लेखक परिचय

अनिल गुप्ता

अनिल गुप्ता

मैं मूल रूप से देहरादून का रहने वाला हूँ! और पिछले सैंतीस वर्षों से मेरठ मै रहता हूँ! उत्तर प्रदेश मै बिक्री कर अधिकारी के रूप मै १९७४ मै सेवा प्रारम्भ की थी और २०११ मै उत्तराखंड से अपर आयुक्त के पड से सेवा मुक्त हुआ हूँ! वर्तमान मे मेरठ मे रा.स्व.सं. के संपर्क विभाग का दायित्व हैऔर संघ की ही एक वेबसाइट www.samvaadbhartipost.com का सञ्चालन कर रहा हूँ!

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भारत की आर्थिक प्रगति को सबसे बड़ी चुनौती यहाँ की तेजी से बढ़ रही जनसँख्या है!२०११ की जनसँख्या के आंकड़ों के अनुसार पिछले दशक में जनसँख्या वृद्धि की औसत दर लगभग १.७% प्रतिवर्ष रही है! पिछले पांच वर्षों में इसमें ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ लगता! फिर भी यदि पिछले पांच वर्षों की अथवा यों कहें कि चालू दशक की वृद्धि दर १.६% प्रति वर्ष रहे तो भी पिछले पाँचवर्षों में जनसँख्या बढ़कर वर्तमान में लगभग १३१ करोड़ से अधिक हो चुकी है! और संयुक्त राष्ट्र की जनसँख्या सम्बन्धी गणना के अनुसार २०२२ तक भारत विश्व का सर्वाधिक आबादी वाला देश बन जायेगा और चीन को पीछे छोड़ देगा! २०२६ तक भारत की जनसंख्या लगभग १५० करोड़ होगी! तथा यदि कोई विशेष घटना या दुर्घटना नहीं घटी तो २०६५ तक हमारी जनसँख्या २०० करोड़ को पार कर जाएगी!
क्या हमारे नीति निर्धारक इस सम्भावना को ध्यान में रखकर कार्य कर रहे हैं? लगता तो नहीं है!हमारे पास इतनी जनसँख्या के लिए धरती सीमित है!तीन तरफ पानी और एक तरफ पहाड़ है जो हमारी भौतिक सीमाओं को बांधे हुए हैं! अतः वर्तमान क्षेत्रफल के आधार पर ही समस्त योजनाएं बनानी होंगी!
खाद्यान्न सुरक्षा की दृष्टि से हमारा विकास क्षैतिज (हॉरिजॉन्टल) अथवा समतल न होकर उर्ध्वाकार (वर्टिकल) ही हो सकता है! सिंगापुर की तरह बहुमंजिले आवास जिनमे चाइल्ड केयर सेंटर, प्रोविजन स्टोर्स, प्राथमिक चिकित्सा केंद्र भी हों बनाये जाने चाहिए! लेकिन हमारे विकास प्राधिकरणों में आज भी पचास साल पुराने नियम चल रहे हैं जिनमे अधिकतम ऊंचाई को सीमित किया जाता है! इसे तत्काल बदलने की आवश्यकता है!भूमि की कमी के कारण इस प्रकार से नियोजन करना होगा कि हमारी खाद्य सुरक्षा, बढ़ती हुई आबादी के लिए भी,बानी रहे! कृषि के क्षेत्र में भी लघु सिंचाई की सुविधाओं के द्वारा सिंचित कृषि क्षेत्र को वर्तमान 19% से बढाकर अगले दशक में कम से कम 50% किया जाना आवश्यक है!और २०३५ तक शत प्रतिशत सिंचित कृषि होनी अपेक्षित है! ऐसा होने पर हम वर्तमान की तुलना में कमसे कम दो गुना खाद्यान्न उत्पन्न क़र सकेंगे! 1966-67 में अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने एक रिपोर्ट तैयार करायी थी जिसमे उस समय भारत की खाद्यान्न उत्पादन की क्षमता 250 करोड़ लोगों के लिए पर्याप्त मानी गयी थी बशर्ते इंटेंसिव और एक्सटेंसिव कृषि उत्पादन को अपनाया जाये! वर्तमान में कृषि विज्ञानं में भारी प्रगति हुई है और इस समय हम 400 करोड़ लोगों के लायक अन्न पैदा कर सकते हैं!दृढ इच्छा शक्ति और किसानों का मोटिवेशन चाहिए! साथ ही दूसरी हरित क्रांति की जो बात की जाती है उसके लिए कृषि को उद्योग की तरह आगे बढ़ाना होगा जिसके लिए खेती की आधुनिक तकनीक का प्रयोग आवश्यक है! इसके लिए वर्तमान कृषि भूमि सीमा कानूनों को आमूल चूल बदल क़र इस प्रकार की व्यवस्था करनी होगी कि छोटी छोटी जोतों के स्थान पर बहुत बड़े बड़े फार्म हों जिनमे आधुनिकतम तकनीक अपनाना संभव हो सके!पानी कि बढ़ती किल्लत को देखते हुए काम पानी वाली तकनीक को अपनाया जाये! ड्रिप सिंचाई योजना को उदारता पूर्वक वित्तपोषित किया जाये और इसके भरपूर प्रयोग हेतु किसानों का सघन प्रशिक्षण किया जाये!ऑर्गेनिक खेती को बढ़ावा दिया जाये!
भारत को एक आधुनिक राष्ट्र राज्य बनाने के लिए भविष्य दृष्टि का स्पष्ट होना आवश्यक है!इस निमित्त प्रधान मंत्री जी को एक उच्च स्तरीय सलाहकार समिति का गठन करना चाहिए जिसमे विभिन्न क्षेत्रों के बेस्ट ब्रेन्स हों! अगले दस वर्षों की योजना लेकिन अगले सौ वर्षों का परिदृश्य सामने रखकर कम होगा तभी इस देश को परम वैभव के शिखर तक पहुँचाना संभव हो सकेगा!

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1 Comment on "हमारा लक्ष्य: परम वैभव; लेकिन कैसे?"

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Himwant
Guest

भारतीयों की स्वर्ण के प्रति भूख हमारी परम गरीबी का कारण है. सरकार को चाहिए की वह ऐसा कानून लाए जिसमे स्वर्ण रखने वाले को मृत्यु दंड का प्रावधान हो. अगर स्वर्ण में कैद भारत के वैभव को हम मुक्त करा सके तो देश तेजी से आगे बढेगा. भारतीयों के पास बहुत पैसा है, सरकार के कड़े टैक्स कानूनों ने उसे कुंठित कर दिया है. स्वर्ण से पैसे खाली हो और सरकार नागरिको के लिए उन पैसो को उद्योग वाणिज्य कृषि में निवेश को सहज बनाए तो हम परम वैभव को पा सकेंगे.

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