष्कार करती है। पर जब उस लगता है कि इस
बार घटिया मं स बढिय़ाओं का नही अपितु बढिय़ाओं मं स घटिया को छोडऩ का
विकल्प मिल रहा है तो वह उत्साह स चुनाव मं भाग लती है। मिजोरम सहित
पांचों प्रदशों मं जनता न अप्रत्याशित रूप स मतदान किया। विवकशील लोगों न
तभी अनुमान लगा लिया था कि जनादश ऐतिहासिक होगा। अब ऐतिहासिक जनादश क हम
सब साक्षी बन गय हैं। अच्छा हो कि भाजपा इस विनम्रता स ल और गंभीरता स दश
निर्माण क कार्य मं लग जाए। दिल्ली मं 'आप' सचमुच विशष पक्ष बनकर विपक्ष
की भूमिका निभाए और कांग्रस भविष्य की तैयारियों मं जुट जाए। वह
अंतर्मन्थन कर कि भूल कहां हुई और उस कैस दूर किया जा सकता है? मोदी या
कजरीवाल को उस बलगाम नही बनन दना है, इसलिए वह संभल और आग बढ़ं। दश क
निर्माण मं उसक योगदान की भूमिका अभी भी शष है। इन तीन स अलग दश की जनता
अब किसी की ओर नही दख रही है, इसलिए हम भी यहां तीसर मोर्च वालों का कोई
उल्लख नही कर रह हैं। जनता जनार्दन को नमन है जिसन तीसर मोर्च की भ्रूण
हत्या ही कर दी है।

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