लेखक परिचय

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

वामपंथी चिंतक। कलकत्‍ता वि‍श्‍ववि‍द्यालय के हि‍न्‍दी वि‍भाग में प्रोफेसर। मीडि‍या और साहि‍त्‍यालोचना का वि‍शेष अध्‍ययन।

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-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी

हिन्दी का साहित्य संसार करवट बदल रहा है, धड़ाधड़ हिन्दी लेखिकाएं अपनी आत्मकथा लिख रही हैं, कहीं ये कथाएं अंशों में आ रही हैं तो कहीं किताब के रूप में। यह हिन्दी की नयी बदलती स्थिति है। हिन्दी में स्त्री आत्मकथा का लंबे समय से अभाव रहा है। हिन्दी के आलोचकों के लिए यह एकदम नयी परिस्थिति है। हिन्दी की आलोचना मर्द की आत्मकथा की अभ्यस्त रही है, उसे स्त्री की आत्मकथा में कभी दिलचस्पी नहीं रही, स्थिति यह रही है कि हिन्दी भाषी लेखिकाएं परिवार की रक्षा के नाम पर लिखने तक से परहेज करती रही हैं, ऐसे में स्त्री आत्मकथा का बाजार में आना सचमुच में सुखद और ऐतिहासिक घटना है।

स्त्री आत्मकथा को मर्द आत्मकथा की तरह न तो लिखा जाता है और न पढ़ा जाता है। स्त्री आत्मकथा एक स्वतंत्र विधा रूप है। यह प्रचलित मर्द आत्मकथा से बुनियादी तौर पर भिन्ना विधा है। स्त्री आत्मकथा कभी पूरी नहीं होती, हमेशा अधूरी होती है। स्त्री आत्मकथा लिखती ही है तब जब वह अपने अव्यक्त को व्यक्त करना चाहती है, निजी को सार्वजनिक करना चाहती है, ऐसे में वह व्यक्तिगत को सामाजिक बनाती है, सामाजिक को बताने और बुनने में उसकी ज्यादा दिलचस्पी नहीं होती। सामाजिक को आप अन्य के द्वारा भी जान सकते हैं किंतु स्त्री के व्यक्तिगत को सिर्फ स्त्री आत्मकथा में ही जान सकते हैं। स्त्री अपनी आत्मकथा में स्वयं की और अपनी छाया की अनेक उलझी परतों को खोलती है, ये ऐसी परतें हैं जो विवादों को जन्म देती हैं, अनेकार्थी व्याख्याओं को जन्म देती हैं। स्त्री आत्मकथा में कही गयी बातों, मसलों आदि के एकाधिक समाधान भी उपलब्ध होते हैं, किंतु स्त्री को आत्मकथा में समाधान की तलाश नहीं होती बल्कि वह अपनी पहचान की खोज और अपनी निजता को व्यक्त करने के लिए लिखती है।

स्त्री आत्मकथा पूरी नहीं होती बल्कि अधूरी होती है। स्त्री की आत्मकथा कभी पूरी नहीं हो सकती, उसकी कहानी के खासकर निजी कहानी के अनेक अंश बेबाकी और बहादुदाराना दावों के बावजूद सामने नहीं आते, यही वह बिंदु है जहां से हमें स्त्री आत्मकथा को पढ़ना चाहिए, स्त्री आत्मकथा और पुरूष आत्मकथा में बुनियादी अंतर यह है कि पुरूष को वस्तुगतता पसंद है, स्त्री को निजता पसंद है, स्त्री वस्तुगतता को अस्वीकार करती है, निज के भावों और अनुभवों को पेश करने में उसकी दिलचस्पी ज्यादा होती है।

स्त्री आत्मकथा को कल तक पश्चिमी विधा माना जाता था, वैसे ही जैसे उपन्यास को माना जाता था, हिन्दी की स्त्री लेखिकाओं की आत्मकथाओं के आने से स्त्री साहित्य का संसार ही नहीं साहित्यिक आलोचना का संसार भी बदलेगा। स्त्री आत्मकथा इसलिए नहीं लिखती कि उसे निजी जीवन की बातें बतानी हैं और पाठकों को पढ़ना है, स्त्री आत्मकथा पाठ नहीं बल्कि आन्दोलन है। स्त्री आत्मकथा आन्दोलन की तरह है, यह सतह पर राजनीतिक आंदोलन की तरह नहीं है, बल्कि व्यवहार में किया गया आंदोलन है। स्त्री आत्मकथा का निशाना विचार नहीं मनुष्य का व्यवहार होता है। स्त्री आत्मकथा के सामाजिक प्रभावों के बारे में हमने कभी सोचा ही नहीं, क्योंकि हमारे यहां स्त्री आत्मकथा लिखी ही नहीं गयी, अब लिखी जा रही है तो इसके सामाजिक प्रभावों के बारे में भी सोचना चाहिए।

स्त्री आत्मकथा के प्रभाव का क्षेत्र सामाजिक संस्कार, आदतें और एटीट्यूटस होते हैं। वह अपने अनुभव से बदलने की सीख देती है। मजेदार बात यह है कि हमारे यहां मर्द के ‘स्व’ का काफी लंबा चौड़ा साहित्यिक आख्यान मिलेगा, प्रत्येक विधा में इस मर्द आख्यान की महिमा का वर्णन मिलता है, किंतु स्त्री के ‘स्व’ पर स्त्री के नजरिए से न तो कभी लिखा और न सोचा ही गया है। स्त्री का ‘स्व’ मर्द के ‘स्व’ से भिन्ना होता है। मर्द के ‘स्व’ को देखने के जो पैमाने प्रचलन में हैं,वे स्त्री के ‘स्व’ को उद्धाटित करने में हमारी मदद नहीं करते, मर्द के लिए ‘स्व’ एक विषय है, जबकि स्त्री के लिए ‘स्व’ विषय नहीं है, पाठ नहीं है। बल्कि उसकी अस्मिता है,लिंगीय पहचान है, अनुभूति है। मर्द के यहां विषय बोलता है, व्यक्ति बोलता है। वस्तुगतता पर जोर होता है। मर्द अपनी आत्मकथा में आत्मस्वीकृति (कनफेशनल मोड़) की पध्दति का इस्तेमाल करता है, उसका अकादमिक महत्व भी होता है। जबकि स्त्री के यहां ऐसा नहीं होता, स्त्री के यहां आत्मकथा का पांडित्य प्रदर्शन से कोई संबंध नहीं है। स्त्री को वस्तुगत प्रस्तुति से चिढ़ है, वस्तुगत प्रस्तुति के नाम पर साहित्यिक परंपरा में हमेशा स्त्री की अभिव्यक्ति को ही कुचला गया है। अथवा उसे प्रस्तुति योग्य ही नहीं समझा गया। स्त्रीवादी साहित्य परंपरा में आत्मकथा का सचेत रूप से विकास किया गया है, उनके यहां स्त्री आत्मकथा को गंभीरता से लिया जाता है।

प्रभाखेतान की आत्मकथा ‘अन्या से अनन्या’ में कई महत्वपूर्ण विधागत चीजें हैं जिनका ख्याल रखा गया है, मसलन् लेखिका ने अपने परिवार, सामाजिक परिवेश, संस्कृति, मारवाड़ी जाति और पश्चिम बंगाल के परिवेश के बहाने बंगाली जाति के बारे में भी अपने व्यक्तित्व के रिश्तों को खोला है। इसके कारण यह आत्मकथा अनजाने ही एंथ्रोपॉलोजिकल दिशा में चली गई है। प्रभा खेतान ने जिन क्षेत्रों का विस्तार से आख्यान विकसित किया है उसमें पढ़ते हुए हम जब डा. सर्राफ और उनके बीच के आख्यान को बारीकी से पढ़ते हैं तो ये हिस्से डिसटर्ब करते हैं, पाठक को तनाव में ले जाते हैं, मर्दवादियों को इनमें कुछ निंदा की गंध भी मिल सकती है। किंतु ‘अन्या से अनन्या’ का लक्ष्य किसी की निंदा करना अथवा चरित्र हनन करना नहीं है। यह नितांत व्यक्तिगत वृत्तान्त है, सामाजिक वृत्तान्त है, एक ऐसा वृत्ताान्त है जो घट चुका है, किंतु लिखा अब गया है, यह ऐसा यथार्थ है जिसमें कल्पना की गुंजाइश नहीं है, स्त्री आत्मकथा इसी अर्थ में यथार्थ अनुभवों पर टिकी होती है। उसमें कल्पना और भाषायी अतिरेक नहीं होता। स्त्री आत्मकथा इस अर्थ में भी अलग है कि इसमें बहुत कुछ ऐसा भी है जो अवचेतन का हिस्सा रहा है।

प्रभाखेतान अपनी आत्मकथा में अभिव्यक्त नहीं करती, बल्कि उद्धाटित करती है। स्त्री सैध्दान्तिकी के मुताबिक स्त्री को आत्मकथा लिखने की जरूरत अपनी अभिव्यक्ति के लिए पड़ी बल्कि स्त्री आत्मकथा का लक्ष्य होता है उद्धाटन करना। यह उद्धाटित करने वाला गद्य है। यहां आत्मकथा का पांडित्य में विलय देखा जा सकता है। जो व्यक्तिगत अभिव्यक्ति है वह धीरे-धीरे उद्धाटन की शक्ल ले लेती है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो औरत अभिव्यक्त नहीं उद्धाटित करती है। निबंध और कहानी की मिल-जुली शैली में ‘अन्या से अनन्या’ को लिखा गया है। ‘अन्या से अनन्या’ में कई रणनीतियां एक साथ लागू की गई हैं। यहां मनोविज्ञान की रणनीतियां हैं तो साथ ही द्वि-स्तरीय अभिव्यक्ति के रूप भी हैं, प्रभाखेतान एक औरत है, परनिर्भर औरत है, भावनात्मक रूप से डा.सर्राफ पर निर्भरता है साथ ही इसका भिन्ना रूप भी है, यानी परनिर्भर औरत के अंदर से आत्मनिर्भर औरत की रणनीतियां भी उभरती नजर आती हैं, यह चेतना के स्तर पर जो द्वि-स्तरीयबोध है, यही स्त्री आत्मकथा का सबसे मजबूत तत्व भी है। युवा प्रभा के जीवन के मन, बचपन में यौन शोषण और बाद में गर्भपात का जिक्र आना, ये अवचेतन की रणनीतियां हैं। आत्मकथा यथार्थ अनुभव से गुजरते हुए अचानक अवचेतन की ओर मुड़ जाती है। स्त्री आत्मकथा में अवचेतन का आना स्वस्थ लक्षण है। स्त्री साहित्य को इस फिनोमिना की अभिव्यक्ति से अपनी पहचान मिलती है।

‘अन्या से अनन्या’ का आख्यान डा. सर्राफ और प्रभा के बीच में चलता है, यह मूलत: उन्हीं की कहानी भी है ये दोनों किताब का अच्छा-खासा हिस्सा घेरते हैं। इस आत्मकथा को लिखा है प्रभा ने, किंतु इसमें डा.सर्राफ की आवाजें भी चली आई हैं। सतह पर ये ही दो मुख्य आवाजें हैं उन्हीं का आख्यान है इसे हम प्राइवेट कार्य व्यापार भी कह सकते हैं,किंतु स्त्री का आख्यान इसे प्राइवेट अथवा दो के बीच की चीज नहीं रहने देता। प्रभा अपने बचपन से लेकर जवानी तक के जिस अन्तर्विरोध और द्वंद्व की विस्तार से चर्चा करती है उसके कारण सामाजिक का जन्म लेता है, प्राइवेट जन्म नहीं लेता। प्राइवेट को आप छिपाते हैं, किंतु इस किताब को पढ़कर आप छिपाते नहीं हैं बल्कि पाठक को अनेक बार यह महसूस होता है कि यह तो मैं भी जानता हूँ, मेरे साथ भी ऐसा हुआ है। प्रभा का गुस्सा, कुंठा, अवसाद, दुख, सफलता और आत्मनिर्भरता आदि के प्राइवेट ब्यौरे अंतत: किसी भी चीज को प्राइवेट नहीं रहने देते। आप इन्हें प्राइवेट ब्यौरे मानकर पढ़ भी नहीं सकते। ये ऐसे प्राइवेट ब्यौरे हैं जो सामाजिक ब्यौरों को हजम कर रहे हैं।

प्रभा का आत्मकथा में पब्लिक और प्राइवेट का कहानी के रूप में सतह पर विभाजन मिलेगा, किंतु वास्तव में ये दोनों ही एक-दूसरे की जगह लेते नजर आते हैं। मसलन् डा. सर्राफ का चुम्बन लेना प्राइवेट क्रिया है किंतु चुम्बन लेते ही यह प्राइवेट नहीं रह जाता बल्कि सार्वजनिक संकट को पैदा करता है। प्रभा को यह क्षण बदल देता है। उसकी सामाजिक और मानसिक अवस्था को गुणात्मक तौर पर बदल देता है।

प्रेम एक निजी अथवा प्राइवेट कार्य व्यापार है, किंतु जब आप एक बार इस प्राइवेट क्षेत्र में दाखिल हो जाते हैं तो वह सार्वजनिक का स्थान ग्रहण कर लेता है। मर्द मीमांसा ने प्राइवेट और पब्लिक में भेद करके रखा है, वे प्राइवेट को प्राइवेट और सार्वजनिक को सार्वजनिक ही बनाए रखना चाहते हैं, इसी रूप में साहित्य की आलोचना भी लिखी जाती रही है। किंतु स्त्री के दाखिल होते है सबवर्सिव क्रिया शुरू हो जाती है। प्राइवेट प्राइवेट नहीं रहता, सार्वजनिक सार्वजनिक नहीं रहता, इस संदर्भ में पुराना विभाजन खत्म हो जाता है। स्त्री जो जैसा है उसे वैसा नहीं रहने देती, इसी अर्थ में ‘अन्या से अनन्या’ में सबवर्जन चलता रहता है। पूरी आत्मकथा सबवर्सिव भाव की अभिव्यक्ति है, इसमें तिथियों और विचारों का महत्व नहीं है, बल्कि रवैयये और एटीटयूट को ज्यादा तवज्जह दी गयी है। मर्द की आदतों को निशाना बनाया गया है।

मर्द की आदतों की हमने कभी समीक्षा नहीं की, हमारे माक्र्सवादियों के लिए साहित्य में मूल्य महत्वपूर्ण रहा है, स्त्रीवादी विचारकों को साहित्य को मूल्य के रूप में देखने वाली दृष्टि स्वीकार नहीं है उनके लिए साहित्य अनुभूति और स्त्री का द्वंद्व है, कभी इन दोनों में विभाजन भी नजर आता है। ‘अन्या से अनन्या’ में प्रभा का गुस्सा केन्द्र में नहीं है बल्कि प्रेम केन्द्र में है, अंत तक प्रेम की चाह और सिर्फ चाह ही इसकी केन्द्रीय धुरी है। यह प्रेम के प्रति न्याय की तलाश में लिखी गयी आत्मकथा है। ‘अनन्या से अनन्या’ के जगत का अनुभव पाठ में नहीं है बल्कि पाठ के बाहर है। इस किताब को पाठात्मक अनुभव के रूप में नहीं पढ़ा जाना चाहिए। ये साठ साल की औरत के अनुभवों का एक हिस्सा है, इसे प्रभा के साठ साल का समग्र समझने की भूल भी नहीं करनी चाहिए।

यह ऐसी आत्मकथा है जिसमें हिन्दी जाति की पहचान भी निहित है। इस आत्मकथा में लेखिका ने चिर-परिचित सांस्कृतिक-राजनीतिक संदर्भों का इस्तेमाल किया है इसे आप सहज रूप में पढ़ सकते है, इसे प्रामाणिक मान सकते हैं। चिर-परिचित संदर्भ ही हैं जो इसे प्रामाणिक बनाते हैं। ‘अन्या से अनन्या’ की एक विशेषता यह है कि इसमें संवाद की शैली का इस्तेमाल किया गया है। लेखिका संवाद करती हुई मिलती है। वह डा.सर्राफ से संवाद करती है, बहन गीता से संवाद करती है, दाई से संवाद करती है, मॉ से संवाद करती है, अमेरिकी, जर्मन लोगों (स्त्री-पुरूष दोनों) से संवाद करती है, अपनी सहेलियों और पुरूष मित्रों से संवाद करती है, यही संवाद है जो इस आत्मकथा को संप्रेषणीय और पाठक को शिरकत करने के लिए मजबूर करता है। संवाद के कारण ही पाठक तनाव,आनंद, गुस्सा ,और घृणा का आनंद लेता है। इसके अलावा ‘अन्या से अनन्या’ में प्रभा की कहानी से पाठक का पूरी तरह जुड़ता है, प्रभा की कहानी के साथ अपने को जोड़ता भी है। यह टोटल आइडेंटीफिकेशन ही इस आत्मकथा के शिल्प की विशेषता है। आरंभ में यह एक प्रेम कहानी लगती है किंतु बहुत ही जल्दी प्रेम कहानी को फ्रस्टेशन अथवा कुंठा आकर घेर लेती है,कुंठा को परिवार का ढांचा घेर लेता है और अंत में इन सबका अतिक्रमण करते हुए कहानी में प्रभा की आवाज सुनाई पड़ने लगती है। प्रभा का सशक्त रूप उभरकर सामने आता है,पता ही नहीं चलता कि कुंठा,निराशा,दुख,परिवार और प्रेम कहां गायब हो गए। यही वह बिंदु है जहां स्त्री आत्मकथा अपनी स्वतंत्र पहचान बनाती है, स्त्री की पहचान,उसका सशक्तिकरण ही उसका प्रधान लक्ष्य होता है।

स्त्री आत्मकथा में द्वैत का होना अनिवार्य है और वह यहां भी है। एक वह इमेज है जिसे स्त्री स्वयं देख रही है, दूसरी वह इमेज है जिसे अन्य देख रहे हैं। स्त्री का स्वयं को देखना ‘मैं’ को देखना है, जो उसका आदर्श है, स्त्री का ‘आत्म’ के रूप में देखना और कालान्तर में आत्म का ‘आत्मनिर्भर’ में रूपान्तरण हो जाना, उसके वर्चस्व की स्थापना का संकेत है। स्त्री आत्मकथा में ‘स्व’ और ‘अन्य’ एक ही साथ होते हैं। इसी अर्थ में इस किताब में जो ‘स्व’ है वह ‘अन्या’ में तब्दील हो जाता है। ‘स्व’ का ‘अन्या’ में रूपान्तरण धीरे-धीरे होता है, कहानी का ज्यों-ज्यों विकास होता जाता है, ‘स्व’ का लोप हो जाता है और उसकी जगह ‘अन्या’ ले लेती है। यही लाकां यहां ” मिरर स्टेज” है। इस लाकांनियन पध्दति का लेखिका ने बडे ही कौशल के साथ इस्तेमाल किया है।

प्रभा खेतान ने वर्जीनिया वुल्फ की लेखन शैली का इस्तेमाल करते हुए अवचेतन के रूपों को भी सामने रखा है। बाल यौन शोषण और जवानी के यौन कष्टों को अवचेतन के हिस्सों के रूप में पढ़ा जाना चाहिए, इसमें वह बार-बार स्त्री की नियति और परंपरागत अवस्था पर लेखिका ध्यान खींचती है। ‘स्त्रीत्व’ की चर्चा करते हुए वह ‘अन्या’ में तब्दील हो जाती है। अपने आख्यान में उन तमाम चीजों को लाना चाहती है जो उसकी भूमिका और नजरिए से जुड़े हैं। पश्चिम बंगाल से लेकर अमेरिका तक के व्यापक दायरे के विस्तृत ब्यौरे किताब में उपलब्ध हैं। इसके अलावा ‘फ्रेगमेंटेड स्मृति’ का रूप कृति में हावी दिखाई देता है, किताब दूसरे पैराग्राफ से अमेरिका से शुरू होती है फिर अचानक कलकत्ता चली आती है काफी समय पाठक कलकत्ता में विचरण करता है फिर हठात पाता है कि वह वापस अमेरिका लौट जाता है। लेखिका की स्मृति में जो बातें आती रही हैं उन्हें उसी क्रम में पेश कर दिया गया है। इसमें क्रमश: चीजें पेश करने की पध्दति का निषेध अभिव्यक्त हुआ है। परंपरागत आत्मकथा के तमाम तत्वों को एकसिरे से त्याग दिया गया है। कुछ लोगों को ‘अन्या से अनन्या’ में आत्मस्वीकृति (कनफेशन्स) का भाव दिखाई दे सकता है,सतह पर लेखिका ऐसा आभास भी देती है, जबकि वास्तविकता यह है कि ‘अन्या से अनन्या’ आत्मस्वीकृति नहीं स्वयं के खिलाफ दी गयी गवाही है,यही इसकी आयरनी है। लेखिका बार-बार इस तथ्य की तरफ ध्यान खींचती है कि हमारे समस्त कार्यकलाप संस्थान निर्भर हैं। लेखिका जब अपने खिलाफ गवाही दे रही होती है तो वे हिस्से ऐसे हैं जिनकी अनेक तरह से व्याख्या संभव है। ये हिस्से व्याख्या के लिए खुले हैं। ये हिस्से अनेक किस्म की व्याख्याओं को जन्म देते हैं। अनेक किस्म की व्याख्याएं ही हैं जो स्त्रीवादी साहित्य की संपदा हैं। स्त्री साहित्य को एक व्याख्या की नहीं अनेक व्याख्याओं की जरूरत है। स्त्रीवादी नजरिए व्याख्या में बहुलतावाद को जन्म देता है, उसका संरक्षण करता है। इसे ‘अवचेतन व्यक्तिवाद’ कहते हैं। इसमें ‘स्व’ पर फोकस रहता है। इसका अंतर्निहित संदेश है, तुम समाज को नहीं बदल सकते। तुम सिर्फ स्वयं को बदल सकते हो। इसमें व्यक्तिगत निष्क्रियता का भाव सक्रिय रहता है, इस तरह की प्रस्तुतियां राजनीतिक एक्शन और सामाजिक परिवर्तन के लिए उदबुद्ध नहीं करतीं।

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1 Comment on "स्त्री आत्मकथा के अनुत्तरित सवाल"

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पंकज झा
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बहुत अद्भुत एवं प्रवाह्पूर्ण लेखन है ‘अन्या से अनन्या.’ लेकिन उसे पढते हुए और बार बार डॉ. सर्राफ से स्वाभाविक नफरत ही होता है पाठक को. बस उसमे महज़ एक बात समझ में आने योग्य नहीं है लेखिका जिंदगी भर एक अधेर द्वारा शारीरिक और भावनात्मक शोषण का शिकार होती रही. लांछित और पीड़ित भी रही जिंदगी भर बिना कुछ पाए. तो ऐसी कोई लेखिका किसी और को शसक्तिकरण की सीख क्या दे सकती है जब वो खुद स्वयं को immotional blakmail होने से नहीं बचा पाती?

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