लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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maldaप्रवीण दुबे

कहां खो गए असहिष्णुता पर विधवा विलाप करने वाले, कहां चले गए सम्मान लौटाने वाले? उन साहित्यकारों, कलाकारों की कलम और कला को अब लकवा क्यों मार गया? क्यों इस देश के तथाकथित धर्मनिरपेक्षतावादियों और छद्म बुद्धिजीवियों के मुंह पर ताले लग गये। आखिर इस समय राहुल, सोनिया, केजरीवाल जैसे नेताओं की आंखों पर परदा क्यों पड़ गया?
इस देश में कट्टरपंथी मुसलमानों की सामूहिक भीड़ हिंसा का जो विप्लव करने पर आमादा है उसके लिए तो असहिष्णुता जैसा शब्द भी बौना पड़ जाता है। पहले उत्तरप्रदेश के लखनऊ, बरेली, कानपुर आदि शहरों में फिर पश्चिम बंगाल के मालदा में और अब बिहार के पूर्णिया में मुसलमानों द्वारा जो सुनियोजित हिंसाचार किया गया है, उसके पीछे का सच आखिर क्या है?
यूं तो इस देश ने कट्टरपंथी मुसलमानों का खूनी हिंसाचार कई बार भोगा है। आखिर कौन भूल सकता है २७ फरवरी २००२ को जब गुजरात के गोधरा रेलवे स्टेशन के पास हिंसा पर उतारू मुस्लिमों की एक भीड़ ने उस साबरमती एक्सप्रेस के डब्बों में मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी थी जिसमें अयोध्या से शांतिपूर्ण कारसेवा करके तमाम हिन्दू वापस लौट रहे थे। इसमें ५९ कारसेवक जिंदा जलमरे थे। कौन भूल सकता है उस कश्मीर को जहां से लाखों कश्मीरी पंडित या तो मार दिए गए या फिर मुस्लिम हिंसा के कारण डरकर अपना घर-बार छोडऩे को मजबूर हो गए। कौन भूल सकता है मुम्बई में दंगाइयों की उस उन्मादी भीड़ को जिसने पवित्र शहीद स्मारक को अपने दंगाई चरित्र से अपवित्र कर दिया था। इस देश ने इसी हिंसक मानसिकता वाले लोगों को राष्ट्रीय ध्वज का अपमान करते भी देखा है। दुख इस बात का है कि यदि भूल से भी क्रिया की प्रतिक्रिया हो जाए तो हमारे देश के कथित धर्म निरपेक्षतावादियों, कथित बुद्धिजीवियों को इस देश का सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ता दिखाई देने लगता है।
उस समय गुजरात, बाबरी मस्जिद का गला फाड़-फाड़कर उदाहरण दिया जाता है लेकिन यह कभी नहीं बताया जाता कि गुजरात के पीछे गोधरा और बाबरी मस्जिद विध्वंस के पीछे बाबर, गौरी और गजनी हिंसा मुख्य कारण रहे हैं। पिछले एक माह के दौरान देश में ऐसी ही मानसिकता से पालित-पोषित कुछ मुस्लिम इस बात को लेकर हिंसा पर उतारू हैं कि एक व्यक्ति ने पैगम्बर मोहम्मद के खिलाफ कोई टिप्पणी कर दी थी। महत्वपूर्ण  बात यह है कि जिस व्यक्ति ने यह बात कही थी उसे रासुका जैसी गंभीर धारा के अन्तर्गत जेल में डाल दिया गया है। आखिर फिर क्यों देश के विभिन्न शहरों में सुनियोजित हिंसा फैलाई जा रही है? इसके पीछे का षड्यंत्र आखिर क्या है? कहीं हिंसाचार करने वालों की भीड़ हाफिज और मसूद जैसे पाक परस्तों के संदेशों पर तो संचालित नहीं हो रही ? मालदा और पूर्णिया जैसे शहरों में बड़ी संख्या में मुस्लिम आबादी निवास करती है। अध्ययन से यह भी सामने आया है कि यहां बड़ी संख्या में बंाग्लादेशी घुसपैठिए सक्रिय हैं। इन घुसपैठियों को न हिन्दुस्तान से और न हिन्दुओं से प्रेम है। उनका एकमात्र उद्देश्य इस देश के संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए कट्टरपंथियों की फौज तैयार करना है। ऐसे कट्टरपंथी जो आईएस जैसे मानवता के दुश्मनों में शामिल होकर भारत के लिए खतरा बन जाएं। ऐसी ही मानसिकता वाले इस देश में मालदा और पूर्णिया जैसे हालात पैदा कर रहे हैं। इससे पहले कि यह लोग अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल हों ऐसे आस्तीनों के सांपों का फन कुचलना ही सही रणनीति है, हमारी सरकार और सुरक्षा बलों को इसमें तनिक भी देर नहीं करना चाहिए। इस देश में हिंसाचार फैला रहे मुस्लिम जो कि अविनाश तिवारी की फांसी की मांग कर रहे हैं, उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश में संवैधानिक व्यवस्था है, और उसके अनुसार जिसने मोहम्मद साहेब पर टिप्पणी की थी, उसे जेल में डाला जा चुका है। बावजूद इसके देश के शांतिपूर्ण माहौल में हिंसा फैलाकर कमलेश तिवारी को जबरदस्ती फांसी पर लटकाने की मांग कर रहे इन लोगों को यह समझ लेना चाहिए कि यह देश मुल्ला मौलवियों के कानून के अनुसार नहीं चलेगा। सरकार को भी इस बात को गंभीरता से लेने की जरूरत है

 

 

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