लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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internकालेज के सेमेस्टर खत्म होने से पहले ही सभी को इंटर्न की चिंता होने लगती है। फिर चाहे वह किसी भी क्षेत्र का विद्यार्थी हो उसे इंटर्न की चिंता सताने लगती है। सेमेस्टर के अंतिम दिनों में जब परीक्षा का भूत हमारे सर पर सवार होता है तो ऐसे में इंटर्न का भी आतंक हमें चैन नही लेने देती है। ऐसे में हम कहा जाए क्या करे ये आसानी से समझ नहीं आता है। कई सारी दुविधाओं से हमारा मन ग्रस्त हो जाता है। जैसे – कहाँ इंटर्न मिलेगी, मिलेगी भी या नही और मिल भी गई तो वहाँ हमें सीखने लायक भी कुछ मिलेगा या नही इस तरह से तमाम दुविधा हमें परेशान करती रहती है। ये परेशानी परीक्षा के समय की ही नही बल्कि जब तक इंटर्न न मिले तब तक सताती रहती है।
परीक्षा खत्म होने के बाद हमारी हालात कॉल सेंटर जैसी बन जाती है। अंतरजाल के द्वारा भिन्न भिन्न संस्थानों के संपर्क सूची निकालते है फिर एक विज्ञापनकर्ता की तरह इधर उधर कॉल करके इंटर्न का प्रचार करने में लग जाते है। फर्क सिर्फ इतना है कि विज्ञापनकर्ता अपने लोभ के लिए इधर उधर करते है और हम अपनी जरूरत यानि अपने भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए इधर उधर करते है। असल में इंटर्न के आतंक की शुरूआत तब होती है जब अपना परिचय लेकर कई सारी कंपनी में जाते है और वहां जाकर हमें यह पता चलता है कि यहाँ इंटर्न के लिए कोई जगह खाली नही है। कसम से ऐसा एहसास होता है जैसे हम इंटर्न नहीं नौकरी मांगने गये है। मै आपको मीडिया में इंटर्न के लिए कैसे कैसे धक्के खाने को मिलते है इससे अवगत कराती हूँ।
कालेज के प्रथम वर्ष में मेरा उद्देश्य प्रिंट मीडिया में इंटर्न करने का था। बीते दिसंबर की ही बात है । कड़कड़ाके की ठंड में मै नोएडा और दिल्ली की सड़को पर इंटर्न के लिए दौड़ती रही। कभी कभी कोई कहता कि हम इंटर्न नहीं कराते तो कोइ वक्त पर वक्त दे देता परंतु आखिरी में उसका वक्त ही नही आता था। इन तमाम परेशानियों का सामना करते हुए मैनें हार नहीं मानी और आखिर में मुझे अपनी पहली इंटर्न मिल गई। लेकिन ये इंटर्न इतनी आसानी से नहीं मिली इसके लिए मुझे समाचार दफ्तर के कई चक्कर लगाने पड़े थे। ठीक यही हाल मई जून के अवकाश के दौरान भी हुआ लेकिन इसमें थोड़े कम धक्के खाने पड़े थे क्योंकि कुछ दिन में सफलता मिल गई थी।
कालेज के दूसरे वर्ष के दौरान उद्देश्य बदले तो जाहिर सी बात है परेशानियों में भी इजाफा हुआ। प्रिंट मीडिया से इलैक्ट्रानिक मीडिया के तरफ मैने अपना रूख किया तो ऐसे लगा जैसे कि शेर के मुंह में हाथ डालना। प्रिंट मीडिया में आपको इंटर्न थोड़ी आसानी से मिल सकते है परंतु इलैक्ट्रानिक में तो इंटर्न का मिलना नाको चने चबाने जैसै है। दिसंबर की छुट्टियाँ चल रही है और मेरा सिलसिला पिछले साल जैसा ही सड़क पर धक्के खाना है। कई जगह काल करके पता किया तो वही पहले जैसा जवाब कि अभी जगह उपलब्ध नही है, जो इंटर्न कराते है वो अभी अवकाश पर गये कुछ दिनों बाद संपर्क करना,हमारे यहाँ कम से कम इंटर्न तीन महीने का होता है,हमारा खुद का संस्थान है तो हम अपने बच्चों को ही इंटर्न कराते है। इस तरह के जवाब सुनते सुनते मेरी आश टूटने को है। इलैक्ट्रानिक मीडिया में कई ऐसे कंपनी है जो कहते है कि आपक किसके जान पहचान से आए है यहां पर जान पहचान से इंटर्न मिलती है। अब जो पहली बार इंटर्न करने जाएगा वो बेचारा भला किसी का हवाला कैसे दे सकता है। और जान पहचान तो जब बनेगी जब हमें काम करने का अवसर मिलेगा। तो कोई नौकरी की तरह आठ घंटे तक काम करना पड़ेगा और सुविधा नाम की कोई चीज नही मिलेगी। धक्के खाने के बाद भी अगर आपको इंटर्न मिल गयी तो वो आपका नसीब अच्छा है वरना कई बार तो धक्के खाने के बाद भी इंटर्न नहीं मिलती। आजकल तो इतनी कंपनी खुल गई है उन्हें देखने पर लगता है कि इंटर्न कही न कही तो मिल ही जाएगी परंतु हकीक़त इससे परे है।
एक विद्यार्थी बेचारा इसी सोच में डूबा रहता है और छुट्टियाँ समाप्त हो जाती है। फिर से यह प्रक्रिया अगले वर्ष के लिए टल जाती है और यही कारण होता है कि जब उन्हें नौकरी की जरूरत होती है तब उन्हें इंटर्न कराई जाती है। इंटर्न अगर समय पर मिल जाए तो विद्यार्थी का भविष्य थोड़ा उज्ज्वल बन जाएगा।
श्रेया पाण्डेय
दिल्ली विश्वविद्यालय

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