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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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santosh-bhartiyaसाप्ताहिक अखबार ‘चौथी दुनिया’ और इसके संपादक संतोष भारतीय पर राज्यसभा सदस्यों के सँज्ञान पर राज्य सभा ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस भेजा है.  नोटिस देने वाले सांसदों और उनकी पार्टी के नाम हैं- अली अनवर (जद-यू), अजीज़ पाशा (सीपीआई), राजनीति प्रसाद (आरजेडी) और साबिर अली (लोकजनशक्ति पार्टी). इन सांसदों ने यह नोटिस उप-राष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति हामिद अली अंसारी को दी है. नोटिस को संज्ञान लेते हुए उप-राष्ट्रपति ने इन सासंदों को विश्वास दिलाया है कि ‘चौथी दुनिया’ और इसके संपादक के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की जाएगी.

ज्ञात हो कि ‘चौथी दुनिया’ के 7-13 दिसंबर 2009 के अंक में इस हिंदी साप्ताहिक के प्रधान संपादक संतोष भारतीय ने जो कवर स्टोरी लिखी है, उसका शीर्षक है- ‘रंगनाथ कमीशन : रिपोर्ट पेश न होना राज्यसभा का अपमान‘. इसे पढ़ने के बाद राज्यसभा के सासंदों को लगा कि ‘चौथी दुनिया’ और इसके संपादक ने राज्यसभा और उसके सदस्यों का घोर अपमान किया है.

हमें यह भी समझना होगा कि मनमोहन सिहं इस दलील को मानने वालों मे से हैं कि देश के संसाधनों पर समाज के अल्पसंख्यकों का सबसे पहला हक है. मनमोहन सिंह सरकार ने रंगनाथ मिश्र कमीशन का गठन किया. रंगनाथ मिश्र कमीशन को मुसलमानों और इसाईयों में दलितों और पिछड़ों को पहचान करने की दी गई थी. साथ ही उनके लिए सरकारी रोजगार में आरक्षण का भरोसा कांग्रेस की सरकार ने दी थी. अजीब बात है जब कमीशन ने रिपोर्ट दे दी तो उसे अलमारी में बंद कर दिया गया. इसका मतलब साफ है मनमोहन सरकार इस मामले में देश के अल्पसंख्यको धोखे में रखना चाहती है. कमीशन की सिफारिशों को लागू करना नहीं चाहती है. ऐसे में कोई पत्रकार सरकार के आचार और विचार पर अपनी प्रतिक्रिया देता है तो उसमें बुराई क्या है. क्या मनमोहन सिंह की सरकार पत्रकारों से यही उम्मीद रखती है कि वे सिर्फ सरकार की चापलूसी करें. संतोष भारतीय ने जो बात चौथी दुनिया के अपने लेख में लिखा है यह देश के अल्पसंख्यकों की आवाज है. समझने वाली बात यह है कि लिबरहान कमीशन की रिपोर्ट पर संसद में इसलिए बहस होता क्योंकि यह सीधे चुनावी राजनीति से जुड़ा है. सरकार रंगनाथ कमीशन की रिपोर्ट को इसलिए दबाया जाता है क्योंकि गरीबों और लाचारों की आवाज उठाने वाला कोई नहीं है. राजनेताओं की नजर में देश के गरीब सिर्फ वोट हैं. यही वजह है कि आजादी के बाद से राजनीतिक दल उनके वोट तो लेती रही लेकिन उनका विकास नहीं किया. यही सच संतोष भारतीय ने लिखा है. संतोष भारतीय ने अपने लेख संसद की खत्म हो रही साख पर चिंता जताई है. कड़े शब्दों में राज्य सभा के सदस्यों को ललकारा है कि अगर वे अपने कर्तव्य का निर्वाह करने में चूक गए तो लोगों का भरोसा टूट जाएगा. संतोष भारतीय के लिखने का अपना तरीका है. जनता की भावनाओं को अपने लेखों में समेटने की कला में वे माहिर हैं. इस लेख के जरिए उन्होंने यह साबित किया है कि वे एक निर्भीक और विश्वसनीय पत्रकार हैं.

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