लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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अवधकिशोर

लम्बी टांग, सामान्य से उँची ठोड़ तथा बिल्कुल सफेद रंग यह बगुले की पहचान है, अत्यधिक सफेद धुले कपड़ों का उदाहरण भी बगुले की पंख से दिया जाता है। विद्यार्थी जो विद्यार्जन करते हैं, उनके पांच लक्षणों में एक लक्षण है ‘वकोध्यानम्’, अर्थात् बगुले की तरह ध्यान जिसका हो, वह श्रेष्ठ विद्यार्थी है बगुला (बकुला) नदी, तालाब, सरोवर तथा झील, के किनारे चुपचाप बिना किसी हरकत के शान्तचित्त बैठा मिल जाएगा उसके ध्यान को देखकर लगता है कि वह एक सिध्दसाधक एवं महान ध्यानयोगी है। उसके ध्यान में जैसे ही कोई जलीय जीव विशेषकर मछली आती है वह बिना देर किये ही एक क्षण में ही उसे अपने प्रसाद रूप में ग्रहण कर लेता है। शास्त्रों में यह उल्लेख मिलता है कि ‘जीवो जीवश्य भोजनम्।’ कहा भी जाता है घोड़ा घास से दोस्ती करेगा तो भूखो मरेगा। ‘इकोसिस्टम’ का नियम भी यही है तथा सृष्टि में समस्त प्राणियों के परिस्थितिकतन्त्र का चक्र चलना भी चाहिए। यही कारण है कि बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है, बड़ी मछली के विकास में अनेक छोटी-छोटी मछलियों का योगदान होता है साथ ही इस ‘इकोसिस्टम’ में सैवाल एवं जलीय छोटे-छोटे कीड़ों-मकौडों का भी विशेष योगदान होता है अपने बीज का पोषण प्रकृति करती है जो सरवाइव करता है उसका अस्तित्व ही स्वीकार किया जाता है, इस धरा के प्राणियों में अस्तित्व के लिए (प्रतिस्पर्धा) संघर्र्ष चलती रहती है। उपजाऊ और अच्छी भूमि में अनेक प्रकार के बीज डाले जाते हैं, पर सभी उगते नहीं, सभी बीजों का अकुरण नहीं होता कुछ ही उगते हैं, फिर जो उगते हैं उनको बड़ा और फलदायी बनाने हेतु निराई-गुड़ाई भी की जाती है, तथा खाद-पानी भी दी जाती है। कोई भी विशाल वृक्ष ऐसे बड़ा नहीं बन जाता इसके लिये अनेक छोटे-छोटे पौधों को उसके आस-पास से निकाला जाता है तब वह विशाल वृक्ष का रूप लेता है तथा उसका समुचित विकास होता है और पथिकों को छाया तथा फल देता है। कभी कोई वृक्ष अपना फल स्वयं नहीं खाता, वह ‘सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ जीवन पर्यन्त लगा रहता है। फल ताड़ने के लिए पेड़ पर पत्थर भी फेंके जाते हैं, पेड़ को चोट लगता है फिर भी वह पेड़ पत्थर के बदले फल ही देता है। ‘सर्वजनहिताय’ सेवा में उसका यह कार्य सतत् चलता रहता है, अनवरत और अवधगति से। सहनशीलता और परोपकार का इससे बड़ा उदाहरण कहीं नहीं मिलता।

सफेद रंग शान्तचित्त और ध्यानस्थ बगुले का गुण-धर्म होता है कि वह अपना शिकार ग्रहणकर, उदरस्त कर लेने के बाद पेड़ पर आराम से बैठ जाता है। बगुला जिस भी पेड़ पर बैठ जाता है उसे धीरे-धीरे वह नष्ट कर देता है, सुखा देता है। जिस पेड़ पर बगुला बैठा समझो वह गया। यह कहावत आम प्रचलन में है। सत्य भी यही है कि एक के बाद एक बहुत सारे बगुले उस पेड़ पर बैठने लगते हैं बैठने के बाद वे बीट करके उस पेड़ के पत्ते डाली सबको सुखा देते हैं। उनके बीट में ऐसा रसायन होता है जो पेड़ के सेहत को नुकसान पहुँचाता है। पेड़ की शोभा पत्तों और डाली से होती है। प्रारम्भ में जब बगुला पेड़ पर बैठता है तो देखने वाले को बहुत ही अच्छा लगता है हरे-हरे पत्तों के बीच में सफेद-सफेद शोभायमान बगुला महाराज। फिर वे बीट करने जायेंगे कहां बीट तो वहीं करेंगे जहाँ बैठेंगे, जहांँ उनका रहना-सहना है। गुण-अवगुध उसी को पता होगा जो संसर्ग में हैं। बेचारा पेड़ कुछ ही दिन बाद श्रीविहिन सा दिखता है क्योंकि उसपर वाग महाराज की कृपा हो जाती है, फिर तो उस पेड़ की जड़ों को लाख सींचने के बाद भी उसे बचाया नहीं जा सकता।

बगुला भगत की कथा आमतौर पर यही प्रचलित है कि वह अपने श्रेष्ठ लक्ष्य से तनिक भी ओझल नहीं हो सकता धवल एवं ध्यानस्थ मुद्रा तो उसका मात्र दिखावा होता है वह तो केवल आडम्बर है, पाखण्ड है, बगुला भगल समाज में मुहावरा बन गया है। बगुला भगत वृत्ति और प्रवृत्ति भी है, जो दिन प्रतिदिन अपने कुटुम्ब की संख्या बढ़ाते हुए, एक संस्कृति एवं परम्परा को जन्म दे चुके एक विशाल जन-समुदाय का रूप ले चुका है। यह युग अर्थप्रधान है, चेष्टा सबको अर्थ कामना की है इसी हेतु अनेक प्रकार के छल-छद्म, गोरखधन्धा, तोड़-जोड़, तिकड़म जैसे अनेक प्रकार के असामाजिक कार्य इस देश का नागरिक भी कर रहा है। उसने बस इसी सूत्र को जीवन में स्वीकार किया है कि ‘सर्व दुःख हरे लक्ष्मी’। उसका यही विचार बन गया है कि माया के बिना सब बेकार है, लोग शान से सीना ठोक कर कहते हैं कि लक्ष्मी की सवारी तो उल्लू ही होता है यदि कोई उल्लू भी कहे तो क्या फर्क पड़ता है, ‘टका नास्ति टकटकायते’। हाल बहुत बूरा है। धन कमाने की होड़ में आज का व्यक्ति ईमानदारी, नैतिकमूल्यों एवं सिध्दान्तों को ताक पर रख दिया है। इसलिए समाज में नैतिक मूल्यों का ह्रास एवं राष्ट्रीय चरित्र का न होना परिलक्षित हो रहा है। सब जगह लूट-खसोट, घूसखोरी, चोरी, बेईमानी, दिख रही है। इसी सोच के धनी लोग भ्रष्टाचार, मंहगाई और कालेधन को बढ़ावा दे रहे हैं। राष्ट्र रूपी विशाल वृक्ष पर बैठकर बगुला भगत की भाँति इसे सुखाने की पुरजोर कोशिश रहे हैं और अपने तर्क में हर ऐसा व्यक्ति यह कहते सुना जाता है कि जब देश का प्रधानमंत्री नेता नौकरशाह तथा जज तक सभी इसी राह पर चल रहे हैं तो आम आदमी की बात क्यों? संसद से सड़क तक बड़े-बड़े घोटालों की चर्चा होती है। विकिलिक्स के खुलासे और वोट की जगह नोट की चर्चा होती है फिर भी बेशर्मी ऐसी कि दूसरे घोटाले की तैयारी भी शुरू हो जाती है। जनता बेबस है, राजनेता मौज मारते हैं। जनता का भी जहाँ जैसा स्वार्थ सधता है वह अपने स्वार्थ से परे न सोच कर अपनी पसन्द-नापसन्द के अनुसार अपना पक्ष तय करती है। समाज से ही निकलकर बगुला भगत संसद तक विधान सभा तक जाते हैं। इसके लिए उन्हें बड़े पापड़ बेलने पड़ते हैं। उन्हें अपनी एक लम्बी लॉबी तैयार करनी पड़ती है, जिसमें वे एक दूसरे के पूरक होते हैं। जिसकी लॉबी की शृंखला जितनी लम्बी हो या दूसरे शब्दों में कह सके तो लॉबी तगड़ी हो वह अपने कुटुम्ब, समाज, संस्था, पार्टी पर दबाव बना लेता है। वह जहाँ से खड़ा होता है वहीं से पंक्ति शुरू होती है। लोग उसे सक्षम मानते हैं। समाज एवं राष्ट्र जीवन में सब जगह उसकी स्वीकारोक्ति होती है। इस वर्चस्व की जंग में जातिवाद, क्षेत्रवाद, वंशवाद, तथा व्यक्तिवाद का फण्डा भी खूब चल रहा है। आज बाजारवाद के प्रभाव ने हर क्षेत्र में अपना प्रभाव जमाया है, नकली ने असली को पीछे धकेल दिया है।

सदियों के सतत् संघर्ष और अप्रतिम बलिदान के बाद स्वराज्य का आगमन लोकतंत्र के मन्दिर के रूप में प्रतिष्ठित हुआ लोग सोचने लगे कि अब अपने राज में सुख चैन होगा लेकिन हमारे राजनेता लोकतंत्र को अपने अमर्यादित आचरणों से अनेकों बार कलंकित किए, घोटालों एवं भ्रष्टाचार से विश्व पटल पर देश की नाक कटी। नोट के बदले वोट की गोट ने लोकतंत्र के माथे पर एक बदनुमा दाग लगा दिया तथा एक काले अध्याय की शुरूआत हुई। ऐसा नहीं है कि यह घटना 22 जुलाई, 2008 में ही घटी, बहुत पहले से ही ऐसी खरीद फरोक्त की घटनाएं चोरी-छिपे चलती रही है। यह बहुत पुराना खेल है। इसलिए राष्ट्रहित में देश की जनता को बगुला भगत से सावधान रहना है, सज्जन शक्ति के जागरूकता से ही राष्ट्र का भला होना है। राष्ट्ररूपी वृक्ष को पुर्नजीवन देने हेतु राष्ट्रवादी समाज को भ्रष्टाचार मिटाने हेतु कृतसंकल्प होना होगा यह कार्य इतना आसान नहीं इसे एक लम्बे संघर्ष के साथ ही समाप्त किया जा सकता है, इसके लिए देश के प्रत्येक नागरिक को अपना मन बनाना होगा।

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