लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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swami sanandअरुण तिवारी

प्रो जी डी अग्रवाल जी से स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद जी का नामकरण हासिल गंगापुत्र की एक पहचान आई आई टी, कानपुर के सेवानिवृत प्रोफेसर, राष्ट्रीय नदी संरक्षण निदेशालय के पूर्व सलाहकार, केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के प्रथम सचिव, चित्रकूट स्थित ग्रामोदय विश्वविद्यालय में अध्यापन और पानी-पर्यावरण इंजीनियरिंग के नामी सलाहकार के रूप में है, तो दूसरी पहचान गंगा के लिए अपने प्राणों को दांव पर लगा देने वाले सन्यासी की है। जानने वाले, गंगापुत्र स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद को ज्ञान, विज्ञान और संकल्प के एक संगम की तरह जानते हैं।

मां गंगा के संबंध मंे अपनी मांगों को लेकर स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद द्वारा किए कठिन अनशन को करीब सवा दो वर्ष हो चुके हैं और ’नमामि गंगे’ की घोषणा हुए करीब डेढ़ बरस, किंतु मांगों को अभी भी पूर्ति का इंतजार है। इसी इंतजार में हम पानी, प्रकृति, ग्रामीण विकास एवम् लोकतांत्रिक मसलों पर लेखक व पत्रकार श्री अरुण तिवारी जी द्वारा स्वामी ज्ञानस्वरूप सांनद जी से की लंबी बातचीत को सार्वजनिक करने से हिचकते रहे, किंतु अब स्वयं बातचीत का धैर्य जवाब दे गया है। अतः अब यह बातचीत को सार्वजनिक कर रहे हैं। हम, आपको प्रत्येक शुक्रवार को इस श्रृंखला का अगला कथन उपलब्ध कराते रहेंगे; यह हमारा निश्चय है।

इस बातचीत की श्रृंखला में पूर्व प्रकाशित कथनों कोे पढ़ने के लिए यहंा क्लिक करें।

तीसरा कथन आपके समर्थ पठन, पाठन और प्रतिक्रिया के लिए प्रस्तुत है:

स्वामी सानंद गंगा संकल्प संवाद – तीसरा कथन

30 सितंबर, 2013: हित तीन तरह के होते हैं: एक-भौतिक पक्ष, दूसरा-दैविक पक्ष, जो मन, इच्छा…थिंकिंग से जुङा और तीसरा आध्यात्मिक पक्ष; यह सुप्रीम होता है। जैसे जब में जेल के हाॅस्पीटल वार्ड में था, तो कुछ कैदी, स्वयं को
रोगी बताकर भर्ती हो जाते थे। डाॅक्टर जानते थे कि दर्द नापने का कोई थर्मामीटर नहीं है। यह दर्द, एक मानसिक पक्ष
है। आध्यात्मिक पक्ष..जैसे आत्मा के बारे में क्लेयरिटी.. भारतीय दर्शन में जैसा है, वह आध्यात्मिक पक्ष है। गंगाजी का भौतिक पक्ष – इसमें जो गंगा जी का रोगनाशक पक्ष है, इसे कौन कोई समझता है; आजीविका को समझते हैं। इसीलिए गंगाजी का दोहन करना चाहते हैं।

नदी दोहन का पर्याय बना नदी विकास

आज का विकास, दोहन है। ग्राउंड वाटर डेवल्पमेंट… पानी के एक्सप्लाॅयटेशन को पानी विकास कहते हैं ! नदी के
एक्सप्लाॅयटेशन को नदी विकास कहते हैं !! डेवल्पमेंट शब्द का मतलब ही एक्सप्लाॅयटेशन हो गया है। दोहन, प्रकृति का विकास नहीं हो सकता। भारतीय संस्कृति, व्यावसायिक दोहन के पक्ष में कभी नहीं थी; बाकी लोग, सभी नदियों को एक तराजू पर रखना चाहते हैं। जितनी ज्यादा नदियों को जोङे, उतनी ज्यादा मुश्किल बढ़ती जायेगी।

सब ग्रेड से ऊपर गंगाजी

सिंधु, नर्मदा, यमुना, कावेरी,…..सात प्रमुख नदियां हैं। नदियों का भी ग्रेडेशन है; किंतु हम यह कैसे भूल जाते हैं कि
गंगाजी तो सब ग्रेड से ऊपर है। गंगा घाटी में रहने वाले कावेरी का जल लाने नहीं जाते, किंतु गंगाजी का जल लेने के
लिए लोग पूरी दुनिया से आते हैं। फिल्म में भी गीत है -’’मैं उस देश का वासी हूं, जिस देश में गंगा बहती है। ऐसे ही
एक गीत है -’’ छोरा गंगा किनारे वाला..’’। ऐसा किसी और नदी को लेकर नहीं है।

उन्हे गंगाजी से कोई सहानुभूति नहीं

मैने बहुत विचारा और लगा कि शासन-प्रशासन के लोग, ग्रेडिंग नहीं करना चाहते। स्थानीय लोगों का इन्ट्रस्ट भी गंगाजी की पवित्रता में नहीं, बल्कि गंगाजी से आमदनी में है। यदि ऐसा न होता, तो गंगाजी के किनारे होटल बनाने..
ऊंची-ऊंची इमारत बनाने से लोगों को कष्ट होता; किंतु लोगों को कोई कष्ट नहीं है; क्यों ?

एक समय पर मुझसे बात होती थी, अनुपम भाई (प्रख्यात पर्यावरणविद् श्री अनुपम मिश्र) से भी; पूछा, तो कहा -’’हां, गंगा में श्रृद्धा तो है’’, किंतु अनुपम भाई नेे राजेन्द्र (जलपुरुष) को भी कहा -’’ तुम भूगर्भ जल पर काम कर रहे हो;
कहां फंस गये जी डी के चक्कर में; गंगाजी में ?’’ इस सब से मुझे जो निराशा थी, वह वैज्ञानिकों से, पर्यावरणविद्ों से, सामाजिक कार्यकर्ताओं से.. निष्कर्ष में मैने यह पाया कि मित्र के नाते उन्हे मुझसे सहानुभूति है, लेकिन गंगाजी के प्रति उनकी कोई सहानुभूति नहीं है।

पुख्ता हुई एक धारणा

यह निराशा मुझमें भरती गई। कई कहते थे कि जनान्दोलन होना चाहिए। वह मेरी सामथ्र्य नहीं है। मैं जानता था कि पहले तो उन संगठनांे से जनान्दोलन खङा होना ही मुश्किल था; यदि हो भी गया, तो गंगा के उद्देश्य की पूर्ति नहीं करेगा। इस तरह 2008 के शुरु में ही यह धारणा, मेरे मन में पुख्ता हो गई कि लोग मानसिक पक्ष को नकारकर, केवल फिजीकल पक्ष की बात देखते हैं। जब लोगों ने विवेकानंद जी तक से पूछ लिया था कि धर्म से क्या फायदा होगा, तो मैं क्या बताता ? कोर्ट से भी कोई उम्मीद नहीं थी।

गांधी विचार ने दिखाया अनशन मार्ग

आई.आई.टी. आंदोलनों मंे देखा था 100-150 की रैली का कोई प्रभाव नहीं होता। ज्यादा से ज्यादा घेराव कर सकते हैं; प्रदर्शन कर सकते हैं। मैने देखा कि मेरे साथ तो इतने लोग भी नहीं। अंततः गांधी जी का विचार मन में आया; अनशन – अकेले आदमी का हथियार; तो फिर मैने रामनवमी, 2008 को चित्रकूट में संकल्प लिया कि मेरा बचा हुआ सब जीवन गंगाजी के लिए है। संकल्प लिया कि यदि परियोजनायें निरस्त नहीं होती हैं, तो गंगा दशहरा, 2008 यानी 13 जून को अनशन पर बैठ जाउंगा।

इसी संकल्प के समय मैने गंगा जी की समस्या और उपाय पर दो पेज लिखे। राहुल देव (दूरदर्शन) और संजय देव को दिए भी। मैं चाहता था कि इंडियन एक्सप्रेस के सभी एडिशन में छपे। मैं सोचता था कि साउथ इंडिया के लोग मेरी बात को ज्यादा समझेंगे, उसमें खर्च की बात आई, तो मैने नहीं किया।

आशा के आधार

अनशन के पीछे की पहली आशा थे – गिरधर आचार्य जी। 13 जून, 2008 का उत्तरकाशी का अनशन मैं, गिरधर आचार्य जी की प्रेरणा से कर रहा था। उनका कथन था कि मणिकर्णिका घाट पर न करूं, विश्वनाथ मंदिर पर करूं। लेकिन वहां कोई शौचालय नहीं था। मणिकर्णिका के पास सुलभ शौचालय था; सो, मणिकर्णिका का स्थान तय किया। इस बात से गिरधर महाराज जी नाराज हो गये।

दूसरा बिंदु था कि अनशन के पीछे एक इंस्टीट्युशन बन गया – ’भागीरथी बचाओ संकल्प’; इंडियन काउंसिल फाॅर एन्वायरो लीगल एसोसिएशन थी….तो रवि चोपङा, राजेन्द्र, मेहता आदि को मिलाकर एक कोर कमेटी बना ली गई थी। इससे गिरधर महाराज और नाराज हो गये। वे चाहते थे कि वह खुद, प्रिया और मेहता की कमेटी बने। हालांकि उनके भक्त वहां रहे, लेकिन मेरे एक सप्ताह के अनशन के दौरान गिरधर महाराज जी उत्तरकाशी नहीं आये।

मिला समर्थन

हालांकि, मैं किसी ग्रुप के बंधन में नहीं था; ज्योतिषपीठ के माधवाश्रम जी का लैटर पैड पर लिखा हुआ समर्थन आया। 15 को शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद जी का समर्थन आया। मुझे पता था कि वह, हरिद्वार में कैम्प कर रहे हैं। समर्थन पर बातचीत को लेकर राजेन्द्र जी के साथ बहनोई वहां गये। 17 जून को लौटे, तो स्वयं शंकराचार्य स्वरूपानंद जी आ गये। हर्ष था कि हरिद्वार से सिर्फ समर्थन देने वह स्वयं आये। उन्होने सभा कर समर्थन दिया और अपने सन्यासी परिपूर्णानन्द को छोङ गये। सुंदरलाल बहुगुणा जी, पत्नी के साथ चार दिन तक आते रहे। बागपत के मशहूर भगतजी बालूशाही वाले देेवेन्द्र भगत भी अनशन पर साथ रहे।

देहरादून शिफ्ट कराने की शासकीय योजना

उधर 11 जून को खंडूरी जी ने उत्तरकाशी में पाला-मनेरी का शिलान्यास कर दिया था। उत्तराखण्ड में उस वक्त के चीफ सेक्रेट्री – एस. के. दास थे। उनसे मेरा, 1990 से संपर्क था। वह कभी सिर्फ मुझसे मिलने के लिए ही चित्रकूट आये थे। शासन, प्रशासन और डाॅक्टर सब रेस्पक्टफुल्ली आते थे। तीसरे दिन से कहने लगे कि पेशाब में टाॅन्ट बाॅडी आने लगी है। मेरी भतीजी डाॅक्टर थी। उसने कहा -’’ मेरे सामने टेस्ट करो’’, तो डाॅक्टरों ने कहा कि उनसे कहा गया है कि देहरादून शिफ्ट कराना है।

खंडूरी जी का यू टर्न

15 जून को एस. के. दास का फोन आया; कहा कि खंडूरी जी मिलना चाहते हैं। मैने मना कर दिया। 17 जून को हंसदेवाचार्य व परमार्थ निकेतन से चिदानंद मुनि आये और चर्चा की। एक तरह से ये खंडूरी जी के भेजे हुए थे। 17 की ही रात को चिदानंद जी का मैसेज आया कि पाला-मनेरी और भैरोंघाटी प्रोजेक्ट स्टेट के हैं, तो राज्य सरकार निरस्त करने को तैयार है।

( इसे यू टर्न कहना इसलिए उचित होगा, चूंकि अनशन की पूर्व चेतावनी के बावजूद, तत्कालीन मुख्यमंत्री श्री खंडूरी जी ने अनशन शु्रु होने से चंद दिन पूर्व ही वहां एक पनबिजली परियोजना का शिलान्यास किया था। – अ. ति. )

पत्र मिले, तो दिल्ली चलूूं

मैने कहा कि इससे हमारा उद्देश्य पूरा नहीं होता। लोहारी-नाग-पाला तो फिर भी बनेगा। उन्होने कहा कि वह तो केन्द्र का है। मैने कहा कि मैं उपवास खत्म नहीं कर सकता। हां, यदि राज्य सरकार मुझे पाला-मनेरी और भैरोंघाटी प्रोजेक्ट निरस्त करने का पत्र भेजती है, तो मैं उन्हे धन्यवाद दूंगा और यह भी कर सकता हूं कि आगे का उपवास दिल्ली में करूं।

इसके पीछे एक वजह यह भी थी कि गिरधर महाराज की नाराजगी के कारण मैं अनकम्फर्ट फील कर रहा था। दूसरी वजह यह कि मेरा पूरा परिवार व साथी वहां पङे थे और मै कभी नहीं चाहता था कि अनशन की वजह से औरों को कष्ट हो। हालांकि मुझे उनके रहने-सहने का इंतजाम नहीं करना था, फिर भी मुझे इसका कष्ट था। इस वजह से भी मैने दिल्ली जाने के बारे में सोचा।
संवाद जारी…

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