लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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पनामा लीक्स

पनामा लीक्स

प्रमोद भार्गव

मध्य अमेरिकी देश पनामा से सक्रिय कालेधन से जुड़े कारोबारियों की सार्वजनिक हुई सूची से एक बात स्पष्ट हुई है कि भारत समेत दुनिया के ज्यादातर देशों की राजनीति,उद्योग,फिल्म और खेल से जुड़ी नामी हस्तियां अपने देश के कानूनों की अवहेलना कर रही हैं। विदेशों में वैध-अवैध इस ताजे खुलासे से फिलहाल वैश्विक स्तर पर हल्ला मच गया है। पनामा की कानूनी कंपनी मोसेक फोनसेका की 15 लाख फाइलों के 1.15 करोड़ पृष्ठ जारी हुए हैं। इन दस्तावेजों के जरिए 2,14,153 कंपनियों से जुड़े 14,153 लोगों के नाम उजागर हुए हैं। ये वे लोग हैं,जो अपनी जन्मभूमि व कर्मभूमि से  कमाए कालेधन को इस देश में लाए। इस कालेधन को सफेद बनाने की प्रक्रिया, मसलन मनी लाॅन्ड्रिंग के जरिए लाया गया। 78 देशों के 370 से भी ज्यादा पत्रकारों के एक महासंघ ने महीनों तक की गहन जांच के बाद यह खुलासा किया है। इसमें दुनिया के दिग्गज नेताओं समेत भारत के महानायक अमिताभ बच्चन और उनकी बहू ऐशवर्या राय बच्चन के साथ 500 लोगों के नाम हैं। हालांकि यह हकीकत तो सरकारी स्तर पर जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगी कि किस कारोबारी का कितना धन काला है और कितना सफेद ?

मध्य अमेरिकी देशों में महज 40 लाख की आबादी वाला पनामा एक ऐसा देश है,जहां की सरकारें स्विट्रलैंड की तरह टैक्स हैवन के जरिए अपने बैंकों के वित्तीय कारोबार को प्रोत्साहन व सरंक्षण देती रही हैं। इस देश का इस्तेमाल धनी,बलशाली,तस्कर व अपराधियों के धन को सफेद बनाने के लिए बड़े पैमाने पर किया जाता है। यही वजह है कि स्विस बैंकों की तरह पनामा भी काले कारोबारियों के लिए एक सुरक्षित पनाहगाह बन गया है।

पनामा की मोसेक फोनसेका नाम की जिस कंपनी के दस्तावेज लीक हुए हैं,इसे फर्जी कंपनियां खोलने में महारत हासिल है। कंपनी खाताधारी का स्वामित्व छिपाकर और फर्जी दस्तावेजों की कूट रचना करके पूंजी का निवेश कराने का उपाय करती है। इसका कारोबार लंदन,बीजिंग,मियामी,ज्यूरिख समेत 35 देशों में फैला हुआ है। कंपनी द्वारा इस तरह से किए जा रहे फर्जी कारोबार से कई देशों की अर्थव्यस्था बुरी तरह प्रभावित हो रही थी। इन देशों को संदेह था कि मोसेक फोनसेका फर्जी दस्तावेज बनाकर अनेक देशों के धन-कुबेरों की पूंजी निवेश के गोरखधंधे में लगी है। इसलिए इंटरनेशनल कांसोर्टियन आॅफ इनवेस्टिगेटिव जर्नलिस्ट व 107 अन्य समाचार-पत्र समूह इस कंपनी के गोपनीय ढंग से दस्तावेज खंगालने में लग गए। इस संगठन में भारत का इंडियन सक्सप्रेस समाचार-पत्र समूह भी शामिल है। 78 देशों के 370 से भी अधिक पत्रकारों ने इस गैर कानूनी निवेश की लगातार महीनों पड़ताल की और नाम व पतों की दस्तावेजी पुश्टि होने के बाद यह खुलासा किया। 2010 में अमेरिका में हुए विकीलीक्स खुलासे के बाद इसे विश्व का सबसे बड़ा विस्फोटक खुलासा माना जा रहा है। विकीलीक्स ने 5 लाख फाइलों का खुलासा किया था,जबकि पनामा लीक्स ने 1.15 करोड़ से ज्यादा दस्तावेजों को सार्वजनिक करने में बड़ी सफलता पाई है। दुनिया की बड़ी राजीनीतिक हस्तियों व आतंकवाद से जुड़े संगठनों के नाम भी इसमें दर्ज हैं,इसलिए यह विस्फोटक व सनसनीखेज खुलासों में से एक माना जा रहा है।

जिन बड़े नेताओं के नाम उजागर हुए हैं,उनमें प्रमुख हैं,रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, मिस्त्र के पूर्व राष्ट्रपति होस्नी मुबारक, सीरिया के राष्ट्रपति बरार अल असद, लीबिया के पूर्व लीडर गद्दाफी, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ एवं उनके दो बेटे , पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो, आइसलैंड के प्रधानमंत्री जोहाना, साऊदी अरब के शाह और ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमराॅन के परिजनों की कंपनियां शामिल हैं। अर्जेंटीना के फुटबाॅल खिलाड़ी लियोनेल मैसी का नाम भी सूची में दर्ज है। इस में करीब भारत की 500 कंपनियां, प्रतिष्ठान,ट्रस्ट एवं 234 भारतीय लोगों के नाम है। जिसमें बाॅलीवुड के अमिताभ बच्चन उनके बेटे अभिषेक बच्चन की पत्नी व हिरोइन ऐशवर्या राय, डीएलएफ के मालिक केपी सिंह, उद्योगपति गौतम अडानी के बड़े भाई विनोद अडानी, इंडिया बुल्स के मालिक समीर गहलोत और सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व महाधिवक्ता हरीश साल्वे जैसे मशहूर वकील के नाम शामिल हैं। अंडरववाल्र्ड डाॅन इकबाल मिर्ची का नाम भी है। इसमें हिजबुल जैसे आतंकी संगठन, मैक्सिको के ड्रग तस्कर के अलावा उत्तर कोरिया और ईरान जैसे देशों के साथ व्यापार करने के कारण अमेरिकी सरकार की काली सूची में दर्ज 33 लोगों और कंपनियों के नाम भी शामिल हैं। ये आंकड़े 1977 से लेकर 2015 तक के हैं। 28 राजनेताओं और नौकरशाहों के गुप्त वित्तीय लेनदेन के ब्यौरे भी हैं।

दरअसल दुनिया में 77.6 प्रतिशत काली कमाई ‘ट्रांसफर प्राइसिंग‘ मसलन संबद्ध पक्षों के बीच सौदों में मूल्य अंतरण के मार्फत पैदा हो रही है। इसमें एक कंपनी विदेशों में स्थित अपनी सहायक कंपनी के साथ हुए सौदों में 100 रुपए की वस्तु की कीमत 1000 रुपए या 10 रुपए दिखाकर करों की चोरी और धन की हेराफेरी करती हैं। पनामा की मोसेक फोनसेका कंपनी यही गोरखधंधा कर रही थी। भारत समेत दुनिया में जायज-नजायज ढंग से अकूत संपत्ति कमाने वाले लोग ऐसी ही कंपनियों की मदद से एक तो कालेधन को सफेद में बदलने का काम करते हैं,दूसरे विदेश में इस पूंजी को निवेश करके पूंजी से पूंजी बनाने का काम करते हैं। हालांकि इस कंपनी का दावा है कि वह तो विधि-सम्मत काम करती है। दरअसल समस्या की असली जड़ यहीं हैं। यूरोप के कई देशों ने अपनी अर्थव्यस्था को मजबूत बनाए रखने के लिए दोहरे कराधान कानूनों को वैधानिक दर्जा दिया हुआ है और इन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सरंक्षण प्राप्त है। पनामा और स्विट्रलैंड जैसे देशों के बैंकों को गोपनीय खाते खोलने,धन के स्रोत छिपाने और कागजी कंपनियों के जरिए लेनदेन के कानूनी अधिकार हासिल हैं। इन गोपनीय बैकिंग नियमों का लाभ भ्रष्ट राजनेता कालेधन के कुबेर और माफिया सरगना एवं तस्कर उठा रहे हैं। पनामा पेपर्स के जरिए जिन लोगों के नाम सार्वजनिक हुए हैं,उसमें से अधिकतर कर चोरी से संबद्ध हैं। क्योंकि जर्मन अखबार के जिस पत्रकार सुडेष ख्यजेतुंग ने मोसेक फोनसेका के जरिए कर चोरी का जो पहला दस्तावेजी सूत्र पकड़ा था,वह इसी हेराफेरी से संबद्ध था। इसी के बाद आईसीआईजे के गठन की पृष्ठभूमि बनी और 8 माह की खोज व अनुसंधान के बाद कंपनी का पर्दाफ़ाश हुआ।

आईसीआईजे का यह पहला खुलासा नहीं है, इसके पहले भी वह 2013 में इसी प्रकृति का एक खुलासा कर चुकी है। इसलिए इस ताजा खुलासे के बाद वित्तमंत्री अरुण जेटली ने कहा है कि ‘प्रर्वतन निदेशालय एचएसबीसी और उससे पहले की आईसीआईजे के राजफाश पर 43 विदेशी खातों की जांच कर रहा है। आईसीआइजे द्वारा 2013 में बताई गई सूचना के आधार पर राजस्व विभाग के 434 लोगों की पहचान की है,जिनमें से 184 ने विदेशी ईकाइयों से सौदे की बाद स्वीकार ली है। इन खातों के विस्तृत आकलन के बाद लगभग 6500 करोड़ रुपए की अवैध संपत्ति का पता चला है।‘ अमेरिका सीनेट की एक रिपोर्ट के से भी यह उजागर हुआ था कि ब्रिटेन के हांगकांग एंड शंघाई बैंक काॅर्पोरेशन यानी एचएसबीसी बैंक मनी लाॅन्ड्रिंग में शामिल है। रिपोर्ट में स्पष्ट तौर से कहा गया था कि इस बैंक के कर्मचारियों ने गैर कानूनी तरीक से कालाधन का हस्तांतरण किया है। कुछ धन का लेनदेन आतंकवादी संगठनों को भी किया है। इस खुलासे के बाद भारतीय रिर्जव बैंक ने भी अपने स्तर पर पड़ताल की थी, लेकिन इस पड़ताल के निष्कर्श क्या निकले,यह कोई नहीं जानता।

नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल कालाधन जमाखोरों को धन वापसी की एक अच्छी योजना सुझाई थी। इसके तहत 90 दिन के भीतर कालाधन घोषित करने को कहा था। यह अवैध धन को वैध बनाने की उत्तम योजना थी,किंतु महज 638 लोगों ने 3770 करोड़ रुपए घोषित किए। जिन्होंने ऐसा नहीं किया और यदि भविष्य में उनके पास कालाधन पाया जाता है तो वह निश्चित ही जुर्माना और जेल के हकदार होने चाहिए,क्योंकि मोदी सरकार कालेधन की वापसी का जनता को पुख्ता भरोसा देकर ही सत्तारूढ़ हुई है। हालांकि कालाधन वापसी के लिए बनाए गए विषेश जांच दल के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एमबीशाह ने भी पनामा लीक्स को गंभीरता से लिया है। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देष पर एसआर्दटी का गठन राजग सरकार ने ही 2014 में किया था। भारत समेत कुछ अन्य देशों की तमाम कोशिशों के बावजूद वैश्विक स्तर पर कोई ऐसी कानूनी-व्यवस्था अब तक नहीं बन पाई है,जिससे कालेधन के कारोबारी हतोत्साहित हों और कराधान की दोहरी व्यवस्था पर अंकुश लगे। इसलिए मोदी सरकार और एसआईटी का फर्ज बनता है कि पनामा खुलासे के बाद कुछ ऐसे परिणाम सामने आएं,जिनसे यह संदेश निकले की काला-कारोबारी कितनी बड़ी व किसी भी क्षेत्र की शाख्सियत क्यों न हो,उसे किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

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