लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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arharसंजय सक्सेना
देश की सियासत गरम है। मुट्ठी भर नेताओं और चंद मीडिया समूहों द्वारा देश पर थोपा गया ‘तनाव’ देश की सवा सौ करोड़ शांति प्रिय जनता पर भारी पड़ रहा है। पूरे हिन्दुस्तान में माहौल ऐसा तैयार किया जा रहा है, मानो दादरी कांड़, बीफ मुद्दा,आरएएस का आरक्षण पर बयान, कुछ साहित्यकारों का पुरस्कार लौटाना,एक-दो नेताओं पर स्याही फेंकने की घटनाएं,गरबा डांस कार्यक्रम पर हंगामा,शिवसैनिकों के उदंड,प्रधानमंत्री पर अनाप-शनाप बयानबाजी करने वाले नेताओं को लाइमलाइट में लाने जैसी खबरों के अलावा मीडिया के पास दिखाने को कुछ बचा ही नहीं है।वो सब दिखाया जा रहा है जिससे देश को नुकसान हो सकता है। जनता से जुड़ी तमाम समस्याएं मीडिया की सुर्खियां बनना तो दूर खबरों में जगह तक नहीं बना पाती हैं। इतना ही नहीं विवादों को खाद्य-पानी देने वाले नेता मीडिया की पहली पंसद बन जाते है।ऐसे नेताओं को स्टूडियों में बुलाकर और अधिक जहर उगलने का मौका दिया जाता है,जिससे लगातार देश का माहौल खराब हो रहा है।सभी दलों के भड़काऊ बयान देने वाले नेताओं की बयानबाजी ने देश की उस जनता को चौराहे पर खड़ा कर दिया है जो 24 घंटे रोजी-रोटी के लिये जद्दोजहद करती रहती है,जिसे हमेशा यह चिंता सताती रहती है कि देश में माहौल खराब होने या फिर लड़ाई-झगड़े के हालात बनने पर उसके घर का चूल्हा कैसे जलेगा।यह कल्पना मात्र नहीं है।कई बार मीडिया के अति-उत्साह के कारण देश का माहौल बिगड़ा भी चुका है।आज स्थिति यह है कि किसानों को भी समय पर न पानी मिल रहा है न खाद। मिलावटखोर देशवासियों के साथ घिनौना कृत्य कर रहे हैं, बेरोजगारी,मंहगाई जैसी समस्याओं के कारण पूरे देश में अपराध बढ़ रहा है।चंद लोग अपने स्वार्थ के लिये प्राकृतिक संसाधनों का दोहन कर रहे है।कालाबाजारी करने वालों की तो चांदी ही चांदी है।आपस में लड़ने वाले नेता और सरकारें उनकी तरफ से आंख मूंदे बैठी हैं या फिर अपना हिस्सा लेकर खामोश हैं।
यह हास्यास्पद है कि तमाम दलों के नेता और सरकारें एक-दूसरे को नीचा दिखाने और गलत साबित करने में अपना पूरा समय खपा रहे हैं।जनता की समस्याओं से इनका कोई सरोकार नहीं रह गया है।ऐसे लोगों को मीडिया,उसमें भी खासकर कथित तौर पर इलेक्ट्रानिक मीडिया फलने-फूलने का पूरा मौका दे रहा है।आज कुपोषण देश की बड़ी समस्या है।कुपोषण से जुझते और मरते बच्चों,किसानों की समस्याओं,गाॅव की चौपाल से शहर तक में व्याप्त भ्रष्टाचार, बिजली चोरी जैसी सामाजिक बुराइयों,स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में तमाम सरकारों की नाकामी को अनदेखा करके मीडिया नेताओं के साथ मिलकर उन मुद्दों पर चर्चा करने में लगा रहता है,जिससे नेताओं और मीडिया के अलावा किसी का भला नहीं होता है।इतना ही नहीं नेताओं के सीधे-साधे बयान को तोड-मरोड़ कर विवादित रूप में पेश करने की पीत पत्रकारिता भी पूरे शबाब पर है। ऐसा लगता है, अब समय आ गया है कि कुछ मीडिया समूहों और पत्रकारों के क्रियाकलापों की भी जांच कराई जाये ताकि पता चल सके कि यह लोग विदेशी शक्तियों के हाथ का खिलौना तो नहीं बन गये हैं।नहीं भूलना चाहिए कि विदेशी ताकतें देश में काम करने वाले कथित नेताओं,पत्रकारों आदि का अपने लिये इस्तेमाल करती रही हैं। तमाम विदेशी ताकतें समाज सेवी संगठनों(एनजीओ)के माध्यम से लम्बे समय से हिन्दुस्तान को तोड़ने के लगी हुई हैं।इस बात के प्रमाण भी सामने आते रहते हैं।
यह देख कर आश्चर्य होता है कि स्याही फंेकने की छोटी सी घटना पर तो मीडिया हाहाकार मचा देता है,लेकिन उन लोगों की तरफ से मुंह मोड़े रहता है,जिनकी वजह से देश की सवा सौ करोड़ जनता त्राहिमाम करने को मजबूर है।बड़े-बड़े औद्योगिक घराने सरकार की मिलीभगत से फलफूल रहे हैं। देशभर में मिलावटखोरों, कालाबाजारियों,नशे का धंधा करने वालों का नेटवर्क फैला हुआ है,लेकिन इनके खिलाफ न तो कोई सरकार कदम उठाती है,न मीडिया मुंह खोलता है। इसकी ताजा मिसाल है पहले प्याज और अब दालें। बाजार में अरहर दाल की कीमत रिकॉर्ड तोड़ते हुए 200 रुपये के पार पहुंच गई है,लेकिन इसको लेकर न तो मीडिया चिंतित है न नेतागण। मीडिया कभी मंहगाई पर कार्यक्रम करता भी है तो मंहगाई के कारणों पर जाने की बजाये वह सियासी दांवपेंच में उलझा रहता है। हैरानी की बात यह है कि जुलाई के आसपास ही यह अनुमान लगा लिया गया था कि इस वर्ष बाजार में दलहन की कमी हो सकती है, इसके बावजूद समय रहते इसके लिये उपाय नहीं किए गए।इसी तरह के तमाम सरकारी कदमों से लगता है कि या तो वह(सरकारें)जमीनी हकीकत को पहचाने बिना गलत नीतियां बना रही हैं, या फिर कालाबाजारियों से उनकी मिलीभगत है।मध्यप्रदेश में जिस तरह से दालों की जमाखोरी का पर्दाफाश हुआ है उससे यह बात पुख्ता हो गई है।
एक अनुमान के अनुसार देश में इस वक्त करीब 30 से 40000 क्विंटल दालों की जमाखोरी की जा रही है। अगर ये दालें खुले बाजार में आ जाएं तो दालों की फुटकर कीमतों में 30 से 40 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है। जमाखोरों का लक्ष्य दीवाली के आसपास दालों की कीमतों में रिकॉर्ड तेजी लाकर मुनाफा कमाने का था। इसकी जानकारी सभी राज्यों को दे दी गई थी। मगर मध्य प्रदेश को छोड़कर किसी भी राज्य ने जमाखोरों के खिलाफ कार्रवाई करने या ठोस कदम उठाने में कोई रूचि नहीं दिखाई।अब भी कई राज्य ऐसे हैं जो इस बारे में केंद्र का सहयोग करने की बजाये सियासत कर रहे हैं। बिना राज्यों के सहयोग के महंगाई पर काबू नहीं पाया जा सकता है। यह बात राज्यों को समझनी होगी। सिर्फ वोट बैंक बढ़ाने और केन्द्र सरकार को बदनाम करने के लिये मंहगाई को पनपने का मौका दिया जाना उस जनता के साथ नाइंसाफी है जो वोट देकर नेताओं को सत्तारूढ़ करता है। हालांकि मौजूदा स्थिति यह है कि केन्द्र सरकार की पहल पर पांच हजार टन अरहर दाल आयात होकर देश की बाजार में पहुंच तो गई है,लेकिन इस बीच कालाबाजारी तो मालमाल हो ही चुके हैं,जिस तरह प्याज की बनावटी कमी दिखाकर हजारों करोड़ रूपया कालाबाजारियों की तिजोरी में चला गया था,वैसे ही दालों के साथ भी हुआ।इससे तो और भी मोटा मुनाफा कमाया गया।यह नहीं भूलना चाहिए कि उत्तर भारत सहित देश के बड़े हिस्से में अरहर दाल आम लोगों के दैनिक भोजन का हिस्सा है। दालें प्रोटीन और पौष्टिकता का एक बड़ा स्रोत हैं।अब ‘दाल-रोटी खाओ,प्रभु के गुण गाओं’ की कल्पना नहीं की जा सकती। केवल अरहर की बात ही नहीं, उड़द और दूसरी दालों की कीमतें भी आम लोगों की पहुंच से दूर होती जा रही हैं।अतीत पर नजर डाली जाये तो विगत पांच वर्षों के दौरान अरहर की कीमत 70 से 80 रुपये के आसपास स्थिर रही है। बाजार का एक सामान्य नियम है कि जब आपूर्ति कम हो और मांग अधिक, तो कीमतें बढ़ने लगती है और कालाबाजारी करने वाले तेजी से सक्रिय हो जाते हैं। दलहन के साथ भी यही हो रहा है।
बहरहाल, अब केंद्र सरकार अपना बफर स्टाक बढ़ा रही है।केन्द्र ने आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत दालों के संग्रहण पर रोक लगा दी है,ताकि बाजार में दाल की उपलब्धता बढ़ाई जा सके,लेकिन जनता और मोदी सरकार को जो नुकसान होना था,वह तो हो ही चुका है।यह फैसले जल्दी भी लिये जा सकते थे।खैर,मंहगाई बढ़ने के लिये जितनी प्रदेश की सरकारें गुनाहगार हैं उतना ही मीडिया भी जिम्मेदार है।दोनों को ही जनता के प्रति जबावदेह होना चाहिए।

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