लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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असीम वेदना के साथ पन्ना गूजरी महल से बाहर निकली

अपने पुत्र चंदन से हाथ धोकर और अपनी असीम वेदना को अपने हृदय में समेटकर पन्ना चित्तौड़ के राजभवनों से बाहर निकली। उसे असीम वेदना थी पर  वह अपने पथ से ना तो विचलित थी और ना ही उसे कोई घबराहट थी। हमारी इस मान्यता का आधार यह है किपन्ना ने अपने पुत्र का अंतिम संस्कार स्वयं गुप्त रीति से किया और जब चित्तौड़ से बाहर निकली, तो उसने यह मिथ्या प्रचार कराया कि वह अपने पिता के घर जा रही है। इतना ही नही जब कोई उससे पूछता कि तेरा बेटा चंदन कहां है? तब वह उसे भी वह यही उत्तर देती थी कि वह अपने मामा के यहां है, और मैं उसके जीवन को लेकर चिंतित हूं, कहीं कोई उसकी हत्या ना कर दे।

पन्ना के इस प्रकार के विचारों से उसके धैर्य और साहस का पता चलता है कि वह कितनी बुद्घिमत्ता से काम ले रही थी? यदि वह घबराहट अनुभव करती तो इतने धैर्य, साहस और बुद्घिमत्ता का परिचय वह नही दे पाती।

कष्टों में बुद्घि कई गुणा बढ़ जाती है

कहा तो ये जाता है कि जब  आपत्ति आती है तो उस समय व्यक्ति की बुद्घि भी कई गुणा बढ़ जाया करती है। पर हमारा मानना है कि जब आपत्ति बुलाई जाती है, तो बुद्घि पहले से ही कई गुणा बढ़ी होती है। देश, धर्म और संस्कृति के लिए बलिदान होने वाले लोग या इनके लिए अपना सर्वस्व होम करने वाले लोगों के जीवनवृत्त इन तथ्यों की घोषणा कर रहे हैं कि उन्होंने आदर्शों के लिए जीवन होम करने का संकल्प लिया और कष्ट उठाये तो उस समय ईश्वर ने उनका बुद्घि कौशल भी कई गुणा बढ़ा दिया था।

ईश्वरीय व्यवस्था के अनुसार संसार की व्यवस्था को ढालने का संकल्प यदि आप लेंगे तो वह अदृश्य शक्ति आपका मार्गदर्शन तो करेगी ही साथ ही मार्ग प्रशस्त भी करेगी। यही पन्ना गूजरी के साथ भी हो रहा था, वह शेरनी अपने शौर्य का परिचय देकर किसी प्रकार चित्तौड़ के राजभवनों से बाहर निकलने में सफल हो गयी।

ऐसी शौर्य संपन्न वीरांगनाओं के उद्दीप्त जीवन-कृत्य लोगों के जीवन में क्रांति मचा देते हैं। वीर सावरकर ने ठीक ही लिखा है-‘‘भूतकालीन ऐतिहासिक वीर काव्य, वीरों की गाथाएं, गीता का कर्मयोग और उपनिषदों का ब्रह्मवाद पढक़र अण्डमान के बंदियों की चैतन्य शक्ति उद्दीप्त हो उठती थी। इन पुस्तकों को पढक़र आत्मलज्जा या निराशा के बादल छंट जाते थे, तथा आत्मगौरव व आशा की अनुभूति कर वे जेल यातनाओं को वरदान व राष्ट्रीय कार्य मानने लगते थे।’’

(संदर्भ : ‘आजन्म कारावास’ पृष्ठ 183)

विकल्प को न चुनकर संकल्प को चुना पन्ना ने

भारत माता के ऐसे कोटि-कोटि वीर वीरांगनाएं हुई हैं, जिन्होंने स्वयं को शत्रु की कारागृह से भी भयंकर कष्टों की कारा में स्वयं ही डाल लिया, जबकि उनके पास अवसर उपलब्ध था, जब वे स्वयं को कष्टों में न डालकर संसार के ऐश्वर्यों का भोग कर सकते थे। पन्ना गूजरी के पास भी विकल्प था कि वह उदयसिंह का बलिदान स्वेच्छा से दिलाकर बनवीर की कृपापात्र बन सकती थी। पर उसने हिंदुस्थान के स्वराज्य और स्वधर्म के मूल सिद्घांत को अपनाकर उसके लिए अपना सर्वस्व होम करना उचित समझा। फलस्वरूप उसकी देशभक्ति और स्वतंत्रता की साधना देश की अस्थियों और मज्जा में समाविष्ट हो गयीं, जिससे पन्ना के नाम की सुगंध से भारत का स्वतंत्रता संघर्ष का दीर्घ कालखण्ड आज भी सुगंधित है, और किसी कालखण्ड को अपनी सुगंध से सुगंधित कर लेना निश्चित ही किसी बड़ी साधना की फलश्रुति होते हैं।

स्वतंत्रता का ‘सूर्यास्त’ नही होने दिया पन्ना ने

पन्ना गूजरी उन महान नारियों में सम्मिलित है, जिन्होंने अपने अनुपम योगदान से भारत के स्वतंत्रता के सूर्य को अस्त नही होने दिया। जब कभी सूर्य को काले बादलों ने भी ढंकने का प्रयास किया तो पन्ना जैसी नारियां तेज वायु का प्रवाह बनकर आयीं  और उन काले बादलों को उड़ा ले गयीं।

पन्ना के लिए श्रद्घांजलि

थोड़े से शब्द परिवर्तन के साथ  यदि भाव ग्रहण किया जाए तो वीर सावरकर के ये शब्द पन्ना के लिए सटीक श्रद्घांजलि हो सकते हैं-‘‘विदेशी और पक्षपात के चश्मे अपने नेत्रों पर चढ़ाकर लिखने वालों ने हमारी हिंदू-भूमि के उज्ज्वल चित्र को कितने ही घृणास्पद रंगों में रंगने का प्रयास क्यों न किया हो, किंतु जब तक हमारे देश के इतिहास के पृष्ठों में चित्तौड़ का पावन नाम विद्यमान है, सिंहगढ़ का नाम है, प्रतापादित्य का नाम अंकित है, गुरू गोविन्द सिंह का नाम विद्यमान है, तब तक स्वधर्म और स्वराज्य के मूल सिद्घांत हिंदुस्थान की संतानों की अस्थियों और मज्जा में समाए ही रहेंगे। दासता के आवरण में उन्हें क्षण भर के लिए ढंका तो जा सकता है-आखिर सूर्य को भी बादल कुछ समय के लिए ढक लिया करते हैं-किंतु ज्यों ही इन तत्वों रूपी सूर्य की किरणें उद्दीप्त होती हैं, दासता का यह अंधकार मिट जाता है और ये तत्व सूर्य के प्रचण्ड प्रकाश के तुल्य पुन: उददीप्त हो उठते हैं।’’ (संदर्भ : ‘1857 का भारतीय स्वातंत्रय समर,’ पृष्ठ 8)

पन्ना यूं निकली दुर्ग से

पन्ना गूजरी के गांव के हांकला गोत्रीय गूजर चित्तौड़ के दुर्ग के दक्षिणी भाग के रक्षक थे। सारा राजमहल गहरे सन्नाटे में था, जिन लोगों को ज्ञात हो गया था कि आज राणा संग्रामसिंह के वंशजों को समाप्त करने का काम बनवीर कर चुका है, वे मारे भय के कुछ नही कह रहे थे। तब पन्ना ने निश्चय किया कि वह दुर्ग के दक्षिणी भाग से ही बाहर निकलेगी। उसके व्यक्तित्व और कृतित्व के प्रति लोगों में श्रद्घा थी, और दूसरे, दुर्ग के दक्षिणी भाग पर पहरा दे रहे पहरेदार उसके अपने गांव के ही लोग थे। अत: उसने उधर की ओर ही प्र्रस्थान किया। पहरेदारों ने बड़ी सहजता से पन्ना को राज भवन से बाहर निकाल दिया।

जा मिली अपने लाल उदयसिंह से

पन्ना खींची और पन्ना गूजरी का एक सेवक उदयसिंह को लेकर बेरिस नदी के तट पर पहुंच गये थे। इसलिए पन्ना भी वहीं पहुंच गयी। वहां पहुंचने पर उसने उदयसिंह को सकुशल देखते ही अपनी छाती से लगा लिया और चुपचाप खड़ी-खड़ी रोने लगी। बालक उदयसिंह को यह ज्ञात नही था कि मां पन्ना क्यों रो रही है? उसे तो यही लगा होगा कि मां तेरे प्रति कत्र्तव्यबोध से प्रेरित होकर आंसू बहा रही है। उसे नही पता था कि आज मां की ममता लुट गयी है और वह भी उसके कत्र्तव्यबोध के कारण।

भावना और कत्र्तव्य का रोमांचकारी संगम

यहां ममतारूपी भावना और कत्र्तव्य का संगम हो गया था। इसलिए पुत्र चंदन के लिए भावनाएं अपना काम कर उसे अपनी अश्रुपूर्ण श्रद्घांजलि दे रही थीं, तो कत्र्तव्य भी सामने खड़े सुरक्षित उदय को देखकर प्रसन्नता से आंसू निकाल रहा था। देखने वालों के लिए कितना रोमांचकारी दृश्य रहा होगा, उन दोनों मां बेटों का मिलना? ‘राम-भरत मिलाप’ पर तो नाटक बने हैं, कविताएं बनी हैं, लेख लिये गये हैं-पर ‘पन्ना-उदय’ के मिलाप पर कुछ नही हुआ, जहां केवल अश्रु थे, और वे अश्रु जैसे-जैसे धरती पर गिर रहे थे वैसे-वैसे ही एक रोमांचकारी इतिहास खण्ड का निर्माण कर रहे थे-संपूर्ण  वसुधा वीरों की खेती के लिए तैयार हो रही थी, मां की आंखों का एक-एक आंसू बलिदान का एक शिलालेख लिख रहा था, और उस शिलालेख पर अपनी ही पुष्पवर्षा कर आकाश से दिव्यात्माएं अपनी चित्रकारी कर रही थीं। उनका मूल्य आंका नही जा सकता था-अनमोल थे वह आंसू। वे कहां गिरे यह आज तक किसी ने नही खोजा? पर जहां भी गिरे होंगे, धरती के वे कण इस संपूर्ण भूमंडल में उस समय ही नही आज तक सर्वाधिक गरिमामयी और गौरवमयी होने का भाव रखते हैं।

मां रोने का कारण नही बता पा रही थी

बालक उदय अपनी माता से रोने का कारण पूछे जा रहा था और पन्ना थी कि केवल रोती थी-पर बताती कुछ नही थी। रोती-रोती पन्ना ने अपने हृदय को किसी प्रकार सम्बल दिया और चंदन की स्मृति को कहीं दूर फेंककर उदय से कह दिया-‘मेरे लाल, मुझे तेरी याद बहुत आ रही थी, इसलिए तुझे देखते ही रोना आ गया।’ ऐसा कहकर मां अपने बलिदान के सत्य को छुपा गयी।

उदय ने फिर प्रश्न कर दिया और इस बार का प्रश्न पन्ना के सीधे कलेजा में जाकर लगा। उसने कहा कि-‘मां, मेरा भाई चंदन कहां है? उसे कहां छोड़ आयी?’

पन्ना के हृदय की चीत्कार निकल गयी, पर वह पुन: स्वयं को संभाल गयी, चुप रही कुछ नही बोली। बालक उदयसिंह गुमसुम सा खड़ा था और अपनी धाय मां की व्यथा को समझने का प्रयास कर रहा था। पन्ना खींची और पन्ना का वह सेवक जो उदय को यहां तक लाये थे पन्ना के रोने से और चंदन के न आने से कुछ-कुछ समझने लगे थे कि क्या हो चुका है?

ले चली उदय को सुरक्षित स्थान की ओर

पन्ना ने अब उदय को इधर-उधर की बातें समझानी आरंभ कर दीं। अब तक अधिक समय यहां व्यतीत नही करना चाहती थी, इसलिए पुन: शेरनी का रूप धरकर अपने उदय को साथ लेकर पन्ना खींची और अपने सेवक के साथ आगे बढ़ चली। यहां से वे सभी देवल प्रतापगढ़ पहुंचे जहां का शासक उस समय सिंगराव था। उसने पन्ना की व्यथा-कथा सुनकर उससे सहानुभूति तो प्रकट की, परंतु किसी प्रकार की सहायता करने में असमर्थता प्रकट कर दी। तब पन्ना निराश होकर डूंगरपुरी के शासक आशकरण के यहां पहुंची। पर उसने भी कह दिया कि मेवाड़ के साथ शत्रुता करना मेरे वश की बात नही है, यदि किसी अन्य प्रकार की सहायता की आवश्यकता है तो वह बताओ-मैं उसे करने का प्रयास करूंगा।

ऐसे उत्तरों को सुनकर पन्ना बहुत दु:खी होती थी। वह समझ नही पा रही थी कि करे तो क्या करे? पर उसका साहस और कत्र्तव्य के प्रति समर्पण का भाव था कि जो उसे बार-बार आगे बढऩे की प्रेरणा देते थे। …और वह पुन: आगे चल पड़ती थी।

एक दृष्टांत-एक शिक्षा

एक दृष्टांत है-समुद्र से जल भरकर लौट रहे मरूत देवों को विंध्याचल शिखर ने बीच में ही रोक दिया। मरूत विंध्याचल के इस कृत्य पर बड़े कुपित हुए और युद्घ ठानने को तैयार हो गये। विंध्याचल ने बड़े सौम्य स्वभाव से कहा-‘महाभाग! हम आपसे युद्घ करना नही चाहते, हमारी तो एक अभिलाषा है कि आप यह जो जल लिये जा रहे हैं, उसी उदारता के साथ आप भी इसे प्यासी धरती को पिलाते चलें तो कितना अच्छा हो?’

मरूतों को अपने अपमान की पड़ी थी, सो वे शिखर से भिड़ गये पर उन्होंने जितना युद्घ किया उतना ही बल क्षीण होता गया और धरती को अपने आप जल मिल गया।

कभी-कभी मनुष्य न चाहे तो भी ईश्वर उससे अपना काम करा ही लेता है, पर श्रद्घापूर्वक करने का तो आनंद ही कुछ और है।

पन्ना ने अपना कत्र्तव्य श्रद्घा के साथ निभाया

पन्ना के पास अपने कत्र्तव्य के प्रति अगाध श्रद्घा थी। अत: वह बाधाओं से घबराती नही थी, ईश्वर पर भरोसा कर पुन: उठ खड़ी होती, और चल पड़ती उस ओर-जहां उसका लक्ष्य उसकी प्रतीक्षा कर रहा था।

वह ईडर के उस राज्य में भी पहुंची जहां से कभी राणा परिवार के मूल पूर्वज गुहिल से लेकर शीलादित्य तक ने शासन किया था। पर उन लोगों ने भी पन्ना को निराश ही किया। अंत में वह कमलमेर (कोमलमीर ) पहुंची जहां का शासक एक जैन मतावलंबी राजा आशाशाह था।

मां ने लताड़ा आशाशाह को

आशाशाह ने भी पन्ना गूजरी के दुख को सुनकर अपनी ओर से उसे किसी प्रकार की रक्षा देने में असमर्थता प्रकट कर दी। पर उस समय वहां उसकी मां भी खड़ी थी, जिसने आशाशाह को धिक्कारा और कहा कि-‘‘हे आशा! क्या इसी दिन को देखने के लिए मैं आज तक जीवित रही? मैं यह समझ नही पा रही हंू कि तू एक अभागिन स्त्री को देखकर भी देख क्यों नही रहा है? यह स्त्री इस बच्चे को उस राक्षस के पंजों से छुड़ाकर लायी है, और एक तू है कि इसे रखने में भी आनाकानी कर रहा है। क्या तेरे पास साधनों की कमी है? यदि नही तो फिर तेरे इस राज्य का क्या लाभ….जो एक नन्हें से बच्चे को भी शरण नही दे सकता।’’

पन्ना को मिल गयी धर्मरक्षिका

आशाशाह ने अपनी मां को बनवीर की क्रूरता के विषय में भी समझाने का प्रयास किया, परंतु राजमाता तो राजधात्री पन्ना को सहायता देने का मन बना चुकी थी। अत: उन्होंने पन्ना से कह दिया कि-‘आज से इस बच्चे की सुरक्षा का भार मेरे ऊपर है तुम निश्चिंत रहो।’

पन्ना राजधात्री ने राजमाता के मुंह से जब ये शब्द सुने तो मारे प्रसन्नता के उसकी आंखों से आंसू छलक पड़े। स्वतंत्रता की रक्षिका को एक धर्मरक्षिका मिल गयी थी, और अब दोनों मिलकर एक कहानी गढऩा चाहती थीं। इतिहास ने कुतूहल से अपने आंख, कान उस ओर लगा लिये कि वे दोनों क्या करती हैं, और क्या कहती हैं?

पन्ना राजमाता के पैरों में गिर पड़ी-बोली-‘हे, राजमाता! आप धन्य हैं। जो आपने मेरी सहायता करने का वचन मुझे दे दिया।’

पन्ना ने उदय से ली विदाई

उदय की रक्षा के लिए रानी कर्मवती और धायमाता पन्ना गूजरी के पश्चात अब तीसरी माता (आशाशाह की माता) आ गयी थी। अत: पन्ना यहां से लौटने का आग्रह करती है। आशाशाह की माता उसे भी यहीं रहने के लिए कहती है। पर पन्ना जानती थी कि कई स्थानों पर उसके और उदय के जीवित होने की सूचना लोगों को हो चुकी है, तो बनवीर को भी उसके गुप्तचरों के माध्यम से सूचना मिल सकती है कि वह दोनों जीवित हैं और तब वह उनकी हत्या के लिए कोई भी कार्य कर सकता है। इसलिए उदय को पूर्णत: सुरक्षित समझकर वह वहां से चलना चाहती है, पर तभी उदय ने उसका पल्लू पकडक़र रोना आरंभ कर दिया। पन्ना के लिए वे क्षण पुन: भावुक हो गये, उसने रोते-रोते अपने उदय को पल्लू से दूर किया। तभी आशाशाह उदय का रोना बंद कराने का प्रयास करता है, बच्चे को इधर -उधर की बातों में लगाने का प्रयास करता है, पर इस सब के उपरांत भी उदय का रोना बंद नही हुआ, वह भीतर ही भीतर रोता था और उसकी रोने की आवाज को सुनकर पन्ना बाहर बैठी रोती थी।

मन तो चाहता था कि उठकर भागी चली जाऊं और अपने उदय को छाती से लगा लूं। पर पन्ना को कत्र्तव्य ने पुन: रोक दिया, और वह हृदय पर पत्थर रखकर आशाशाह के भवन से बाहर चल दी। उसकी आंखों में आंसू थे और एक अदभुत चमक भी थी। आंसू उदय और चंदन को लेकर थे तो चमक इस बात से थी कि अब वह उदय की सुरक्षा के प्रति आश्वस्त हो गयी थी।

मां-मां कहकर चिल्लाता रहा बालक उदय

बालक उदय भवन के झरोखों से झांकता हुआ मां….मां…चिल्लाता था और मां एक बार पीछे मुडक़र देखती तो फिर आगे चलती। रोती हुई पन्ना धीरे-धीरे महल से दूर हो गयी। उदय झरोखों से नीचे दीवार के साथ मासूम सा बैठकर सुबकियां ले रहा था और पन्ना स्वयं भी अपने रास्ते पर बढ़ती अब केवल सुबकियां ही ले रही थी।

स्वतंत्रता की साधना इसी को कहते हैं जो युग-युगों तक लोगों को प्रेरित करे और अपने आंसुओं को निकालने के लिए बाध्य कर दे। पन्ना के अदभुत बलिदान के इस वर्णन के बिना हमारा इतिहास अधूरा है।

पुन: पहुंच गयी चित्तौड़

पन्ना राजधात्री असीम वेदना और करूणा को अपने भीतर समेटकर जैसे-तैसे चित्तौड़ के दुर्ग के द्वार पर पहुंची, उसके वहां पहुंचते ही उसके सेवक और सेविकाएं उसकी ओर दौड़े। सबने उससे उसके मायके के विषय में पूछा कि वहां लोग कैसे हैं, चंदन कैसा है? इत्यादि।

चंदन का नाम आने पर माता की आंखों में पुन: आंसू छलक आये।

बनवीर की दानवता सिर चढक़र बोलने लगी

उधर बनवीर को अब विश्वास हो गया था कि अब राणा संग्राम सिंह का कोई वंशज पृथ्वी पर नही रहा है। इसलिए उसकी दानव प्रवृत्ति और भी अधिक बढ़ गयी, वह लोगों के साथ क्रूरता का व्यवहार करने लगा। जिससे सरदारों में उसके प्रति असंतोष बढ़ता गया और वे उससे किसी भी प्रकार से मुक्ति पाने का प्रयत्न करने लगे।

राजा के चयन में चित्तौड़ के राणा वंश में सरदारों की विशेष और महत्वपूर्ण भूमिका रहती रही है। राणा वंश की वीर परंपरा और हिंदू धर्म व संस्कृति के लिए कौन व्यक्ति उपयुक्त होगा और कौन नही? राज्य सिंहासन को लेकर इस प्रश्न का उत्तर सरदार लोग ही खोजा करते थे।

सरदारों के लिए बनवीर ने किया सहभोज का आयोजन

इन सरदारों को प्रसन्न करने के लिए एक दिन बनवीर ने एक विशाल सहभोज का आयोजन किया। क्योंकि वह जानता था कि यदि ये सरदार लोग अप्रसन्न रहे तो ये राणावंश के किसी भी व्यक्ति के मिलते ही उसे सिंहासनारूढ़ कर देंगे। जब सहभोज का आयोजन किया गया तो राणा के दांये-बांये बैठने वाले सरदारों में सरदार चूड़ावत था।

उस समय की परंपरा के अनुसार राणा बनवीर ने अपने थाल में से कुछ सामग्री उठाकर चूड़ावत के थाल में रख दी। इसे उस समय राजा के विशेष स्नेह का प्रतीक माना जाया करता था। चूड़ावत बनवीर को राजा तो मानता था, पर कुलीन नही मानता था, इसलिए उसे बनवीर का यह कृत्य अच्छा नही लगा। चूड़ावत मारे क्रोध के जल उठा और वह थाली से उठ गया। इतना ही नही वह अन्य सरदारों से कहने लगा कि आप लोगों को भले ही ये मेरा सम्मान लगा हो पर वस्तुत: ये मेरा अपमान है, और मैं मानता हूं कि बनवीर ने मेरा ही नही आपका भी अपमान किया है।

यह कहकर चूड़ावत तो वहां से चला ही गया, पर शेष सरदार भी भोजन को छोडक़र उठ लिये। इससे बनवीर और सरदारों के मध्य वैमनस्यता और बढ़ गयी।

उदयसिंह का क्षत्रियोचित होने लगा पालन

उधर राजा आशाशाह ने उदय सिंह को अपना भतीजा बताकर उसकी क्षत्रियोचित शिक्षा-दीक्षा का प्रबंध किया। कुछ लोगों की यह धारणा रही है कि उदयसिंह को वीरोचित शिक्षा-दीक्षा नही मिली, इसलिए वह अपना क्षत्रियोचित विकास करने में असफल रहा, परंतु यह भ्रांत धारणा है। वह राजा आशाशाह की छत्रछाया में शीघ्र ही एक साहसी क्षत्रिय बन गया था। उसके विषय में देवला, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, कुंभलगढ़ के शासकों को तो ये ज्ञात ही था कि राणा सांगा का एक पुत्र अभी जीवित है, तो ये समाचार धीरे-धीरे चित्तौड़ भी पहुंच गया और जब यह समाचार चित्तौड़ के सरदारों को मिला तो उन्हें अतीव प्रसन्नता हुई। उन्होंने वास्तविकता की जानकारी करने के लिए कुंभलगढ़ जाना आरंभ कर दिया। एक-एक कर कई सरदार कुंभलगढ़ होकर आये।

उधर एक दिन बनवीर से एक सेवक ने कह दिया कि उदयसिंह अभी जीवित है तो उसने उदयसिंह के विषय में सही जानकारी देने के लिए पन्ना को दरबार में बुला भेजा। पर पन्ना बड़ी समझदारी से बनवीर का मूर्ख बनाने में सफल हो गयी और बनवीर को पुन: विश्वास हो गया कि उदयसिंह अब जीवित नही है। वैसे भी वह यह मानता था कि उदयसिंह का वध उसने स्वयं ही किया है, अत: उसके जीवित होने का कोई प्रश्न ही नही है।

चित्तौड़ के सरदार पहुंचे कुंभलगढ़

अब उदयसिंह के विषय में सही जानकारी मिलने पर चित्तौड़ के कई सरदार एक साथ कुंभलगढ़ गये तो राजा आशाशाह ने उन्हें उदयसिंह के विषय में स्पष्ट कर दिया कि उसे यहां भेजने के लिए पन्नाधाय धन्य है। सारे सरदार पन्ना के त्याग से अभिभूत हो उठे। उन्होंने बूंदी के हाड़ा सरदार तथा पन्ना को गुप्त रूप से कुंभलगढ़ बुलवा लिया।

पन्ना आशाशाह के दरबार में पहुंची। उदयसिंह एक बार तो उसे पहचान नही पाया, पर जब उसने पन्ना की आंखों में आंसू देखे तो उसे उसका चेहरा स्मरण हो आया और वह दौडक़र उसकी छाती से चिपट गया।

सभी ने सराहा मां का बलिदान

पन्ना रोती जाती थी और उदयसिंह पर अपने ममत्व की वर्षा भी करती जाती थी। हर हृदय ने मां पन्ना के असीम त्याग और बुद्घि चातुर्य को मुक्त कंठ से सराहा और उस देवी के प्रति सबके हृदय में श्रद्घा का सागर उमड़ आया। आशाशाह के प्रति भी सभी सामंतों ने आभार व्यक्त किया।

कुंभलगढ़ में किया उदयसिंह का राजतिलक

1540 ई में सभी सामंतों ने माता पन्नाधाय की उपस्थिति में कुंभलगढ़ के राजसिंहासन पर बिठाकर राणा उदयसिंह का राजतिलक किया। पन्ना की आंखों में पुन: आंसू छलक आये, वह अपने आपको आज धन्य मान रही थी।
बनवीर का अंत

उदयसिंह के जीवित होने की सूचना अब बनवीर को भी मिल गयी थी, इसलिए वह उससे युद्घ के लिए सेना तैयार करने लगा। उधर अपने सरदारों के साथ उदयसिंह भी चित्तौड़ के लिए चल दिया। चित्तौड़ के निकट महोली नामक स्थान पर दोनों सेनाओं में घमासान युद्घ हुआ। बनवीर को अंत में युद्घ क्षेत्र से भागना पड़ा और वह चित्तौड़ दुर्ग में ही आकर छिप गया।

तब राणा उदय ने उसका पीछे करते हुए चित्तौड़ में प्रवेश किया। चित्तौडग़ढ़ का पहरेदार राणा सांगा का निष्ठावान चील महता था, जिसने राणा उदयसिंह का सहयोग करने का मन बनाया और कुछ रसद भीतर आने की बात कहकर बनवीर से दुर्ग का द्वार रात में खोलने की अनुमति प्राप्त कर रात्रि में द्वार खोल दिया।

द्वार खुलते ही राणा उदयसिंह की सेना भीतर प्रविष्ट हो गयी। किले में भयंकर युद्घ हुआ और बनवीर मार दिया गया। प्रात: काल होते-होते चित्तौड़ पर राणा उदयसिंह का ध्वज लहरा उठा। यह घटना जुलाई 1540 ई. के प्रारंभ की है। उस समय राणा उदयसिंह की आयु 18 वर्ष की थी। राणा का यहां विधिवत राजतिलक किया गया। कुछ लोगों की यह भ्रांति है कि जब 1535 ई. में पन्नागूजरी ने अपने पुत्र चंदन का बलिदान दिया  था तो उस समय उदयसिंह पांच, सात वर्ष का बालक ही होगा, पर वास्तव में उस समय उसकी अवस्था तेरह वर्ष थी, दूसरे यह मान्यता भी निराधार है कि अपने पांच वर्ष के अज्ञातवास में उदयसिंह को कोई क्षत्रियोचित शिक्षा-दीक्षा नही मिली थी। इसके स्थान पर भी सच यही है कि उसे अपने अज्ञातवास के पांच वर्ष में राजा आशाशाह के यहां पूर्ण क्षत्रियोचित शिक्षा-दीक्षा प्राप्त हुई थी।

उदय के दरबार में मां पन्ना आई एक पालकी में बैठकर

उस समय एक पालकी वहां आयी उस पालकी को जब खोला गया तो उसमें से एक तेजस्विनी और त्याग की साक्षात मूर्ति बनी महिला निकली, सबने पहचाना तो वह धायमाता पन्ना गूजरी थी। वह अपनी गोद में उस दिन एक बालक को लेकर आयी और उसे उदयसिंह की गोद में दे दिया कि अपने पुत्र से भी अधिक प्रिय एक पुत्र मैं तुम्हें दे रही हूं, इसे संभालकर रखना। यह बालक प्रताप था, जो राणा उदयसिंह की पहली संतान थी और जिसे वह अभी तक देख नही पाया था। आशाशाह के यहां रहते हुए ही उदयसिंह का विवाह भी हो चुका था।

उदयसिंह ने किया मां का भव्य स्वागत

उदयसिंह अपने सिंहासन से उतरा और उसने धायमाता की चरण वंदना की। सबको अच्छा लगा। पर उसके पश्चात वह कत्र्तव्यपथ की साक्षात मूर्ति त्यागमयी माता कहां गयी, किसी को पता नही चला।

चित्तौड़ में पन्नाधाय और उसके पुत्र चंदन गूर्जर की स्मृति में कोई स्मारक नही है। हमारी स्वतंत्रता के लिए मर मिटने वाले या अपने त्याग और बलिदान से अपना नाम अमर करने वाले इन दोनों मां बेटों को हमने इतना ही दिया है और इससे अधिक दे भी क्या सकते थे? बलिदान देना उनकी प्रकृति थी और उसे भुला देना हमारी प्रवृत्ति है।

क्रमश:

UGTA BHARAT

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