लेखक परिचय

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री

जन्म लखनऊ में, पर बचपन - किशोरावस्था जबलपुर में जहाँ पिताजी टी बी सेनिटोरियम में चीफ मेडिकल आफिसर थे ; उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान में स्नातक / स्नातकोत्तर कक्षाओं में अध्यापन करने के पश्चात् भारतीय स्टेट बैंक , केन्द्रीय कार्यालय, मुंबई में राजभाषा विभाग के अध्यक्ष पद से सेवानिवृत्त ; सेवानिवृत्ति के पश्चात् भी बैंक में सलाहकार ; राष्ट्रीय बैंक प्रबंध संस्थान, पुणे में प्रोफ़ेसर - सलाहकार ; एस बी आई ओ ए प्रबंध संस्थान , चेन्नई में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर ; अनेक विश्वविद्यालयों एवं बैंकिंग उद्योग की विभिन्न संस्थाओं से सम्बद्ध ; हिंदी - अंग्रेजी - संस्कृत में 500 से अधिक लेख - समीक्षाएं, 10 शोध - लेख एवं 40 से अधिक पुस्तकों के लेखक - अनुवादक ; कई पुस्तकों पर अखिल भारतीय पुरस्कार ; राष्ट्रपति से सम्मानित ; विद्या वाचस्पति , साहित्य शिरोमणि जैसी मानद उपाधियाँ / पुरस्कार/ सम्मान ; राजस्थान हिंदी ग्रन्थ अकादमी, जयपुर का प्रतिष्ठित लेखक सम्मान, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान , लखनऊ का मदन मोहन मालवीय पुरस्कार, एन सी ई आर टी की शोध परियोजना निदेशक एवं सर्वोत्तम शोध पुरस्कार , विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अनुसन्धान अनुदान , अंतर -राष्ट्रीय कला एवं साहित्य परिषद् का राष्ट्रीय एकता सम्मान.

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-डा. रवीन्द्र अग्निहोत्री-    english

हाल ही में देश में अंग्रेजी से संबंधित एक अभूतपूर्व घटना घटी. वैसे तो हमारे देश में जो भी घटना घटती है वह अभूतपूर्व ही होती है. संसद और विधान सभाएं तो ऐसी घटनाओं के लिए “दुर्घटना संभावित क्षेत्र“ जैसी ख्याति अर्जित कर चुकी हैं. लिम्का बुक वाले चाहें तो उन्हें अपने रिकार्ड के लिए वहां भरपूर सामग्री मिल सकती है. यहां जिस घटना का जिक्र किया जा रहा है, वह एक नहीं, कई दृष्टियों से अभूतपूर्व है. हुआ यह कि एक अंतर-मंत्रालयी बैठक में हमारे वित्त मंत्री चिदंबरम साहब ने शहरी विकास सचिव सुधीर कृष्ण को झिड़कते हुए कहा कि आपकी अंग्रेजी मेरी समझ में नहीं आती. आप हिंदी में बोलिए जिसका अनुवाद करके मेरे अधिकारी मुझे अंग्रेजी में समझा देंगे.  

सुधीर कृष्ण एम एस-सी (फिजिक्स) हैं, एम ए (पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन) हैं, पी-एच डी हैं. दूसरे शब्दों में, उनके पास भारतीय विश्वविद्यालयों की दी हुई ऐसी कई अधिस्नातक डिग्रियां हैं जो बिना अंग्रेजी के नहीं मिलतीं. वे आई ए एस हैं जो अत्यंत प्रतिष्ठित नौकरी मानी जाती है. आज तो आई ए एस की परीक्षा और साक्षात्कार भारतीय भाषाओं में देने की अनुमति मिल गई है, पर 1977  में जब वे आई ए एस बने, तब यह अनुमति नहीं थी. तब साक्षात्कार केवल अंग्रेजी में होता था. श्री सुधीर कृष्ण मूलरूप से उत्तर प्रदेश के निवासी हैं, पर आई ए एस की नौकरी में कर्नाटक कैडर में रहे. अतः उन्होंने कन्नड़ भाषा भी सीखी. इससे पता चलता है कि भाषा सीखने में वे पीछे नहीं रहे. अन्य आई ए एस अफसरों की तरह उन्होंने भी विभिन्न पदों पर काम किया, क्रमशः पदोन्नत होते हुए सचिव स्तर तक पहुंचे और अब जून में रिटायर होने वाले हैं. इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए यह माना जा सकता है कि शिक्षा के दौरान ही नहीं, आई ए एस में प्रवेश से लेकर पदोन्नति के हर सोपान पर उन्होंने अंग्रेजी की बाधा पार की, इसके बावजूद अगर उनकी अंग्रेजी कमजोर है तो क्या इससे यह बात प्रमाणित नहीं होती कि विदेशी भाषा कितनी भी पढ़ ली जाए, उस पर अधिकार नहीं हो सकता ?

चिदंबरम साहब की गिनती हमारी वर्तमान सरकार के “सुशिक्षित“ लोगों में होती है. कुछ लोग कहते हैं कि उनकी शिक्षा-दीक्षा हारवर्ड (अमरीका) में हुई, शायद इसीलिए उनकी अंग्रेजी भी अलग तरह की होगी. बात गलत तो नहीं है, पर पूरी तरह सच भी नहीं है, क्योंकि उनकी स्कूली और यूनिवर्सिटी शिक्षा तो तमिलनाडु में हुई, एम बी ए उन्होंने हारवर्ड से किया. अतः यह बिलकुल संभव है कि प्रबंधन के गुर सीखने के साथ उनकी अंग्रेजी भी सुधर गई हो. पर हर आदमी तो हारवर्ड नहीं जा सकता.

तो बात हो रही थी चिदंबरम साहब की झिड़की की. बात झिड़की पर खत्म नहीं हुई, बल्कि वहां से शुरू हुई. सचिव महोदय चिदंबरम से तो शिष्टाचारवश कुछ कह नहीं पाए, पर शांत भी नहीं बैठे. बात दूसरे सचिवों की उपस्थिति में कही गई थी. अतः  उनके आत्मसम्मान को कुछ ज्यादा ही ठेस लगी. उन्होंने अपने मंत्री कमलनाथ को पत्र लिखा जिसमें चिदंबरम के दुर्व्यवहार की शिकायत करके अपनी भड़ास निकाली. पहले का कोई उदाहरण याद नहीं आता जब किसी  अफसर ने सरकार के दिग्गज मंत्री की शिकायत की हो और वह भी लिखकर.

पर शायद वे जानते थे कि जिससे शिकायत कर रहा हूं, वह कुछ कर नहीं पाएगा . अतः उन्होंने उसी पत्र में यह अनुरोध किया कि समुचित कारर्वाई के लिए यह बात प्रधानमंत्री जी के संज्ञान में लाई जाए. उन्होंने “समुचित कारर्वाई“ के लिए प्रधानमंत्री जी पर भरोसा कैसे कर लिया, यह तो वे ही जानें, पर उनके मंत्री महोदय ने उनके अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह शिकायत प्रधानमंत्री जी के पास भेज दी. अब यह तो पता नहीं कि “मेरी खामोशी अच्छी“ कहने वाले प्रधानमंत्री जी ने इस पर कोई संज्ञान लिया या नहीं, अगर लिया तो क्या किया, पर जैसा अक्सर होता आया है कि सरकार की गोपनीय बातें जनता से गोपनीय नहीं रहतीं, सो यह चिट्ठी किसी तरह मीडिया में आ गई और चर्चा का विषय बन गई. अंग्रेजी समाचारपत्रों ने आई ए एस अफसरों को “बाबू” लिखा तो अफसर बिगड़ गए कि हम बाबू नहीं, अफसर हैं ; पर किसी अफसर ने अफसरी दिखाते हुए न तो बैठक में चिदंबरम साहब से कुछ कहने का साहस किया, न उनकी टिप्पणीं के बारे में बाद में कुछ कहा. बात बढ़िया क्वालिटी की अंग्रेजी की थी. अतः संभव है दूसरे अफसरों ने इसीलिए चुप रहना बेहतर समझा हो.

पर इस घटना पर मुझे कुछ कहना है. हमारी सरकार में दो तरह के लोग हैं. एक वे जो अपने अशिष्ट बेतुके बयानों के लिए ही बदनाम हैं, दूसरे वे जो अपने शिष्ट शालीन व्यवहार के लिए जाने जाते हैं, चिदंबरम जी की गिनती इन दूसरे लोगों में ही की जाती है. पर उनकी इस टिप्पणी से तो उनकी छवि धूमिल हुई है. किसी सम्मानित व्यक्ति को इस प्रकार अपमानित करना चिदंबरम जैसे सुशिक्षित व्यक्ति को शोभा नहीं देता.

मामला अंग्रेजी का है, अतः सबसे पहले तो हमारा ध्यान अपनी राजभाषा नीति की ओर जाता है. हमारे मंत्रीगण जिस संविधान की शपथ लेते हैं, उसके अनुसार केन्द्र सरकार की “राजभाषा“ हिंदी है (संविधान सभा ने 15 वर्ष के लिए अंग्रेजी में भी काम करने की छूट यह सोचकर दी थी कि परिवर्तन एकाएक करने के बजाय क्रमशः किया जाए). जब राजभाषा हिंदी है तो बैठक अंग्रेजी में हो ही क्यों रही थी ? हमारे मंत्रीगण शपथ संविधान के अनुरूप काम करने की लेते हैं या उल्लंघन करने की ?

चिदंबरम साहब वकील हैं. तर्क दे सकते हैं कि संविधान के बाद बनाए गए राजभाषा अधिनियम के आधार पर अभी भी अंग्रेजी के प्रयोग की खुली छूट है. बात सच है. तर्क वे यह भी दे सकते हैं कि मैंने तो सचिव महोदय से हिंदी में बोलने के लिए कहा. बिलकुल ठीक, पर आगे यह भी कहा न कि मेरे अधिकारी उसका अंग्रेजी में अनुवाद कर देंगे, अर्थात आपके कामकाज की भाषा अंग्रेजी ही रहेगी. श्रीमान जी, तमिलनाडु में जन्म लेने और शिक्षा पाने के बाद आपने हिंदी विरोध करने वाली पार्टियों में नहीं, बल्कि उस  पार्टी में काम करना पसंद किया जो हिंदी के प्रबल समर्थक महात्मा गाँधी को अपना आदर्श मानती आई है. पता नहीं, आप उन्हें अपना आदर्श मानते हैं या नहीं, पर यह तो विचार कर ही सकते हैं कि आप सन 1984 से संसद में हैं और 1985 से केन्द्र सरकार में विभिन्न पदों पर हैं. इस प्रकार केन्द्रीय राजनीति में भूमिका निभाते हुए आपको लगभग तीस वर्ष हो गए. इसलिए वकील साहब, एक बात यह बताइये कि आप वकालत छोड़कर राजनीति में किसलिए आए ? 26  जनवरी 1950  वाली स्थिति बनाए रखने के लिए या इसे बदलने के लिए ? जो छूट 1950 में दी गई थी, उसे कितना खींचेंगे ? इस स्थिति को बदलने का दायित्व कौन निभाएगा ?

सरकार ने राजभाषा नीति के अनुपालन के लिए यह व्यवस्था की है कि सरकारी नौकरी में प्रवेश करते समय हिंदी ज्ञान आवश्यक नहीं, पर नौकरी में आ जाने के बाद हिंदी सिखाने की व्यवस्था सरकारी खर्च पर की जाती है. अखिल भारतीय सेवा में होने के कारण आई ए एस अफसरों को तो उनके प्रारंभिक प्रशिक्षणकाल में ही हिंदी सिखाई जाती है. केन्द्रीय स्तर पर राजनीति करने के इच्छुक नेताओं के लिए भी ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं कर दी जाती ?

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2 Comments on "हमारी अंग्रेजी"

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डॉ. मधुसूदन
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हम कितना ही प्रयास क्यों न करें, ऐसी परदेशी भाषा में हम निष्णात नहीं हो सकते। दो उदाहरण देता हूँ। (१) एक सज्जन, अपने घर भोजन पर निमंत्रित अतिथि को कहना चाहते थे, कि, कृपया, बिना शरमाएं भोजन करें। तो अंग्रेज़ी में बोले। “प्लीज ईट शेमलेस्ली।” (शेमलेस = निर्लज्ज अर्थ में प्रयुक्त होता है।) (२) दूसरे सज्जन अपने निमंत्रक को उनके अतिथि सत्कारपर, धन्यवाद देना चाहते थे। बोले “थॅन्क यु फॉर युअर हॉस्टीलीटी”। अंग्रेज़ी में यजमान को होस्ट कहा जाता है।पर होस्टीलीटि =शत्रुता होता है। और ये लोग तो पढे लिखे थे। ऐसे और भी उदाहरण है। अंग्रेज़ी हमारी भाषा… Read more »
mahendra gupta
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नेताओं के लिए कोई योग्यता सम्बन्धी नियम लागू नहीं होते.अंगूठा छाप व्यक्ति भी मंत्री बन आई .ए.एस अधिकारी पर रौब गांठ सकता है.बिहार में राबड़ी, राजस्थान में गोलमा देवी हाल के ही उदहारण हैं. प्रारम्भिक सरकारों में तो ऐसे मिनिस्टर्स काफी matra में रहे हैं. आज किसी भी कार्यालय में चतुर्थ श्रेणी पद की नियुक्ति के लिए न्यूनतम योग्यता का होना जरुरी है, पर मंत्री पद के लिए नहीं.सभी सरकारी पदों के लिए सेवा निवृति के प्रावधान हैं.पर मंत्रियों के लिए नहीं.यह एक जनतंत्र के लिए विडंबना दायी ही है.

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