लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

netajiदेश में जब से धर्म और जाति की राजनीति शुरू हुई है तब से चुनाव की घोषणा होते ही देश राजनेताओ के लिये सियासी दंगल बन जाता है पर इस बार देश का सियासी दंगल चुनाव की घोषण होते ही धार्मिक दंगो और हिंदू मुसलमान में गहरी खाई बनाने के साथ ही नफरत भी पैदा कर रहा है जो आने वाले वक्त में देश हित में न होने के साथ ही देश और देशवासियो के लिये एक गम्भीर समस्या बन कर देश की एकता और अखंडता के लिये बहुत बडा खतरा बनता नजर आ रहा है। देश की राजनीतिक पार्टिया जाति, धर्म और आरक्षण का जो खेल, खेल रही है यकीनन उससे भी हिंदू मुसलमानो में तनाव पैदा होने के साथ ही देश की एकता उस से देश की एकता अखडंता खतरे में पडने के साथ ही समाज में अराजिकता फैलने की पूरी आशंका बढती जा रही है। देश में हो रही जाति धर्म की इस गंदी राजनीति ने एक दूसरी के प्रति हम लोगो में ऐसी नफरत पैदा कर दी है कि आज देश के हालात बहुत ही नाजुक हो गये है। जाति धर्म की राजनीति करने वाले देश के कुछ राजनेताओ और राजनीतिक पार्टियो की दखल अंदाजी के कारण अब जरा जरा सी बात बडे बडे सामप्रदायिक दंगो का रूप ले लेती है।

पिछले दिनो हम सब ने देखा है कि जैसे ही दिल्ली सहित चार राज्यो में चुनाव की घोषणा हुई देश के ज्यादातर राजनेता और राजनीतिक पार्टियो एक दूसरे को नंगा करने में लग गई थी। जब कि हम सब पहले से ही जानते है कि राजनीति के इस हमाम में ये ये सारे लोग ही नंगे है। राजनीति में जब से अपराधियो ने प्रवेश किया है शरीफ और खानदानी लोगो ने राजनीति से तौबा कर ली है। ये ही कारण है कि देश की संसद और देश की विधान सभाओ में आज जो मारपीट गाली गलौच और माननीयो द्वारा विधानसभओ में बैठ कर जो पार्न फिल्मी देखी जा रही है ये सब आने वाले समय में घटने वाला नही है बल्कि हो सकता है कि आने वाले वक्त में संसद और विधान सभाओ में मर्डर, अपहरण और न जाने क्या क्या हो। वही दूसरा बडा सवाल ये उठता है कि आने वाले समय में अगर शरीफ, पढे लिखे, खानदानी लोग राजनीति में नही आयेगे तो देश की संसद भवन और विधान सभाओ का दृष्य कैसा होगा ये भी सोचा जा सकता है।

दिल्ली में इस बार विधानसभा चुनावो में 28 सीटे जीतने वाले आम आदमी पार्टी के केजरीवाल ने पिछले दिनो कहा था कि वो ऐसी ’’संसद का सम्मान नही कर सकते जिस में गुंडे बैठते हो। ’’बाबा रामदेव ने भी छत्तीसगढ़ दुर्ग से अपनी महीने भर लम्बी यात्रा की शुरूआत में ही देश की संसद और सांसदो से पंगा लेते हुए ये कह कर पूरे देश में भूचाल मचा दिया था कि ‘‘ देश की संासद में बैठे ये वो लोग है जो देश की परवाह नही करते, किसान से प्यार नही करते, देश के श्रमिको और लोगो को नही चाहते, ये लोग धन के दोस्त और गुलाम है। ये लोग अशिक्षित, डकैत और हत्यारे है। ये लोग मानव रूप में राक्षस है जिन्हे हमने चुना है वो इस लायक नही है।’’ इस बीच बाबा ने अपने बचाव के लिये ये भी कहा था कि कुछ अच्छे सांसद भी है जिन का हम सम्मान करते है। आखिर ये सब क्या है, ये कैसी परम्परा डाली जा रही है। कभी अरविंद केजरीवाल एक कार्यक्रम के दौरान सांसदो को हत्यारे बलात्कारी कहते हुए 14 मंत्रियो पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते है। कभी किरन बेदी रामलीला मैदान में सांसदो को ये कह कर ज़लील करती है कि सांसदो के दो चेहरे होते है ये लोग एक मंच पर कुछ कहते है तो दूसरे पर कुछ। कभी प्रशांत भूषण कथित रूप से आपत्तिजनक टिप्पणी करते है। लोकपाल बिल, काले धन और भ्रष्टाचार को लेकर देश में जब से संघर्ष होना शुरू हुआ है लोग बिना सोचे बिना विचारे सांसदो, विधायको को निशाना बना रहे है। जब कि किसी को भी संसद और सांसदो, विधायको का इस प्रकार अपमान करने का अधिकार नही क्यो कि ये सब जनता के प्रतिनिधि है। वही ये सब लोग देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया से ही सांसद और विधायक बने है। हम ऐसे बयानो से कह सकते है कि इस तरह के बयानो से संसद और विधानसभाओ रूपी लोकतंत्र के मंदिरो, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओ और देश की जनता का अपमान है।

वही आज देश के राजनीतिक गलियारों में सिर्फ एक ही बहस छिड़ी हुई है कि 2014 का प्रधानमंत्री कौन बनेगा। कुछ लोग कहते हैं कि राहुल गांधी बनेंगे तो कुछ लोग कहते हैं कि मोदी का नाम सबसे ऊपर है। वहीं एनसीपी शरद पंवार को प्रधानमंत्री बनाने के सपने संजोए बैठी है तो समाजवादी पार्टी अपने मुखिया मुलायम को प्रधानमंत्री बनते हुए देखना चाहती है। मायावती कहती है कि दलितों की रक्षा के लिए उनका प्रधानमंत्री होना बहुत ज़रुरी है। देश हित और आम आदमी और उस की मर्जी की बात आज कोई दल कोई राजनेता करने या सोचने को तैयार नही है। वो क्या चाहता है क्या सोचता है उस की क्या मर्जी है वो किन उम्मीदो से कैसे प्रधानमंत्री के सपने संजोकर बैठा है ये तो किसी ने नहीं सोचा। कांग्रेस, भाजपा जो देश की सबसे बड़ी पार्टी हैं वो हिन्दू और मुसलमान के मुद्दों पर ही उलझ रही है। बीजेपी ने एक बार फिर से राम मंिदर का मुद्दा उछाल दिया है कहती है कि वो राम मंदिर बनाने को तवज्जो देती है अगर जनता ने उसे दिल्ली की बागडोर दी तो वो मंदिर जरूर बनायेगी।

आज वोट बैक की राजनीति ने संसद और विधानसभाओ के स्तर को बहुत नीचे ला कर रख दिया है। आज देश में जाति, धर्म और वोट बैंक की इस लडाई में देश के दो नुकसान हो रहे है एक तो हम हिंदू मुसलमानो में नफरत बढ रही है दूसरे इस लड़ाई में आज आम जनता के रोज़ाना की दिनचर्या से जुड़े वो सारे सवाल पीछे छूट रहे हैं जिनसे उसका रोज सामना होता है। वही धर्म, जाति की वोट बैंक की इस राजनीति ने देश और देश की संसद और विधानसभाओ को सब्जी मंडी बना कर रख दिया है ऐसे में सवाल ये उठता है कि आखिर कैसे बचे देश की संसद और विधानसभाओ की गिरती साख?।

 

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