लेखक परिचय

शिवेश प्रताप सिंह

शिवेश प्रताप सिंह

इलेक्ट्रोनिकी एवं संचार अभियंत्रण स्नातक एवं IIM कलकत्ता से आपूर्ति श्रंखला से प्रबंध की शिक्षा प्राप्त कर एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में आपूर्ति श्रृंखला सलाहकार के रूप में कार्यरत | भारतीय संस्कृति एवं धर्म का तुलनात्मक अध्ययन,तकनीकि एवं प्रबंधन पर आधारित हिंदी लेखन इनका प्रिय है | राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सामाजिक कार्यों में सहयोग देते हैं |

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आज के इस भागदौड़ के जीवन में वास्तविक जीवन से हम बहूत दूर होते जा रहे
हैं | हम परिवर्तनों को नहीं रोक सकते परन्तु थोडा जागरूक होकर हम अपने
परिवार में एक स्वस्थ वातावरण बना सकते हैं | स्वस्थ परिवार की दस आदतेँ
अपनाकर हम बहुत अच्छा बदलाव कर सकते हैं |

१. परिवार को भूखा ना रखेँ

जब हमारे शरीर को भूख की इच्छा होती हे तो सहज ही शरीर भोजन पचाने के
हारमोंस उत्तेजित करता हे ओर भूख के हार्मोन सामान्य होने मेँ कम से कम
आधे घंटे का समय लगता हे । इतनी देर मेँ शरीर बहुत अधिक कैलोरी का सेवन
कर चुका होता हैं जिस की पूर्ति आपके शरीर मे स्टोर्ड केलोरी से होती हे
। इसलिए जब आप को भूख लगती हे तो अपनी भूख को बर्दाश्त न करेँ बल्कि भोजन
करेँ ।
आज के समय मेँ जब की छोटे परिवारों का चलन हे ओर पति पत्नी दोनोँ नौकरी
पेशा हैं तो अक्सर ब्रेकफास्ट ओर लंच की नियमितता एक बहुत बडी समस्या है

२. ब्रेकफास्ट ओर लंच को नियमित करेँ

जब हम अपने स्वास्थ्य के बारे मेँ सोचते हे तो हम एक या दो पोस्टिक फूल
या सूखे मेवे या प्रोटीन पाउडर के बारे मेँ सोचते हैं परंतु हमेँ अपने
दैनिक जीवन मेँ रोज खाने वाली वस्तुओं को नियमित करने से भी अच्छा
स्वास्थ्य लाभ मिल सकता है | आप नियमित रुप से अखरोट बादाम की कुछ
गिरियाँ खा सकते हेँ ओर अपने नाश्ते मेँ नियमित रुप से दलिया खाकर भी
बहुत स्वस्थ रह सकते हैं । आप अपने दोपहर के खाने मेँ नियमित रुप से एक
हरी सब्जी शामिल करके स्वास्थ्य लाभ पा सकते हैं ।
इसके लिए युद्ध स्तर पर तैयारी की आवश्यकता नहीँ है अपितु आप के पास जो
भी है सबसे पहले आप उन खाने की चीजोँ के साथ अपना नियमितीकरण करें ।

३. २० मिनट व्यायाम

हमारा शरीर इस तरह से प्रकृति द्वारा बनाया गया है की उसे भी कुछ परिश्रम
की आवश्यकता होती हे ओर इसलिए यदि हम शरीर के लिए आवश्यक परिश्रम नहीँ
करते हे तो निश्चित थी हम तमाम प्रकार की बीमारियाँ होती हैं | नियम से
प्रतिदिन व्यायाम करने से हम स्वस्थ होते हैं ओर यह उतना ही आवश्यक है
जितना कि नहाना, खाना और सोना ।
परिवार के साथ सामूहिक व्यायाम के लिए समय निकालें और सामूहिक रुप से
व्यायाम करने से परिवार मेँ बच्चे भी इस से प्रेरित होंगे ओर उन्हे भी
इसका लाभ मिलेगा ।

४. घर का भोजन निर्णायक बनेँ

हम यदि इस बात पर विचार करेँ कि हमारे बच्चे चॉकलेट चिप्स के लिए क्यूँ
खाते हैं ? जबकि वह शराब और सिगरेट के लिए नहीँ रोते हे तो इसका एक सीधा
सा उत्तर यही आएगा कि हम उनहे चॉकलेट चिप्स देना चाहते हे इसलिए । इसका
अर्थ यही हे कि हमारा परिवार वही खाता हे जो वास्तव मेँ हम उसे खिलाना
चाहते हैं ।
चोकलेट और चिप्स खिलाना एक झूठी समृद्धि का प्रतीक है और इसलिए हमेँ अपने
घर मेँ अच्छे ओर पोष्टिक खाने सब्जियों ओर फॉलो की आदत बच्चो मेँ भी
डालनी चाहिए ।
बच्चो को जब भूख लगती हे तो वह अपने आसपास उपलब्ध सभी वस्तुओं मेँ जो
सबसे ठीक लगेगी उसी का चुनाव करते हे ओर यदि उनके पास चोक्लेट या चिप्स
चुनने का कोई आंप्सन नहीँ होता हे तो वह फल या किसी घरेलू पोस्टिक सामान
की मांग करेंगे ।

५. रात का भोजन साथ करेँ

आजकल परिवार के सदस्योँ की अपनी रोजगार संबंधित व्यस्तताओं के कारण
परिवार के भीतर बहुत अधिक समय न दे पाने की वजह से परिवार मेँ साहचर्य और
संबंधोँ की मधुरता मेँ लगातार कमी देखी जा रही हे ।
परिवार मेँ भावनात्मक सदभाव मानसिक स्वास्थ्य के लिए सबसे पोस्टिक साबित
होता हे साथ मेँ भोजन करने से हम एक दूसरे से अपनी भावनाएँ अपने अच्छे ओर
बुरे अनुभव को शेयर करते हे इससे एक अपनापन बनता है जो हमेँ सुकून देता
है ।

६. बच्चो को भी पारिवारिक निर्णय मेँ शामिल करेँ

बच्चो के साथ अच्छे और पोष्टिक भोजन के बारे मेँ, साफ सफाई के बारे मेँ
ओर अच्छी आदतोँ के बारे मेँ बात करें ओर उनसे कहिये कि जब भी वह आपके
भीतर कोई कमी देखे तो आप को टोके ।
परिवार के किशोर सदस्योँ के साथ आप उनके दिन भर के बारे मेँ पूछे, उनसे
बात करे ओर जो बहुत छोटे बच्चे हो उन्हे सोने से पहले एक कहानी जरुर
सुनाएँ । किशोरावस्था मेँ सतत बदलते विचारोँ एवम शारीरिक गतिविधियोँ की
वजह से बच्चे एकाकी अथवा उदासी महसूस करते हैं उन्हें परिवार के अनुभवी
लोगोँ की आवश्यकता होती है ।

७. टीवी ओर मोबाइल समय सीमा निर्धारित करेँ

सबसे अच्छा होगा यदि आप रात को दस बजे सभी फोन और टीवी भी बंद कर दे इस
तरह आप अनावश्यक टेलीफोन पर बात करना ओर टेलीविजन पर सीरियल देखने से
बचेंगे ओर अपना थोडा समय परिवार के साथ विताकर परिवार के मानसिक
स्वास्थ्य को बढाएंगे भी ओर एक बेहतर वातावरण तैयार होगा ।
परिवार के साथ बात करने से और जीवन के अनुभव बांटने से हम एक दुसरे को
समझ पाते हैं और जीवन के वर्तमान दौर की जरूरतों एवं अनुभवों से हमें एक
दुसरे के बारे में पता चलता है | हमारी बातों एवं अनुभवों से सबसे बड़ा
लाभ बच्चों को मिलता है और वो अपने जीवन के निर्णय में हमारी बातों से
सीखते हैं |

८. सोने की दिनचर्या को सर्वोच्च प्राथमिकता दें ।

आमतौर पर हम सुबह जल्दी उठने का प्रयास करते हैँ परंतु यदि हम अपने
विचारोँ मेँ थोडा परिवर्तन करके ओर रात मेँ जल्दी सोने का प्रयास करेँ तो
निश्चित ही हम सुबह जल्दी उठेंगे । वास्तव मेँ सुबह जल्दी उठते हैं तो
आपके भीतर मानसिक और शारीरिक रुप से 30 प्रतिशत अधिक ऊर्जा आ जाती है ।
रात मेँ जल्दी सोने से सुबह उठकर आप अपना वक्त गुणवत्तापूर्ण कार्योँ मेँ
लगा सकती हे अपने परिवार को दे सकते हैं और घर के बच्चे अपनी पढ़ाई पर दे
सकते हे ।

९. आध्यत्मिक बनें

आज के इस भाग दौड़ के जीवन में जब की सामाजिक नैतिक बोध की सर्वथा कमी
होती जा रही है और अपार्टमेंट संस्कृति ने व्यक्ति को एकाकी कर दिया है
तो हमें बौधिक एवं नैतिक साहचर्य की आवश्यकता भी है | आध्यात्मिक होने का
अर्थ किसी का फालोवर बनना नहीं है अपितु आप धार्मिक और सामाजिक पुस्तकों
के माध्यम से भी ईश्वरवादी बन सकते हैं | ईश्वरवादी होने का अर्थ यह नहीं
की हमारी समस्याएं कम हो जाती हैं अपितु हमें एक संबल मिलता है और हम
जीवन में संघर्षों का मुकाबला ज्यादा मजबूती से कर पाते हैं |
बच्चों में आशावादी भावना और सत्यनिष्ठ का संचार होता है और इस तरह वो
गलत रास्ते पर जाने से बचते हैं |

१०. संतोष की प्रवृत्ति

उपभोक्तावाद और बाजारीकरण ने भौतक समृद्धि के प्रति समाज में
प्रतिस्पर्धा बढाया है और कहीं न कहीं इस कारण से हमारे पास जो है, हम
उसका आनंद नहीं ले पा रहे हैं और हमारे पास जो नहीं है उसकी तृष्णा हमें
दुखी कर रही है | बच्चों में भौतिक समृद्धि के प्रति लालसा को दबाएँ नहीं
अपितु उन्हें एक ऐसा दृष्टिकोण दें जिससे वो समझ सकें की वास्तव में यह
समृद्धि की दौड़ अंतहीन है और हम कभी तृप्त नहीं हो सकते |
उन्हें मानवीय गुणों और प्रतिभा के आधार पर भौतिक समृद्धि हासिल करने की
प्रेरणा दें और अनावश्यक रूप से समाज के दिखावे की जगह परिवार में
भावनात्मक रूप से पारस्परिक साहचर्य का विकास करें |

Shivesh Pratap

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