लेखक परिचय

डॉ केडी सिंह

डॉ केडी सिंह

झारखण्ड से अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस के राज्यसभा सांसद हैं। बचपन से ही सामाजिक कार्यों में रूचि के चलते एक सामाजिक संस्था केडी सिंह फाउंडेशन का निर्माण किया जो मुख्य रूप से महिलाओं के लिए, उनके अधिकारों के लिए संघर्ष कर रही है। सामाजिक सेवा करने हेतु ही राजनीति में कदम रखा है।

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 49 फीसदी महिलाओं की चुनाव में भागीदारी रचेगी इतिहास

डा. केडी सिंह

images (1)2014 का लोकसभा चुनाव भारतीय समाज के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ होगा, 49 फीसदी महिला मतदाता इस बार अपना मत देकर भारत का भविष्य तय करेंगी।

भारत में महिलाओं के लिए राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे पर पहली सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की मांग 1917 में उठी थी, 1930 तक आते आते उन्हें मत देने का अधिकार मिला। और ये ही अधिकार आज एक नए भारत की नींव रखेगा। भारत में महिलाएं आज एक बड़ा मुकाम हासिल कर चुकी हैं, फिर चाहे वो भारत की राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष या प्रतिपक्ष की नेता के रूप में हो।

महिलाओं की चुनाव में भागीदारी अगर कुछ समय पहले से देखें तो पता चलता है कि 2007 के बाद से महिलाओं की चुनाव और राजनीति की ओर रूचि बढ़ी है, और महिला मतदाताओं की संख्या में भी पुरुष मतदाताओं कि तुलना में बड़ी वृद्धि हुई है, अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो 2007 में चुनाव समिति द्वारा आई एक रिपोर्ट से हमें पता चलता है कि उत्तर प्रदेश में 57.72 फीसदी से बढ़कर महिला मतदातों की संख्या 60.29 फीसदी हुई, इसके अलावा गोवा में भी ये आंकड़ा 79.67 फीसदी से बढ़कर 85.97 फीसदी हुआ। साथ ही अमृतसर और देहरादून में भी ये आंकड़ा क्रमशः 22.56 फीसदी और 21.46 फीसदी बढ़ा। अब यहाँ देखना है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में महिलाओं की कितनी भागीदारी होती है, वह किस दल और नेता में अपना विश्वास दिखाती हैं।

इसी को ध्यान में रखते हुए, शायद सरकार आजकल महिलाओं से जुड़ी विभिन्न परियोजनाओं को जल्दबाजी में लागू कर रही है। खाद्य सुरक्षा कानून के पीछे भी सरकार की ये ही मंशा दिखती है। यहां पर अफसोस की बात ये है कि महिलाओं की मूलभूत सुविधाओं को सरकार द्वारा अभी भी नजरंदाज किया जा रहा है। मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्रों की महिलाओं की समस्याओं पर आज भी सरकार द्वारा कम ध्यान दिया जा रहा है।

सैनिटेशन (सफाई व्यवस्था) महिलाओं के लिए एक बडी समस्या है। सरकार ने इस ओर काम तो किया है परन्तु फिर भी सफाई व्यवस्था की हालत सुधरी नही है। खुले में शौच महिलाओं के लिए सबसे बड़ा अभिशाप कहा जा सकता है। शौच के लिए बाहर जाने के दौरान महिलाएं दुष्कर्म का शिकार हो रहीं हैं। निर्मल भारत योजना इसी के तहत लागू की गई है, पर काम कितना आती है ये देखना बाकी है। कुछ समय पहले सरकार ने घरों में शौचालय भी बनाये थे पर वो कितने कारगर थे, इसका अंदाजा आज भी बड़े पैमाने पर खुले में शौच जाने वाले लोगों को देखकर लगाया जा सकता है।

साफ पीने के पानी की उपलब्धता भी महिलाओं के लिए एक चिंताजनक विषय है। देश के दूरदराज इलाकों में आज भी महिलाओं का 25 फीसदी समय पानी लाने ले जाने में चला जाता है। देश की बढ़ती आबादी और औद्योगिकीकरण के आधार पर वर्ष 2025 तक पानी की अनुमानित आवश्यकता 1,093 घन किलोमीटर हो जाएगी। जिसे उपलब्ध कराना अपने आप में बड़ी चुनौती है।

महिलाएं महंगाई और खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों से भी परेशान हैं। केवल नए खाद्य सुरक्षा कानून से ही गरीबों का कल्याण नहीं होगा, सरकार को महंगाई पर भी काबू पाने के लिए उपाए करने होंगे, ताकि महिलाएं अपना घर आसानी से चला सकें। पेंशन और अन्य क्षेत्रों में भी महिलाओं के लिए नए प्रावधानों की जरूरत है।

इन सब प्रावधानों और कानूनों में महिला सुरक्षा सबसे बड़ा ज्वलंत मुद्दा है, जिसे लेकर सिर्फ कुछ राज्य ही संजीदा हैं पर अधिकतर राज्य तो इस ओर ध्यान ही नहीं दे रहे हैं। हरियाणा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखण्ड, उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में तो महिला सुरक्षा के नाम पर प्रशासन और पुलिस ही खिलवाड़ कर रही है। दुष्कर्म, महिलाओं से छेड़छाड़ दहेज के लिए हत्या, घरेलु हिंसा जैसे उत्पीड़ऩ से महिलाओं का जीना दुश्वार है। मीडिया शहरी क्षेत्रों में महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों को उजागर कर देती है या यूं कहें कि सक्रिय है, पर ग्रामीण क्षेत्रों में दिन-ब-दिन घट रहे अपराधों को लेकर कोई राष्ट्रीय बहस नहीं हो रही है।

दुष्कर्म जैसे जघन्य अपराध के आंकड़े कम होने की जगह बढ़ते ही जा रहे हैं, 2011 में जहाँ महिलाओं के साथ हो रहे अपराधों की संख्या 228650 थी, वहीं 2012 में यह संख्या बढ़कर 244276 हो गयी, वहीँ जहां 2011 में 19 फीसदी अपराध सामने आये थे, वहीँ 2012 में 42 फीसदी अपराधों की घटनाएं घटीं। अगर राज्यों में इन अपराधों पर नजर डालें तो असम में 89.5 फीसदी, आन्ध्र प्रदेश में 40.5 फीसदी, उत्तर प्रदेश में 20.7 फीसदी, दिल्ली में 14.2 फीसदी एवं बेंगलुरू और कोलकाता में क्रमशः 6.2 और 5.7 फीसदी अपराध सामने आये, जबकि 2012 में ही मध्य प्रदेश में सबसे अधिक दुष्कर्म 3425 और उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा उत्पीड़न के मामले सामने आए हैं, जिसमें दहेज के लिए हत्या के 27.3 फीसदी, 2244 मामले सामने आये, इनके बाद अगर हरियाणा की बात करें तो आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं।

अगर सरकार की सभी परियोजनाओं और मिशनों की तुलना महिला सुरक्षा से करें, तो महिला सुरक्षा का पलड़ा भारी नजर आता है। महिलाओं का एक बड़ा वर्ग इस बार अपने साथ हो रहे हर अपराध और दुव्र्यवहार का हिसाब चुनाव में अपने मत के माध्यम से लेने वाली हैं। अब देखना ये है कि आगे क्या होता है। क्या वाकई पहले ’महिला का सम्मान, फिर भारत का निर्माण’ का नारा राजनीतिक दलों के लिए कारगर साबित होगा?

मैं आशा करता हूँ कि महिलाएं इस बार के चुनावों में बड़ी संख्या में मतदान कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगी, और एक ऐसी सरकार का चुनाव करेंगी जो उनकी परेशानियों को ऊपरी तौर पर नहीं, बल्कि जड़ों तक पहुंचकर उनका हल करे।

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