लेखक परिचय

बलवन्त

बलवन्त

विभागाध्यक्ष हिंदी कमला कॉलेज ऑफ मैनेजमेंट एण्ड साईंस 450, ओ.टी.सी.रोड, कॉटनपेट, बेंगलूर-53

Posted On by &filed under कहानी, साहित्‍य.


‘विश्वनाथ! अरे ओ हमार लाल, कहाँ चला गवा रे तू! तोरे बिना हमार मन नाहीं लागत है रे! हे भगवान! हमार बिटवा के हमरे पास वापस भेज दे, ना त हमरा के उके पास भेज दे भगवान!’ गुलेटन दास अपने प्यारे बेटे को याद कर रोये जा रहा था, तभी उसके छोटे बेटे की पत्नी वहाँ आई- ‘जब देखो तब विश्वनाथ-विश्वनाथ चिल्लाता रहता है बुढ़वा, अरे इतना मुँह चलाने से अच्छा है कि किसी काम-धन्धे में अपना हाथ चलाओ। दो-चार पैसे भी आ जाएंगे। काम का न काज का, दुश्मन अनाज का….बोलते हुए निकल गई।’

 

बहू के ताने सुनकर गुलेटन की पत्नी रुधे हुए स्वर में बोली- ‘तीन साल हो गये विश्वनाथ को गुजरे, अब तो ओकरा के भूल जाओ, कब तक इ गम में डूबे रहोगे? जो मिलत है चुपचाप उही खाई लेव और शांति से रहो।’ इतने में उसका छोटा बेटा गजोधर दारू के नशे में लड़खड़ाते हुए वहाँ आया और बोला- का रे बुढ़वा! जब देखा अपने बड़कय बेटा के नाम जपत रहत है। अरे! ऊ कमीना का नाम लेगा त का पेट भर जाई? साला कब तक इहाँ बैठ के दूनों बुड्ढा-बूडढी बोझ बना रहेगा रे, कब मरेगा तू दूनों….बोलते हुए पत्नी के कमरे में घुस के दरवाजा बंद कर लिया। बिचारा गुलेटन दास ये सब सुनकर भी कुछ नहीं बोला और न रोया ही, क्योंकि ये तो रोज का नाटक था।

 

चारपाई पर पड़े हुए वह अपने अतीत की यादों में गोते लगाने लगा। ‘कितना खुश हुए थे हम जब हमार दूसरा बेटा पैदा भवा रहा। बड़का तो इतना खुश रहा कि ऊ केहू और को उके देखे नाहीं देत रहा। कहत फिरत- मेरे भाई को किसी की नज़र न लगे। जब छोटा बेटा कुछ बड़ा भवा  तो विश्वनाथ जिद्द करके ओके स्कूल भेजा। खुद न पढ़ के उसे पढ़ाया। हम पति-पत्नी भी बेटवन के प्यार देखके कितना खुश रहत रहे।’ जब वह दसवीं पास कर कॉलेज में गवा तो खर्चा बढ़ा। विश्वनाथ तब तक एक बड़े साहब का ट्रक चलावय लगा। ओकरा के जो भी पैसा मिलत रहा ऊ भाई के पढ़ाई में लगाय देत रहा। पर छोटका गलत संगति में पड़ गवा। ऊ सारा पइसा पीयय में उड़ाय देत रहा। जब इ बात विश्वनाथ के पता चली त ऊ बड़ा दुःखी भवा रहा। इन्हीं बातों के उधेड़-बुन में पड़ा हुआ वह देर तक आसमान की ओर देखता रहा।

 

विश्वनाथ हमेशा चिन्तित रहता था। वह अपने भाई की इन्हीं करतूतों के बारे में सोच-सोच कर गाड़ी चला रहा था कि अचानक उसके सामने एक कुत्ता आ गया। उसे बचाने की कोशिश में खुद ही गाड़ी लेकर गड्ढे में जा गिरा और उसी समय उसकी मौत हो गई। यह बात जब गुलेटन को पता चली तो वह सदमें में आ गया, और तभी से बीमार रहने लगा। न कुछ खाता न किसी से बातें करता। एक लाश बनकर रह गया था वह।

 

 

वह हमेशा एक ही बात रटता- हमार लाल हमें छोड़ के काहें चला गवा….और रोने लगता। उसकी माँ का भी यही हाल था। वो भी हमेशा यमराज को बुलाती रहती। ‘हमके हमरे लाल के पास ले चलो यमराज जी! ये निरमोही बेटा के पास हम अब रहल नाहीं चाहत हैं। इतने में दरवाजा खुला और उसका पियक्कड़ बेटा लड़खड़ाते हुए बाहर आया और बोला- क्या रे बुढ़वा! तू बड़े बेटे के पास जाना चाहता है न तो कह देता क्यों नहीं कि हम गला दबा दें तुम्हारा। वह जैसे ही गुलेटन को जोर का झटका दिया वह निठाल होकर गिर पड़े। फिर उसने गालियाँ देते हुए कहा- हरामी मर गया साला! फिर आपनी माँ के पास गया। उसकी माँ अपने पति को जमीन पर पड़ा देखकर अवाक् रह गई। शराबी बेटे ने जैसे ही माँ की गरदन पकड़ी, वह भी जमीन पर लुढ़क गई। आखिर यमराज कब तक उनको बचा कर रखते और क्यों? उनको बूढ़ी माँ पर भी दया आ गई और वह उसे उसके विश्वनाथ के पास ले गए।

राजन कुमार

बेंगलूर, कर्नाटक

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz