लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

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भावांजलि
डा. राधेश्याम द्विवेदी’’ नवीन’’

दस दिन का संगीत रहा । मीत यहां पर झूम रहा ।
ताज महल की साया है। ताज महोत्सव आया है
रंग रंगीला ताज महोत्सव। सुर संजीला ताज महोत्सव ।
जित देखो तित अच्छा है। यहां दिल होता बच्चा है।
शिल्पी व्यंजन झूले हैं। अफसर लगते दूल्हे हैं।
आर्ट क्राफट संगीत सजा । गायन वादन मीत ध्वजा।
खुले मंच पर मस्ती है। मनभावन महफिल हंसती है।
जितना यह मुस्काता है। उतना मन को भाता है।
एसा ना कोई उत्सव है। जैसा ताज महोत्सव है।
आलोक ने प्रोग्राम बनाया। मुम्बई वालों को बुलवाया । ं
स्वर्ण जयन्ती मना रहा। अपनो पर इठला रहा ।
पी के सिन्हा किये शुरू। एक एक खिल रहे गुरू।
अधिकारी लग जाते हैं । शिल्पग्राम सजवाते हैं।
फलदायक है यह उत्सव। खुशियां लाया ताज महोत्सव।
जो मनभाव से काम करे। अपनी तरक्की पक्की करे।
पच्चीस साल अब आया है। सिलवर जुबली मनाया है।
मंडलायुक्त की सोच रही। डी.एम. की वह आन रही।
प्रदीप भटनागर पंकज कुमार। मुकुल गुप्ता दिनेशकुमार।
प्रभांशु श्रीवास्तव सुधीर नारायण। कविसम्मेलन गायन बादन ।
संगीत गर्ग शाहिद सिद्दीकी। देखो इनकी जोड़ी नीकी ।
कुछ तो मंच के नीचे है। औ कुछ परदे के पीछे है।
ना खुद सोते हैं न सोने दे। ताज महोत्सव को होने दें ।
सालों दर जो आता हैं। यह प्रोग्राम करवाता है।
एसी अनेक हस्तियां हैं। महोत्सव की कश्तियां हैं।
दिन हेै सिर्फ दो एक बचे। अब मत देर लगाओ चचे ।
जल्दी जल्दी आ जाओं। जो लेना हो ले जाओ।
मैं जब हूॅ तैयार खड़ा । तुम क्यों देर लगाओ बड़ा ।
विंदिया लेलो लंहगां लेलो। सस्ता लेलो मंहगां लेलो।
रूपयांे का है माल यहां। लाखों का ताम झाम यहां।
जो मुझे देखने आया हैं। वह सुख ही सुख पाया है।
जो मुझे देखने भागे हैं। भाग्य उन्हीं के जागे है।।
इसलिए समय है आजाओ। अपने भाग्य जगा जाओ।
नवीन काव्य रसपान करो। ताज महोत्सव गुणगान करो।
आगरा का यह सपना है । देखकर इसको हंसना है।।

डा. राधेश्याम द्विवेदी ’’ नवीन’’

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