लेखक परिचय

अरुण कान्त शुक्ला

अरुण कान्त शुक्ला

भारतीय जीवन बीमा निगम से सेवानिवृत्त। ट्रेड यूनियन में तीन दशक से अधिक कार्य करता रहा। अध्ययन व लेखन में रुचि। रायपुर से प्रकाशित स्थानीय दैनिक अख़बारों में नियमित लेखन। सामाजिक कार्यों में रुचि। सामाजिक एवं नागरिक संस्थाओं में कार्यरत। जागरण जंक्शन में दबंग आवाज़ के नाम से अपना स्वयं का ब्लॉग। कार्ल मार्क्स से प्रभावित। प्रिय कोट " नदी के बहाव के साथ तो शव भी दूर तक तेज़ी के साथ बह जाता है , इसका अर्थ यह तो नहीं होता कि शव एक अच्छा तैराक है।"

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raman छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह की लो प्रोफाईल राजनीति ने इस बार भी कमाल दिखाकर छत्तीसगढ़ में कमल खिलाया है| 2013 के इन चुनावों की सबसे बड़ी खासियत यही रही कि प्रदेश में न तो झीरम में नक्सली हमले के चलते हुई कांग्रेस के दिग्गज नेताओं की मौत से पैदा हुई कोई सहानुभूति की लहर दिखाई पड़ी और न ही भाजपा के मोदी राग का कोई असर दिखाई दिया| इसका उदाहरण है कि झीरम घाटी में शहीद हुये कांग्रेस के चार नेताओं के परिजनों को कांग्रेस ने चुनाव मैदान में उतारा था, जिनमें सिर्फ दो नेताओं के ही परिजन, दंतेवाड़ा से दिवंगत महेंद्र कर्मा की पत्नी देहुति कर्मा और खरसिया से कांग्रेस के दिवंगत प्रदेश अध्यक्ष नन्द कुमार पटेल के पुत्र उमेश पटेल ही चुनाव जीत पाए| इसके पीछे भी विशेष कारण यह है की दोनों परिवार लम्बे अर्से से राजनीति में हैं और देहुती तथा उमेश पटेल दोनों ही सक्रिय भी थे| राजनांदगांव से मुख्यमंत्री रमन सिंह के खिलाफ खड़ी हुईं दिवंगत उदय मुदलियार की पत्नी अलका मुदलियार और धरसींवा क्षेत्र से खड़ी हुईं दिवंगत योगेन्द्र शर्मा की पत्नी अनिता शर्मा, दोनों के हार का सामना करना पड़ा है| कारण, दोनों राजनीति में पूर्व से सक्रिय नहीं थे|

इसी तरह प्रदेश की जनता को मोदी के शब्दों को खींच खींच कर कवितानुमा स्टाईल में दिए गए भाषण भी प्रभावित करने में कामयाब नहीं हुए| इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि 2008 में जहां भाजपा और कांग्रेस को मिले मतों का अंतर 1.70% था, अब यह घटकर 2013 में महज 0.75 रह गया है| प्रदेश में मोदी ने 14 विधान सभा क्षेत्रों में 12 रेलियाँ की थीं| इनमें, केवल एक बेमेतरा विधानसभा भाजपा कांग्रेस से छीन पायी, रायपुर की एक विधानसभा रायपुर उत्तर यदि उसने कांग्रेस से छीनी तो दूसरी विधानसभा रायपुर ग्रामीण कांग्रेस को गंवाई| जबकि अपने कब्जे से भाजपा ने दुर्ग शहर, बिल्हा और कांकेर की सीटें कांग्रेस को हारीं| महासमुंद पहले कांग्रेस के पास था, जिस पर निर्दलीय प्रत्याशी की जीत हुई है| बाकी जगह, कवर्धा, रायगढ़ जगदलपुर, डोंगरगढ़ पहले से उसके पास थी, जिन्हें वो रोक पायी है| याने, जहां जहां मोदी की रेली हुई, वहां केवल एक सीट भाजपा कांग्रेस से छीन सकी, जबकि उसने गवाईं 3 सीटें| कुल मिलाकर छत्तीसगढ़ मोदी फेक्टर या मोदी लहर, जिसका मीडिया और भाजपा के बड़े नेता प्रचार कर रहे थे, से दूर ही रहा है, इसमें कोई शक नहीं है| हाँ, रमन सिंह जरुर सरकार और संगठन में तमाम गुटबाजी और दबे विरोध के बावजूद अपनी लो प्रोफाईल राजनीति के चलते अपनी जगह पर मजबूत हैं| छत्तीसगढ़ में यदि भाजपा तीसरी पारी की शुरुवात करने जा रही है तो इसका पूरा श्रेय रमन  सिंह को ही देना होगा| साधारण दिखने और साधारण तरीके से अपनी बात कहने की रमन सिंह की लो प्रोफाईल राजनीति ने ही भाजपा के कमल को छत्तीसगढ़ में खिलाया है|

2013 के जनादेशों को यदि सही तरीके से समझा जाए तो छत्तीसगढ़ के लोगों ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को सबक दिया है कि वे आम लोगों से जुड़ें और उनकी मनोभावना को समझने की कोशिश करें| नोटा उसका उदाहरण है, जिसमें कुल डाले गए वोटों के तीन प्रतिशत से ज्यादा वोट डाले गए, तो उससे भी बड़ा उदाहरण है भाजपा और कांग्रेस के दिग्गजों का भारी संख्या में हारना| भाजपा खेमे से विधानसभा अध्यक्ष, विधानसभा उपाध्यक्ष, पांच मंत्रियों, तीन संसदीय सचिवों सहित  कुल मिलाकर 18 वर्तमान विधायक पराजित हुए तो कांग्रेस के खेमे से नेता प्रतिपक्ष रविन्द्र चौबे सहित कुल मिलाकर 26 विधायक पराजित हुए| यह जनता के मध्य संचारित हुआ नया एंटी-इनकम्बेंसी है, जो स्थानीय स्तर पर अपने इलाकों के जनप्रतिनिधियों पर उनके नकारापन और क्षेत्र की जनता के कामों के प्रति उनकी उदासीनता को लेकर वृहद् स्तर पर सामने आया है और दोनों प्रमुख पार्टियों के लिए सन्देश है कि वे प्रत्याशियों के चयन को लेकर फूंक फूंक कर कदम रखें|

छत्तीसगढ़ के चुनाव परिणामों को शेष चार राज्यों के चुनाव परिणामों से अलग करके नहीं देखा जा सकता है| मिजोरम में कांग्रेस की वापसी हुई है| लेकिन, राजस्थान और दिल्ली, कांग्रेस को खोना पड़े हैं| मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा काबिज थी तो दिल्ली और राजस्थान में कांग्रेस की सरकारें थीं| मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में प्रदेश की जनता के सामने राज्यों की कांग्रेस पार्टियों की कोई भी खामियां नहीं थीं, सिवाय उनकी अंदरुनी खींचतान के, जिसके साथ आम जनता का कोई बड़ा सरोकार नहीं रहता है| और, ये अंदरुनी खींचतान भाजपा में भी उसी मात्रा में मौजूद थी, जितनी मात्रा में यह कांग्रेस में थी| सभी आंकड़े और हाल बताते हैं की राजस्थान और दिल्ली में कांग्रेस की सरकारों ने न केवल विकास के लिए बल्कि प्रदेश के लोगों, विशेषकर पिछड़े और गरीब तबकों के लिए वे सभी कार्य किये, जो आज की दौर की सरकारें अमूमन करती हैं और जो मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी किये गए| वह चाहे दो रुपये किलो चावल बांटना हो, साईकिल, लेपटॉप, पायल, बिछिया, डिनर सेट या नगद राशी का वितरण हो| फसल को खरीदना हो या बिजली, पानी, सड़क जैसी सुविधाओं को उपलब्ध कराना| जहां तक, भ्रष्टाचार का सवाल है, सार्वजनिक सेवाओं, जैसे बिजली, पानी, सड़क के लिए ज्यादा पैसा वसूलना और निजी लोगों को फ़ायदा पहुंचाने का सवाल है, देश के किसी भी राज्य और मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, राजस्थान में कोई भी अंतर नहीं है| उसके बावजूद जहां, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में कमल फिर से खिला तो राजस्थान और दिल्ली कांग्रेस को गवाना पड़े|

एक कहावत है की रोटी क्यों जली, घोड़ा क्यों अड़ा और पान का पत्ता क्यों सड़ा, तीनों का जबाब एक ही है कि पलटा नहीं गया| यदि दिल्ली और राजस्थान कांग्रेस ने खोये हैं और सारी प्रभुत्व-विरोधी लहर के बावजूद यदि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा तीसरी बार काबिज हो सकी है तो इसका एक मात्र जबाब, यूपीए- दो का कुशासन, भ्रष्टाचार है, जिसे इन प्रदेशों की कांग्रेस पार्टियों को ढोना पड़ा है| राजस्थान के मुख्यमंत्री गहलोत ने ऐसे ही इशारों इशारों में केंद्र की सरकार को दोषी नहीं ठहराया है या दिल्ली में ऐसे ही शीला दीक्षित ने ये नहीं कहा की हम बेवकूफ हैं, इसके पीछे केंद्र की सरकार की अक्षमताओं की दर्द भरी कहानी है| शायद यह सब ठीक करने का समय अब कांग्रेस के पास नहीं है और यदि है भी तो बहुत कम है| यदि यह कम समय भी पूरा पड़ जाए तो महत्वपूर्ण यह है कि केंद्र सरकार और केंद्र की कांग्रेस के पास इसे पूरा करने की इच्छा शक्ति है या नहीं?

यह कहना कि इन पांच राज्यों के चुनाव लोकसभा के लिए होने वाले चुनावों के सेमी फायनल हैं, न केवल जल्दबाजी होगी बल्कि शायद गलत भी होगा| क्योंकि, हमारे सामने 2003 और 2008 के चुनावों के नतीजे हैं, जब कांग्रेस का राज्यों के चुनाव में प्रदर्शन कमजोर था, लेकिन केंद्र में कांग्रेस सरकार बनाने में सहगोयियों के साथ सफल रही थी| भाजपा की पूरी कोशिश यही होगी की वह इन परिणामों को केंद्र के सेमीफायनल के रूप में प्रस्तुत करे, यही उसे सत्ता के रास्ते पर ले जा सकता है| पर, केंद्र में गठबंधन की सरकार ही बनना है और सत्ता के समीकरण, वहां पूरी तरह जुदा होंगे, जहां भाजपा केवल अकाली दल और शिवसेना के साथ एक साम्प्रदायिक गुट के रूप में खड़ी है| उसे अभी अपने इस रूप से निकलने में और ढेर सारी कोशिशें करनी है| मोदी का जादू, जितना दिखता है, उतना असरकारी नहीं है, इन चुनावों में यह सिद्ध हो चुका है|

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