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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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रविन्द्र शर्मा

अतीत की उम्मीद और भविष्य -वर्तमान के भरोसे  का टूटना, कुछ ऐसी ही धुंधली तस्वीर बन चुकी है  आज AAP की। नवंबर 2013 में AAP आम आदमी के
लिए लांच की गई लेकिन आज विवादों के शो पीस  के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा। मिडिल  क्लास के लिए magni show के हीरो बनकर आए
अरविंद आज एक विवादित मुख्यमन्त्री बन चुके हैं और  लोग भी उनके पुराने भाषण, बातें, दावे और वायदे  भूलकर आने वाली कोई नई उम्मीद के इंतजार में लग
गए। जिस लोकपाल के लिए वो बेहद भावुक थे,  उसका दोबारा चुनाव जीतने के बाद शायद ही  कभी भूल से ही नाम भी लिया हो या लोकपाल के
लिए राष्ट्र स्तर पर उनकी पार्टी की कोई मुहिम  चल रही हो, किसी को भी नजर नहीं आ रहा।
क्या अभी यह कहना जल्दबाजी नहीं होगी कि  उनके तमाम आंदोलन सत्ता के गलियारों में खुद की  स्थापना के लिए ही थे।  राजनीति के घोर निराशावादी दौर को बडे़ ही
अदब तरीके से पहचानते परखते हुए उन्होंने अन्ना हजारे  के साथ लोकपाल के नाम पर एक प्रायोजित  जनांदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर जन्म दे ही दिया।
जब देश कोयले की कालिख से लेकर 2G के तारों व  CWG से लेकर हजारों छोटे मोटे दागों से सारी  उम्मीदें खो चुका था और विपक्ष अपनी सुस्ती में
मस्त था ही तो अरविंद ने उस दौर को बखूबी  इस्तेमाल करते हुए खुद को मीडिया की मंडी में एक  क्रांतिकारी के रूप में स्थापित कर ही दिया, शायद
यही अरविंद की खूबी और चाह भी थी।अरविंद  जमीन से ज्यादा मीडिया की उपज तो थे ही  लेकिन मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद
मीडिया के कम फोकस के बाद उन्होंने दिल्ली की  जमीन पर तो व्यापक रूप से स्थापित कर ही दिया।  49 दिन के अच्छे दिन (शासन) के बाद के नाटकीय
घटनाक्रम से लेकर दिल्ली चुनाव नतीजों के  एतिहासिक 11 फरवरी तक का दौर तो सिर्फ खुद   की स्थापना से लेकर कुर्सी को हासिल करने के
लिए ही था। तो क्या परिवर्तन NGO से लेकर सूचना  के अधिकार कानून में अरविंद की भागीदारी सिर्फ  खुद को पावरप्ले में उतारना ही थी? क्या उनके
लिए सिर्फ कुर्सी ही सच्ची थी और सब झूठ।  इतने कम समय में आप के विवाद इतने ज्यादा है कि  लिस्ट बनाई जाए तो शायद पेपर ही कम पड़
जाएगा। विवादों के गणित में तो उनका प्रदर्शन  अच्छे पिच पर भी विकेटों की झड़ी लगने से कम नहीं  है। जीतने के बाद जिस तरह उन्होंने योगेन्द्र -प्रशान्त
को पहले तो PAC से और बाद में पार्टी से बाहर का  रास्ता दिखाया, जो कि पार्टी के संस्थापक व  महत्वपूर्ण सदस्यों में थे, इस विवाद में तो पार्टी की
इतनी फजीहत हुई, इतने स्टिंग व आडियो सामने आए,  कि दिल्ली की जनता शायद अपने ही दिये  शानदार जनादेश पर पछतावा कर रही होगी।
महत्वपूर्ण पदों पर अधिकारियों की नियुक्ति से  लेकर स्थानांतरण के मामले में भी उपराज्यपाल से  उनकी टक्कर को सबने देखा और दिल्ली उच्च
न्यायालय व सर्वोच्च न्यायालय ने भी उनको हर निर्णय LG के परामर्श से लेने का आदेश दिया। इसमें उपराज्यपाल व केंद्र भी सवालों के घेरे में है ही।
लेकिन इस टकराव की स्थिति में भी उन्होंने समझदारी का परिचय देने की बजाय राजनीतिक फायदे की कोशिश ज्यादा की।
विवादों की फेहरिस्त में अरविंद की फजीहत करवाने वालों में नरेंद्र तोमर का नाम भी अदब से लिया जाना चाहिए, तमाम फर्जी डिग्रियां में
उनके 6 विधायक फंसे हैं इसके अलावा उनके एक विधायक पर जमीन हड़पने सहित 10 मुकदमों में पुलिस जांच कर रही है। एक विधायक पति पर स्कूल
प्रिंसिपल को धमकाने का आरोप है। सोमनाथ भारती की पत्नी ने भी उत्पीड़न का आरोप लगाया है।पंजाब के एक सांसद ने भी पार्टी के
भीतरी लोकतंत्र व हाईकमान को लेकर बगावत की लेकिन अपने आंदोलन के दिनों में वे जिस पारदर्शिता व नैतिकता की बात राजनीति में करते थे, उन्होंने
खुद की राजनीति में ये सारी बातें पाली। आंदोलन के दिनों में तो आरोपों के आधार पर तो अरविंद UPA के 15 मंत्रियों समेत प्रधान मंत्री का इस्तीफा
मांगा करते थे। संसद को चोर, हत्यारे, बलात्कारी, भ्रष्टाचारी की जगह बताते हुए उस वक्त के 162 दागी सांसदों पर कार्रवाई की बातें करते थे तो अब
अरविंद दिल्ली विधानसभा की सफाई कब करेंगे या फिर वे भी अन्य दलों की तरह राजनीति ही करेंगे।
दिल्ली के सबसे बड़े आम आदमी की झोपड़ी का बिजली बिल एक लाख रूपये महीना आना आम आदमी होने का सबसे पुख्ता प्रमाण है। यह वही
अरविंद है जो आंदोलन के दिनों में शीला दीक्षित के बाथरूम व किचन में लगे एयर कंडीशनर को भी आम आदमी के होने का बता रहे थे। इसके अलावा सरकार
का विज्ञापन खर्च 21 गुना बढाकर 526 करोड़ रुपये कर दिया गया है। क्या अरविंद भी अन्य क्षत्रपों के रास्ते पर जा रहे हैं। क्या रेडियो टेलीविजन पर दिन
भर सरकार का प्रचार जनता के पैसे से नहीं हो रहा है।
क्याअब उनके अंदर की नैतिकता डगमगा गई है। क्या उनका आंतरिक लोकपाल सिर्फ दिखावा है या  फिर वो सिर्फ अरविंद से सवाल करने वालों पर
कार्रवाई करता है। क्या अब AAP भी अन्य दलों के  रास्ते पर चली गई है। क्या उनका आंदोलन सिर्फ  कुर्सी तक का रास्ता था। लेकिन तमाम आरोपों के
बाद जनता तो आम आदमी के हाथों में सत्ता देने के  AAP के वादे को झूठ या जुमले के रूप में देखते हुए  राजनीति में भरोसे के टूटने व मौकापरस्ती ही समझ
लें। तो क्या एक क्रांतिकारी आंदोलनकारी के रूप  में अरविंद की नैतिकता सिर्फ सत्ता हथियाने का  औजार ही थी। क्या अरविंद को भी
सत्ताफोबिया हो गया है।क्या स्वराज के लेखक  अरविंद ही AAP है और AAP ही अरविंद और सत्ता के  विकेंद्रीकरण से लेकर लोकपाल तक सब झूठ और कुर्सी
ही सच।

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