लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा. राधेश्याम द्विवेदी
इतिहास के पन्ने पलटने पर ज्ञात होता है कि वर्ष 1923 से अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता संघ द्वारा हर वर्ष जुलाई माह के पहले शनिवार को विश्व सहकारिता दिवस मनाया जाता है। इस अवसर पर नियमतः अंतर्राष्ट्रीय सहकारी एलायंस (आईसीए) अपने सदस्यों से अपील करता है कि वे सहकारी आंदोलन को बढ़ावा दें और घटनाओं के आयोजन, पैरवी में हिस्सा लेकर, आदि द्वारा अपने अभियान आदि में राष्ट्रीय और स्थानीय सहकारी पहल का समर्थन करें.सहकारी समितियों को मजबूत बनाने और स्थानीय, राष्ट्रीय तथा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अंतर्राष्ट्रीय सहकारिता आंदोलन और सरकार सहित अन्य अभिनेताओं के बीच साझेदारी को मजबूत करने के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए आईसीए और अन्य संयुक्त राष्ट्र संगठन संदेश जारी करता है। वर्ष 1923 में जुलाई माह के प्रथम शनिवार को मनाये गये पहले विश्व सहकारिता दिवस को सहकारिता को सर्वमान्य पहचान देने का उद्देश्य रखा गया था। अन्तर्राष्ट्रीय सहकारिता संघ के तत्कालीन अध्यक्ष श्री जी जे डी सी. गोदर्थ ने सहकारी आन्दोलन के विकास में बाधा बने कारणों की तरफ ध्यान आकृष्ट कर यह प्रस्ताव रखा कि प्रत्येक देश में प्रचार -प्रसार दिवस या प्रचार-प्रसार संध्या समारोह आयोजित कर विश्व भर में यह बताया जाये कि सहकारिता आन्दोलन क्या कर रहा है। यह प्रस्ताव स्वीकार किया गया और वर्ष 1922 में सम्पन्न कार्यकारिणी की बैठक में जुलाई के प्रथम शनिवार को विश्व सहकारिता दिवस मनाने का निर्णय लिया गया। तभी से हर वर्ष विश्व सहकारिता दिवस मनाया जा रहा है। 1923 में जब प्रथम बार इसका आयोजन हुआ तब इसमें सहकारिता का संवर्धन, अन्तर्राष्ट्रीय एकता, आर्थिक दक्षता, शांति और समानता की चर्चा प्रमुखता से हुई। विश्व सहकारी आंदोलन के शीर्ष संस्थान अन्तर्राष्ट्रीय सहकारी परिसंघ की स्थापना 1885 में हुई।
सन् 1995 में सहकारिता के विश्वमान्य सिध्दान्तों को नये स्वरूप में मान्यता दी गई है। जिसके तहत सिध्दान्तों के प्रचार-प्रसार के साथ-साथ सहकारिता से प्राप्त होने वाली समृध्दि से किस प्रकार संतुष्टि प्राप्त होती है, इसका एहसास सभी को कराने पर विशेष जोर दिया जाता है। प्रति वर्ष की भाँति इस वर्ष भी जुलाई माह के प्रथम शनिवार को विश्व सहकारिता दिवस मनाया जायेगा। इस दिवस पर सहकारिता के महान लोकतांत्रिक विचारों के अनुरूप मिलजुल कर संपदा सृजन और समान वितरण के लक्ष्य को लेकर कार्य करने का संकल्प व्यक्त किया जाता है। सहकारी संस्थान आर्थिक उत्थान और विश्व शांति का संदेश भी इस दिवस पर देते हैं। समूचे विश्व में 94 वें अन्तरराष्ट्रीय सहकारिता दिवस और 22 वें यूएन डे ऑफ को-ऑपरेटिव का आयोजन किया जा रहा है. इसी को ध्यान में रखते हुए 2 जुलाई को पूरे प्रदेश में सभी केन्द्रीय सहकारी बैंकों द्वारा एक ही दिन शिविर का आयोजन कर ऋण वितरित किए जाने का फैसला किया गया है।
सहकारी आन्दोलन ने समाज के उपेक्षित वर्ग को संगठनात्मक शक्ति उपलब्ध कराई है । सहकारिता के इस आन्दोलन ने अभावग्रस्तता से लड़ने, सामाजिक एकीकरण और रोजगार के अवसर सहज मुहैया कराने का साहस किया है। देश में सहकारिता के क्षेत्र में कुछ संस्थाओं ने अपने कार्य के तरीकों से विश्व में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। सहकारिता की जन्मस्थली भारत ही है सहकारिता के सभी गुण व संस्कृति यहां की रगरग मे रची बसी है। हमारे पूर्वजों ने आपस में मिलकर संगठन बनाकर अपने अभीष्ट को प्राप्त किया था। सहाकारिता संगठित शक्ति , सृजन दृष्टि एवं सर्वाड़ीण उन्नति का परिणाम है। सहकारिता की यह परंपरा अच्छी है कि इसमें चाहे सहकारी संस्थाओं के सदस्य हो या पदाधिकारी हो अथवा कर्मचारी या अधिकारी सभी सहकारी कार्यकर्ता कहलाते है। सहकारी आन्दोलन को दशा और दिशा बदलने के लिए सदस्यों को शक्ति सम्पन्न बनाना आवश्यक है। ग्रामीण कृषको को सहकारिता के प्रति जागरूक करना आवश्यक है। कृषि ऋण एवं उर्वरक वितरण में व्यावसायिक बैंकों एवं अन्य वित्तीय संस्थाओं से आगे रहकर ईमानदारी एवं पारदर्शिता के साथ कार्य करना है ताकि सहकारिता से जुडा हर व्यक्तित गौरवान्वित हो सके। सहकारिता के विकास के लिए आपसी समन्वय एवं टीमभावना से काम करने की आवश्यकता है।
प्रदेश में सहकारिता सभी क्षेत्रों तथा नवीन दिशाओं में तेजी के साथ आगे बढे, इसका लाभ सभी तबके को समान रूप से प्राप्त हो। संस्थाओं में प्रबंध की कुशलता बढाई जाने तथा प्रबंध का पूर्ण व्यावसायीकरण हो। सहकारी संस्थाओं के कार्यकलापों में पूर्ण पारदर्शिता दृष्ट्रिगोचर हो। संस्थाएँ आर्थिक रूप से सुदृढ एवं कार्यकुशल हो। सभी संस्थाओं में शिक्षण एवं प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाए। सदस्य तथा प्रबंध शिक्षण की पूर्ण व्यवस्था की जाए। कृषि साख संस्थाएं कम से कम ब्याज दर पर पूर्ण ऋण कृषको को प्रदान करें। शासन ने 7 प्रतिशत ब्याज दर निर्धारित की है इसका पालन सुनिश्चित किया जाय। सहकारिता के आर्थिक अपराधों तथा जिला स्तर पर आंतरिक पुलिस की व्यवस्था आवश्यक है। शासकीय स्तर पर विचाराधीन प्रकरणों में शीघ्र निर्णय लिए जाए।प्रो. वैद्यनाथन कमेटी की सिफारिशों से केन्द्रीय जिला सहकारी संस्थाएं जो धारा 11 में है वे उभर जायगीं। उनकी आर्थिक स्थिति सुधरेगी तथा कार्यकुशलता पर भी सकारात्मक प्रभाव पडेगा। प्राथमिक कृषि साख समितियों को सुदृढ बनाया जा सकेगा तथा उनके व्यवसाय में वृध्दि होगी। संस्थाओं की आर्थिक सक्षमता पर भी अच्छा प्रभाव पडेगा। संस्थाओं में आधुनिकीकरण होगा और मानीटियरिंग पध्दति में सुधार आयगा। इससे प्रदेश की सहकारिता सशक्त होगी।
सहकारिता एक शाश्वत आर्थिक पध्दति है। इन्ही शाश्वत मूल्यों और सिध्दांतों के अनुपालन के फलस्वरूप सहकारिता आज के प्रतियोगिता के युग में प्रगति के पथ पर अग्रसर है। अन्य प्रमुख गुण सहकारी पध्दति का है। सभी आर्थिक पध्दतियां पूँजीवाद अथवा समाजवाद में अपनी स्थिति और उपस्थिति को कायम रखने की शक्ति। इसी शक्ति में सहकारिता को गतिशील और सामाजिक सरोकार से परिपूर्ण आर्थिक पध्दति बनाया है। परिणामत : विश्व के हर महाद्वीप में लगभग हर देश में सहकारी संस्थाए अपने सदस्यों के सामाजिक आर्थिक उत्थान में लगी हुई है। चाहे वह भारत और चीन जैसे विशाल देश हो अथवा सिंगापुर , फिजी जैसे छोटे देश , हर जगह सहकारी संगठन विद्यमान है और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गो को संगठित कर नए अवसरों का सृजन कर रहे है। आर्थिक उदारीकरण के युग में सहकारिता उच्चकोटि की गुणवत्ता , उत्पादकता एवं व्यावसायिक प्रबंध व्यवस्था से शिखर स्थान प्राप्त कर सकती है और आर्थिक एवं सामाजिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की क्षमता प्रदर्शित कर सकती है।

 

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