लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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anglo indianभारत में एंग्लो इंडियन (आंग्ल भारतीय/आ.भा.) कितने हैं, इसके  ठीक आंकड़े उपलब्ध नहीं है। देश में कई स्थानों पर ये रहते हैं; पर इन्हें संविधान द्वारा कई विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। भारत में अंग्रेजी शासन के दौरान अधिकांश अंग्रेज अधिकारी अकेले ही रहते थे। ऐसे में उनके कई भारतीय महिलाओं से वैध/अवैध सम्बन्ध बन गये। उनसे उत्पन्न संतानें ही आ.भा. हैं। इनमें अपवाद स्वरूप कुछ लोग होंगे, जिनके पिता भारतीय और मां अंग्रेज थी। अन्यथा सभी के पिता अंग्रेज और मां भारतीय हैं।

1947 में जब अंग्रेज वापस गये, तो वे इन तथाकथित पत्नियों और बच्चों को यहीं छोड़ गये; पर जाते-जाते वे इनके लिए कुछ विशेष अधिकारों का प्रावधान करा गये। इसके लिए फ्रैंक एंथोनी ने नेहरू जी से कहा था। संविधान लागू होने के दस वर्ष बाद ये अधिकार समाप्त होने थे; पर अब तक छह बार ये बढ़ाये जा चुके हैं।

अनुच्छेद 331 के अनुसार राष्ट्रपति महोदय लोकसभा में दो आ.भा. सदस्य मनोनीत कर सकते हैं।

अनु. 333 के अनुसार राज्यों की विधानसभा में एक आ.भा. विधायक मनोनीत किया जा सकता है।

अनु. 336 (1 व 2) के अनुसार आ.भा. को नौकरियों में आरक्षण प्राप्त है।

अनु. 337 के अनुसार आ.भा. छात्रों को शिक्षा में विशेष अनुदान का प्रावधान है।

स्वाधीनता के 67 साल बाद यह प्रश्न विचारणीय है कि जो असली  आ.भा. थे, उनमें से अब कितने बाकी हैं ? अब जो हैं, वे तो तीसरी पीढ़ी के लोग हैं। 67 साल बाद भी वे पूरे भारतीय क्यों नहीं हुए ? सोचना यह भी चाहिए कि इनका भारत की उन्नति में क्या योगदान है ? उदाहरण के लिए उत्तराखंड को लें। मसूरी में इनके चार-छह परिवार हैं। इनमें प्रसिद्ध लेखक रस्किन बांड और अभिनेता टॉम ऑल्टर भी हैं। कुछ परिवार रुड़की, देहरादून, लैंसडाउन, नैनीताल, अल्मोड़ा आदि में भी हैं। कुल मिलाकर इनकी संख्या एक हजार से भी कम है। फिर भी इनमें से एक विधायक मनोनीत किया जाता है। सत्तापक्ष द्वारा मनोनीत होने के कारण इन सांसदों और विधायकों की भूमिका सदा उनके समर्थन की ही होती है। सार्वजनिक जीवन से अलग-थलग रहने के कारण सदन की चर्चाओं में इनका योगदान प्रायः शून्य ही होता है। जनप्रतिनिधि के नाते मिलने वाली सुविधाओं का लाभ इनके मजहब और समुदाय वालों को ही होता है। ऐसे में इनकी विशेष सुविधाओं का क्या औचित्य है ?

इन दिनों तेलंगाना और आंध्र के मुख्यमंत्रियों के बीच जो विवाद चल रहा है, उसके मूल में भी एल्विस स्टीफंेसन नामक मनोनीत आ.भा. विधायक है। चंद्रशेखर राव का आरोप है कि चंद्रबाबू नायडू ने उसे रिश्वत देकर विधान परिषद चुनाव में तेलुगुदेशम पार्टी के प्रत्याशी के पक्ष में वोट देने का आग्रह किया था।

आ.भा. प्रतिनिधियों को मिलने वाली सुविधाओं का एक और पहलू देखें। ये सब लोग ईसाई हैं। अतः इन्हें अल्पसंख्यकों के नाते भी कुछ आरक्षण मिलता है। दूसरी और ये आ.भा. होने की सुविधा का लाभ भी उठाते हैं, जबकि ये सब सुशिक्षित और सम्पन्न हैं। पढ़-लिखकर विदेश चले जाने से इनकी संख्या घट भी रही है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अल्पसंख्यक की धारणा मुख्यतः रक्तवंश के आधार पर की जाती है। इस दृष्टि से भारत में यहूदी और पारसी ही अल्पसंख्यक हैं; पर इन्होंने कभी कोई आरक्षण नहीं मांगा। इसके बावजूद उन्होंने सदा उच्च स्थानों पर काम किया है। देश की उन्नति में उनका योगदान सराहनीय है। पीलू मोदी पारसी होते हुए भी सार्वजनिक जीवन में सक्रियता के कारण दो बार गोधरा से लोकसभा सांसद बने। अर्थात यदि कोई सामाजिक रूप से सक्रिय हो, तो जनता उसे स्वयमेव अपना प्रतिनिधि बनाएगी; पर समाज से अलग रहते हुए केवल आ.भा. होने के कारण प्रतिनिधि बनाना जनता के धन और अधिकारों का दुरुपयोग है।

लगता है हम आज भी गुलाम मानसिकता में जी रहे हैं। तभी तो हमें गुलाम बनाने वालों की संतानों को विशेषाधिकार मिल रहे हैं; क्या यह स्वाधीनता सेनानियों का अपमान नहीं है ? इन लोगों को भी चाहिए कि वे अब मालिकों के वंशज की भूमिका छोड़कर स्वयं को पूरा भारतीय मानें। संविधान में संशोधन कर इनकी विशेष सुविधाएं समाप्त होनी चाहिए, जिससे वे एक आम भारतीय जैसा प्यार और सम्मान पूरे देश में पा सकें।

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