लेखक परिचय

मनमोहन आर्य

मनमोहन आर्य

स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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मनमोहन कुमार आर्य

हमारे लेख के शीर्षक से आर्यसमाज के अनुयायी तो प्रायः सभी सहमत होंगे परन्तु इतर बन्धु इस तथ्य को स्वीकार करने में संकोच कर सकते हैं। अतः अपने ऐसे बन्धुओं से हम प्रश्न करते हैं कि वह महर्षि दयानन्द से अधिक प्रतिभावान व योग्य ऋषि का नाम बतायें? दूसरा प्रश्न यह है कि महर्षि दयानन्द से उच्च कौन सा गुरु है जिसने संसार को धार्मिक विषयों सहित सभी प्रकार का सत्य ज्ञान दिया है? गुरु, ज्ञान व विद्या में पराकाष्ठा व उसका लाभ संसार के अधिक से अधिक लोगों में निःस्वार्थ भाव से वितरित करने वाले को कहते हैं। अज्ञानी, अल्पज्ञान व जिसकी बातें, विचार व सिद्धान्त भ्रान्तिपूर्ण हो वह विश्व गुरू तो क्या एक साधारण गुरु भी नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार से महाभारत काल के बाद के पांच हजार वर्षों में ऐसा कौन सा विद्वान हुआ जिसकी तुलना महर्षि दयानन्द से कर सकते हैं, जिसने उनकी तरह से वेदों की खोज की हो और उनके सत्य अर्थों को प्राप्त कर उसको अधिकतम लोगों तक पहुंचाने का पुरजोर प्रयास किया है। महर्षि दयानन्द जी का एक गुण और है जो उनके पूर्व व बाद के महापुरुषों सहित धार्मिक विद्वानों व धर्मगुरुओं में नहीं पाया जाता। वह उनका बाल ब्रह्मचारी होने के साथ सिद्ध योगी होना भी है। इन सब व अन्य अनेक गुणों के कारण वह संसार के सर्वश्रेष्ठ मानव व सर्वोच्च विश्व गुरु सिद्ध होते हैं।

 
महर्षि दयानन्द गुरु, ऋषि व वेदप्रचारक कैसे थे? इसका उत्तर है महर्षि दयानन्द के समय चार वेदों की मन्त्र संहितायें हिन्दुओं वा आर्यों के आलस्य प्रमाद के कारण लुप्त प्रायः हो चुकी थीं। उनके जीवन काल में वेदों की मुद्रित मन्त्र संहितायें व सायण आदि भाष्य आदि देश भर में कहीं उपलब्ध नहीं होते थे। सायण ने जो मन्त्र भाष्य किया वह भी प्राचीन वेद परम्परा व अष्टाध्यायी-महाभाष्य-निरुक्त पद्धति के अनुरुप व उनसे पोषित नहीं था। उन्होंने सभी वेद मन्त्रों का प्रयोजन यज्ञार्थ बताकर उनके याज्ञिक अर्थ ही किये थे। इसके विपरीत महर्षि दयानंद अपने समय व महाभारत काल के बाद पहले विद्वान थे जिन्होंने चुनौती के स्वरों में घोषणा की थी कि वेद सब सत्य विद्याओं का पुस्तक है। अपनी इस मान्यता को वेदों का भाष्य आरम्भ करने से पूर्व उन्होंने चारों वेदों की भूमिका के रूप में लिखी पुस्तक ‘ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका’ में प्रमाणों के साथ प्रस्तुत किया है। महर्षि दयानन्द ने चारों वेदों के भाष्यों के लेखन का उपक्रम आरम्भ किया था। यदि उनके विरोधियों ने उन्हें विष देकर मारा न होता तो वह चारों वेदों का अपूर्व भाष्य करते। सारे देश में घूम-घूम कर वेदों का प्रचार, प्रतिपक्षियों से शास्त्रार्थ व वार्तालाप व अन्य अनेक ग्रन्थों का लेखन, आर्यसमाजों की स्थापना, गोरक्षा आन्दोलन, हिन्दी रक्षा आन्दोलन आदि कार्यो को करते हुए भी उन्होंने यजुर्वेद का सम्पूर्ण और ऋग्वेद के कुल 10 मण्डलों में से 6 मण्डलों का पूर्ण और सातवे मण्डल का आंशिक भाष्य किया है। उनके द्वारा किया गया भाष्य आकार व परिमाण की दृष्टि से समस्त चार वेदों का 33 प्रतिशत से कुछ अधिक है। वेदों का यह भाष्य संस्कृत व हिन्दी दोनों में है। सभी मन्त्रों के ऋषि व देवताओं सहित स्वर व छन्द भी दिये गये हैं और मन्त्रों का पदच्छेद, अन्वय, पदों के संस्कृत व हिन्दी में अर्थ सहित इन दोनों भाषाओं में प्रत्येक मन्त्र का भावार्थ भी दिया गया है। मण्डल, सूक्त आदि के अन्त में पूर्व के सूक्त की बाद के सूक्त के साथ संगति कैसे लगती है, यह भी दर्शायी गई है। कई स्थलों पर सायण भाष्य की न्यूनता व त्रुटियों को बताया गया है। इस प्रकार से महर्षि दयानन्द द्वारा किया गया भाष्य संसार के इतिहास में अपूर्व व महत्ता में सर्वोपरि उत्कृष्ट है।

 

महर्षि दयानन्द के जीवन चरित से ज्ञात होता है कि उन्होंने चारों वेदों के प्रत्येक मन्त्र को जाना व समझा था तभी वह वेदों पर अनेक घोषणायें कर सके थे जिनमें चारों वेदों में मूर्तिपूजा का विधान कहीं नहीं है, घोषणा भी सम्मिति है। उनकी इस चुनौती को देश भर के बड़े से बड़े किसी पण्डित ने स्वीकार नहीं किया और काशी में इस विषय में जो शास्त्रार्थ हुआ उसमें भी पूरी काशी व देश के शीर्ष पण्डित वेदों में मूर्तिैपूजा का विधायी एक मन्त्र भी नहीं दिखा पाये थे और न ही उस शास्त्रार्थ के 14 वर्ष बाद तक उनके जीवन काल में व आज तक दिखा सके हैं। इस प्रकार से महर्षि दयानन्द चारों वेदों के मन्त्रों के अर्थों के द्रष्टा वा विद्वान थे। इस कारण उनको न केवल ऋषि=वदों के मन्त्रों के अर्थों के द्रष्टा ही अपितु अपूर्व ऋषि व महर्षि भी कह सकते हैं। भारत में वेदों का पहली बार मुद्रण उन्हीं के प्रयासों से हुआ जो उनका इतिहास में अन्यतम कार्य है। अतः स्वामी दयानन्द सच्चे व अपूर्व ऋषि सिद्ध होने के साथ चारों वेदों के ज्ञाता व व्याख्याता की दक्षता रखने के कारण महर्षि भी सिद्ध होते हैं।

 

मनुष्यों को शिक्षा व ज्ञान देने वाले को गुरु कहते हैं। संसार की आदि से अब तक विभिन्न विषयों के असंख्य गुरु हो चुके हैं जिनका संकेत, विवरण व कुछ इतिहास रामायण व महाभारत सहित अनेक ग्रन्थों में दृष्टिगोचर होता है। महाभारत काल के बाद भी यह क्रम जारी है परन्तु महाभारत काल के बाद हम देखते हैं कि धर्म में अनेक विकृतियां आईं। ईश्वर की आज्ञा के पालनार्थ किये जाने वाले यज्ञों में मूक पशुओं की हिंसा का क्रम जारी हुआ व बढ़ता रहा। सामाजिक विषमता व अनेक कुरीतियां प्रचलित हुई जिनका आधार अज्ञान व अन्धविश्वास थे जो अज्ञान व अविद्या से ही उत्पन्न होते हैं। उस समय में ऐसे किसी सुधारक का विवरण नहीं मिलता जिसने यज्ञों में हिंसा सहित अज्ञान, अन्धविश्वास तथा कुरीतियां का पूर्ण निवारण करने का बीड़ा उठाया हो और इन समस्याओं के सत्य समाधान प्रस्तुत किये हों। वेदों के सत्य अर्थों को तो इस अवधि में विलुप्त हुआ ही पाते हैं। महात्मा बुद्ध ने अवश्य यज्ञों में पशु हिंसा का विरोध किया परन्तु यह हिंसा जिस अज्ञान व स्वार्थ आदि के कारण अस्तित्व में आई थी उसका कोई समाधान नहीं किया। वेदों के सत्य अर्थ भी हमें उनसे नहीं मिलें। हम जानते हैं कि दूषित जल पीने योग्य नहीं होता परन्तु उसे छान कर, अशुद्धियों को हटाकर स्वच्छ व निर्मल बनाकर प्रयोग में लाया जा सकता है। यही विधि ग्राह्य होती है। यज्ञों का विरोध करने से यथार्थ हिंसारहित यज्ञों से होने वाले लाभों से भी मनुष्य समाज वंचित हो गया। नास्तिकता को बढ़ावा मिला। ईश्वर की यथार्थ उपासना भी विकृत वा बन्द हो गई। यह हमें कोई समाधान नहीं लगता। बाद में स्वामी शंकराचार्यजी हुए। वह विद्या की दृष्टि से महाभारत काल के बाद सर्वाधिक योग्य व शीर्ष स्थान पर थे। उन्हें समाज से ईश्वर की अवहेलना करने वाले नास्तिक मतों को हटा कर ईश्वर के अस्तित्व को सिद्ध करने के साथ वैदिक धर्म को प्रवृत्त करना था। परन्तु उन्होंने जिस अद्वैतवाद का सिद्धान्त दिया, वह उनसे पूर्व के इतिहासादि, वेद, दर्शन व उपनिषदों में कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। वेद से लेकर महाभारत काल व उसके बाद के साहित्य में सर्वत्र त्रैतवाद अर्थात् ईश्वर, जीव व प्रकृति की पृथक-पृथक सत्ता का वाद ही प्रचलित पाया जाता है जो कि पूर्णतया व्यवहारिक एवं यथार्थ है।

 

आज का सारा संसार सृष्टि के अस्तित्व व महत्व को स्वीकार करता है। यह संसार व इसके दिन प्रतिदिन होने वाले आविष्कार एवं घटनायें स्वप्नवत न होकर वास्तविक व यथार्थ हैं। भारत में रेलें चलती हैं और हम उनका उपयोग करते हैं, यह स्वप्नवत नहीं, हकीकत व यथार्थ हैं। स्वामी शंकराचार्य जी के बाद जो मत देश व विदेश में उत्पन्न हुए वह एंकागीं व अपूर्ण थे। उनमें यदि बहुत सी बातें अच्छी, सत्य व उचित थी तो बहुत सी अज्ञान व अन्धविश्वासों से युक्त अविवेकपूर्ण भी हैं। अतः अज्ञान, अन्धविश्वास व अविवेकपूर्ण बातों को मानने वाले व प्रचार करने वाले सच्चे व सर्वोच्च गुरु की उपमा व उपाधि से अभिहित नहीं कहे जा सकते। महर्षि दयानन्द महाभारत काल के बाद इतिहास में पहले महापुरुष हुए हैं जिन्होंने सत्य की कसौटी को पकड़ा और चाहे ईश्वर का अस्तित्व व उसकी उपासना हो या कुछ अन्य भी, सभी को सत्य की कसौटी पर कसा और उसका ऐसा प्रचार किया जिसकी इतिहास में दूसरी मिसाल नहीं है। उन्होंने सभी मतों के अज्ञान, अन्धविश्वासों व मिथ्याचारों पर दृष्टि डाली और उन्हें मनुष्यजाति के सुख शान्ति के लिए हानिकर जानकर उसके निवारण का अपूर्व प्रयास व पुरुषार्थ किया। ऐसा करने में उनका अपना कोई निजी प्रयोजन, हित व स्वार्थ नहीं अपितु केवल ईश्वर की आज्ञा का पालन व लोकोपकार की भावना ही थी। महर्षि दयानन्द ज्ञान की दृष्टि से महाभारत काल के बाद उत्पन्न हुए सर्वोच्च व शीर्ष पुरुष तो थे ही, उन्होंने वेद की सत्य मान्यताओं व सिद्धान्तों के लेखन व मौखिक प्रचार का भी कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके लिए उन्होंने कितने कष्ट सहे, इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। वह शायद इतिहास में पहले व्यक्ति थे जिन्होंने संसार से धार्मिक व सामाजिक अज्ञान, अन्धविश्वास, अन्याय, शोषण, उत्पीड़न को दूर कर ईश्वर की सच्ची उपासना, यज्ञ के सत्य स्वरुप का प्रचार व उसके क्रियात्मक पक्ष की विधि आदि का निर्माण व प्रचार किया। उनके द्वारा किए गये एक नही ऐसे अनेकानेक काम हैं जिस पर बड़े-बड़े ग्रन्थ लिखे जा सकते हैं। मानवता की सेवा व सुधार का उन्होंने अपूर्व उदाहरण प्रस्तुत किया है जिसके कारण हम स्वामी दयानन्द को विश्व का सर्वोच्च गुरु पाते है। ऐसा करके हम किसी अन्य गुरु की अवहेलना नहीं कर रहे हैं। अन्य सभी गुरु भी देश काल व परिस्थिति के अनुसार महान थे व हो सकते हैं परन्तु महर्षि दयानन्द का कार्य अन्यों की तुलना में अधिक महान व समाज सुधार व श्रेष्ठ समाज के निर्माण की दृष्टि से अतुलनीय है।

 

स्वामी दयानन्द मुत्यु के उपाय व सत्य की खोज में अपनी आयु के बाईसवें वर्ष में घर से निकले थे। पूरे देश का भ्रमण कर उन्हें मिले सभी गुरुओं की संगति व सेवा कर तथा अपनी अपूर्व बौद्धिक क्षमताओं से उन्होंने अपूर्व ज्ञान व वैदुष्य प्राप्त किया था। योग में वह सिद्ध योगी बने और ज्ञान की पराकाष्ठा को उन्होंने संस्कृत भाषा की आर्ष व्याकरण, उपनिषदों, दर्शनों, वेदांगों व वेद के ज्ञान सहित दण्डी गुरु प्रज्ञाचक्षु स्वामी विरजानन्द सरस्वती के शिष्यत्व से प्राप्त किया। स्वामी दयानन्द के अनेक गुरुओं में स्वामी विरजानन्द सरस्वती उनके सर्वोच्च गुरु थे। उनकी प्रेरणा व आज्ञा से व अपने विवेक से उन्होंने अज्ञान, अन्धविश्वास, कुरीतियां, सामाजिक असमानता व विषमता, देश सुधार व देशोन्नति का कोई कार्य छोड़ा नहीं अपितु सभी कार्यों को प्राणपन से किया। इन सब कार्यों का आधार उनका वैदिक ज्ञान था। सभी सुधारों का सुधार वेदाध्ययन, वेदाचारण व वेद प्रचार ही है। स्वामी दयानन्द ने वेद प्रचार के लिए ही मुख्यतः सर्वाधिक प्रयत्न किये। उनके मौखिक प्रचार के अतिरिक्त वेदों का भाष्य, सत्यार्थप्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका एवं संस्कारविधि आदि अन्यान्य ग्रन्थ वेद प्रचार के ही अंग-प्रत्यंग हैं। वह महाभारत काल के बाद अपूर्व वेद प्रचारक हुए हैं। ऐसा वेद प्रचारक सृष्टि की आदि से वर्तमान युग तक होने का वर्णन नहीं मिलता और न हि अनुमान ही होता है। उनका वेद प्रचार का कार्य संसार के कल्याण की दृष्टि से सर्वोत्तम कार्य है। मनुष्य जीवन में वेद प्रचार का कार्य करना एक प्रकार से ईश्वर का ही कार्य व साधना है। अपने कल्याण की इच्छा करने वाले सभी मनुष्यों को वैदिक साधना के साथ वेदाध्ययन व वेद प्रचार को ही अपने जीवन का लक्ष्य बनाना चाहिये। सभी सरकारों को योग्य वेद प्रचारकों को सर्वाधिक सम्मान व उनकी आर्थिक आवश्यकताओं का ध्यान रखना चाहिये। देश व संसार में जितना अधिक वेदप्रचार होगा, जिसकी दशा व दिशा महर्षि दयानन्द अपने जीवन के उदाहरण से निर्धारित कर चुके हैं, उतना ही मानवता का हित होगा। यह कार्य ईश्वर का कार्य होने के साथ मानव जाति की समग्र उन्नति व सुख शान्ति का कार्य है। इसको समाज में मुख्य स्थान मिलना चाहिये। लेख को विराम देते हुए हम आशा करते हैं पाठक लेख को पसन्द करेंगे।

 

 

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