लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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’’असहिष्णुता, सियासी मसला है।’’ भारत के प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति श्री टी एस ठाकुर ने यह बयान खासकर, मजहबी असहिष्णुता के संदर्भ मंे दिया। न्यायमूर्ति श्री ठाकुर द्वारा ठीक 06 दिसंबर, 2015 के दिए इस बयान का संदेश साफ है और ठीक इसी दिन भारत में घटे ताजा घटनाक्रम का भी। याद कीजिए कि 06 दिसबंर, वर्ष 1992 में बाबरी मसजिद का विघ्वंस हुआ था 23 वर्ष बाद आज भी यह विवाद अनसुलझा ही है। 23 साल बाद बाबरी मसजिद की बरसी एक ओर बाबरी मसजिद एक्शन कमेटी ने ’योम ए ग़म’ मनाया गया; बाबरी मसजिद के गुनाहगारों को सजा देने की मांग को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर एक प्रदर्शन हुआ; मुसलिम बिरादरी की राजनीति करने वाले ओवैसी ने बाबरी मसजिद की जगह मसजिद बनाने के लिए मुसलिम नौजवानों को ललकारा, तो दूसरी ओर विश्व हिंदू परिषद ने भी ’शौर्य दिवस’ मनाया और हिंदू संतों ने मंदिर निर्माण का रास्ता साफ करने की कोशिशें तेज करने का इशारा किया। क्या आवाज उठाने वाले संगठनों का लक्ष्य सचमुच मंदिर या मसजिद है ? दरअसल उक्त बयान और घटनाक्रम का ही नहीं, मजहबी और राजनैतिक अतीत का संदेश भी यही है कि खासकर मजहबी असहिष्णुता, पूर्णतया सियासी है।
आमजन के लिए मजहब, आस्था का विषय है, धार्मिक-राजतांत्रिक सत्ता के लिए वर्चस्व का, मीडिया के लिए रेटिंग व पूर्वाग्रह का और वर्तमान भारतीय नेताओं के लिए वोट की बंदरबांट का। हिंदू, मुसलमान, पारसी और ईसाइयों के बीच कुछ सांस्कृतिक-वैचारिक भिन्नता हो सकती है ? ऐसी भिन्नता तो दक्षिणपंथी, वामपंथी, समाजवादी और गांधीवादियों के बीच भी है। क्या वे एक-दूसरे के लिए असहनीय हैं ? नहीं, तो क्या दुनिया का कोई मजहब ऐसा भी है, जो दूसरे मजहब को सहन न करने की शिक्षा देता हो ? नहीं, तो फिर निश्चित रूप से समझ लेना चाहिए कि मजहबी असहिष्णुता दर्शाने के कारण कुछ और हंै। वैचारिक-सांस्कृतिक भिन्नता में छोटे-मोटे द्वंद कोई खास बात नहीं, किंतु एक-दूसरे को न सह पाने का संदेश देना, निश्चित ही मजहब के गैरमजहबी इस्तेमाल के कारण ही है।
अतीत पर गौर कीजिए कि यदि राजनैतिक इस्तेमाल की तमन्ना न होती, तो सोमनाथ मंदिर से लेकर बाबरी मसजिद तक को ध्वस्त करने के राजनैतिक प्रयास न होते। जमशेदपुर, मुंबई, सूरत, अहमदाबाद, भोपाल, कानपुर, मुरादाबाद, अलीगढ़, आगरा, मुजफ्फरनगर और मेरठ के हाशिमपुरा, मलियाना आदि जगहों मंे घटे शर्मनाक दंगे न घटते; गुलाम अली की आवाज सुनने से शिवसेना को ऐतराज न होता; प्रतिक्रिया में दिल्ली के मुख्यमंत्री गुलाम अली को दिल्ली में मंच देने का वक्तव्य न देते। बात राजनैतिक न होकर देशभक्ति की होती, तो पाकिस्तान और बांग्ला देश से एक-एक इंच ज़मीन वापस लेने का घोष करनेे वाले, भारत की लाखों वर्ग किलोमीटर ज़मीन दबाये बैठे चीन को सबसे पहले आंखें दिखाते। यदि ऐसा न होता, तो बांग्ला देश से भारत आये भिन्न-धर्मी शरणार्थियों की गिनती, सिर्फ मुसलमान के रूप में नहीं होती। नित नई पाबंदियां तथा तालिबानी, फियादिन व जिहादी हमलों का नये वैश्विक चित्रों का संदेश क्या है ?
जंग-ए-आज़ादी का दर्द
यह गौर करने की बात है कि जब-जब हिंदू-मुसलिम प्रतिनिधि राजनैतिक दलों या संगठनों द्वारा साझा करने की कोशिश हुई, उसके बाद अक्सर माहौल बिगाङने की कोशिशें भी हुई; नतीजे में साप्रदायिक ताकतें, ताकतवर होकर उभरीं। याद कीजिए वर्ष 1905; बिना किसी तरह का मजहबी ख्याल मन में लाये भारत हिंदू और मुसलमान एक कौम.. एक सांस होकर जंग-ए-आज़ादी मंे जुटी थी कि लाॅर्ड कर्जन, मजहबी आधार पर बंगाल के बंटवारे का प्रस्ताव ले आया। 1906 मंे मुसलिमों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल की मांग को मंजूर कर लाॅर्ड मिंटो ने सांप्रदाियक विभेद की अपनी कोशिश को आगे बढ़ाना जारी रखा। मुसलिमों के लिए अलग सीटों के आरक्षण को क्या कहंेगे ? इन सीटों पर कांग्रेस और मुसलिम लीग के एक साथ चुनाव लङने को असफल प्रयास के नतीजे, इन सीटों पर कांग्रेस को महज एक सीट और दंगे के रूप मंे सामने आये। 1927-28 मंे कांग्रेस द्वारा मुसलिम लीग की मांगों को पहले मानना और फिर नेहरु रिपोर्ट के जरिए पलट जाना। तीन-तीन गोलमेज सम्मेलनों का विफल रहना।
यह तो सिर्फ कुछ नजीर भर हैं,  आज़ादी की जंग का काला हिस्सा यह है कि इस दौरान की ब्रितानी और हिंदुस्तानी राजनीति…पूरी की पूरी मजहबी पक्ष-विपक्ष मंे खङे होकर गढी गई। वह चाहे मुसलिम लीग हो या फिर जनसंघ, एक संप्रदाय विशेष के नाम पर राजनीति करना, संप्रदाय का राजनैतिक इस्तेमाल ही है। लाला लाजपतराय ने लाहौर के अखबार ट्रिब्यून में तीन लेखों की श्रृंखला लिखकर, पंजाब और बंगाल की मांग पेश कर दी। उन्होने तो यहां तक मान लिया था कि अब हिंदू और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते।
दंगे गवाह
भारत में दंगों का इतिहास देखिए। मजहबी आधार पर किसी मुल्क का विभाजन और फिर दंगे! आखिर ऐसा भी कहीं हुआ है ? वर्ष 1947 – भारत में हुआ। 1961 और आज़ादी के बाद का दूसरा चुनाव – उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, असम, महाराष्ट्र, कर्नाटक आदि प्रदेशों में प्रगतिशील तत्वों द्वारा एकजुट विपक्ष के रूप में उभरने की प्रक्रिया चल रही थी। दूसरी ओर केरल में कम्युनिस्ट पार्टी के खिलाफ कांग्रेस, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और मुसलिम लीग ने साझा कर लिया। 1961 और 1964 में फिर बङा सांप्रदायिक दंगा करा दिया गया। नतीजा ? दंगे की प्रतिक्रिया मंे मजलिस मुसलिम मुसाबरात का गठन हुआ। 1969 मंे तो जैसे सांप्रदायिक दंगों की बाढ़ ही आ गई। रांची, जमशेदपुर, अहमदाबाद, जलगांव आदि में इंसानियत शर्मसार हुई। भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ पर उंगली उठी; नतीजे मंे मजलिस मुसलिम मुसाबरात का विस्तार हुआ और 1972 के चुनाव मंे भारतीय जनसंघ, एक शक्तिशाली राजनैतिक दल के रूप में उभरा।
कम नहीं कांग्रेस
1977 के बाद क्या हुआ ?  वर्ष 1977 में चुनाव हारने के बाद कांग्रेस की कट्टरता गंुडागर्दी और आपराधिक शक्ति के तौर पर सामने आई। उसके ’गरीबी हटाओ’ नारे और समाजवाद चेहरे का भ्रम टूटा, तो इंदिरा गांधी ने भी हिंदू कार्ड को अपनी ताकत बनाने की कोशिश की। शेख अबदुल्ला की मृत्यु के बाद जम्मू-कश्मीर घाटी में हुए चुनावों में उग्र हिंदू एजेंडे के साथ चुनाव लङा। नतीजा ? कश्मीर में फारूक अबदुल्ला की नेशनल कांफ्रेस जीती, किंतु हिंदू वोट वाली जम्मू घाटी में कांग्रेस (आई) ने सबका सफाया कर दिया। जनसंघ को भी एक सीट नहीं मिली। इसी तरह  पंजाब के अकाली दल को निपटाने के लिए कांग्रेस ने जरनैल सिंह भिंडरावाले के आतंकवाद को फलने-फूलने दिया। फिर एकता और अखंडता के नारे को उछाल कर सिखों को राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए खतरे के रूप में पेश किया गया। हिंदू समाज में व्यापक प्रतिक्रिया स्वाभाविक थीं। सोची-समझी रणनीति के तहत् कांग्रेस ने ’आॅपरेशन ब्लू स्टार’ करा दिया और हिंदू मानस को तुष्ट करने का श्रेय लूट लिया। यह बात और है कि हिंदू वोट हथियाने की इस जुगत में इंदिरा गांधी की जान चली गई। इस खेल से गुस्साये दो सिख अंगरक्षकों ने उन्हे मौत के मुंह में पहुंचा दिया। राजनैतिक लाभ, राजीव गांधी को मिला।
सत्ता में आते ही उन्होने हिंदुओं की प्रिय गंगा की सफाई हेतु ’गंगा कार्य योजना’ की घोषणा की। स्वामी विवेकानंद के जन्म दिन को ’राष्ट्रीय युवा दिवस’ घोषित कर डाला। शाहबानो प्रकरण में मुसलिम समुदाय के सामने समर्पण से हिंदुओं में नकरात्मक प्रतिक्रिया होती दिखी, तो स्वयं श्री राजीव गांधी, उनके आंतरिक सुरक्षा राज्य मंत्री अरूण नेहरू और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह ने मिलकर राम जन्मभूमि स्थल का ताला खुलवा कर, कट्टरवादियों के लिए एक नया जिन्न खङा कर दिया। गौर कीजिए कि इसी के बाद रामजन्म भूमि मुक्ति आंदोलन खङा हुआ। इसी समय दूरदर्शन पर रामानंद सागर रचित ’रामायण’ धारावाहिक शुरु हुआ। इसी बीच 1989 के चुनाव आ गये और राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस ने हिंदुवादी संगठनों के साथ मिलकर बाबरी मसजिद के पास राम जन्मभूमि मंदिर का शिलान्यास करा दिया। किंतु तब तक जनसंघ से ज्यादा आक्रामक तेवर वाली भारतीय जनता पार्टी का अवतार हो चुका था। कांग्रेस के धर्मोन्मादी रुख से वामपंथी नाराज थे। लिहाजा, कांग्रेस के हाथ से बाजी निकल गई।
जाति-धर्म-राजनीति: बढ़ता घालमेल
1989 में विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय मोर्चा, भाजपा और वामपंथी दलों के समर्थन से सरकार बनाने में सफल रहा। विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल आयोग की सिफारिश पर अमल पर फैसला किया, तो अगङों की खिलाफ प्रतिक्रिया को देखते हुए भाजपा ने समर्थन खींच लिया; सरकार गिरा दी। जनता ने दंगों का दर्द झेला। जनता दल भी बंट गया। किंतु जातिवाद के नये जिन्न ने पिछङी-दलित जातियों, जनजातियों और अल्पसंख्यकों को नई जगह दी। लिहाजा, हिंदू कट्टरता को फलने-फूलने के पर्याप्त कारण विद्यमान थे। नतीजे में जहां एक ओर जाति व अल्पसंख्यक गठजोङ की राजनीति ने मुलायमसिंह, काशीराम, कर्पूरी ठाकुर, लालू यादव, शरद यादव, नीतीश कुमार, रामविलास पासवान के अलावा कई मुसलिम दलों और नेताओं को भी जन्म दिया, वहीं प्रतिक्रिया में साध्वी उमा भारती, साध्वी ऋतम्भरा, योगी आदित्यनाथ जैसे हिंदू चोला पहनने वाली कई शख्सियतें राजनैतिक हो गईं। इसी संघ-भाजपा और विश्व हिंदू परिषद ने बाद में केन्द्र मंे तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव और प्रदेश में तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से सांठगांठ कर बाबरी मसजिद ढहा दी। फिर सांप्रदाियक सद्भाव टूटा। भारत ने फिर मार-काट का दर्द झेला। इससे जहां भारतीय जनता पार्टी एक ओर पूरी तरह कट्टर हिंदू पार्टी के रूप में उभरी, वहीं एक जिम्मेदार पार्टी के तौर पर भाजपा की छवि को गहरा धक्का भी लगा।
उदारवाद और कट्टरता का काॅकटेल
तब भाजपा ने अटल बिहारी बाजपेई के उदारवादी चेहरे और आडवाणी के कट्टरवादी चेहरे के काॅकटेल का प्रयोग करने में ही भलाई समझी। अटल, प्रधानमंत्री बने और आडवाली गृहमंत्री। गौर कीजिए कि काॅकटेल के इसी सबक से सीखते हुए वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा किसी एक छवि के साथ आगे आने से बची। इस चुनाव में भाजपा की पूरी छवि, श्री नरेन्द्र मोदी के एकमात्र आइने में उतार दी गई। मोदी की भी कई छवियां गढी गईं। एक छवि, गुजरात के विकास माॅडल को सामने रख उकेरी गई विकास पुरुष की छवि थी। दूसरी छवि, पिछङे वर्ग के जातिवादी मोदी की थी। तीसरी छवि, ’मैं आया नहीं हूं, मुझे गंगा मां ने बुलाया है’ तथा रात्रि में योग-ध्यान करने वाले, मां का आशीष लेने वाले सनातनी हिंदू की थी। चैथी छवि, एक चाय वाले से प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार की ऊंचाई तक पहंुचने वाले निर्णायक, जुझारू, निर्भीक व बेदाग और गरीबी से उठकर आसमान छू लेने वाले नेतृत्व की छवि थी। कांग्रेस के कारपोरेट घोटाले वाले शासनकाल और सोनिया, राहुल और मनमोहन सिंह की तुलना में इन चारों छवियों ने बहुस्तरीय असर किया। मोदी के साथ-साथ भाजपा भी जीती, किंतु हिंदुवाद का कार्ड उसने छोङा नहीं। कभी जनगणना में मुसलिमों की आबादी में वृद्धि का आंकङा पेश कर, तो कभी साक्षी महाराज, कभी योगी आदित्यनाथ महाराज, कभी शंकराचार्य द्वारा साईंबाबा के हिंदू-मुसलमान होने का विवाद और कभी गोमांस का निर्यात बंद कर और कभी जैन पर्युषण पर्व पर बूचङखाने और मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाकर एजेंडे को मरने नहीं दिया। बिहार चुनाव के बाद अब राम मंदिर और असहिष्णुता को मुद्दा बनाकर पेश कर के प्रयास, हम सभी के सामने हैं ही।
पश्चिमीकरण से असुरक्षा और पहचान के निशान
सब जानते हैं कि वैश्विक उदारवाद और डिजीटल उदारवाद के इस दशक में जिला, राज्य या राष्ट्र को  एक जाति, संप्रदाय या वर्ग विशेष की संर्कीर्ण दीवारों वाले बांधने की कोशिश करना बेमानी है; बावजूद इसके जातीय असुरक्षा के कारण उपजी कट्टरता के कारण, आज कई स्थानों पर उत्तर-पूर्व से लेकर गुजरात तक जातीय आंदोलन हैं, ब्राह्मण-क्षत्रिय महासभायें हैं, आरक्षण विरोधी अनशन हैं, हिंदु-मुसलिम विरोधी नारे हैं, डी एन ए के जुमले हैं, और जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान विरोधी नारों को गतिमान रखकर, हिंदू वोट धुव्रीकरण के छिपे एजेंडे हैं। अपनी-अपनी पहचान दिखाने के प्रयास भी कम नहीं।
पहचान के इन निशानों के लिए बेचैनी इसलामी समाज मंे भी बढ़ी है। पढे़-लिखे मुसलिम युवाओं में भी दाढ़ी, टोपी और ऊंचे पायजामों का चलन बढ़ा है। हो सकता है कि भारत में बाबरी मसजिद ढहाये जाने के बाद अल्पसंख्यक मन की असुरक्षा ने इस प्रवृति को हवा दी हो, किंतु हकीकत यह है कि पश्चिमी तौर-तरीकों ने हिंदू और मुसलमान… दोनो की पारंपरिक जीवन शैली, संस्कार और ज्ञानतंत्र में घुसपैठ कर इन्हे जिस तरह ध्वस्त करना शुरु किया है, इससे उपजी असुरक्षा भी कट्टरता का एक बङा कारण है। आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में उभरी ईरानी कट्टरता के दौर को याद कीजिए। शिया-सुन्नी… दोनो फिरकों पर पश्चिमीकरण का आघात बराबर है। खासकर, पश्चिमी मुल्कों के खिलाफ तनी आतंकवादी हरकतों को देखिए। ब्रिटिश मुसलमान छात्र से इस्लामिक स्टेट नामक संगठन द्वारा फिदायिन बनने की अपील करता वीडियो, काबुल में नाटो काफिले पर तालीबनी हमला; सब याद करते जाइये। दुनिया के तमाम इसलामी मुल्कों में घट रही घटनाओं का समग्रता से विश्लेषण कीजिए; आप गांरटी से पायेंगे कि हिंदू-मुसलिम दोनो की कट्टरता के कारण, भीतरी से ज्यादा बाहरी हंै। स्पष्ट है कि मजहबी खेमों मे खङे होकर मुद्दे की खाल खीचने से हल नहीं निकलेगा। निवेदन है कि यदि मजहबी कट्टरता से निजात पानी है, तो बाहरी कारणों से निजात पाने की कोशिश करनी चाहिए। लोकतंत्र मंे यह संभव है। क्या हम करेंगे ?

कैसे रुके वर्चस्व का खेल और घालमेल ?
राजनीति, इहलोक का विषय है और धर्म, परलोक का। कह सकते हैं कि दोनो में घालमेल ठीक नहीं; फिर भी यह हमेशा से होता रहा है। क्यों ? क्योंकि इस घालमेल का एक ही मकसद रहा है – वर्चस्व, वर्चस्व और वर्चस्व। धर्म के वर्चस्व के लिए राजनीति का इस्तेमाल, राजनैतिक वर्चस्व के लिए, धर्म का इस्तेमाल। इतिहास गवाह है कि कोई धर्म, कोई संप्रदाय, कोई जाति.. सिर्फ श्रेष्ठता के आधार पर इस दुनिया में वर्चस्व हासिल नहीं कर सके। वर्चस्व के इस खेल में ईसाई धर्म के संस्थापक ईसा मसीह को एक रोमन सामंत ने सूली पर चढ़ा दिया। प्रोस्टेटों से असुरक्षा का बोध होते ही कैथोलिक कट्टरता पर उतर आये। तुर्की साम्राज्य ने अपने आतंक से ग्रीक आर्थोडाॅक्स चर्च को भगाया। आयरलैंड मंे प्रोस्टेट और कैथोलिकों के बीच हिंसात्मक द्वंद होते 300 से अधिक वर्ष हो चुके। ईरान-इराक में शिया-सुन्नी फिरकों को लेकर दस साला युद्ध चला ही। इजरायल मंे यहुदियों के साथ, यूरोपियों के अपराध याद कीजिए। अग्नि पूजक पारसियांे को देश से बाहर निकालकर ही इस्लाम, ईरान पर वर्चस्व हासिल कर सका।
इंडोनेशिया, मलेशिया, भारत आदि दक्षिण पूर्व एशिया के देशों में अपना वर्चस्व जमाने के लिए भी इस्लाम ने यही किया। यह बात और है कि एक दौर के राजनैतिक वर्चस्व के बावजूद, इस्लाम, भारत में एक अल्पसंख्यक संप्रदाय बना हुआ है। ताजा चित्र देखें। इलेक्ट्राॅनिक्स माध्यमों के प्रभाव में जब परम्परागत इस्लामी जीवन प्रणाली ध्वस्त होने लगी, तो आयतुल्ला खुमैनी के नेतृत्व में ईरान एक ऐसी इस्लामी क्रांति के रंग में रंगा कि दुनिया की तमाम इस्लामी आबादी को कट्टरता की चपेट में ले लिया। भारत में इस्लाम के प्रवेश से पूर्व, शैव, वैष्णव, शाक्तों भीषण और हिंसात्मक संघर्ष हुए। लिंगायत कहे जाने वाले दक्षिण के शैवों के विरुद्ध 150-200 साल अभियान चला। हिदुओं और बौद्धों मंे एक समय इतना युद्ध रहा कि एक समय भारत से बौद्ध धर्म का देश निकाला ही हो गया था। जैनियों ने तो एक वक्त गुफाओं और निर्जन प्रदेशों मंे रहकर अपना अस्तित्व बचाया।
वर्चस्व के लिए धर्म का यह इस्तेमाल कब बंद हो सकता है ? जब धर्मांे के बीच अपना वर्चस्व सिद्ध करने की होङ खत्म हो; जब एक राजनीतिज्ञ दल व व्यक्तियों को दूसरे राजनीतिज्ञ दल व व्यक्तियों पर वर्चस्व करने की जरूरत ही न महसूस हो। किंतु यह तब तक नहीं हो सकता; जब तक कि धर्म प्रमुखों के लिए धर्म, और राजनीतिज्ञों के लिए राजनीति, सत्ता का विषय है।
कहना न होगा कि जब तक धर्म प्रमुखों के पद, उनसे जुङा पैसा व संपत्ति.. आकर्षण के बिंदु बने रहेंगे, धर्म प्रमुखों के लिए धर्म, सत्ता का विषय बना रहेगा। जब तक सामाजिक और संवैधानिक रूप से सभी धर्मों का बराबर सम्मान स्वीकार लिया नहीं जाता, दो धर्मों के बीच वर्चस्व का द्वंद कभी खत्म नहीं होगा।
जहां तक राजनीति का सवाल है, गौर कीजिए कि राजनीति का मतलब होता है, राज करने की नीति। नीति और नीयत राज करने की हो, तो सत्ता भी होगी और उसके वर्चस्व के लिए संघर्ष भी; और मजहबी इस्तेमाल भी। एक राजा होगा, तो दूसरे प्रजा; कोई शासक होगा, तो कोई शासित। इस स्थिति को खत्म करने के लिए ही तो आज़ादी की इतनी लंबी जंग हुई, किंतु क्या आज़ाद भारत से शासक और शासित का भाव गया ? कहने को भारत, आज एक लोकतंत्र है। राजा-प्रजा, राजतंत्र के विषय हंै। स्पष्ट है कि लोकतंत्र मंे राज, राजनेता और सत्ता जैसे शब्दों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए। क्या हमने इन शब्दों को निकाल फेंका ? नहीं, जनता अपने जनप्रतिनिधियों को आज भी राजनेता ही कहती है। ऐसे में वर्चस्व के उनके खेल को राजनीति कहना ही पङेगा। जैसा संबोधन, वैसा व्यवहार। ये लोकतंत्र के प्रतिकूल शब्द हैं; प्रतिकूल व्यवहार। लोकतंत्र का मतलब होता है, राज की जगह-लोक, राजनीति की जगह-लोकनीति, राजनेता की जगह-लोकप्रतिनिधि और सत्ता की जगह-व्यवस्था को सुचारु बनाये रखने के लिए लोकप्रतिनिधि सभायें। जरूरी है कि जनता स्वयं अपने संबोधन.. शब्दावली से लेकर विचार और व्यवहार को लोकतंत्र की परिभाषा के अनुकूल करें। राज, राजनेता, राजनीति और सत्ता – इन चार शब्दों की पुकार और व्यवहार बंद कर दें। क्या बिना दल की कोई लोकतांत्रिक व्यवस्था बनाने से इसमें मदद मिल सकती है ? विचार करें। जब राजनीति ही नहीं होगी, तो धर्म प्रमुखों द्वारा इसका इस्तेमाल भी नहीं होगा। यदि लोकनीति और लोकप्रतिनिधि सभाओं को धर्म के इस्तेमाल की कभी जरूरत हुई भी, तो तय मानिए वह सांप्रदायिक व सत्तात्मक होने की बजाय, सकारात्मक ही होगी। जिस दिन दुनिया, इस मंतव्य के अनुकूल परिस्थिति निर्मित कर सकी, तय मानिए कि धर्म और राजनीति का घालमेल पूरी तरह खत्म न भी हुआ, तो एक-दूसरे के साथ मिलकर वर्चस्व का खेल खेलने का मंतव्य, मंद अवश्य पङ जायेगा।

आशंका और आकांक्षा
एक दिन मैने अपनी बेटी से उसकी सबसे अच्छी सहपाठिन का नाम पूछा। उसका जवाब था – ’’ नूर। वह मुसलमान है।’’ मेरे सन्न रह गया। नूर, स्कूली वर्दी मंे आती है। उसके शरीर पर मुसलमान होने का कोई निशान नहीं है। फिर मेरी बेटी को किसने बताया कि नूर, मुसलमान है। मैंने तो कभी नहीं बताया। क्या मुसलमान होना ही नूर की पहचान है ?
दूूसरी घटना तब घटी, जब मेरे स्कूल के दिनों के साथी अमरजीत जी जब पहली बार मेरी बेटी से मिले। उन्होने अपने बारे मंे पूछा कि वह कौन है। बेटी ने तपाक से उत्तर दिया – सिख। अमरजीत, हतप्रभ थे और मैं, शर्मिंदा। हम दोनों ने अपेक्षा की थी कि उसका जवाब ’चाचू’ या ’अंकल’ होगा।  उन्होने पूछा कि उसे किसने बताया। वह बोली – ’’ आपके सिर पर पगङी है न, इसने।’’
हालांकि दोनो बार बिटिया ने जवाब सहज भाव से ही दिया था, किंतु इसने मुझे दुखी किया कि उसमें भिन्नता के बीज पङ गया है। मुझे तो आजकल सांप्रदायिक सद्भाव के नारे लगाते भी संकोच होता है। ये नारे भी तो हमारा परिचय एक इंसान या भारतीय के रूप में न कराकर, हिंदू-मुसलमां-सिख-ईसाई के तौर पर कराते हैं। कभी-कभी लगता है कि पाठ्यक्रमों से कौमी भिन्नता के निशानों से परिचय कराने वाले पाठों को हटा देना चाहिए। खैर, मेरी चिंता और जिज्ञासा तब और ज्यादा बढ़ जाती है, जब मुझे मेरे कई हिंदू करीबियों की दिलचस्पी, हिंदुआंे का गौरव गान करने से ज्यादा, मुसलमानों और ईसाइयों को खतरनाक सिद्ध करने में दिखती हैं।
मेरा गांव अमेठी के जिस इलाके में है, वहां मुसलिमों की आबादी कम नहीं। पीढियों से इलाके का कपङा सिलने वाले, हमारे सार्वजनिक उत्सवों उत्सवों, और शादियों में गोला-पटाखे दगाने वाले और मंदिरों के बाहर फूलमाला बेचने वाली मालिने… सब मुसलमां हैं। सब से हमारा सुख-दुख का रिश्ता है; आना-जाना है; बावजूद इसके बाबरी मसजिद विघ्वंस के बाद अपनी पहचान के निशानों के लिए उनकी बेचैनी देखकर भी मैं चिंतित हूं।
हिंदुवादी संगठन भी भारत को हिंदू राष्ट्रवाद के डंडे से हांकने की कोशिश में इतनी शिद्दत के साथ लगे हैं, मानो हिंदू राष्ट्र रहते हुए नेपाल ने कुदरत और दुनिया की सारी नियामतें पा ली थी या फिर हिंदू राष्ट्र रहते हुए नेपाल में आपसी वैमनस्य को कोई आंदोलन ही नहीं हुआ। आखिर वह क्या है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था अपनाकर नेपाल ने खोया और हिंदू राष्ट्र होते हुए उसने हासिल कर लिया था ? गौर कीजिए कि भारत में भाजपा सरकार आने के बाद से नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने की मांग को फिर हवा देने की कोशिश की गई। सफल नहीं होने पर नाराजगी जताई गई। नतीजा भी सामने ही है। मात्र डेढ़ वर्ष के  छोटे से राजनैतिक कालखण्ड में भारत ने नेपाल के बङे भाई का पद और हक.. दोनो खो दिया है। भारत के प्रति आज भाव यह है कि नेपाल ने भारतीय चैनलों की एक बङी संख्या का नेपाल मंे प्रसारण रोक दिया है।
दूसरी तरफ दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इतने वर्षों बाद भी पाकिस्तान और भारत आपस में क्रमशः एक मुसलमां और हिंदू राष्ट्र की तरह ही व्यवहार कर रहे हैं। जर्मनी, रूस समेत दुनिया के कई देशों का विभाजन हुआ, किंतु विभाजन पश्चात् आपसी सरकारों में ऐसा सांप्रदायिक रंज किन्ही और दो देशों में नहीं। जिन्ना ने मृत्यु पूर्व भारत-पाकिस्तान के एक हो जाने की इच्छा जाहिर की थी। दोनो मुल्कों के कितने लोगों के मन में आज भी है कि दोनो मुल्कों के शासन, सांप्रदायिक कट्टरता त्यागें। कश्मीर के मसले पर हिंदू-मुसलमां के तरफदार होकर हल करने की जिद्द छोङें। एक दोस्त की तरह रहें। अपना ध्यान, एक-दूसरे का नुकसान करने की बजाय, तरक्की में सहयोग के लिए लगायें। इन्ही तमाम आकांक्षाओं और आशंकाओं ने मुझे हिंदू-मुसलिम कट्टरता, मिथक और यथार्थ को जानने को तैयार किया।

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