लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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railपिछले दिनों 21 जून को पूरी दुनिया में ‘योग दिवस’ मनाया गया। इससे बाकी लोगों को कितना लाभ हुआ, ये तो वही जानें; पर हमारे शर्मा जी में एक चमत्कारी परिवर्तन हुआ। उनके पड़ोसी गुप्ता जी ने उन्हें रोज कुछ देर ‘शीर्षासन’ करने की सलाह दी थी। पहले तो शर्मा जी ने सिर नीचे और पैर ऊपर करने को महज बेवकूफी माना; पर कुछ दिन बाद ही वे इसके मुरीद हो गये।

असल में हुआ यों कि जैसे ही वे उल्टे खड़े होते, उनकी बुद्धि सीधी हो जाती। उन्हें लगता मानो अब वे हर बात को ठीक ढंग से सोचने लगे हैं। अतः वे क्रमशः शीर्षासन का समय बढ़ाने लगे। एक बार तो उन्होंने इसी स्थिति में कुछ लिखने का भी प्रयास किया। यद्यपि वे इसमें सफल नहीं हो सके। एक दिन उन्हें किसी विषय पर गहन चिंतन करना था, तो वे तीन घंटे तक लगातार शीर्षासन की मुद्रा में ही रहे। इसके बाद वे सीधे खड़े हुए, तो चक्कर आने लगे। इससे उनकी मैडम घबरा गयी। वे भागकर गुप्ता जी को बुला लायीं। उनके सहयोग से शर्मा जी सामान्य स्थिति में आ सके।

इसके बाद गुप्ता जी ने उन्हें बताया कि उनकी बुद्धि के कपाट अब पूरी तरह खुल गये हैं। अतः वे शीर्षासन की बजाय कुछ और आसन करें। शर्मा जी अब उन आसनों को करने लगे; पर बीच-बीच में वे चुपचाप शीर्षासन भी कर लेते थे। हम मित्र लोग जब सुबह-शाम पार्क में मिलते थे, तो ये साफ लगता था कि शर्मा जी के चिंतन-मनन की धार अब क्रमशः तेज हो रही है।

इन दिनों दिल्ली में स्थानीय रेल प्रणाली पर चर्चा हो रही है। यहां भी साल-डेढ़ साल में काफी परिवर्तन हुए हैं। मोदी के नेतृत्व में भा.ज.पा. को लोकसभा में पहली बार बहुमत मिला। दूसरी ओर केजरी ‘आपा’ को दिल्ली में इतनी सीट मिल गयीं कि उनकी चादर ही छोटी पड़ गयी। दोनों लोकप्रियता की ‘जनता मेल’ पर सवार होकर आये हैं। इसलिए अब पांच साल जनता ही जाने।

पर ये दोनों ही बड़े बीहड़ किस्म के लोग हैं। एक देश में बुलेट ट्रेन का सपना परोस रहा है, तो दूसरा दिल्ली में मोनो और मिनी रेल का। कल मैं शर्मा जी के घर गया, तो इसी बात पर चर्चा होने लगी।

– वर्मा जी, मैं ‘बुलेट ट्रेन’ का तो नहीं, पर उसके नाम का विरोधी हूं। बुलेट का अर्थ है गोली; और गोली यानि खूनखराबा। इसलिए इसका नाम ‘सरपट रेल’ होना चाहिए। क्योंकि यह पटरियों पर सरपट दौड़ती चली जाएगी।

– लेकिन शर्मा जी, आपकी सरपट रेल तो अमदाबाद से मुंबई तक चलेगी; और इन दोनों के बीच में दिल्ली नहीं आता। फिलहाल तो बात दिल्ली की स्थानीय रेलगाड़ी की हो रही है।

– हां, सुना है केजरीवाल साहब दिल्ली में मोनो रेल की बात कह रहे हैं। वैसे वर्मा, ये मोनो रेल होती कैसी है ?

– ये तो मुझे भी नहीं पता शर्मा जी। दिल्ली में मैट्रो चलती है, जो कभी धरती के अंदर जाती है, तो कभी धरती के ऊपर। हो सकता है मोनो रेल पानी में तैरती और आकाश में उड़ती हो।

– पर मैंने सुना है कि ये एक ही पटरी पर चलने वाली रेल है ?

– फिर तो शर्मा जी इससे भगवान ही बचाये। एक आदमी की सरकार के नजारे हम दिल्ली में नीचे भी देख रहे हैं और ऊपर भी। अब एक पटरी वाली रेल आ गयी, तो फिर…।

– और ये मिनी रेल… ?

– हो सकता है ये बिना पटरियों के चलती हो। जैसे पहाड़ी पर्यटन स्थलों में रस्सी पर छोटे-छोटे बक्सों में तीन-चार लोग चलते हैं। शायद ये वैसी ही कोई चीज हो ?

– लेकिन रेल तो और भी कई तरह की होती हैं ?

– जी हां। कोलकाता में दो डिब्बे वाली ट्राम चलती हैं। उनकी पटरियां सड़क पर ही बिछी रहती हैं। पैदलयात्री, साइकिल, रिक्शा, स्कूटर, कार और ट्रामगाड़ी..; सब एक ही सड़क पर चलते हैं। कार और स्कूटर वाले भले ही आपस में टकरा जाएं; पर ट्राम किसी से नहीं टकराती।

– फिर तो ये हमारे यहां भी होनी चाहिए। यहां दिल्ली सरकार और केन्द्र सरकार टकराना छोड़ दें, तो आम आदमी का बड़ा भला हो। अभी तो दोनों एक-दूसरे से लड़ने के नित नये बहाने ढूंढते रहते हैं।

– पहले पुरानी दिल्ली में ट्राम चलती थी; पर फिर बंद हो गयी। सुना है अब फिर से उसकी कोशिश हो रही है; पर कभी-कभी लाइट टेªन की भी बात सुनाई दे जाती है।

– वर्मा जी, दिल्ली में जिस गति से पूरे देश से लोग काम की तलाश में आ रहे हैं, उस हिसाब से तो टेªन लाइट हो या टाइट, सब फेल हो जाएंगी। इसलिए अब एक ही रास्ता है ‘गाड़ी नंबर ग्यारह’।

– मैं समझा नहीं शर्मा जी ?

– जिस गाड़ी का प्रयोग हम सब सुबह और शाम को करते हैं। यानि पैदल चलना । इसे जितना अधिक अपनाएंगे, उतना ही शरीर स्वस्थ रहेगा और प्रदूषण से भी अपना शहर बचा रहेगा। एक-दो कि.मी. दूर जाना हो, तो इस ग्यारह नंबर की गाड़ी से अच्छी कोई चीज नहीं है। दो-चार लोग साथ हों, तो फिर कहना ही क्या ? जैसे हम लोग आपस में बात करते हुए घंटों घूमते रहते हैं। इससे तन और मन दोनों ठीक रहते हैं। छोटे-मोटे घरेलू काम भी इसी गाड़ी की सहायता से कर सकते हैं।

– और कहीं दूर जाना हो तो … ?

– तो फिर मिनी से लेकर मोनो तक, लाइट से लेकर टाइट तक और मैट्रो से लेकर बुलेट तक, जो चाहे ले लो।

शर्मा जी के इस विश्लेषण से मैं हैरान रह गया। योग का इतना तेज प्रभाव मैंने पहली बार ही देखा था। काश, वे लोग भी इसे समझें, जिन्हें इसमें मजहबी और साम्प्रदायिक बदबू आ रही है। धरती, आकाश या पाताल में योग करने में परेशानी हो, तो फिर रेल का डिब्बा तो है ही; लेकिन उसकी छत पर योग करने की भूल न करें, वरना सीधे ऋषि पतंजलि के पास पहुंच जाएंगे।

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