लेखक परिचय

अरुण तिवारी

अरुण तिवारी

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नदी जिये या जल मरें,
बची रहे श्री सदा
ऐसा भी कमाल हो,
सत्ता ही दलाल हो, तो
क्यों न ईमान पे सवाल हो ?
जल रही मशाल है
कि उठ रहे सवाल हैं
कि आज के सवाल हैं
कि आज ही जवाब दो।
चुन गये तो क्या तुम्हीं
भगवान हो गये?
चुन रहा जो क्या उसके
अरमान खो गये ?
चुना तो पहरेदार था
क्यों भ्रष्ट आचार हो गये ?
पोशाक दी सफेद थी
क्यों दाग़दार हो गये ?
जल रही मशाल है….

पैसा तो है पसीने का
क्यों भर रहे मशीनें तुम ?
कृषि प्रधान राष्ट्र की
क्यों खा रहे जमीने तुम ?
बेच दी धरा अगर
जीयेंगे कैसे तू बता ?
बेच रहा जल हवा
साँस ले सकेगा क्या ?
जल रही मशाल है कि…
बेच दी क्यों नीतियां
अस्मिता है बेहाल क्यों ?
बढ़ रही हैं डिग्रियां तो
घट रहा लोकज्ञान क्यों ?
गर बढ़ रही तिजोरियां
तो बढ़ रहे ग़रीब क्यों ?
गर जी डी पी उङान सब

तोे रोटी के सवाल क्यों ?
जल रही मशाल है कि……

स्वप्न है महाशक्ति का
क्यों परासक्ति घट रही नहीं ?
कहीं जाति के, कहीं वर्ग के
उठ रहे है सवाल क्यों ?
छोटे-छोटे काम की
क्यों लग रही है लाइनें ?
बढ रहा है तंत्र तो
क्यों घट रही सम इनायतें ?
जल रही मशाल है कि..

ग्राम के प्रधान से
राष्ट्र के ईमान तक
बने वे जोंकपाल तो क्यों न
जन ही लोकपाल हो ?
घट रहे हो मूल्य गर
बढ रही हों कीमतें
निर्णायक ही दलाल हो तो
क्यों न निर्णय पर सवाल हों?
जल रही मशाल है कि…

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