लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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akhileshअखिलेश का होगा दागी माया-शीला से मुकाबला

संजय सक्सेना

उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव ज्यों जो नजदीक आ रहा है। सियासी पारा बढ़ता जा रहा है। तमाम राजनैतिक दल वोट बटोरने का कोई भी मौका छोड़ना नहीं चाहते हैं। कोई दलितों के दुख-दर्द में घुला जा रहा है तो किसी को पिछड़ों की चिता सता रही है। मुस्लिम वोटरों को कैसे अपने पाले में किया जाये इसके लिये भी बाजीगरी की जा रही है। वोटों की सियासत की मारामारी के बीच करीब तीन दशकों के बाद उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव 2017 के लिये चतुष्कोणीय मुकाबला होता दिख रहा है। 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी और पिछले छहः माह में कांगे्रस ने ऐसा ‘रंग’ बदला है कि अब उसे भी राजनैतिक पंडित चुनावी बिसात परं गंभीरता से लेने लगे हैं। 27 वर्षो के बाद पहली बार कांगे्रस के पक्ष में माहौल बनने से यूपी में सियासी समीकरण काफी बदल सकते हैं। कुछ माह बाद के अंतराल के बाद होने वाले विधान सभा चुनाव के लिये भारतीय जनता पार्टी को छोड़कर सभी प्रमुख दलों ने अपना मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित कर दिया है। सपा की तरफ से अखिलेश यादव और बसपा की ओर से मायावती का नाम तो सीएम की रेस के लिये पहले से ही तय था,लेकिन कांगे्रस की तरफ से शीला दीक्षित को आगे बढ़ाना सबके लिये चैकाने वाली घटना रहा। कांगे्रस ने दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को सीएम की कुर्सी के लिये प्रोजेक्ट करके चुनावी हवा का रूख अपनी तरफ मोड़ने का जो प्रयास किया है उससे कांगे्रस को कितना फायदा होगा, यह तो समय ही बतायेगा लेकिन कांगे्रस ने कम से कम एक मामले में सपा की राह जरूर आसान कर दी। कांगे्रस द्वारा शीला दीक्षित के नाम की घोषणा के साथ ही तय हो गया कि अखिलेश का मुख्यमंत्री पद की दो ऐसी महिला दावेदारों से सीधे मुकाबला होगा जिनके ऊपर भ्रष्टाचार के कई आरोप हैं। शीला दीक्षित टैंकर घोटाले में आरोपी है तो माया के खिलाफ आय से अधिक सम्पति, ताज काॅरिडोर में भ्रष्टाचार के मामले कोर्ट में लंबित हैं। अखिलेश सरकार भले ही कानून व्यवस्था के र्मोचे पर बुरी तरह से नाकाम रही है, लेकिन अखिलेश के ऊपर आज तक भ्रष्टाचार का कोई आरोप नहीं लगा हैं।इसी तरह से समाजवादी पार्टी को भले ही उसके विरोधी गुंडांे की पार्टी कहते रहते हों,मगर अखिलेश यादव को इस मामले में भी विरोधियों से माइलेज हासिल है।बाहुबली डीपी यादव से लेकर मुख्तार अंसारी तक को अखिलेश ने अपनी पार्टी के अंदर फटकने नहीं दिया,जबकि मुख्तार की पार्टी कौमी एकता दल और सपा के बीच तो चुनावी तालमेल की घोषणा भी हो गई थी,परंतु अखिलेश की जिद्द के चलते मुलायम सिंह को कदम पीछे खिंचना पड़ गये। ईमानदार अखिलेश,अपराधियों से दूरी बनाकर चलने वाले अखिलेश के मुकाबले कांगे्रस और बसपा में शायद ही कोई नजर आता हो।
चुनावी मौसम में यह ‘अंतर’ बसपा-कांगे्रस के लिये मुश्किल पैदा कर सकता है। समाजवादी पार्टी के रणनीतिकार माया-शीला के भ्रष्टाचार को जनता के बीच पूरी शिद्दत से उठायेंगे इसमें कहीं किसी को संदेह नहीं होना चाहिए। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो शुरू से ही अपनी सरकार के विकास कार्यो और स्वच्छ छवि को लेकर जनता के बीच भ्रमण कर रहे हैं। अखिलेश चाहते भी यही हैं कि चुनाव विकास के पक्ष में और भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ा जाये। अगर ऐसा हुआ तो समाजवादी पार्टी को इसका बढ़ा फायदा मिल सकता है।
बात मायावती कि की जाये तो बसपा में पिछले दिनों जो घटनाक्रम घटा,उससे मायावती की ताकत कम हुई है। माया के कई नेताओं ने पार्टी छोड़ दी। हैरान-परेशान मायावती के लिये ‘दयाशंकर प्रकरण’(मायावती के चरित्र की तुलना एक वैश्या से करने वाला बयान) संजीवनी बनकर आया तो उन्होंने झट से उसे कैच कर लिया। राज्य सभा में तो मायावती ने गुजरात में दलितों की पिटाई और अपने (मायावती) ऊपर उत्तर प्रदेश भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह की अभद्र टिप्पणी के मुद्दे को उछाला ही इसके अलावा लखनऊ में विधान भवन के पास धरना-प्रदर्शन करके अपनी ताकत भी दिखाई। मायावती की एक आवाज पर 24 घंटे के भीतर लाखों बसपाई लखनऊ पहुंच गये।यह सब तब हुआ जबकि मायावती की बात को मानते हुए भाजपा दयाशंकर को पार्टी से निकाल चुकी थी। पहले दयाशंकर को भाजपा से बाहर निकालने की जिद्द पर अड़ी मायावती अब दयाशंकर की गिरफ्तारी की मांग करने लगीं। ऐसा करके वह भाजपा के साथ समाजवादी पार्टी की भी मुश्किल खड़ी करना चाहती थीं। दयाशंकर प्रकरण के सहारे मायावती पिछले दिनों पार्टी में जो कुछ उससे हताश नेताओं/कार्यकर्ताओं में नई जान डालने की कोशिश तो कर ही रहीं हैं, वहीं ऐसे मुद्दो उछाल कर वह दलित वोट बैंक मजबूत करने के अलावा भारतीय जनता पार्टी के सामने अपनी पार्टी को मुख्य मुकाबले में भी दिखाना चाहती हैं।
भाजपा नेता दयाशंकर ने मायावती के खिलाफ जो भी कहा उसकी निंदा होनी चाहिए लेकिन इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि बसपा पर विरोधी ही नहीं उनकी पार्टी से बगावत करने वाले नेता भी भ्रष्टाचार और धन उगाही का आरोप लगाते रहते हैं। माया राज में भ्रष्टाचार की कई इबारते लिखी जा चुकी हैं। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव सूबे की सत्ता संभालने के बाद जब पहली बार मीडिया से रूबरू हुए थे तो उन्होंने पूर्ववर्ती बसपा सरकार और उसकी सुप्रीमो मायावती पर निशाना साधते हुए कहा था कि मायावती के कार्यकाल में हाथी प्रतिमाओं की स्थापना, पत्थरों के स्मारकों के निर्माण समेत विभिन्न कार्यो और योजनाओं में 40 हजार करोड़ का घोटाला हुआ है। इसमें कई पूर्व मंत्रियों की संलिप्तता है। अखिलेश का यह बयान इस लिये और अहम था क्योंकि पुलिस ने लखनऊ-नोएडा में हाथी प्रतिमाएं लगाने में कथित गड़बड़ी की जांच के क्रम में राजकीय निर्माण निगम के गोमती नगर स्थित कार्यालय में छापा मारा। अखिलेश यादव ने तब कहा था कि उनके शुरूआती कार्यकाल में ही एनआरएचएम, इको पार्क, नोएडा, पार्क, हाथी प्रतिमाओं और पॉम ट्री समेत एक दर्जन घोटाले अब तक सामने आ चुके हैं। सीएम अखिलेश का यह भी कहना था कि घोटाले में अभी तक सिर्फ सरकारी खजाने से निकाले गए धन का ही जिक्र किया गया है, जमीन की कीमत जोड़ी नहीं गई है। ऐसा कर दिया जाए तो आंकड़ा कहीं ज्यादा होगा। यहां यह बता देना जरूरी है कि 2012 के विधान सभा चुनाव प्रचार के दौरान सपा के कई दिग्गज नेताओं ने ऐलान किया था कि उनकी सरकार बनी तो प्रदेश का खजाना लूटने वाली बसपा सुप्रीमों मायावती जेल में होंगी। यह और बात है कि 2012 से 2016 आ गया है,लेकिन अखिलेश सरकार ने उनको जेल भेजना तो दूर एक भी मुकदमा तक नहीं दर्ज कराया है।
बसपा ही नहीं कांगे्रस का भ्रष्टाचार भी समाजवादी पार्टी को संजीवनी देने का काम कर रहा हैं। खासकर यूपी की मुख्यमंत्री पद की कांग्रेसी उम्मीदवार शीला दीक्षित पर भ्रष्टाचार के जो आरोप लगे हैं वह कांगे्रस के लिये चुनावी जंग में मुश्किल खड़ी कर सकते हैं। वाटर टैंकर घोटालें में फंसी दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दी़ि़क्षत को हाल ही में एंटी करप्शन ब्रांच (एसीबी) ने समन जारी करके पूछताछ के लिये बुलाया है। दिल्ली जल बोर्ड में टैंकर घोटाला साल 2010-11 के दौरान सामने आया था। दिल्ली में पीने के पानी की सप्लाई के लिए टैंकरों को किराए पर हायर किए जाने के दौरान यह घोटाला किया गया था। शीला दीक्षित के कार्यकाल में दिल्ली की जिन कॉलोनियों में पानी की पाइप लाइनें नहीं हैं, वहां वाटर सप्लाई के लिए टैंकर किराए पर लिए जाने थे। इस काम के लिए जल बोर्ड को स्टेनलेस स्टील वाले 450 माउंटेड टैंकर हायर करने थे। इसके लिए कई बार टेंडर निकाले गए। पहली बार मार्च 2010 में टैंडर निकाला गया। सात साल के लिए जारी टेंडर की कुल कॉस्ट 50.98 करोड़ रुपए रखी गई थी। इसके बाद इस टेंडर को कैंसल कर दिया। इस तरह करीब डेढ़ साल में चार बार टेंडर कैंसल किए गए। आखिरकार दिसंबर 2011 में 10 साल के लिए टैंकरों को किराए पर लेने के लिए टेंडर पास किया गया। इस बार टेंडर की कुल कॉस्ट 50.98 करोड रुपए से अप्रत्याशित रूप से बढ़ाकर 637 करोड़ 23 लाख रुपये कर दी गई थी। इसी वजह से घोटाले का अरोप शीला सरकार पर लगने लगा था।
इसी काल खंड में यानी शीला दीक्षित के शासनकाल के दौरान दिल्ली में हुए कॉमनवेल्थ खेल घोटाले की छींटे भी शीला के ऊपर आईं थी।। खेल खत्म होने के महज एक दिन बाद ही नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (कैग) ने इस बड़े खेल आयोजन से जुड़ी उन विभिन्न परियोजनाओं का आकलन शुरू कर दिया है जो भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी रही हैं। कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला 2011 में सामने आया जिसे भारत के सबसे बड़े घोटालों में से एक माना जा रहा है। 2010 में नई दिल्ली में आयोजित कॉमनवेल्थ गेम्स की तैयारी के चरण और आचरण के दौरान पैसे की बड़े पैमाने पर हेराफेरी हुई थी। इस घोटाले का कुल मूल्य ७०,००० करोड़ रुपये होने का अनुमान है। शीला दीक्षित की इस घोटाले में काफी बदनामी हुई थी। शीला के ऐसे ही भ्रष्टाचारों का डंका पीटकर सपा, कांगे्रस के यूपी से पैर उखाड़ देना चाहती हैं।
बात भाजपा की कि जाये, जिसने अभी तक अपना सीएम प्रत्याशी घोषित नहीं किया है। चार में से तीन प्रमुख राजनैतिक दलों कांगे्रस,सपा,बसपा द्वारा अपना सीएम प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद भाजपा के ऊपर भी मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशाी घोषित करने का दबाब काफी बढ़ गया है। भाजपा पर न केवल सीएम प्रत्याशी घोषित करने का दबाव है,बल्कि उसे इस बात का भी ध्यान रखना होगा कि उसका प्रत्याशी किसी भी तरह से 19 न नजर आये। मुख्यमंत्री के उम्मीदवार का नाम घोषित न होने से प्रतिस्पर्धी दलों ने भाजपा की घेरेबंदी शुरू कर दी है। खासतौर से मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने इस मुद्दे पर भाजपा पर तंज कसते यहां तक कह दिया कि उप्र में साढ़े तीन मुख्यमंत्री की बात कहने वाली भाजपा मुख्यमंत्री का एक उम्मीदवार तक नहीं तलाश पा रही हैं।  भाजपा प्रवक्ता हरिश्चन्द्र श्रीवास्तव ने अखिलेश पर तंज कसते हुए कहा कि भाजपा का कथन सही था तभी तो अखिलेश को खुद को ट्रेनीज सीएम बताना पड़ा।

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