लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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childमोहन के पांव आज धरती पर नहीं पड़ रहे थे। दिल्ली से प्रकाशित होने वाली एक प्रतिष्ठित पत्रिका में उसकी कहानी छपी थी। पत्रिका की ओर से स्वीकृति का पत्र तो दो माह पहले ही आ गया था; पर तब उसने किसी से इसकी चर्चा नहीं की। वस्तुतः वह सबको ‘सरप्राइज’ देना चाहता था। कई दिन से वह बस अड्डे की अखबार और किताबें बेचने वाली दुकान पर चक्कर लगा रहा था। उसने दुकानदार को कह दिया था कि उस पत्रिका की एक प्रति उसके लिए सुरक्षित रखे; पर उसके मन की बेचैनी उसे हर दूसरे दिन वहां तक पहुंचा देती थी। आज जैसे ही उसे पता लगा कि पत्रिका आ गयी है, वह तेज-तेज साइकिल चलाकर वहां पहुंचा और पत्रिका खरीद ली। उसे डर था कि कहीं उसके पहुंचने से पहले ही सभी अंक समाप्त न हो जायें।

 

पत्रिका को लेकर वह एक पार्क में बैठ गया। मन ही मन उसने भगवान का नाम लेकर पत्रिका का पहला पृष्ठ खोला। अनुक्रम में उसकी कहानी ‘नया विश्वास’ के सामने पृष्ठ 62 लिखा था। उसने धड़कते दिल से वह पृष्ठ खोला। उसकी कहानी काले-नीले अक्षरों में सुशोभित थी। इतना ही नहीं, तो पहले पृष्ठ पर एक सुंदर चित्र भी बना था। वह एक ही सांस में सारी कहानी पढ़ गया। एक-दो-तीन-चार..; जाने कितनी बार उसने अपनी कहानी को पढ़ा। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि इतनी अच्छी कहानी उसने ही लिखी है। जितनी बार वह उसे पढ़ता, उतनी ही बार उसे नया रस आता था।

 

उसका मन-मस्तिष्क कल्पनाओं के पंख लगाकर सातवें आसमान पर उड़ने लगा। वह बहुत बड़ा लेखक और कहानीकार बन गया है। सभी प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में उसके लेख छपने लगे हैं। उसे ढेरों मान-सम्मान तथा पुरस्कार मिल चुके हैं। साहित्य-जगत में अब उसे एक चर्चित और प्रतिष्ठित व्यक्तित्व माना जाता है; और भी न जाने कैसी-कैसी मधुर अकल्पनीय सी कल्पनाएं।

 

काफी देर बाद उसे होश आया। छह बज रहे थे; अर्थात पिताजी घर आ चुके होंगे। पिताजी की याद आते ही उसके शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गयी। न जाने क्यों पिताजी उसके इस लेखन के शौक को बिल्कुल पसन्द नहीं करते थे। उसे याद आया कि तीन साल पहले जब शहर के एक कभी-कभी छपने वाले अखबार में उसकी एक कविता छपी थी, तो वह कितना प्रफुल्लित हो उठा था। घर आकर मां को बताया, तो मां ने पीठ थपथपाई। दीदी और भैया ने पहले तो हंसी उड़ाई, फिर वे भी उस कविता के शब्द और भाव देखकर प्रसन्न ही हुए थे।

 

लेकिन पिताजी.., शाम को जब वे दफ्तर से लौटे, तो मोहन का उत्साह चरम पर था। उसने पिताजी के बैठने की प्रतीक्षा भी नहीं की, बस वह अखबार उनके हाथों में थमा दिया। वह सोच रहा था कि पिताजी उसे शाबाशी देंगे; पर पिताजी का मूड न जाने क्यों खराब था। उन्होंने वह अखबार फाड़कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। इतना ही नहीं तो मोहन को दो चांटे भी लगा दिये, ‘‘खबरदार आगे से इन कविताओं के चक्कर में पड़ा तो..; अपना ध्यान पढ़ने-लिखने में लगाओ।’’

 

उसके बाद तीन-चार दिन तक मोहन का मन किसी काम में नहीं लगा। उसकी हिन्दी की पुस्तक में न जाने कितने कवि और लेखकों की कहानियां, कविताएं, निबन्ध आदि भरे थे। उन रचनाकारों की महानता एवं विद्वत्ता के बारे में हिन्दी के अध्यापक कितनी रुचि से बताते हैं। उन लेखों और छन्दों की व्याख्या किये बिना पास होना भी तो संभव नहीं था; फिर पिताजी को साहित्य से इतनी चिढ़ क्यों है ? वह दो-तीन दिन तक पिताजी के सामने जाने से भी बचता रहा। मां से उसने इस बारे में पूछना चाहा; पर मां ने हर बार टाल दिया। थोड़े दिन में वातावरण सामान्य हो गया और वह भी इस घटना को भूल सा गया।

 

उसके मन का लेखक जोर मारता, तो वह कागज पर कुछ लिख लेता। कभी-कभी मां को भी दिखाता। मां हर बार मुस्कुरा देतीं। स्थानीय अखबार में जब उसकी कोई रचना छपती, तो वह मां, भैया और दीदी को इस शर्त पर दिखाता कि वे पिताजी को नहीं बतायेंगे। पिछले साल जब विद्यालय की वार्षिक पत्रिका के लिए छात्रों से उनकी स्वरचित रचनाएं मांगी गयीं, तो उसने भी एक निबन्ध लिखकर अपने कक्षाध्यापक को दे दिया।

 

निबन्ध का विषय था ‘हिन्दी साहित्य की दशा और दिशा।’ वह सोच रहा था कि इतने बड़े विद्यालय में, जहां बड़ी कक्षाओं के भी सैकड़ों छात्र पढ़ते हैं, उसके निबन्ध को स्थान मुश्किल से ही मिलेगा; पर उसके निबन्ध को तो विद्यालय-पत्रिका की सर्वश्रेष्ठ रचना का पुरस्कार मिला। उसका मन हर्ष से भर उठा। घर में सबने उसे प्रोत्साहन दिया; पर पिताजी की नजर जब पत्रिका देखते हुए उसके निबन्ध पर पड़ी, तो वे फिर बौखला उठे, ‘‘तुम्हें कहा था न, इस चक्कर में नहीं पड़ना; पर तुम्हें बात समझ में नहीं आती ?’’ उसने वहां से चुपचाप हट जाना ही ठीक समझा, कहीं पिताजी फिर चांटेबाजी पर न उतर आयें।

 

पर लेखकीय कीटाणुओं का क्या हो ? वे तो प्रायः जोर मारते ही रहते थे। उसकी डायरी कविताओं और छुटपुट कहानियों से भरने लगी थी। तीन महीने पूर्व उसने साहस करके अपनी कहानी ‘नया विश्वास’ दिल्ली की एक पत्रिका में भेज दी। उसे आशा तो नहीं थी; पर जब 15-20 दिन बाद सम्पादक की स्वीकृति का पत्र आ गया, तो उसका मन बल्लियों उछलने लगा; लेकिन उसने यह बात किसी को बतायी नहीं।

 

पर आज तो वह पत्रिका में छप कर आ गयी थी। उसने पत्रिका को छिपाकर अपनी किताबों के बीच रख लिया और अगले दिन पिताजी की अनुपस्थिति में सबसे पहले मां और फिर दीदी व भैया को वह कहानी पढ़कर सुनायी। दीदी ने कहानी को दुबारा पढ़ने के लिए उससे पत्रिका ली और मेज पर रखकर किसी और काम में लग गयी। रात को मेज पर पड़ी वह पत्रिका पिताजी की निगाहों में आ गयी, तो वे उसके पन्ने पलटने लगे। मोहन को तो मानो बुखार-सा चढ़ गया। उसका दिल धुक-धुक करने लगा। वह मुंह पर चादर ढक कर लेट गया। उसे डर था कि कहीं रात में ही मारपीट और डांट-फटकार का कार्यक्रम शुरू न हो जाये।

 

अगले दिन दफ्तर से लौटकर पिताजी ने उसे आवाज दी। वह डरता-डरता उनके पास पहुंचा। सामने मेज पर वह पत्रिका रखी थी। मोहन को तो मानो सांप सूंघ गया। उसका सिर ऊपर ही नहीं उठ पा रहा था; पर पिताजी ने डांटा नहीं। शायद वे आज कुछ अच्छे मूड में थे। प्यार से पीठ थपथपाकर बोले, ‘‘शाबाश बेटा, मैं लिखने को मना नहीं करता; पर इसके कारण पढ़ाई का नुकसान न हो, बस यह ध्यान रहे। देखो मैं तुम्हें पुरस्कार देने के लिए क्या लाया हूं ?’’ मोहन ने सिर उठाकर देखा, पिताजी के हाथ में एक बहुत सुन्दर डिब्बा था, जिसमें से दो सुनहरे पेन झांक रहे थे।

 

मोहन ने डिब्बा लेकर उनके पांव छुए और अपने कमरे में आ गया। उसका मन हो रहा था कि वह जी भरकर रोये। वह पिताजी को कितना गलत समझ रहा था; लेकिन वह तो….। मोहन ने कहानी तो अपनी कल्पना से लिखी थी; पर उसका शीर्षक ‘नया विश्वास’ उसने अपने मन में प्रस्फुटित होते आज ही देखा था।

 

विजय कुमार

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1 Comment on "नया विश्वास"

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बी एन गोयल
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बी एन गोयल

विजय कुमार जी बधाई के पात्र हैं – छोटी छोटी कहानियों के द्वारा बड़ी बात कह देते हैं …………….

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