लेखक परिचय

तुलसी टावरी

तुलसी टावरी

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तुलसी टावरी

प्रगति का अर्थ कमजोर को रौंद कर स्वयं आगे बढ़ना कदापि नहीं l समाज में हर एक व्यक्ति को हक़ है, समुचित अवसर पाने का, स्वयं के पुरुषार्थ को सम्पूर्णता से जीने का l विश्व की व्यवस्था में, भारत एक नयी राह- ‘तीसरा रास्ता’ – बनाने में सक्षम है; जहां आर्थिक-समृद्धि पाने के लिए सदियों से चली आ रही भारतीय सभ्यता का मूलमंत्र ‘विविधता में एकता’ खोये नहीं, बल्कि एक स्व-प्रेरित अनिवार्यता बने l आवश्यकता है ऐसे नव-निर्माण की, जहां “शहर बसे गाँवों की गोद में, जैसे पृथ्वी बसी है प्राण-दायक वायुमंडल में” l

इक्कीसवीं सदी का भारत, विश्व को एक नयी दिशा देने के लिए उद्यत हो रहा – जिससे समस्त मानव-समाज को जीने का एक नया पैगाम मिल सके l जहां जीवन में आर्थिक-समृद्धि के साथ-साथ वह सब भी मिल सके जो पैसे से कभी ख़रीदा ही नहीं जा सकता l क्या सभ्य और स्वतंत्र समाज के लिए यह जरुरी नहीं कि उसमें एक सहज अपनापन हो, जहां अजनबी इंसान से भय नहीं लगता हो l जहां हर बचपन को खिलने का अवसर मिल सके l जहां खेत-खलिहान, नदियाँ तथा जंगल इतने भी दूर न हो कि केवल टीवी पर दूर से ही दर्शन हो सके l जहां पड़ोस भी परिवार सा लगे l जहां हर जीव में कुछ नया कर दिखाने की तड़प पैदा हो l कुल मिलाकर, जहां अर्थ के साथ ही सभी प्रकार के अन्य सुख हर व्यक्ति को स्वयं के पुरुषार्थ से प्राप्त हो सके, ऐसी व्यवस्था हो l

indiaहम जब एक भवन का निर्माण करते हैं, उसकी डिज़ाइन बड़ी महत्वपूर्ण होती है l अन्यथा कितना भी धन खर्च करने के बाद पछ्ताना पड़ सकता है l भवन को फिर से गिराकर तो आप बनाने से रहे l पिछले ६० वर्षों से हम एक ही गल्ती लगातार करते आ रहे हैं l सारी समृद्धि और आकर्षण शहरों में केन्द्रित करते आ रहे हैं l इस हद तक कि, भारत के किसी भी कोने में रहने वाला हर व्यक्ति यह धारणा बना चुका है कि बिना बड़े शहर गए उसकी प्रगति संभव ही नहीं l दुर्भाग्य से इसका यह अर्थ भी होने लगा कि गाँव याने पिछड़े लोगों के रहने की जगह l कितनी विडंबना है कि जो किसान जीने की  सबसे बहुमूल्य चीज़ का उत्पादन करता है, वह भी बिना किसीसे तनख्वाह लिए; स्वयं के पुरुषार्थ से- उसकी गिनती उसके स्वयं के बच्चे पिछड़ों में करने लगे हैं l और मौका पाते ही शहर का रूख करने के लिए बाध्य हो गए हैं l क्योंकि शहर जाने से ही उनकी अच्छी कमाई हो सकती है, भले ही उसे गन्दी नाली पर बने कच्चे घर में रहना पड़े, जिसे हम स्लम कहते हैं l ऐसी उल्टी अर्थ-व्यवस्था का हमने ही निर्माण किया हुआ है l और इसे गल्ती समझने के बजाय अपनी श्रेष्ठता समझे बैठे हैं l क्या यह एक अनोखी डिज़ाइन नहीं है – जहां शहरों में प्रति स्क्वेअर कि. मी. में ३०,००० लोग एक दूसरे पर लदे पड़े हैं, जबकि शहर से महज एक घंटे दुरी पर उजाड़ गांवों में मात्र ३०० लोग ही बसने के लिए बचे हैं l और ऐसा क्यों? क्योंकि शहर याने उन्नति, और गाँव याने पिछड़ापन l इस मूर्खतापूर्ण मानसिकता के बने रहने का मूल कारण है हमारी अर्थ-व्यवस्था की गलत डिज़ाइन (यानी गलत नीतियां)– जिसने धन और ज्ञान दोनों को शहरों में इस कदर केन्द्रित कर दिया है कि हम सट्टेबाज़ी और बेईमानी से धन पाने को भी पुरुषार्थ कहने में लग गए  हैं l  हमारा ज्ञान बजाय नए अविष्कारों की खोज में (जिससे जीवन और प्रकृति का तारतम्य सुगम हो),  अधिक से अधिक धन हड़पने की तिकड़में लगाने में लगा है l जो गांवों में बसे सीधे-सादे किसानों की कल्पना से कोसों दूर है l यही कारण है कि जो भारत में सच्चा पुरुषार्थ करते हैं जैसे कि किसान, वो समान्यतः गरीब ही बने रहते हैं l (एक्जीबीट-1… भारत में शहरों व गाँवों की स्थिति)

एक्जीबीट-1भारत में शहरों व गाँवों की स्थिति

उन्नति के अवसर बड़े बड़े महानगरों में केंद्रित जैसे मुंबई, दिल्ली इत्यादि

शहर दिन-ब-दिन नर्क बनते जा रहे हैं- छोटे-छोटे पिंजरों में सिमटा जीवन, इतने महंगे घर कि जीवन भर का क़र्ज़, जनसंख्या-घनत्व के दबाव से लचर होते इन्फ्रास्ट्रक्चर, हर प्रकार का प्रदूषण- हवा में, पानी में l ट्रेवेल में समय कि बर्बादी (२ से ४ घंटे), न परिवार के लिए, न ही समाज के लिए समय l सम्पूर्णता में देखें तो – राष्ट्रीय संपत्ति का क्रिमिनल दुरुपयोग सिर्फ शहर में रहने वाले व माईग्रेट करने वालों को महज रोजी-रोटी देने में l

गाँव उजाड़ व वंचित

हर प्रकार के उन्नति के अवसरों से l न तो अच्छे स्कूल, न अच्छे कॉलेज या कि नॉलेज-इंस्टीट्यूट, न ही अच्छे अस्पताल, न सही प्रकार की टेक्नोलॉजी, न पूरी बिजली, न अच्छे रोज़गार, न अच्छी आमदनी इत्यादि l साल में दो-तिहाई समय कि बर्बादी l गाँवों की क्षमता का पूर्णतया अनुपयोग l एक-तरफा माइग्रेशन शहरों की ओर निरंतर जारी l सम्पूर्णता में देखें तो – भारत के गाँव एक अनूठी दास्ताँ है – वेस्टेड प्रतिभाओं व सम्भावनाओं की – ९०% भूमि की, क्षेत्रीय संसाधनों की, तथा गाँव में बसने वाले नागरिकों की l

 

मात्र २० वर्ष ही हुए हैं, सॉफ्टवेयर एक्सपोर्ट रेवोल्यूशन ने बैंगलोर का नक्शा ही बदल दिया है l एक नयी डॉलर अर्थ-व्यवस्था (जो आज लगभग १.३५ लाख करोड़ प्रति वर्ष की है) ने ५० लाख नए लोगों को आकर्षित किया l जनसंख्या-घनत्व जो कि लगभग ५००० प्रति स्क्वेअर कि. मी. था, बढकर ११,००० तक पहुँच गया है l क्या ही अच्छा होता, यदि बैंगलोर को हम सुंदर बगीचों का शहर रहने देते, और नयी अर्थ-व्यवस्था को आस-पास के गाँवों में नए शहरों का विकास करते, १००-२०० कि मी कि दुरी पर l  हर व्यक्ति कि जीवन-क्वालिटी व शहर की आबहवा भी अच्छी बनी रहती l बारी-बारी से हम हर अच्छे शहर को बर्बाद ही करते जा रहे हैं, अपनी ही गल्तियों के चलते l जबकि हम कितने ही गाँवों में एक नए वेल्थ-क्रिएशन की प्रक्रिया स्थापित कर सकते थे l

हम क्यों लगातार एक गलत ग्रोथ-मॉडल को लेकर ही चल रहे हैं ?

क्या ही अच्छा हो कि नयी नीतियां ऐसी बने कि अर्थ-व्यवस्था का सही ढंग से विकेंद्रीकरण हो सके l भारत के गाँव तक़रीबन ९०% भूमि में बसे हैं, जबकि शहर १०% में l कोई कारण नहीं है कि हम शहरों को अंधाधुंध ५० कि मी तक बढाते जायें और गाँव के लोगों को विस्थापित करते जाएँ, पैसे  देकर l इस तरह नगद पैसे का लालच देकर मालिक की हैसियत रखने वाले किसानों को उनके ही पूर्वजों के गाँव से हम विस्थापित कर रहे हैं, अंत में उन्हें हम मजदूरी व बर्बादी की राह पर ही धकेल रहे हैं l क्योंकि बिना पुरुषार्थ से सट्टे का पाया धन उन्हें भी रास नहीं आ रहा; सिर्फ गलत ढंग से उन्हें और उनकी संतानों को नष्ट ही कर रहा है l बजाय इसके,  हम क्यों न शहरों और गाँवों में एक नया तालमेल बिठाएं l हमें शहर भी चाहिए, और गाँव भी l शहर की आवश्यकता इसलिए है की बड़ी संख्या में विविध ज्ञान के लोगों के संगम से ही नए-नए ज्ञान का उदय होता है, और गाँव इसलिए जरूरी हैं कि छोटे-समुदाय में ही आत्मीयता व सामाजिकता के मूल्य विकसित होते हैं l शहर व्यक्ति को विविध प्रकार के कार्यों व career के अवसर दे सकता है, तो गाँव उसे स्वस्थ और प्राकृतिक वातावरण l एक ही व्यक्ति जीवन के विभिन्न पड़ावों में दोनों प्रकार के अवसरों को जी सके, ऐसी व्यवस्था आज इंटरनेट के युग में संभव है l एक किसान खेती के अलावा लघु-उद्यम भी कर सकता है, वैसे ही एक पढ़ा-लिखा वैज्ञानिक खेती l और ऐसा होने भी लगा है l शहर और गाँव की ताकतों का संगम रोज़मर्रा के जीवन में सहजता से कैसे उतारा जाये, यह हमारे लिए एक चुनौती है – या कहें कि २१वीं सदी में ह्यूमनसेट्टल्मेंट की नयी डिज़ाइन का प्रारंभ – जहां गाँव व शहर दो शब्द न रहकर एक नए जुड़न की परिभाषा बन सके l जो भारत को रुरल व अर्बन की भ्रमित परिभाषाओं से बाहर निकाल सके l

कैसे बन सकती है, ऐसी नयी डिज़ाइन ?

एक  शहर को ५ से ७ कि मी रेडिअस के CORE के रूप में  केंद्र में बसे रहने दें, और उसके चारों ओर २५ से  ५० कि मी के घेरे में गाँवों को नए स्वरुप में पुनः निर्मित करें; ठीक वैसे ही जैसे हमारी पृथ्वी सुरक्षित है, चारों तरफ से घिरी हुई प्राण-दायक वायुमंडल में l गाँव की आत्मीयता व परंपराए शहरों में संस्कृति के पनपने में ऑक्सीज़न का काम करें l जहां एक ओर गाँव की खेती भी रहे, वहीं नयी पीढ़ी उद्यमी भी बनें l इतना ही नहीं, पंचायत की भागीदारी से बंजर-भूमि का उपयोग बड़े उद्योगों को लगाने की व्यवस्था के लिए तथा अन्य प्रयोगों के लिए निश्चित हो सके, ताकि जमीन-अधिग्रहण को लेकर समाज के विभिन्न घटकों के बीच कोई विवाद कभी भी न हो l हर वेल्थ-क्रिएशन कार्य, चाहे खेती हो या उद्योग, चाहे छोटा हो या बड़ा, एक दुसरे के पूरक बन सकें, न कि विरोधी l विषय जमीन की कमी का नहीं, योजनाबद्ध तरीके से जमीन के समुचित उपयोग के निर्धारण का है l जमीन को सट्टे की कु-व्यवस्था से मुक्त करने का है l

पिछले २०-२५ वर्षों में जमीनों के जो भाव १० से २० गुने (या उससे भी ज्यादा) बढ़े हैं उनके सही आंकलन करने की आवश्यकता है l क्या यह बढ़ोतरी ‘सट्टेबाजी के जरिये’ हुई या कि ‘सचमुच के पुरुषार्थ से नए-धन के निर्माण’ (क्रिएशन ऑफ़ वेल्थ) से हुई l जब किसी भी घर का भाव बढ़ता है, मालिक को स्वाभाविक ख़ुशी होती है, धनी बनने के एहसास से l वे यह भूल जाते हैं कि घर में एक और कमरा अपनी ही कमाई से बढ़ाना उसके बस में है या नहीं l

इंटरनेट के अविष्कार के साथ ही पूरी दुनिया एक नए युग में प्रवेश कर चुकी है l आज हर व्यक्ति एक मोबाईल फोन के जरिये सारे देश ही नहीं, विदेशों से भी जुड़ चुका है l यह एक मूलभूत परिवर्तन है, जो विज्ञान का वरदान बन कर हम सबको समान रूप से प्राप्त हुआ है l अब मनुष्य की भौगोलिक स्थिति उसकी उन्नति में कोई बड़ी रुकावट नहीं रही l गाँव में बसे व्यक्ति को विदेशों से भी व्यापार करने से अब कोई रोक नहीं सकता है l जो जितनी क्षमता और ज्ञान अर्जित करेगा, वह अपनी प्रगति कहीं भी रहकर कर सकता है l इस हिसाब से देखें, तो सरकार नयी नीतियों के जरिये पढ़ी-लिखी नयी-पीढ़ी को भी गाँव में विशेष रूप से आकर्षित कर सकती है l फिर चाहे डॉक्टर हो या टीचर, सोफ्टवेयर सीखे IT-विशेषज्ञ हो, या कि फुड-प्रोसेसिंग करने के इच्छुक उद्यमी l अच्छे रेजिडेन्शिअल स्कूल या कॉलेज या कि अच्छे अस्पताल गाँवों के आसपास प्रारंभ करना कोई बड़ी बात नहीं l अच्छे अनुभवी टीचर और डॉक्टर यदि स्वयं का ही स्कूल, कॉलेज, या अस्पताल बना सकेंगे (नीतियों के सहयोग से), तो गाँव में जाकर क्यों नहीं बनायेंगे? और जब अच्छे स्कूल, कॉलेज, या अस्पताल गाँव में उपलब्ध होंगे, तो धीरे धीरे शहर से बड़े बुजुर्ग भी क्या गाँव के खुले वातावराण में नहीं जाना चाहेंगे? यह सब तभी संभव हो सकेगा जब राष्ट्र की नीतियां ऐसी बने की नए गाँव शहरों के लिए वरदान बन जाएँ l समय आ गया है जब “रिवर्सल ऑफ माइग्रेशन” का नया मंत्र राष्ट्र में आर्थिक-योजना का आधार बने l

 

नयी नीतियों की एक झलक.

1)    नॉलेज-आधारित उद्यमों के लिए विशेष प्रयास तथा उनमें निवेश के लिए नयी पीढ़ी के लिए विशेष योजनायें (वित्तीय लोन, हाउसिंग, जमीन, इत्यादि) l जो उद्यम (कुटीर, लघु तथा भारी), क्षेत्रीय फसलों तथा खनिजों पर आधारित हों उनके लिए R&D के लिए इंस्टीट्यूशनल सप्पोर्ट l

2)    शहरों की जनसंख्या-घनत्व को सीमित रखना (लगभग ५ से ७ हज़ार प्रति स्क्वेअर कि मी अधिकतम), जिससे कि शहरों में निरर्थक भीड़ न बढ़े l नए आने वाले लोगों के लिए गाँवों की ओर ही नए वेल्थ-क्रिएशन अवसर तथा घर बसाने की जगहें उपलब्ध हो सके l

3)    गाँवों में नए ग्रोथ-केंद्र बने, जहां क्षेत्रीय व्यक्तियों को उद्यमी बनाने में प्राथमिकता मिले l उदाहरण के लिए, शहरों में बसे लोगों को शुद्ध तरकारी, शुद्ध दूध, शुद्ध और ताजे मसाले तथा अन्य कई प्रकार के खाने की शुद्ध वस्तुएं या कि हर वह चीज़ जो कुटीर व लघु उद्योग में बन सकती है, गाँव में बसे उद्यमियों के द्वारा आसानी से मिल सकती है l

4)    बिजनस-सेंटर्स शहरों से बाहर.. इंटरनेट कि ताकत का इस्तेमाल करते हुए, लगाये जा सकते है l सरकारी दफ्तर भी l इससे आसपास के गाँवों के कम पढ़े-लिखे लोगों के लिए भी सरल कार्य करने के स्थाई रोजगार अवसर घर के ही नजदीक उपलब्ध होंगे l शहर में बसे व्यक्ति थोड़ा बाहर यात्रा करेंगे तो गाँव की शुद्ध आबहवा का भी लाभ उन्हें मिलेगा l इस तरह बहुत सारे लोगों की आमदनी के स्रोत शहर में न रहकर, नए गाँव ही बने रहेंगे l और दूर के गांवों से भी जो लोग आना चाहेंगे, उन्हें इन्हीं नए  गाँवों में बसने की जगहें आसानी से मिल सकेगी l और शहारों में स्लम पैदा ही नहीं होंगे l

5)    भवन-निर्माण तथा FSI (फ्लोर-स्पेस-इंडेक्स) नीतियों को इस ढंग से बनाने की आवश्यकता है कि जमीनों तथा भवनों में सट्टा-निवेश करने वालों को कोई रूचि न रह पाए l जिन्हें सचमुच घरों में रहना है, तथा वेल्थ-क्रिएशन का कार्य करना है, उन्हीं के हिसाब से नए भवन बने l इससे अर्थ-व्यवस्था में नए अवसर पैदा होंगे, महंगाई पर नियंत्रण होगा, तथा हर व्यक्ति को संपन्न बनाने में मदद मिलेगी l जमीनों तथा भवनों के भावों का बेवजह बढ़ना, अर्थ-व्यवस्था के कमजोरी कि निशानी है न कि उन्नति की l घर एक मूलभूत आवश्यकता है हर परिवार के लिए; उसके सम्मान व सुरक्षा के लिये l घर का महंगा होना, परिवार को संपन्न नहीं गरीबी के करीब ले जाता है l

6)    एक नयी संरचना जिसमें पूरा समाज शहर-हो-या-गाँव एक ही माला में गुंथा हो … जैसे कि एक बगीचा होता है, जहां बरगद का बड़ा पेड़ होता है, तो नन्हे पौधे भी, मिट्टी को ढकती घांस भी; फलदार वृक्षों की श्रंखला होती है, तो महकने वाले फूलों की लताएं भी l हर व्यक्ति की क्षमता अलग अलग होती ही है l मगर हर किसी को अपनी स्वयं की पहचान के साथ सम्मानपूर्वक जीने का जो हक़ मिल सके, यही सच्ची मानव-सभ्यता की पहचान है l जहां उन्नति के मार्ग हर किसी के लिए वैसे ही खुले हों, जैसे कि पर्वत में चढ़ने वाला हर व्यक्ति अपने समय में अपनी रफ़्तार से एक दिन शिखर पर पहुँच सकता है, स्वयं के पुरुषार्थ से l इसलिए शहर को core में रखकर उन्नत गाँवों का जो एक बड़ा कैनवास है, उसकी डिजाईन के कुछ बिन्दु निम्न हो सकते हैं –

Ø  अलग-अलग स्थलों की भूमिकाएँ तथा प्राथमिकता तय करना, यह एक मूलभूत कार्य है l

Ø  इसमें घर-से-काम पर जाने में जो समय लगता है, उसका भी हिसाब है, ताकि हर व्यक्ति का समय बचे – उसके बच्चों के लिए व परिवार व समाज के लिए l जिस तरह आज बड़े शहरों में इंसान का कीमती समय यात्रा में बर्बाद होता है, तो उसके पास कहां से समय रहेगा किसी के भी लिए l

Ø  इसमें खेती से लेकर, कुटीर तथा भारी उद्योगों के निर्माण की प्लानिंग इसका उद्देश्य है l

Ø  इसमें कैसे गाँव के लोगों की आमदनी घर के निकट ही बढ़े इसका चिंतन है l शहर में स्लम कभी बने ही न l

Ø  गाँव में स्थित स्कूल व कॉलेज के जरिये कैसे शहरों में बसने वाले बच्चों को गाँव के जीवन का निकटता से परिचय हो सके, तथा वे गाँव की आत्मीयता में अभिभूत हो सकें l

Ø  वेल्थ-क्रिएशन के “शुभ-लाभ” के द्वारा पूरे समाज की उन्नति संभव हो, तभी स्वयं के पुरुषार्थ से हर किसी के संपन्न होने की पूरी सम्भावना बन सकेगी, चाहे उसके जीवन का प्रारंभ कहीं से भी, किसी भी स्तर से हुआ हो l

Ø  नए रूप में बने गाँवों में जनसंख्या-घनत्व अभी जो मात्र ३०० व्यक्ति प्रति इस्क्वेर कि मी है, ५ से १० वर्षों में ३००० तक पहुँच सके l और इस तरह नया भारत शहरों की नालियों पर बसे स्लम में न रह कर अपने ही उर्जावान गाँवों में, नए-नए सुंदर व बड़े घरों में रह सके l

 

गाँवों की गोद में बसे शहर … एक झलक

  • भारत के युवा को अपने सपने पूरे करने का अवसर अपने ही घर के आस-पास मिल सकेगा, चाहे वह शहरों में हो या गांवों में बसा हो l

 

  • २१वीं सदी के नए गांवों में ग्रोथ-केंद्र  का निर्माण ... भारत के युवाओं के लिए एक सुनहरा अवसर ! भारत की अर्थ-व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है कि युवा-उद्यमियों के लिए नए अवसर पैदा करना l अगले ५० से ६० वर्षों तक एक ऐसी वेल्थ-क्रिएशन श्रंखला चलती रहेगी, जिसके मुख्य किरदार की  भूमिका युवा-शक्ति की ही होगी l कितने ही युवा इन्जीनियर, डॉक्टर, मैनेजर, आर्किटेक्ट, आईटी सर्विस-प्रोवाइडर तथा अन्य विधाओं में निपुण नए-नए उद्यामिओं के लिए जो अवसर उपलब्ध होंगे, नए वेल्थ-क्रिएशन के l देश के अन्दर ही से नए धन की उत्पत्ति होती है, जब हर व्यक्ति का समय सार्थक कार्यों में लग पाता है l बड़ी कपनियों तथा विदेशी उद्यमियों की भी भूमिका बनी रहेगी, मगर जब तक गाँव की अर्थ-व्यवस्था अपने पैरों पर खड़ी नहीं होगी, वह भी युवा-उद्यमियों कि ताकत से, आज के शहर-केन्द्रित सट्टेबाजी से चलित विकृत अर्थ-व्यवस्था से छुटकारा संभव ही नहीं l गाँव की सम्पन्नता व स्वाभिमान, गाँव में ही वेल्थ-क्रिएशन करने की प्रक्रिया को स्थापित करने से संभव है l यह मिशन भारत के युवाओं के लिए २१वीं सदी की प्रेरणादायक चुनौती बन सकता है, जैसे कि १९४७ के पहले देश का मिशन स्वतंत्रता प्राप्त करना था l

 

  • भारत की आतंरिक अर्थ-व्यवस्था स्वयं के पुरुषार्थ व वेल्थ-क्रिएशन से सुदृढ़ हो न कि एफ़डीआई व एक्सपोर्ट के भरोसे… जब भारत का हर नागरिक अपने पूरे समय का पूरा उपयोग वेल्थ-क्रिएशन में कर पायेगा, तो भारत अपने अन्तः से समृद्ध होगा, बिना किसी भी प्रकार के विदेशी आर्थिक निवेश (FDI.. फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) पर निर्भरता  की बाध्यता के l यह अर्थ-व्यवस्था अपने ही स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों में अपने ही लोगों के द्वारा निवेश किये समय, ज्ञान व पुरुषार्थ के द्वारा निर्मित होगी l हर किसी प्रकार के ज्ञान को विश्व के किसी भी कोने से सीखते हुए l साथ ही अपने बनाये सामानों की विदेशों मे बिक्री (एक्सपोर्ट) भारत के लिए एक सम्मान का कारण जरूर बनेगी, मगर बाहरी बाजार पर निर्भरता विवशता नहीं बनेगी l

 

  • परंपरागत ज्ञान तथा कारीगरी व जुगाड़ की अद्भुत क्षमता… भारत के हजारों वर्षों के इतिहास में परंपरागत ज्ञान तथा कारीगरी लगातार बनी रही है – हर क्षेत्र में- जैसे स्वास्थ्य, आहार, कृषि, जड़ी-बूटियां, हस्त-कलाएं, इत्यादि l यह एक ऐसी धरोहर है जो अपना मूल्य खोती जा रही है गाँव के उजड़ने से l २१वीं सदी के नए गांवों को बनाने में ये ही करोड़ों लोग रीढ़ की हड्डी का काम करेंगे l स्किल-अपग्रेड के राष्ट्रीय मिशन में, इस समुदाय के लाखों उस्तादों व महा-उस्तादों की बहुत बड़ी भूमिका संभव है- जिससे कम समय मे बहुत बड़ी संख्या में नए कारीगर तैयार होंगे l ऐसा होने से भारत में आधुनिक टेक्नोलॉजी के साथ परंपरागत विधाओं का एक नवीन संगम हो सकेगा, जो कि हमारी अर्थ-व्यवस्था को पुनः एक अन्तःनिहित सुदृढ़ता प्रदान करेगा l समान्य भाषा में इसे जुगाड़ के नाम से विश्व-प्रसिद्धि भी मिल चुकी है l गाँव के सुदृढ़ होने से भारत की यह छुपी हुई शक्ति विश्व की बड़ी विदेशी इंजीनियरिंग कम्पनियों को अच्छी प्रतियोगिता भी दे सकेगी व नयी दिशा भी l

 

  • गाँव के जन-साधारण की सह-भागिता सम्भव... समान्यतः यह माना जाने लगा है कि जिस जनसंख्या को खेती में लगा माना जाता है (लगभग ५०%), उनमें से आधे शायद कोई खास कार्य नहीं जानते या करते l छिपा हुई बेरोजगारी l भारत के गांवों में बसे ऐसे करोड़ों साधारण नागरिक अभी जिस स्तर के स्किल-अपग्रेड को सीखने की क्षमता रखते है, उसे ध्यान में रखते हुए, नए गांवों के विकास में उनकी भागीदारी भी संभव हो सकती है l इससे उनकी नए वेल्थ-क्रिएशन की क्रिया में सीधी जिम्मेदारी तय हो पाएगी तथा इस कारण से वे सीधे लाभ के हकदार भी बनेंगे l मुफ्त में धन बांटने की प्रक्रिया ने एक तरफ किसानों के लिए खेती करना महंगा कर दिया है, दूसरी तरफ एक बड़े समुदाय को भ्रष्टाचारी व मुफ्तखोर बनाकर बर्बाद कर रहा है l गाँव के आत्म-सम्मान को खत्म कर कोई राष्ट्र कभी उन्नति नहीं कर सकता है l

 

  • भारत के रिटायर्ड ज्ञानी प्रोफेशनल्स जो स्वस्थ हैं, उनके लिए एक नया अध्याय होगा जीवन का, जब वे भारत की नये युवा उद्यमियों को मार्ग-दर्शन प्रदान कर पायेंगे, उन्हें ट्रेनिंग दे पायेंगे— मैनेजिंग की, टेक्नोलॉजी की, उद्यमिता की..अपने ही शहरों में या कि नजदीक में बन रहे गांवों के ग्रोथ-केन्द्रों में l

 

  • सरल जीवन-शैली, रिन्यूएबल-उर्जा, तथा वेस्ट-रिसायकलिंग... आज जिस हिसाब से शहरों के संपन्न व्यक्ति उर्जा खर्चते हैं, पुरे समाज के लिए यह कभी संभव ही नहीं हो सकेगा, जब तक कि कोई ऐसा अविष्कार न हो कि ऊर्जा हवा कि तरह सहजता से उपलब्ध हो l अतः यह स्वाभाविक ही है कि जन-साधारण सम्पन्नता के साथ तो जिए पर एक ऐसी सरल जीवन-शैली से कि उसकी उर्जा की आवश्यकता बहुत सीमित ही हो l कचरे की उत्पत्ति भी नगण्य हो l साथ ही हर व्यक्ति को एक अच्छी आबहवा से परिपूर्ण घर मिल सके, अपनी रूचि के हिसाब से कार्य मिल सके, तथा उसके समय पर उसका स्वयं का नियंत्रण हो सके l सरल जीवन-शैली एक सामाजिक उद्देश्य के रूप में संभव बनाना इस डिजाइन की विशेषता है l

 

  • पारिवारिक व सामाजिक मूल्य … सदियों से भारत में एक अमूल्य परंपरा बनी हुई है, जहां व्यक्ति का अपने परिवार तथा समाज के प्रति समर्पण एक अन्तःनिहित चेतना है l इस भावना के जड़ में मनुष्य का मनुष्य के प्रति धर्म का गहरा चिंतन है l जो कि आज भी भारत के गांवों में देखा व अनुभव किया जा सकता है l शहरों की मारा-मारी की जिंदगी में वह कहीं खोने सी लगी है l परिवारों के टूटन का दर्द बहुत पीड़ा दायक हो जाता है माँ-बाप के लिए l ऐसी स्थिति में सामाजिक मूल्यों की परवाह भला किसे होगी l गांवों की गोद में बसे शहरों में यह संभव हो सकेगा कि भारत की यह भावनात्मक चेतना एक नए सिरे से जागृत होगी तथा समाज में एक नयी समरसता का कारण बनेगी l इसके चलते ही समस्त समाज एक-दूसरे में गूँथा तथा सुरक्षित महसूस करता है l व्यक्तिवाद की अती में डूबी दुनिया के सामने, युगों-युगों से यही सामाजिक भाव भारत को दुनिया में विशिष्टता प्रदान करता आया है l इस अमूल्य भावना का आंकड़ों में कोई आंकलन हो ही नहीं सकता l

 

  • आर्थिक-विषमता से छुटकारा … आज के शहरों को देखें तो एक बड़ी पीड़ा का कारण है – वहां स्पष्ट दिखने वाली आर्थिक-विषमता l महंगे-महंगे कॉलोनियों के चारों ओर बने स्लम l किसी भी विचारशील व्यक्ति को यह अखरता ही होगा, भले ही हमें इसकी आदत सी पड़ जाती हो l जब गांवों में सम्पन्नता होगी तथा विकास के पूरे अवसर होंगे, तो न तो शहरों में स्लम होंगे और न ही गांवों में गरीबी l

 

  • बच्चों के विकास के लिए समय की उपलब्धता… बड़े शहरों में अधिकतर लोग घर से काम पर आने-जाने  में ही इतना समय (२ से ४ घंटे) गँवा देते हैं कि उनके पास अपने बच्चों तथा परिवार के लिए समय बचता ही नहीं l ऐसे में बच्चों के मानसिक व भावात्मक विकास में कमी रह जाने की पूरी सम्भावना रहती है l गांवों कि गोद में बसे शहर तथा गाँवों में बचपन की भावनात्मक उन्नति जीवन भर प्रेरणादायक बन पाएगी l इसी से पारिवारिक व सामाजिक मूल्यों का विकास बढ़ सकता है, जो कि अनमोल है l

 

  • क्रिएटीव चेतना का विकास.. जब तक कोई भी व्यक्ति रोजी-रोटी के जद्दोजहद से जूझता रहता है, उसकी  क्रिएटीव चेतना सोई पड़ी रहती है l जैसे ही व्यक्ति को समय की स्वतंत्रता  मिलती है, जिसमें वह अपनी मर्जी से कुछ भी कर सके – उसकी  क्रिएटीव चेतना जागृत होने लगती है l ऐसे में गाँवों में बसे शहर तथा उनसे प्रभावित गाँवों में नए अविष्कारों की सम्भावनायें बढ़ना हो सकेगा l
  • शहरों का विकास भी संतुलित हो सकेगा …उर्जावान गांवों से घिरे शहरों का विकास भी संतुलित होगा l यह गाँव इन शहरों के लिए नए-नए प्रयोगों को करने का स्थान बन सकेंगे तथा इससे गाँवों में भी सतत नए ज्ञान तथा ज्ञान-प्रणाली का विस्तार होगा l
  • महानगरों में छुपे हैं इंटेलेक्चुअल-करप्शन के बीज... बड़े शहरों की क्लिष्टता में उन लोगों का छूपा रहना बहुत आसान है, जो जन-सामान्य की मेहनत कि कमाई को हड़पने कि नयी-नयी तरकीबें बनाते रहते हैं l इसी कारण से समाज का ज्यादा धन इन्हीं कुछ लोगों के हांथों में सिमटा हुआ है l गांवों की गोद में बसे शहरों में सामाजिक मूल्यों के जीवित रहते इस प्रकार कि संभावनाएं नगण्य हो जायेंगी l शुभ-लाभ कमाने वालों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो सकेगी l
  • सरल व सहज सरकारी व्यवस्था … ग्राम-पंचायतों की बढ़ी हुई भूमिका के चलते, शहर और गांवों में निरंतर संवाद रहेगा, जिससे सरकारी व्यवस्था न केवल पारदर्शी होगी बल्कि अत्यंत ही सरल व सहज हो सकेगी l
  • सरकारी टैक्स का कम होना तथा उसका सदुपयोग होना … एक उद्यमी समाज जो सामाजिक मूल्यों की स्वस्थ परमपराओं में जीता हो, बहुत प्रकार की सरकारी व्यवस्थाओं का मोहताज नहीं होगा – जैसे कि समाज में पुलिस, सुरक्षा, टैक्स-कलेक्टर्स, ट्रेवल इत्यादी प्रकार के खर्च अत्यंत ही सीमित होंगे l अतः जहाँ एक ओर कम टैक्स कि आवश्यकता होगी, वहीं दूसरी तरफ टैक्स का इस्तेमाल भी सही होने की संभावना रहेगी l

 

२०१४ के चुनाव में, भारत के युवाओं ने एक नए नेतृत्व को पूर्ण बहुमत का अप्रत्याशित अवसर दिया है, इस आशा में – कि भारत एक समृद्ध राष्ट्र बन सके l छ्ह दशकों के लंबे इंतजार के बाद भारत बहुत व्यग्र है l आज तक, भारत की किसी भी सरकार ने भारत की उपर्योक्त अंतःनिहित “गाँव-केन्द्रित वेल्थ-क्रिएटिव संभावना” को पूरी तरह नहीं समझा है l गाँव-व-शहरों की यह नयी जुगलबंदी भारत की अर्थ-व्यवस्था को एक नया आयाम दे सकेगी l जहां समोत्कर्ष (सबका साथ – सबका विकास) बहुत दूर के भविष्य का सपना न होकर आज ही की सच्चाई बन सके l पूंजीवाद और कम्यूनिज़्म के भ्रमों से उबरकर, उद्यमी-विकेन्द्रीकरण का यह मार्ग वह तीसरा-रास्ता भी हो सकता है, जो विश्व की चरमराती हुई अर्थ-व्यवस्था को पुनर्जीवित करने की दिशा में एक नयी चेतना दे सके l

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1 Comment on "२१वीं सदी का भारत…. जहां शहर बसे गाँवों की गोद में !"

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Himwant
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पिछले लम्बे समय से गावँ तथा तृतीय श्रेणी के शहर प्रगति की दौड़ में पिछड़ गए है। प्रगति से मेरा मतलब सड़क, नाली निकास, भवन निर्माण मापदण्ड, सफाई, आदी की दृष्टी से पिछड़ गए है। लोग गाव से शहरो की और भाग रहे है क्योंकि ग्रामीण अर्थ व्यवस्था के विकास पर ध्यान नही दिया गया। तृतीय श्रेणी के शहरों में बड़े बड़े सुंदर रिटेल स्टोर (मोटरसाइकिल, कपड़ो आदी) खुल रहे जो वास्तविक ग्रामीण अर्थ तन्त्र का हिस्सा नहीं है, वहा व्यवस्थित तरकारी व कृषि बाजार बनने चाहिए। बेतरतीब मकान बन रहे है, सड़को का अतिक्रमण हो रहा है। अनेक राज्यो… Read more »
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