लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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भारत जब सल्तनत काल के अत्याचारों से मुक्त होने का संघर्ष कर रहा था, और हिंदू प्रतिरोध की भयानक परिस्थितियों का सामना करते-करते जब सल्तनत की रीढ़ टूट चुकी थी, तब भारत पर बाबर का आक्रमण हुआ। हमने पूर्व में उल्लेख किया था कि जिस समय बाबर ने भारत पर आक्रमण किया। उस समय का इतिहास उदास था, और वह रक्त के आंसुओं से रो रहा था।

भारत बहा रहा था आंसू

इतिहास की आंखों में रक्त के आंसू होने का अभिप्राय है कि भारत अपने उस दुर्भाग्य पर रो रहा था जो उसने दुर्योधन, शकुनि और दु:शासन की हठधर्मिता की कुटिल चालों के रूप में महाभारत में देखने को मिला था। भारत में उस समय ऐसा साज सजा था कि भारत जीतकर भी हार गया था। वह एक ऐसा युद्घ है जिस पर आप किसी को जीत की बधाई नही दे सकते। इसीलिए युधिष्ठिर को युद्घ के पश्चात राजा बनने से विरक्ति हो गयी थी। भारत ने युद्घ को हारकर जीता और युधिष्ठिर को विजयी राजा मानकर शांति पथ पर बढऩा आरंभ कर दिया। आज भारत न तो हारकर जीत रहा था और ना ही जीतकर हार रहा था। आज सब कुछ परिवर्तित हो गया था। आज ना तो हम हारने वाले थे और ना ही जीतने वाले। क्योंकि युद्घ हमारी भूमि पर हम पर शासन करने के लिए दो विदेशी शक्तियों के मध्य हो रहा था और हम मौन रहकर युद्घ को कर रहे थे। अत: हम विनाश के लिए प्रतीक्षारत थे। इतिहास ने भारत में कितने ही नरसंहार देखे थे, और कितने ही विनाश देखे थे, पर अबकी बार का विनाश वास्तव में ही उसके लिए प्रलंयकारी सिद्घ होने जा रहा था। इसलिए इतिहास रक्त के आंसू बहा रहा था।

बाबर का सौभाग्य

बाबर एक ऐसा आक्रांता था जो अपने देश में ही अपने लिए सब कुछ खो चुका था। इसलिए उसने अंतिम दांव एवं भारत की अस्मिता को लूटने के लिए लगाया, और उससे उसका सौभाग्य ही कहा जाएगा कि वह भारत में आकर सफल मनोरथ हो गया।

बाबर की पृष्ठभूमि

बाबर फरगना का रहने वाला था, उसका पिता 50 हजार वर्गमील भूमि के भाग का राजा था। यह प्रांत आजकल तुर्किस्तान में स्थित है। अपने पिता की आकस्मिक मृत्यु के कारण बाबर को मात्र ग्यारह वर्ष की अवस्था में ही राज्य कार्य संभालना पड़ गया था।

बाबर मुगल नही तातार था

बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर लंग का और गैर माता की ओर से चंगेज खां का उत्तराधिकारी था। बाबर तातार था, और मुगलों से घृणा करता था, परंतु इसके उपरांत भी इतिहास में उसके वंश को मुगलवंश के नाम से जाना जाता है। बहुत लोगों को और इतिहासकारों को इस तथ्य का ज्ञान है, परंतु इसके उपरांत भी बाबर और उसके वंशजों को मुगल कहे जाने की परंपरा समाप्त नही हो रही।

बाबर रहने लगा था दुखी

एक समय ऐसा आया था कि बाबर से अपना राज्य भी छिन गया था। तब वह बहुत दुखी रहने लगा था। वह स्वयं लिखता है-‘‘मेरी दशा अतीव शोचनीय हो गयी थी, और मैं बहुत अधिक रोया करता था। पर मेरे मन में विजय तथा राज्य प्रसारण की उत्कट लालसा थी। अत: एकाध हार से ही सर पर हाथ रखकर बैठने वाला नही था। मैं ताशकंद के खान के पास गया कि उसके ही कुछ सहायता प्राप्त की जा सके।’’

होने लगा उत्थान

इस कथन से स्पष्ट होता है कि बाबर उद्यमी और पुरूषार्थी  था, उसने साहस से काम लिया और धीरे-धीरे उठने का प्रयास किया। अंत में 1499 ई. में उसने अपने पिता का खोया हुआ राज्य प्राप्त कर ही लिया। उसका उत्थान हो रहा था और ईश्वर उसकी सहायता कर रहा था। वह अपने जीवन काल में मुगलों से दुखी रहा था। इसलिए उसने मुगलों के विषय में लिखा-‘‘मुगल लुटेरे हर प्रकार से नीचता प्रदर्शन करने वाले तथा विनाश लीला करने वाले हैं। अब तक उन्होंने पांच बार मेरे विरूद्घ विद्रोह किया है। यही नही कि उन्होंने मेरे विरूद्घ ही विद्रोह किया, स्वयं अपने लोगों को भी उन्होंने बख्शा नही है।’’

यह मुगल शासकों के विषय में मुगलों का ही कथन है जिससे स्पष्ट होता है कि बाबर को मुगल लोग इतने घृणास्पद लगते थे कि वह उनके लिए सदा विनाश की ही माला जपता था। बाबर का दृष्टिकोण हिंदुओं के प्रति भी कठोर था। वह अपने हर पूर्ववर्ती मुस्लिम आक्रांता की भांति पहले मुस्लिम था और उसके उपरांत कुछ और था।  इसलिए उसे भी ‘काफिरों’ से घृणा थी।

किया क्रूरता का प्रदर्शन

बाबर ने अपनी क्रूरता का प्रदर्शन अपने प्रथम युद्घ में ही कर दिखाया था। उसने यह युद्घ तेबोलियों के विरूद्घ किया था, जिसके विषय में वह लिखता है-‘‘हमने अनेक बंदियों के सिरों को काटने की आज्ञा दी। जब मैं इन छावनियों में रूका हुआ था। खुराबर्दी, ध्वजवाहक, जिसे मैंने कुछ काल पूर्व ही उपाधि से विभूषित किया था। दो तीन बार तंबोलियों पर झपटा, उन्हें भगा दिया, और  न जाने उनमें से कितनों के सिर काटकर शिविर में ले आया। उस अंदेजन के युवक भी शत्रु देश को लगातार लूटते रहे। उनके घोड़ों को हांक लाये, उनके लोगों को मार दिया और उन्हें मुसीबतों में डाल दिया।’’

पालने में दीख जाते हैं पूत के पांव

कहते हैं कि पूत के पांव पालने में ही दीख जाते हैं। अत: बाबर ने भी अपने प्रथम युद्घ में ही अपने भावी रक्तपिपासु जीवन की झलक दिखा दी। उसने अपने इन संस्मरणों से स्पष्ट कर दिया कि उसको भविष्य में इस युद्घ से भी यदि भयंकर युद्घ करने पड़े तो वह अपनी क्रूरता का भरपूर प्रदर्शन करेगा।

बाबर के भारत पर आक्रमण

बाबर जब भारत पर चढक़र आया तो उसने यहां भी वही किया जो उससे किया जाना अपेक्षित था। भारत पर उसने इब्राहीम लोदी को परास्त करने से पूर्व पांच बार आक्रमण किये थे। उसका पहला आक्रमण 1519 ई. में, दूसरा उसी वर्ष सितंबर में, तीसरा 1520 ई. में, चौथा 1524 ई. में तथा पांचवां नवंबर 1525 ई. में हुआ।

बाबर का राजपूत रायों ने किया वीरोचित ‘स्वागत’

सिंधु नदी पार करते ही बाबर का वीरोचित शैली में ‘स्वागत’ सत्कार हिंदू राठौर राजपूतों के वंशजों के रायों और उनकी सेना ने किया। इन लोगों को जनजुआ कहा जाता था। ये स्वभावत: बड़े वीर और देशभक्त लोग थे। उन्हें  सिंधु के उस पार से अपनी मातृभूमि में प्रवेश कर अपने देश की पवित्र भूमि की ओर बढऩे वाले किसी भी आक्रांता को देखा जाना प्रिय नही था। अत: इन हिंदू वीरों ने इस विदेशी आक्रांता को ललकारा और उसे स्पष्ट कर दिया कि भारत में घुसने का अर्थ होगा हमारी लाशों के ऊपर से जाना एक प्रकार से यह ललकार थी कि आगे बढऩे से पहले हमसे भिड़ो। ‘‘जाने वालो जरा होशियार यहां के हम हैं पहरेदार।’’

निकल रही थी चुनौती की चिंगारी

बाबर ने भी समझ लिया कि तू जिस धरती की ओर बढ़ रहा है उसका बच्चा-बच्चा प्रहरी है और उसके कण कण से चुनौती की चिंगारी निकलती है, इसलिए हर चुनौती का सामना करना होगा। अत: उसने इस देश भक्तों की चुनौती को स्वीकार किया और दोनों पक्षों में भयंकर संघर्ष हुआ। ये राठौर राजपूत मारकाट दिये गये, पर इन वीरों ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार अपने शवों के ऊपर से ही शत्रु को मार्ग दिया।

गक्खरों ने भी किया प्रतिरोध

सीमावर्ती क्षेत्रों में ही हिंदुओं की गक्खर जाति का निवास था। ये लोग भी अपनी वीरता और साहस के लिए प्रसिद्घ थे, और पूर्व में अपने शौर्य एवं साहस के कई कीर्तिमान स्थापित कर चुके थे। अब जब उन्हें भारत की ओर बढ़ते बाबर की जानकारी हुई तो उन्होंने भी बाबर का प्रतिरोध करने की प्रतिज्ञा ली।

बाबर को भागना पड़ गया

भला वीर पुत्रों के रहते मां के आंचल की ओर कोई शत्रु चल भी कैसे सकता था? इसलिए बाबर को इन वीर पुत्रों ने रोक लिया और उसे युद्घ के लिए ललकारा। बाबर ने युद्घ की चुनौती स्वीकार की। युद्घ की विभीषिकाओं से बाबर की सेना में भगदड़ मच गयी। गक्खरों और अन्य वीर हिंदू जातियों ने मिलकर बाबर को सिंधु के उस पार तक खदेड़ दिया। बाबर भारत के मुट्ठी भर लोगों के द्वारा पड़ी मार से पीठ को सहलाता हुआ, अपने देश भाग गया। उसे अपमान, कुण्ठा और पीड़ा ने घेर लिया।

पी.एन. ओक महोदय अपनी पुस्तक ‘भारत में मुस्लिम सुल्तान’ भाग-2 के पृष्ठ 37 पर लिखते हैं-‘‘भारत के सीमावर्ती निवासी व  गक्खरों तथा अन्य हिंदू जातियों द्वारा बाबर को सिंधु के पार खदेड़ दिया गया, जलालाबाद मार्ग पर काबुल से लगभग दस मील पूर्व में स्थित बुत खाक में होकर बाबर का प्रत्यावर्तन हुआ। इसका नाम लुटेरे मुहम्मद गजनी के उस मूर्तिभंजक करतब से पड़ा है जब वह भारत के हिंदू मंदिरों को लूटकर उनकी पवित्र मूर्तियों को विचूर्ण कर गया था।’’

किया स्यालकोट पर आक्रमण

जब बाबर को इन गक्खरों और अन्य हिंदू लोगों ने परास्त कर भगाया तो वह भारत पर दूने वेग से चढक़र आया और कभी राजा शालिवाहन के कोट स्यालकोट को घेर लिया। सईदपुर के वीर लोगों ने यद्यपि बाबर का भरपूर प्रतिरोध किया, परंतु वे अपने उद्देश्य में असफल रहे और बाबर ने उन्हें क्रूरता पूर्वक तलवार की भेंट चढ़ा दिया। परंतु तलवार के घाट उतर जाने या तलवार की भेंट चढ़ जाने का अभिप्राय भी तो कायरता नही है, वह तो और भी उच्च श्रेणी की वीरता है और यह भी कम नही है कि हमारे लोगों ने इस वीरता का प्रदर्शन पग-पग पर किया।

स्यालकोट को लेकर हिंदुओं ने दिये बलिदान

अपने अगले आक्रमण में 22 दिसंबर 1525 को बाबर ने स्यालकोट पर अपना अधिकार कर लिया। यहां के हिंदुओं ने इस प्राचीन ऐतिहासिक नगर की रक्षा के लिए अंतिम बार संघर्ष किया पर वह इस नगर की प्रतिष्ठा और सम्मान को बचा नही पाए। भारत के इतिहास में 22 दिसंबर 1525 ई. का दिन ‘कालादिवस’ है, क्योंकि इसी दिन स्यालकोट हिंदुओं के हाथ से निकलकर पुन: कभी उनके अधिकार में नही आया।

स्यालकोट का गौरव धूमिल हो गया

हिंदुओं के बलिदानों के मध्य अप्रत्याशित रूप से देखते ही देखते एक इतिहास मिट गया। एक गौरव धूमिल हो गया और इसी इतिहास के साथ हिंदुओं के अंतिम बलिदान की अंतिम वीरगाथा भी यूं विस्मृत कर दी गयी कि मानो यह ऐतिहासिक नगर बिना किसी संघर्ष और बिना किसी बलिदान के हिंदुओं द्वारा मुस्लिमों को यूं ही दे दिया गया था।

आज का स्यालकोट चाहे जिस शत्रु देश में हो, परंतु वह वहां के हिंदू पूर्वजों के बलिदान की गौरव गाथा का जीता जागता स्मारक है। जब तक स्यालकोट रहेगा तब तक हिंदू के बलिदानों की गौरवगाथा को भुलाया नही जा सकेगा। जो इसकी सुरक्षा करते-करते अनेकों हिंदुओं ने दिये थे। इस समय इब्राहीम लोदी की ओर से दौलत खां लोदी पंजाब का राज्यपाल था, उसे बाबर की सेना ने बंदी बना लिया और उस पर निर्ममता पूर्वक अत्याचार किये गये।

पुस्तकालयों को लगायी आग

भारत में युग-युगों मेधावी बुद्घि की उपासना की गयी है, इसलिए वैदिक ज्ञान धारा की सरिता का प्रवाह यहां कभी मद्घम नही पड़ा। अपने ज्ञान गाम्भीर्य, बौद्घिक संपदा और मेधाशक्ति के माध्यम से भारत के प्राचीनकाल से ही विश्व का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व किया है। भारत के उस ज्ञानगांभीर्य, बौद्घिक संपदा और मेधाशक्ति का पूरा विश्व ऋणी है, और शत्रु भी उनका प्रशंसक है।

परंतु इस्लामिक आक्रांताओं ने जब जब भी यहां ज्ञान संपदा और मेधाशक्ति की प्राणशक्ति के प्रतीक पुस्तकालयों को कहीं भी देखा तो उन्हें भी शत्रुभाव के कारण अग्नि की भेंट चढ़ाने में तनिक सी भी देरी नही की।

मलोट दुर्ग के पुस्तकालय में लगाई आग

8 जनवरी 1526 ई. को बाबर ने जब मलोट दुर्ग में प्रवेश किया तो वहां के विशाल पुस्तकालय को देखकर वह दंग रह गया। उस पुस्तकालय को उसने आग लगवा दी। जिसमें प्राचीन काल की अनेकों ऐतिहासिक धार्मिक, वैज्ञानिक और बौद्घिक महत्व की पुस्तकें रखीं थी। बाबर लिखता है-‘‘मलोट दुर्ग में प्राप्त स्वर्ण एवं अन्य वस्तुओं के कुछ अंश को मैंने स्वार्थ सिद्घि के लिए बल्ख, कुछ को अपने संबंधियों तथा मित्रों को भेंट स्वरूप काबुल भेज दिया तथा कुछ अंश अपने बच्चों को तथा आश्रितों को बांट दिया।’’ इस प्रकार दुर्ग की संपत्ति को हथियाकर बाबर को असीम प्रसन्नता की अनुभूति हुई।

बलिदानी राजा विक्रम और उसका परिवार

पहले से ही यवनों के आक्रमणों से पद दलित भारत भूमि को एक नये आक्रांता के आक्रमण से बचाने के लिए ग्वालियर का राजा विक्रम इब्राहीम की ओर से पानीपत के युद्घ में बाबर के विरूद्घ लड़ा था। वह राजा अपनी वीरता का प्रदर्शन करता हुआ युद्घ भूमि में ही वीरगति को प्राप्त हो गया था। जब बाबर ने इब्राहीम लोदी को परास्त कर दिया तो उसने 4 मई 1525 ई. को आगरा की ओर प्रस्थान किया। पी.एन. ओक हमें बताते हैं कि बाबर ने वहां खुलेआम फार्मूली द्वारा हथियाये गये एक प्राचीन हिंदू भवन पर अधिकार किया।

यह दुर्ग से बहुत दूर था, अत: बाबर एक अन्य हिंदू महल में गया जिसे जलाल खां जिगहट ने हड़प लिया था? परिवार का मुखिया राजा विक्रम (वास्तविक नाम- राजा विक्रमादित्य सिंह तोमर) पानीपत में इब्राहीम के पक्ष में लड़ता हुआ कुछ सप्ताह पूर्व ही कत्ल कर दिया गया था। हिंदू राजाओं के परिवार जो कि आगरा दुर्ग में थे यवन आक्रांताओं के द्वारा बंदी बना लिये गये और उनकी सारी संपत्ति लूट ली गयी। इस प्रकार आगरा का लालकिला जिसे यहां आगरा दुर्ग कहा गया है, बाबर के आक्रमण के समय भी था, जिसे हमें अकबर द्वारा निर्मित बताया जाता है ।

बादलगढ़ बनाम आगरा का लालकिला

पिछले दिनों लेखक ने स्वयं भी उक्त लालकिले का भ्रमण किया था यह देखकर प्रसन्नता हुई कि सरकारी स्तर पर भी इस किले को अब पुराना बादलगढ़ माना गया है। इस संबंध में किले के भीतर स्थित एक द्वार के निकट शिलालेख के माध्यम से यह भी स्पष्ट किया गया है कि इस बादलगढ़ का जीर्णोद्वार या यथावश्यक परिवर्तन कहीं न कहीं किसी न किसी प्रकार से मुगल कालीन बादशाहों ने भी किया है। ब्रिटिश इतिहासकार कीन का कथन है-‘‘सन 1450 से 1488 तक दीर्घावधि तक शासन करने वाला बहलोल लोदी दिल्ली का पहला बादशाह था जो आगरा पर सीधा मुहम्मदी शासन स्थापित कर पाया। यह बात पहले ही ध्यान में आ चुकी है कि इस नगर के अति प्राचीन इतिहास में एक किला यहां पर विद्यमान था तथा परंपरा के अनुसार बादलसिंह नामक एक राजपूती सरदार था जिसके नाम पर बादलगढ़ किले का नाम रखा गया था। इन किलों का पारस्परिक संबंध कहीं लिखित नही मिलता। इसमें संदेह नही है कि बादलगढ़ पुराने किले के स्थान पर ही बना था और यह भी पूर्णत: सिद्घ है कि जब बहलोल लोदी ने आगरे पर कब्जा किया तब वहां पर एक किला बना हुआ था। अत: बादलगढ़ उस समय आगरे का किला था…किंतु इस किले को यह नाम कब दिया गया था अब निश्चित नही किया जा सका।’’

(‘कीन्स हैण्ड बुक’ पृष्ठ 5)

हमने भुला दिया इतिहास

इस प्रकार कीन महोदय के वर्णन से एक बात तो स्पष्ट है कि हमने ही इस किले की प्राचीन ऐतिहासिकता को छद्म धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भुलाने का आत्मघाती प्रयास किया है। जिसका लाभ मुगल कालीन बादशाहों को मिला है। जिन्होंने आगरा लालकिले को ही नही अपितु अन्य कितने ही प्राचीन ऐतिहासिक दुर्गों, भवनों आदि को अपने द्वारा निर्मित दिखाकर हिंदू स्थापत्य कला को विस्मृत करने का सफल प्रयास किया है। जिससे हिंदू स्थापत्य कला और भवन निर्माण शैली को चोट पहुंची है, और हमारी युवा पीढ़ी में अपने इतिहास के प्रति नीरसता का भाव बढ़ा है। वैसे कीन महोदय ने ही इस किले को ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी के मौर्यकालीन प्रसिद्घ सम्राट अशोक के काल का सिद्घ किया है। पर इस ओर और भी अधिक शोध की आवश्यकता है।

बाबर ने कब्जा लिया आगरा

बाबर ने 10 मई 1526 ई. को बृहस्पतिवार के दिन आगरा स्थित लोदी के भवन को अपने अधिकार में ले लिया था। वह लिखता है-‘‘ईद के कुछ दिन पश्चात एक भव्य भोज समारोह (11 जुलाई 1526 को) ऐसे विशाल कक्ष में हुआ जो पाषाण खंभों की स्तंभ पंक्ति से सुसज्जित है और जो सुल्तान इब्राहीम के पाषाण प्रासाद के मध्य के गुम्बद के नीचे है।’’

आगरा में 1526 ई. को एक ‘भव्य भवन’ कौन सा था? पी.एन. ओक महोदय इस प्रश्न का उत्तर देते हुए स्पष्ट करते हैं कि वह ‘भव्य भवन’ यमुना नदी के तट पर स्थित वर्तमान का ताजमहल ही था। अनेक प्रमाणों से अब यह सिद्घ हो चुका है कि ताजमहल भी एक हिंदू कृति है। इसका उल्लेख प्रसंगवश हम आगे करेंगे।

किये भयंकर नरसंहार

जब बाबर देश के भीतर तक घुसने में सफल हो गया तो स्वाभाविक रूप से उसने हिंदुस्तान को लूटना और नरसंहार करना आरंभ किया। हिंदू भी यह भली प्रकार जानते थे कि अब क्या होने वाला है? इसलिए हिंदुओं ने अपना परंपरागत प्रतिरोधात्मक पलायन किया।

हमने पलायन को प्रतिरोधात्मक इसलिए कहा है कि हिंदू  जब अपने घरों से जंगलों की ओर सुरक्षित स्थानों के लिए पलायन करते थे तो अपना मूल्यवान सामान सोना-चांदी, रूपया, पैसा आदि सब ले जाते थे। वे शत्रु सेना को दुखी करने के लिए और उसे कठिनाइयों में फंसाने के लिए जलस्रोतों को विषाक्त कर जाते और अन्नादि की फसलों को नष्ट कर देते थे। यह एक प्रकार का प्रतिरोध भी था और इसमें अपनी सुरक्षा भी थी। इस सुव्यवस्थित पलायन को इतिहास में स्थान-स्थान पर हिंदू भयभीत होकर भाग गये हिंदू डर गये इत्यादि विशेषणों से वर्णित किया गया है। जिससे कि हमारे भीतर अपने इतिहास और अपने पूर्वजों के प्रति घृणा का भाव baburउत्पन्न हो।

बाबर स्वयं हिंदुओं के सुरक्षात्मक और परंपरागत प्रतिरोधी पलायन के विषय में लिखता है-‘‘हिंदुस्तान में जनधन नगरों का पूर्ण विनाश एक साथ होता है। विशाल नगर, जो अनेक वर्षों से स्थित है एक डेढ़ दिन में इस प्रकार पूर्णतया निर्जन हो जाते हैं (अर्थात हिंदुओं द्वारा स्वयं नष्ट कर जीवन संचालन के लिए अन्न जलादि सुविधाओं से भी हीन कर दिये जाते हैं) कि अन्य कठिनता से ही विश्वास करेंगे कि उनमें कभी कोई आबादी थी।’’

बाबर से भारतीयों ने नही बैठाया सामंजस्य

देश का जनसाधारण नये शासक के साथ किसी भी प्रकार का सामंजस्य स्थापित करने को तैयार नही था, लोगों में बाबर और उसके अधिकारियों सैनिकों तथा व्यक्तियों के विरूद्घ व्यापक घृणा थी। लोग उनसे किसी भी प्रकार का संबंध रखना नही चाहते थे। यह भी प्रतिरोध का एक प्रकार ही था। इसे एक प्रकार से समाज से बहिष्कृत करने का दण्ड भी कहा जा सकता है, जिसे भारतीय इन विदेशियों के विरूद्घ अपना रहे थे। पर क्योंकि यह दण्ड कथित रूप ेसे पराजित जाति के द्वारा विजित जाति को दिया जा रहा था, इसलिए इसका उल्लेख नही किया गया है इसे केवल ‘कथित पराजित’ लोगों की मिथ्याभिमान की भावना या कुण्ठा भाव से जोडक़र देखा गया है। जबकि इसमें पग-पग पर इस कथित पराजित जाति का आत्मस्वाभिमान, वीरता, साहस, अपने को श्रेष्ठ, नैतिक और पवित्र मानने की भावना प्रबलता से कार्य कर रही थी।

हमारे पूर्वजों के श्रेष्ठ गुण मान लिये गये अवगुण

किसी भी जीवन्त जाति के आगे बढऩे के लिए ये सारी बातें उसके श्रेष्ठ गुण होती हैं, ना कि उसके दोष। पता नही हमने अपने पूर्वजों के श्रेष्ठ गुणों को ही अवगुण क्यों मान लिया? यदि कोई व्यक्ति आज भी किसी को अपमानित कर दे और उसके साथ क्रूरता का प्रदर्शन भी करे तो कई बार अगला व्यक्ति उस पहले व्यक्ति से हो सकता है कि संवादहीनता ही स्थापित कर ले या उसके यहां आना-जाना बंद कर उसके प्रति पूर्णत: उपेक्षाभाव का प्रदर्शन करे, तो लोग उस अगले व्यक्ति को स्वाभाविक रूप से स्वाभिमानी व्यक्ति कहते हैं। पर हम अपने पूर्वजों को ऐसा नही कहते क्यों? उनके प्रतिरोध के प्रति ऐसा निंदनीय आचरण अंतत: हम कब तक अपनाएंगे?

बाबर से घृणा करते थे भारत के लोग

हिंदुओं के इस प्रकार के आचरण से दुखी बाबर ने लिखा है-‘‘जब मैं प्रथम बार आगरा गया मेरे लोगों तथा वहां के निवासियों में पारस्परिक द्वेष तथा घृणा थी।  उस देश के किसान तथा सैनिक मेरे आदमियों से बचते (घृणा करते) थे तथा (उपेक्षा भाव समाज-बहिष्कृत जैसा व्यवहार करते हुए) दूर भाग जाते थे। तत्पश्चात दिल्ली तथा आगरा के अतिरिक्त सर्वत्र वहां के निवासी विभिन्न चौकियों पर किलेबंदी कर लेते थे तथा नगर शासक से सुरक्षात्मक किलेबंदी करके न तो आज्ञा पालन करते थे और न झुकते थे।’’

एक प्रकार से बाबर के ये शब्द हमारे हिंदू पूर्वजों की आत्मस्वाभिमानी, देशप्रेमी और जाति अभिमानी भावना का सम्मान करना ही है। हमें भी अपने उन वीर पूर्वजों का यथोचित सम्मान करना सीखना होगा।

क्रमश:


UGTA BHARAT

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