लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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प्रियंका

प्रियंका

उ. प्र. विधान सभा चुनाव 2017

संजय सक्सेना

कांगे्रस के राष्ट्रीय महासचिच, उत्तर प्रदेश के पूर्व प्रभारी, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राहुल गांधी के करीबी दिग्गविजय सिंह ने अपनी दिली इच्छा जाहिर करके कांगे्रस के भीतर चल रही उस हवा को तेज कर दिया है जो प्रियंका के समर्थन में चल रही थीं। दिग्गी राजा आये तो थे समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और मंत्री शिवपाल यादव के बेटे की शादी समारोह के कार्यक्रम में भाग लेने के लिये लेकिन यहां उन्होंने प्रियंका ‘तराना’छेड़ कर उत्तर प्रदेश की सियासत को हवा-पानी उपलब्ध करा दिया। दिग्गी ने प्रियंका को उम्मीदों भरा चेहरा बताते हुए यूपी में प्रियंका को लांच करने की बात कही और बोले,‘ मैं तो पहले से ही चाहता था हॅू कि प्रियंका गांधी को सियासत मं उतरना चाहिए।उनका करिश्माई नेतृत्व कांगे्रस के लिये फयदेमंद होगा।फायदा उठाना चाहिए।’ दिग्गी राजा का बयान उस समय में आया है,जब प्रियंका को मिशन 2017 का चेहरा बनाये जाने की बात कांगे्रस के भीतर तेजी पकड़ रही थी।
प्रियंका अगर यूपी की सियासत में कूदती है तो उनकी इंट्री कांगे्रस के पुराने गढ़ और देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की कर्मभूमि इलाहाबाद से हो सकती है।उत्तर प्रदेश में संगम तीरे बसे इलाहाबाद की जितनी धार्मिक मान्यता है। उतनी ही इसकी अपनी सियासी पहचान है। बात चाहें देश की आजादी की हो या फिर सियासत की दोनों ही जगह इलाहाबाद के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।इलाहाबाद ने कई क्रांतिकारियों और राजनेताओं को जन्म दिया है। कांगे्रस के इलाहाबाद से रिश्ते काफी पुराने हैं।देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की पहचान भले की कश्मीरी पंडित की थी,लेकिन उनकी कर्मभूमि इलाहाबाद ही रही।नेहरू ने यहां से सियासत शूुरू की तो उनकी इकलौती बेटी इंदिरा गांधी को भी इलाहाबाद खूब रास आया। इलाहाबाद आज भी सियासी कारणों से पूरे देश में सुर्खियां बटोर रहा हैं। जब भी लोकसभा/विधान सभा का चुनाव आता है यहां राजनैतिक सरगर्मिर्या तेज हो जाती है।तेजी का यह दौर राहुल गांधी की विफलता के बाद कुछ ज्यादा ही मुखर होकर सामने आ रहा है। यहां से प्रियंका गोधी के समर्थन में आवाजें उठती है तो दबी जुबान से यहां के कांगे्रसी आलाकमान को यह अहसास कराने की का कोई मौका नहीं छोड़ते हैं कि राहुल गांधी यूपी की सियासत मंे वह मुकाम हासिल नहीं कर पा रहे हैं जिसकी कांगे्रस को दरकार हैैं। यहां के कांगे्रसी प्रियंेका गांधी में उनकी तेजतर्रार दादी इंदिरा गांधी का अश्क देखते हैं।‘ प्रियंका नहीं आंधी है,दूसरी इंदिरा गांधी है।’ के यहां नारे लगाये जाते हैं।
अदने से अदना और बड़े से बड़ा कांगे्रसी भी जानता है कि इलाहाबाद ऐसा शहर है, जिससे गांधी परिवार कभी दूरी नहीं बना सका। भले ही इलाहाबाद की दोनों संसदीय सीटों (इलाहाबाद-फूलपुर )पर 1984 के बाद से कांग्रेस का खाता नहीं खुला हो, लेकिन यहां नेहरू-इंदिरा को चाहने वालों की कमी नहीं है।इसमें कांगे्रसी भी हैं ओर आमजन भीं। यह लोग लगातार इस प्रयास में रहते हैं कि किसी तरह से प्रियंका गांधी को यहां से चुनाव लड़ा दिया जाये। कोशिशें हर बार हुई,लेकिन लगता है अबकी से यह कोशिश परवान चढ़ सकती है। 2019 के लोकसभा चुनाव से पूर्व यदि 2017 के विधान सभा में प्रियंका गांधी इलाहाबाद की किसी विधान सभा सीट से किस्मत अजमाते हुए नजर आये ंतो किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए। प्रियंका को मैदान में उतारने की योजना राहुल के खरीदे हुए रणनीतिकार बना रहे हैं।
कांगे्रसी गलियारों में चर्चा तो यह भी है कि दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को भी यूपी की सियासत में अहम किरदार निभाने को कहा जा सकता है।वह यूपी चुनाव में कांगे्रस की प्रभारी बन सकती हैं। प्रियंका गांधी,शीला दीक्षित और डा. रीता बहुगुणा जोशी की तिकड़ी के सहारे कांगे्रस आलाकमान बीजेपी को महिलाओं के मुद्दे पर बैकफुट पर धकेलना चाहती है। पीएम मोदी जिस तरह से महिलाओं के हितों के लिये काम कर रहे हैं,उससे कांगे्रस ही नहीं बसपा और समाजवादी नेतृत्व भी परेशान है।सपा के पास महिला नेतृत्व का अभाव है।इस लिये वह ज्यादा कुछ करने की स्थिति में नहीं दिखता है,लेकिन बसपा और कांगे्रस लगातार भाजपा की हवा निकलाने को मचल रही हैं।
यूपी की राजनीति में प्रियंका गांधी की इंट्री हो रही है। यह बात इस लिये और भी दावे के साथ कही जा सकती हे क्योंकि कांगे्रस अध्यक्षा सोनिया गांधी अचानक इलाहाबाद को लेकर काफी गंभीर हो गई हैं। सोनिया एक महीने के अंदर इलाहाबाद की दो बार चक्कर लगा चुकी हैं।सोनिया की दोनों ही यात्राएं गोपनीय रखने की कोशिश की गई थी। पहली यात्रा के दौरान तो उनकी कुछ कांगे्रसी नेताओं से मुलाकात हो भी गई दूसरी यात्रा के दौरान वह किसी से नहीं मिली।सोनिया के इलाहाबाद दौरे को राजनैतिक पंडित प्रियंका से जोड़ कर देख रहे हैं। आने वाले समय में भी सोनिया की कई यात्राओं की बात कही जा रही है।
वैसे,यह बात भूलना नहीं चाहिए कि बंुरे समय में इलाहाबाद से कई बार कांग्रेस ने खोई हुई ताकत हासिल की है।अतीत पर नजर दौड़ाई जाये तो इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से अलग होने के पश्चात जब फूलपुर को संसदीय क्षेत्र का दर्जा हासिल हुआ तो 1957 में यहां से देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने चुनाव लड़ा था। 1962 में भी नेहरू यहां से चुनाव जीते ।नेहरू के बाद उनकी बहन विजय लक्ष्मी पंडित और वीपी सिंह ने भी यहां से चुनावों मेे जीत हासिल करके कांगे्रस का मान बढ़ाया था। 1984 के बाद से कांगे्रेस को यहां से जीत हासिल नहीं हो पाई। नेहरू ने जब इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ा तो उन्हीं वर्षो (1957-1962) में इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से नेहरू के सबसे करीबी लाल बहादुर शास्त्री चुनाव जीतते रहे। इलाहाबाद संसदीय क्षेत्र से पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह,दिग्गज कांगे्रस नेता हेमवती नंदन बहुगुणा और 1984 में अभिनेता से नेता बने अमिताभ बच्चन भी चुनाव जीत कर शोहरत हासिल कर चुके हैं।बाद में समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र,रेवती रमण सिंह और भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी को भी यहां से जीत हासिल करने का सौभाग्य हासिल हुआ।कांगे्रस से अलग होने के पश्चात 1988 में वीपी सिंह यहां हुए उप-चुनाव में उतरे और निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर जीत हासिल की।
इलाहाबाद से इंदिरा गांधी चुनाव भले ही नहीं लड़ी थी,लेकिन उनका लगाव हमेशा ही इस जिले से बना रहा। यही बात राजीव गांधी के साथ भी जुड़ी थी। हालांकि पिछले तीन दशकोे से कांग्रेस के परिवार या उसका वफादार उम्मीदवार नहीं मिलने के कारण यहां से कांगे्रस का प्रभाव काफी कम हो गया है।हाल ही में इलाहाबाद पहुंची सोनिया गांधी से स्थानीय कार्यकर्ताओं ने प्रियंका को यहां से चुनाव लड़ाने की मांग की थी। तब सोनिया गांधी ने इस पर विचार करने का आश्वासन भी दिया था। यह माना जा रहा है कि नवंबर के मध्य तक इस बात की औपचारिक घोषणा कर दी जायेगी। नवंबर इस लिये महत्वपूर्ण है क्यांेकि इसी माह 14 नवंबर को प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू का और 19 नवंबर को पूर्व पीएम इंदिरा गांधी का जन्मदिन मनाया जाता है। नेहरू-इंदिरा गांधी के जन्मदिन समारोह के दौरान प्रियंका के नाम पर मुहर लग सकती है। प्रियंका के नाम की घोषणा नवंबर में एक और वजह यह है कि कांगे्रस चाहती है कि प्रियंका के नाम की घोषणा जितनी देरी से होगी,उतना उनके नाम का के्रज बना रहेगा।
प्रियंका को यूपी की सियासत में उतारने और उन्हें इलाहाबाद से चुनाव लड़ाने के पीछे की वजह प्रशांत किशोर बताये जाते हैं।इस क्षेत्र में कांग्रेस की संभावनाएं प्रबल हैं।यहां की जनता का आज भी नेहरू परिवार से भावनात्मक लगाव है। 2012 के विधान सभा चुनाव के समय भी कांगे्रसं इलाहाबाद से एक सीट निकालने में पार्टी सफल रही थी। बात आगे बढ़ाई जाये तो यह अहसास सबको है कि उत्तर प्रदेश और नेहरू गांधी परिवार का रिश्ता पुराना है। इस परिवार को यूपी से जितना मिला, उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। अगर देश की सियासत में इस परिवार का चार पीढि़यों से सिक्का चला तो यूपी और उसमें भी खासकर इलाहाबाद, रायबरेली, अमेठी,सुल्तानपुर के योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता है।यूपी में इस परिवार की सियासत का परचम फहराया तो पूरे देश में इसका प्रभाव देखने को मिला। दिल्ली की सत्ता यूपी के रास्ते से होकर गुजरती है। यह बात नेहरू-गांधी परिवार से बेहतर कौन जान सकता है। यूपी में कांगे्रस कमजोर हुई तो दिल्ली से भी उखड़ गई।कांगे्रस की उत्तर प्रदेश में ऐसी दुर्दशा बस एक बार इमरजंेंसी के बाद हुए लोकसभा चुनाव में देखने को मिली थी।तब और कारण थे,लेकिन आज उत्तर प्रदश्ेा में कांगे्रस कमजोर है तो उसकी वजह कांगे्रस के शीर्ष नेतृत्व का कमजोर पड़ना। राजीव गांधी की असमायिक मौत के बाद सोनिया गांधी ने लम्बे समय तक कांगे्रस को संभाले रखा भी,लेकिन जब से वह पुत्र मोह (राहुल गांधी को पीएम बनते देखने का सपना) में फंस गई तब से कांगे्रस की यूपी में बुरी स्थिति हो गई।
बात प्रियंका की यूपी की सियासत कें कूदने की संभावनाओं से हट कर की जाये तो उत्तर प्रदेश में कांगे्रस फिर से खड़ी होना चाहती है, लेकिन उसको गांधी परिवार से वैसा सहारा नहीं मिल रहा है,जैसा इंदिरा और राजीव गांधी के समय में मिला करता था अभी तक के जो हालात थे,उसके तहत प्रियंका गांधी को आगे बढ़ने नहीं दिया जा रहा था तो राहुल गांधी की अपरिपक्तता कांगे्रस की वापसी के अभियान में बड़ा रोड़ा साबित हो रही है। हर चुनाव में कांगे्रसी वापसी की उम्मीद करते हैं और मुंह की खानी पड़ती है। करीब दो दशकों से यह सिलसिला चला आ रहा है। उम्मीद तो यही की जानी चाहिए कि 2017 के विधान सभा चुनाव कांगे्रस के लिये शुभ संकेत लाये,लेकिन ऐसा होगा इसकी संभावना न के बराबर है।क्योंकि जब भी नतीजे आते हैं तो कांगे्रस जीत तो दूर तीसरे/चैथे स्थान पर ही संतोष करना पड़ता है। हर हार के बाद कुछ समय के लिये कांगे्रसी खामोशी की चादर ओढ़ लेते हैं और दिन बीतने के साथ चादर खिसकती जाती है। जब कांगे्रसियों के पास कोई वीजन नहीं होता है तो जनता को बार-बार नेहरू-गांधी परिवार की कुर्बानी की याद दिलाकर भावनात्मक रूप से ब्लैकमेंल किया हैं,जो हमेशा कारगर नहीं होता है। कहा जा रहा है कि प्रंशात किशोर ने कांगे्रस के युवराज राहुल गांधी को संकेत दे दिया है कि अगर उनकी रणनीति के अनुसार कांगे्रस आगे बढ़ती है तो उत्तर प्रदेश में कांगे्रस को बहुमत तो नहीं मिलेगा,लेकिन उसकी जीत का आंकड़ा तिहाई की संख्या में जरूर पहुंच जायेगा,जिसका फायदा यह मिलेगा कि यूपी में सत्ता हासिल करने के लिये कोई भी दल कांगे्रस को अनदेखा नहीं कर पायेगा। यानी 2017 में कांगेस का किंग (मुख्यमंत्री) भले ही न बन पाये लेकिन राहुल गांधी किंगमेकर की भूमिका में जरूर आ जायेंगे।

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