लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

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bhrashtacharडॉ. मधुसूदन

प्रवेश:
==>सकल राष्ट्रिय उत्पाद” संयुक्त-राष्ट्र-संघ सूची भारत ९ वाँ क्रम।
==>पर “भ्रष्ट भारत” की प्रतिष्ठा क्रम फिसल कर ९४ वे क्रम पर (लज्जा का विषय )
==>भारत “धनी देश”-पर नागरिक निर्धन हैं”
==>घूस रहित शीघ्रता से–> शीघ्र विकास–> शीघ्र सुविधाएं –> कीमते गिरना –> सुविधाएं सस्ती —> देश में समृद्धि

(एक) चींटियाँ।
कभी आपने चींटियों को गुडका कण खींचकर ले जाते देखा है?
सारी की सारी चींटियाँ, मिल-जुल कर, उस गुड के दाने को एक ही दिशा में खींचकर ले जाती है।
ऐसा नहीं होता, कि, चींटियाँ उस गुड को अपनी अपनी दिशा में खींचते खींचते चली हो।
दुःख की बात है, जो ज्ञान इन चींटियों को है, वो, हमारे अपने देशभक्त नेतृत्व को नहीं है।

(दो)जनता ने देश सेवा का वचन लेकर इन्हें नौकर रखा है।
पर ये नौकर चींटियाँ, (हाँ नौकर ही है आप की,) जिनपर गुड को सुरक्षित ढो कर, सभी के स्वामित्व का गुड, उचित भण्डार तक ले जाकर, संग्रहण करने का उत्तरदायित्व था, वे ही उस गुड को, अपने स्वामित्व का मान कर, मार्ग में ही खाती खाती जाती है। और यदि कोई उन्हें टोकता है, तो गुर्राती हैं। एक तो चोरी ऊपर से सीना जोरी ?
ऐसी भी चोरी की जाती है, कि, चींटियाँ गुड का थोडा थोडा अंश खा खा कर जब भण्डार तक पहुंचती है, तो गुड का दाना इतना छोटा हो जाता है, कि, स्पष्ट दिखाई भी नहीं देता। चौंकना नहीं, यदि कल सबेरे आप को १५ -२० चींटियाँ मार्ग में ही खडी खडी उस कण को खाती दिखाई दे।  और फिर नाम मात्र  कण बचाकर भण्डार तक पहुंचाएँ।कुछ चींटियाँ तो, उस गुड को सारा का सारा ऐसी चतुराई से, उछालकर किसी ’स्विस’ नामक  बॅन्क में जमा भी करवा देती हैं। हम भोले गाँव वालों को तो गाँव के बाहर जाने का टिकट खरिदने की क्षमता नहीं है;  तो, ये स्विस बॅन्क किस स्वर्ग में है, कैसे पता लगे?

(तीन)सिरमौर समस्या है, “भ्रष्टाचार”।
हमारी समस्याओं की सिरमौर समस्या है, “भ्रष्टाचार”। यदि इसीके कपाल पर वज्रांगबली का गदा-प्रहार किया जाए, तो, सारा भारत समृद्धि की ओर अग्रसर होने में देर नहीं होगी। पर, क्या ऐसा अग्रसर कहीं कोई प्रदेश हुआ भी है? हाँ, जी ऐसा गुजरात में हुआ है।
आप जानते तो होंगे, कि, भ्रष्टाचार कुटिलता से  काम में, विलम्ब कर ही पनपाया जाता है।
कर्मचारी विलम्ब ना  करें, तो घूस कहाँ से उगाहेगा? विलम्ब से घूस मिलती है। और घूस पाने के लिए विलम्ब का नाटक करता है। सारी भ्रष्टाचार प्रक्रिया मुख्यतः विलम्ब पर टिकी हुयी है।
(चार) शीघ्रता समृद्धि की जननी।
इससे उलटे, घूस रहित शीघ्रता, शीघ्र विकास करवाती है। शीघ्र विकास से शीघ्र सुविधाएं उपलब्ध होती है। बाजार में  अधिक सुविधाओं की आपूर्ति होने पर माँग के अनुपात में, आपूर्तियाँ अधिक होने से कीमते गिरती है।फिर जनता को सुविधाएं सरलता से कम मूल्य पर उपलब्ध होती है।

(चार)भ्रष्टाचारी की परिपाटी
भ्रष्टाचारी की परिपाटी काम में देरी कर जनता   को  उकताकर रिश्वत उगाहने की होती है।
इस देरी के कारण जितने भी विकास लक्ष्यी काम होते है, सब धीरे धीरे सम्पन्न होते हैं।
जहाँ दिन में आँठ काम निपटाए जा सकते थे, वहाँ दो ही काम यदि सफल  होते हैं, तो विकास की गति एक चौथाई  हो जाती है। देरी करने से घूस की मात्रा जहाँ बढ जाती है, वहाँ विकास की गति धीमी हो जाती है।
भारत में कर्मचारी घण्टो के अनुपात से वेतन पाता है। ८ घण्टे कार्यालय में, आराम करके, संध्या को घर और आराम करने चला जाता है। और ऐसे दोनों जगहों पर आराम करने का हराम में वेतन पाता है।
काम में जितनी देरी होगी, रिश्वत देने में जनता उतनी ही विवश होगी। इसी समीकरण को समझने से सारी प्रक्रिया समझमें आ जाएगी।

(पाँच) गुजरात में भ्रष्टाचार घटा है।
पर, गुजरात में भ्रष्टाचार पर्याप्त मात्रा में घटा कर, विकास हुआ है, अभी तो, केवल शासकीय भ्रष्टाचार के अंत मात्र से ही शीघ्र विकास हुआ है। छुट पुट भ्रष्टाचार, अशासकीय भ्रष्टाचार विशेष समाप्त हुआ है, ऐसा मैं नहीं मानता, न मेरे पास कोई आँकडे हैं। हमने  ६५ वर्षों में, भ्रष्टाचार को हमारी परम्परा में ढाल दिया है; इस में लेनेवाला, और देनेवाला दोनों सम्मिलित हैं, ऐसे परम्परित और परस्पर-पोषित भ्रष्टाचार को कैसे इतनी शीघ्रता से, समाप्त किया जाये?

(छः ) भ्रष्टाचार की समाप्ति असंभव ही मानी जाती थी।
भ्रष्टाचार समाप्त होगा, ऐसा मानने के लिए १०-१२ वर्ष पहले, कोई भी भारतीय तैयार नहीं था। हर कोई भ्रष्टाचार को बडी बडी गालियाँ देता, अपने को छोडकर सबकी निंदा करता, पर जब उसी को घूस पाने का अवसर आता, तो, विवशता जताकर, धन लेने में न हिचकता।हर कोई देनेवाला, भ्रष्टाचार को गालियाँ देता, पर स्वयं इतना घोर स्वार्थी था, कि लेते समय सब कुछ भूल जाता।
नव-नियुक्त अधिकारी नियुक्ति के पहले भ्रष्टाचार का घोर निंदक, पर वही नियुक्ति के बाद भ्रष्टाचारी बन जाता था। मेरे एक मित्र ने, ऊपर का, धन जोड कर, विवाह के हेतु, अपना वेतन बताया था।  ससुराल वालों को भी विशेष आपत्ति नहीं थी। क्यों कि भ्रष्टाचार परम्परा में ढल चुका था। उसने, अपना विवाह भी भ्रष्ट धन को पानी की भाँति बहाकर सम्पन्न किया।
एक मित्र बेटे को विश्व विद्यालय में, प्रवेश दिलाने के लिए कितनी घूस देनी पडी, इसी का बखान किसी स्वर्ण पदक विजेता की भांति गर्व से बताया करता था।

(सात) रूढि की  समाप्ति आज तक, युगान्तर-कारी अवतारों ने ही की है।
जब आप किसी व्यवहार को रूढि में रूपांतरित कर देते हैं, जिसका प्रचलन एक परम्परा बन जाता है। तो नदी के प्रवाह की भाँति फिर उस नदी में विपरित दिशा में तैरना बडा कठिन ही नहीं, असंभव हो जाता है।
सोचिए जहाँ, सभी गाडियाँ, दाहिनी ओर चल रही हैं, आप अपनी गाडी बाँई ओर कब तक चलाओगे?और चलाओगे, तो टकरा जाओगे। कोई भी यह भ्रष्टाचार समाप्त होगा ऐसा कुछ वर्ष पहले तक मानता नहीं था। चारो ओर निराशा ही निराशा थी। इतनी घोर, निराशा मैंने भी कभी अनुभव न की थी। मैं भी प्रामाणिकता से आशावादी न था।

(आँठ ) भ्रष्टाचार रूकनेकी अपेक्षा नहीं थी?
इस लिए,  मुझे आशा नहीं थी, कि रत्तीभर भ्रष्टाचार भी, कोई रोक पाएगा। पर कहीं पर ईश्वरी संकेत ही होगा, कि, गुजरात में बडी चाणक्य चतुराई से भष्टाचार पर अंकुश लाया गया है। ऐसी चतुराई से मैं अतीव प्रभावित हूँ। आज मात्र राम नहीं, पर राम की नैतिकता के साथ चाणक्य की चतुराई की महती आवश्यकता है। हमें चाहिए राम की नीतिमत्ता और चाणक्य की चतुराई। दोनों का मिश्रण चाहिए। केवल राम नहीं !केवल चाणक्य नहीं ! मेरे लिए यह किसी दैवी चमत्कार से कम नहीं है।

(नौ) बहुत कठिन है।
मोदीजी  को अपनी सज्जन छवि को बचाते हुए, सज्जनता से ही, दुर्जनों के पैंतरों को भाँपकर फिर उनको परास्त करना। जब शत्रुओं के पास सारी सुविधाए,यंत्रणाएं और शक्तियाँ हो, और सारी छद्म रीति-नीति का पथ्य भी ना हो;  यह और भी कठिन ही हो जाता है।
कितनी बार उनपर अनेकानेक अपराध मढे गए, अभी तक एक भी प्रमाणित नहीं हो सका।
एक ओर, अनथक रैलियाँ, दूसरी पक्ष में वरिष्ठों का आदर भी, सभी का सम्मान रखते हुए, और बोलना भी कहीं ना फिसलते हुए, इत्यादि  बहुत बहुत कठिन  उत्तरदायित्व हैं। धन्य है, कि, वें इसे सही सही निर्वाह कर रहें हैं। मोदी जैसी चतुराई,और चारित्र्य; शठं प्रति शाठ्यं, और पैंतरेबाजी की कुशलता; नेतृत्व, व्यक्तित्व और वक्तृत्व; मैं आज कहीं, नहीं देखता।यह अनुभव सिद्ध वास्तविकता है, भावनावश विधान नहीं।

(दस ) पर डर भी है।
– कि कहीं “लॅप-टॉप” के बदले  बिकाउ मतदाता अवसर ना खो दे?
–कि, तुष्टिकरण से जनता को लडाने वाली पार्टी कोई नया झुनझुना ना थमा दें?
–या तो, फिर लीक पर मतदान करने वाली जनता, कोई घपला ना कर दें?
–या भारतीय संस्कृति  द्वेष्टा  पार्टियाँ राष्ट्र-हित को अपने पक्ष स्वार्थों से कम ना तोल बैठें?
—पर सबसे बडा डर मुझे मिडीया का है, जिनका स्वामित्व परदेशी है?
—मिडिया जानता है, कैसे तर्क-कुतर्क देकर भोली जनता को उलझा सकता है।
—वही कुछ सिक्कों के लिए निष्ठा बेचकर, झूठी कहानियाँ फैलाकर राष्ट्र द्रोह ना कर बैठें।
—थोक मत बँक, जाति आधारित मतदान,
—-गुजरात के, बिजली चोर, जिनकी बिजली मोदी ने काटी थी, आज विरोधी हैं।
—-ऐसे बहुत समूह है, जिनका डर है।

(ग्यारह) भारत की प्रतिष्ठा का क्रम ।
दूसरी ओर, संसार भर में भारत का डंका बजानेवाले विवेकानंद, अरविंद, योगानंद इत्यादियों के नाम से जाना जानेवाला भारत आज अपनी प्रतिष्ठा खो चुका है।
जिस देशके आध्यात्म और नीति से संसार चकाचौंध था, उस भारत की प्रतिष्ठा फिसल फिसल कर निचले  ९४ वे क्रम पर पहुंच गयी है।  यह वैश्विक सर्वेक्षण के क्रम है। यु.एस.ए.(अमरिका) ११ वे क्रम पर है। गांधी जी, के देश के लिए इससे बडा अपमान क्या हो सकता है?

(बारह) “सकल राष्ट्रिय उत्पाद” क्रम।
उलटे भारत “सकल राष्ट्रिय उत्पाद” में संयुक्त राष्ट्र संघ की सूची में ९ वें क्रम पर है। वर्ल्ड बॅन्क के १० वे, इंटर्नॅशनल मॉनेटरी फण्ड का १० वाँ, सी. आय. ए. वर्ल्ड फॅक्ट बुक का भी १० वे क्रम पर हैं। कितने गौरव की बात है?और हमारा राष्ट्रीय धन जो स्विस बँक में जमा है, उसको जोडा जाए तो भारत में कोई गरीब या निर्धन हो ही नहीं सकता। कुछ अनुमान यही कह रहे हैं।

पर इसी लिए,  माना जाता है, भारत एक धनी देश है, जिसके नागरिक गरीब है।
जैसे ऊपर बताया, वैसे कुछ जानकार अनुमान करते हैं, कि, स्विस बॅंक में जमा काला धन यदि वापस लाया जाए, तो भारत में कोई भी गरीब ही नहीं बचेगा। तो यह काला धन किसका है? पर सुनता हूँ, कि, यह काला धन भी स्विस बॅंक से निकलवा कर कहीं और दक्षिण अमरिका के बनाना रिपब्लिक देशोमें जमा हो रहा है।

अब अषाढ चूकने का अवसर नहीं है। मोदी जी के हाथ सक्षम करें, जान ले, कि, यदि २७२ का आँकडा पार नहीं किया, तो, लिख के रखिए, आप मृत्यु तक पछताते रहोगे। सोचिए,  कैसे भारत को हम हमारी अगली पीढी को देकर जाना चाहते हैं?
शिव लिंग पर दूध का अभिषेक करना था। गाँव में घोषणा की गयी, पर बहुसंख्य ग्रामवासियों ने जल के ही लोटों में दो बूंद दूध डाल  शिव लिंग पर अभिषेक कर आए। सारा जलाभिषेक ही हो गया।

फिर पछताए कुछ नहीं होगा, जब चुनाव की चिडीया खेत चुग जाएगी। हमें २७२ का आँकडा पार करना ही होगा। नहीं तो अन्य साथी पार्टियाँ अडंगे लगाती रहेगी। शीघ्र विकास होने नहीं देंगी।
जय हिंद-जय भारत।

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1 Comment on "हमारा महाकाय राष्ट्रीय कलंक, भ्रष्टाचार"

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Dr. Chandra P Trivedi
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चन्द्रा पी. त्रिवेदी पूर्व वरिष्ठ अध्येता, स्ंस्कृति विभाग, भारत सरकार, नई दिल्ली। पूर्व प्राचार्य, स्नातकोत्तर महाविद्यालय, भिण्ड म.प्र. 41 एम आई जी विक्रम नगर, रतलाम 9479720428 प्रति, महामहिम माननीय श्री प्रणब मुखर्जी, राष्ट्पति, भारत सरकार नई दिल्ली विषय- प्राणोत्सर्ग महापर्व अनुमति । माननीय राष्ट्पति महोदय, अत्यंत विनम्रता के साथ कष्ट के लिए क्षमा प्रार्थी हूॅं । विष्व मे चेतना की खोज हेतु वैज्ञानिक दिन-रात कार्य कर रहे है, करोडो डालॅर के व्यय के बाद भी जीव चेतना का स्रोत अज्ञात है। भारत मे यह कार्य बिना व्यय कल्पना के परे है । इसका हल वैज्ञानिक प्रमाण सहित प्रस्तुत किया है।… Read more »
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