लेखक परिचय

रवि कुमार छवि

रवि कुमार छवि

(भारतीय जनसंचार संस्थान)

Posted On by &filed under चिंतन.


-रवि कुमार छवि-

random-thoughts1
रात के करीब 10 बजे है। रसोई में रखे खाली बर्तन निशब्द थे. पिंकी और सोनू आज जल्दी सो गए थे.रसोई में लगा एक बल्ब पूरे घर को रोशन कर रहा था। आज राधिका की बहुत याद आ रही थी सोचा कि एक खत लिख दूं । सोचा कि दवाई पी लूं खांसी भी आज ज्यादा है। कमबख्त रुकने का नाम भी नहीं ले रही। शीशी का ढक्कन खोला और दवाई पीकर एक ओर रख दी।
प्रिय राधिका
जब से तुम गई हो मेरा बिल्कुल भी मन नहीं लगता. तुम दूर क्या गई अपने भी पराए हो गए. पता है सोनू और पिंकी तुम्हें रोज़ याद करते है। कहते है पापा-पापा मां कहां गई, मां कब आएगी, क्या वो हमसे नाराज़ है या हमे छोड़कर कहीं चली गई है। और ना जाने ऐसे ढेरो सवाल जिनके जवाब देते-देते मेरी वफा भी दब जाती है।
अक्सर स्कूल जाने के समय दोनों आपस में लड़ते रहते है। कहते है मां ही हमे तैयार करेगी. मां हमे बहुत जल्दी तैयार कर देती है। इस तरह के शब्दों से मेरी कलम भी कुछ देर ठहर सी जाती है। जैसे वो ना चलने की जिद कर रही हो। पता नहीं मेरी मुहब्बत में क्या कमी रह गई। मैं अपने लफ्जों में तुम्हें बता नहीं सकता कि तुम्हें कितना चाहता हूं. प्लीज बच्चों के लिए जल्दी आ जाओ. देखों आज भी भूखे सो गए बच्चे।
हवा अपने पूरे रौब में थी देखकर ऐसा लगता कि मानो कोई तूफान आने वाला हो. तेज हवा से दरवाजा बार-बार आवाज करता। बावजूद इसके कलम कागज पर अपनी मंजिल तलाशती रहती। दीवार घड़ी मेरी सोच से भी आगे बढ़ रही थी, उसकी सेकेंड की सुइयों से लेकर मिनट तक की सुइयों की आवाज मेरे कान तक पहुंच रही थी.
पिंकी और सोनू अभी भी बड़े इत्मीनान से सो रहे थे. उनकी भूख उनकी जिद के सामने लाचार सी थी..लिखते-लिखते थोड़ी थकान हो गई तो चश्मा उतारकर कुछ देर दोनों हाथों को आराम के नजरिए से छोड़ दिया।
इस बीच ना जाने कब राधिका के ख्यालों में खो गया पता नहीं चला। उस वक्त को याद किया जब हम दोनों पहली बार मिले थे। उस दिन बहुत तेज बारिश हो रही थी। मैं पूरी तरह से भीग चुका था.एक लड़की जो मुझसे कुछ ही दूरी पर थी तरस की निगाहों से देख रही थी. इतने में मैं, कुछ कह पाता वो मेरे पास छाता लेकर आई और बोली इधर आ जाइए वरना आप भीग जाओगे। मैं, तो जैसे इसी पल का इंतजार कर रहा था. मानो खुशियों ने बाहों में भर लिया हो। लगा बादल जैसे मेरे लिए बरस रहे थे. बस फिर से भीग जाने का मन था।
इस तरह शुरुआत हुई हमारी मुलाकात की। उसके बाद ये सिलसिला यूं ही चलता रहा। एक दिन मौका पाकर मैंने राधिका को प्रपोज कर दिया और उसने भी बिना देर किए हां बोल दिया। फिर मुहब्बत की हमारी कहानी आगे बढ़ी जिसमे मैं और वो मुख्य किरदार थे। परिवालों की रजामंदी तो नहीं थी लेकिन फिर भी हम दोनों ने मंदिर में शादी कर ली। उसे पाकर ऐसा लगा कि मेरा जहां मुकम्मल हो गया।
मानो उसने मुझे नई जिंदगी दे दी हो मैं, अब हर पल उसके साथ जीने लगा था। उसकी नीली आंखें ना कहकर भी बहुत कुछ कहती थी. वो जब हरे रंग का सलवार-कमीज पहन कर मेरी आंखें बंद कर मुझे चूम लेती थी. मैं भी उसे बांहों में भर लेता था. इस खुशी को बयां करने के लिए शायद मेरे पास लफ्ज़ भी नहीं हैं. वक्त का पहिया भी कैसे घूमता है. मुझसे बेहतर कौन जा सकता है। जिस खुशी के लिए अपना घर छोड़ा जिसके लिए रिश्तेदारों से रिश्ते तोड़े। वो शादी के बाद इतनी बदल जाएगी मालूम ना था।
अनायास से खाली गिलास गिरता है। गिलास को सीधा कर अतीत की उन गलियों से वापस वहीं जाता हूं जहां सिर्फ खामोशी की मौजूदगी है।
फिर से अपने खत को आगे लिखने लगा। पता नहीं इस खत का क्या जवाब आएगा. शायद मेरी गलती ही थी जो मैं तुमको समझ नहीं पाया। पता है जबसे तुम हो गई हो परिवारवालों ने नाता तोड़ लिया है कहते हैं कि कैसी लड़की से शादी कर ली ना चाल ठीक थी ना चलन। हम तो तुम्हें पहले ही कहते थे लेकिन तुमने हमारी एक भी नहीं मानी। तुम्हारे बारे में बहुत बुरा कहते है लेकिन मैं जानता हूं कि तुम सिर्फ और सिर्फ मुझसे ही प्यार करती हो। तुम मुझे कभी धोखा नहीं दे सकती। खत जितना आगे बढ़ता मेरे आंखे उतनी ही नम होती। कुर्सी पर अब थोड़ा झुककर लिखने लगा था। आज दौलत होती तो मेरे बच्चे भूखे ना सोते राधिका मुझे छोड़कर नहीं जाती। एक बार फिर से मेरी आंखे नम हुई बस इस बार फर्क सिर्फ इतना था आंसुओं ने अब खत को अपना आशियाना बना लिया था। बारिश के कारण छत भी टपकने लगी थी। बिजली कड़कने से लाइट भी चली गई थी। बस, एक लालटेन के सहारे खत को पूरा करने की कवायद में था।
लालटेन की हल्की रोशनी में दीवार पर उसकी और मेरी तस्वीर को देखा जा सकता था। यकीन नहीं हो रहा था कि वो मेरे अलावा भी किसी और को चाह सकती है. उसने ऐसा करते हुए हमारे बच्चों के बारे में भी नहीं सोचा कि उसके बिना सोनू और पिंकी का क्या होगा। अब रोज सोनू और पिंकी एक ही सवाल पूछते है पापा-पापा मम्मी कब आएंगी उनकी मासूम आंखों भी उनके मां के आने का ख्वाब देखती है। मैं, अब थक रहा हूं उनके सवालों के झूठे जवाब देते–देते मेरी हिम्मत भी अब मेरा साथ छोड़ रही है.
मैं अपने बच्चों से झूठ नहीं बोल सकता था. इसलिए तय कर लिया कि अब मौत को गले लगाऊंगा.
लेकिन क्या करुं मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है। मगर, मैं कायरों की तरह जी नहीं पाउँगा फिर सोचने लगा क्या मैंने गलत तो नहीं किया उससे शादी करके। इतना लिखते ही मेरे हाथ कांपने लगे सांसे हाफने लगी मुंह से झाग निकलने लगा। मैं, लड़खड़ाकर नीचे गिर गया. आंखों के आगे अंधेरा छा गया। सिर चकराने लगा। लगता है आज ज़हर भी राधिका की तरह बेवफा सा हो गया है। गिरते पड़ते अपने बच्चों को आखिरी बार देखा जो बड़े ही प्यारे और मासूम से दिख रहे थे और उन्हें देखते –देखते आंखे बंद गई हमेशा के लिए। लालटेन अब बुझ चुका था।
अगली सुबह शांत थी। चारो ओर गम छाया हुआ था. चिड़ियाएं चहक जरुर रही थी लेकिन दर्द उन्हें भी था. वो जो उन्हें खाना खिलाता था। आज खुद भूखा सो गया। घर के बाहर भीड़ इकट्ठा थी. पुलिस की एक गाड़ी भी खड़ी थी. एक फोटोग्राफर अलग-अलग एंगल से फोटो खींच रहा था. सोनू रो रहा था मगर पिंकी कह रही थी भैय्या आप रो क्यों रो रहे हो पापा को क्या हो गया। सोनू उसे गले लगाते हुए बोला कुछ नहीं हुआ पिंकी पापा सो रहे है और इस बार वो फिर से रोया लेकिन आंसू नहीं निकले।
पुलिस ने कमरे की तफ्तीश की कमरा बेहद साधारण सा दिख रहा था.खाली गिलास कल रात के बारिश के पानी से भर चुका था. रात को लिखा हुआ खत खामोशी से जिंदगी की गम की किताब लिख चुका था। पुलिस ने खत को ध्यान से देखा जो कल रात हुई बारिश के पानी से थोड़ा धुंधला हो चुका था। लेकिन एक कड़वी सच्चाई को साफ तौर पर पढ़ा जा सकता था. जिसके अंतिम शब्द थे। लौट आओ तुम , मैं, तुमसे बहुत प्यार करता हूं, सोनू और पिंकी तुम्हें बहुत याद करते है प्लीज लौट आओ।

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz