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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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पियूष पटेरिया

बच्चों को देख न जाने क्यों अपने आप ही चहरे पर एक मुस्कान सी आ जाती है , सच ही कहा किसी ने बच्चो मे भगवान होते है बच्चो से भी ज्यादे आगर कोई ओर प्यारी चीज हो तो वो है बचपन , सभी का बचपन एक अलग ही रोचक ओर मजेदार होता हो ओर शायद यह दोबारा आयगा भी नही ऐसे ही आनमोल बच्चो ओर उनके बचपन को बढती अर्थाव्यवस्थाव बदलाव के चलते दबा कुचला जा रहा है उनके हसते खेलते बचपने मे ही उनहे उत्खनन, कृषि, माता पिता के व्यापार में मदद, अपना स्वयं का लघु व्यवसाय (जैसे खाने पीने की चीजे बेचना), या अन्य छोटे मोटे काम करने लगना कुछ बच्चे पर्यटकों के गाइड के रूपमें काम करते हैं, कभी-कभी उन्हें दुकान और रेस्तरां (जहाँ वे वेटर के रूपमें भी काम करते हैं) के काम में लगा दिया जाता है। अन्य बच्चों से बलपूर्वक परिश्रम-साध्य और दोहराव वाले काम लेते हैं जैसे :बक्से को बनाना, जूते पॉलिश, स्टोर के उत्पादों को भंडारण करना और साफ-सफाई करना. हालांकि, कारखानों और मिठाई की दूकान , के अलावा अधिकांश बच्चे अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं, जैसे “सड़कों पर कई चीज़ें बेचना, पटाकों के कारखानों में, कृषि में काम करना या [बच्चों का घरेलू कार्य|घरों में छिप कर काम करना] – ये कार्य सरकारी श्रम निरीक्षकों और मीडिया की जांच की पहुँच से दूर रहते है। “और ये सभी काम सभी प्रकार के मौसम मेभारत और बंगलादेश सहित कई देशों में अभी भी बाल श्रम व्यापक रूप से विद्यमान है। यद्यपि देश के कानून के अनुसार १४ वर्ष से कम आयु के बच्चे काम नही कर सकते, फ़िर भी कानून को नजरअंदाज कर दिया है। ११ साल जैसे छोटी उम्र के बच्चे २० घंटे तक एक दिन में काम करते हैं,और छोटा सा भुगतान पाते हैं।भारत में बाल श्रम को रोकने के लिए कई प्रावधान किए गए है। भारत का संविधान (26 जनवरी 1950) मौलिक अधिकारों और राज्य के नीति-निर्देशक सिध्दांत की विभिन्न धाराओं के माध्यम से कहता है- 14 साल के कम उम्र का कोई भी बच्चा किसी फैक्ट्री या खदान में काम करने के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा और न ही किसी अन्य खतरनाक नियोजन में नियुक्त किया जाएगा (धारा 24)। राज्य अपनी नीतियां इस तरह निर्धारित करेंगे कि श्रमिकों, पुरुषों और महिलाओं का स्वास्थ्य तथा उनकी क्षमता सुरक्षित रह सके और बच्चों की कम उम्र का शोषण न हो तथा वे अपनी उम्र व शक्ति के प्रतिकूल काम में आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रवेश करें (धारा 39-ई)। बच्चों को स्वस्थ तरीके से स्वतंत्र व सम्मानजनक स्थिति में विकास के अवसर तथा सुविधाएं दी जाएंगी और बचपन व जवानी को नैतिक व भौतिक दुरुपयोग से बचाया जाएगा (धारा 39-एफ)। संविधान लागू होने के 10 साल के भीतर राय 14 वर्ष तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा देने का प्रयास करेंगे (धारा 45)। बाल श्रम एक ऐसा विषय है, जिस पर संघीय व राय सरकारें, दोनों कानून बना सकती हैं। दोनों स्तरों पर कई कानून बनाए भी गए हैं प्रमुख राष्ट्रीय कानून में शामिल हैं – बाल श्रम (निषेध व नियमन) कानून 1986- यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को 13 पेशा और 57 प्रक्रियाओं में, जिन्हें बच्चों के जीवन और स्वास्थ्य के लिए अहितकर माना गया है, नियोजन को निषिध्द बनाता है। इन पेशाओं और प्रक्रियाओं का उल्लेख कानून की अनुसूची में है। फैक्ट्री कानून 1948 – यह कानून 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के नियोजन को निषिध्द करता है। 15 से 18 वर्ष तक के किशोर किसी फैक्ट्री में तभी नियुक्त किए जा सकते हैं, जब उनके पास किसी अधिकृत चिकित्सक का फिटनेस प्रमाण पत्र हो। इस कानून में 14 से 18 वर्ष तक के बच्चों के लिए हर दिन साढ़े चार घंटे की कार्यावधि तय की गई है और रात में उनके काम करने पर प्रतिबंध लगाया गया है। भारत में बाल श्रम के खिलाफ कार्रवाई में महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप 1996 में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले से आया, जिसमें संघीय और राय सरकारों को खतरनाक प्रक्रियाओं और पेशों में काम करनेवाले बच्चों की पहचान करने, उन्हें काम से हटाने और उन्हें गुणवत्तायुक्त शिक्षा प्रदान करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने यह आदेश भी दिया था कि एक बाल श्रम पुनर्वास सह कल्याण कोष की स्थापना की जाए, जिसमें बाल श्रम कानून का उल्लंघन करनेवाले नियोक्ताओं के अंशदान का उपयोग हो।
भारत निम्नलिखित संधियों पर हस्ताक्षर कर चुका है- अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन (संख्या 29) अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन बलात श्रम सम्मेलन का उन्मूलन (संख्या 105) बच्चों के अधिकार पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (सीआरसी)।
‘बाल श्रम के लिए कानून तो बहुत पहले बन चुके है परन्तु लोगो को कानून से ज्यादा खौफ तो अपनी भूख का है उम्र न देख किसी बच्चे से बाल श्रम कराना ठीक नही है सरकार ने भी बालश्रम के बहिष्कार करने के लिए कहा है परन्तु किसी ने कभी सोचा नही होगा की कोई भी बच्चा मजदूर क्यो बनता है जाहिर सी बात है इसका कारण आर्थिक परिस्थितिया ही होगी । हालाँकि सरकार योजना बनाकर रुपये खर्च तो कर रही है परन्तु इस तरहा के हालात देख यही लगता है की सरकार का पैसा सही हाथो मे नही है या देश की तात्कालिक आवश्यकताओ पर उपयोग नही हो रहा है bal majdoori

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